بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ محمدي ښوونځى د پېغمبراکرم (ص) د  ويناوو، موعظو، ليکونو، سپارښتنو، سنتونو … پښتو ټولګه څېړنه : اجرالدين اقبال د (( ديني ملي)) خوځښت پلويانو ته، چې د راتپل شويو خوځښتونو له پايلو ستړي ستومانه شوي او روڼ سباوون ته سترګې پر لار دي.           لړليک د […]

 

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ

محمدي ښوونځى

د پېغمبراکرم (ص) د  ويناوو، موعظو، ليکونو، سپارښتنو، سنتونو … پښتو ټولګه

څېړنه :

اجرالدين اقبال

د (( ديني ملي)) خوځښت پلويانو ته،

چې د راتپل شويو خوځښتونو له پايلو ستړي ستومانه شوي

او روڼ سباوون ته سترګې پر لار دي.

 

 

 

 

 

لړليک

د اسلامي نړۍ حديثي ټولګې.. 42

(الف) د اهل سنتو د احاديثوغوره کتابونه : 42

د”امام بخاري” لنډه پېژندنه. 42

“صحيح مسلم”. 43

د”امام مسلم” لنډه پېژندنه. 44

“جامع ترمذي”. 44

د”امام ترمذي” لنډه پېژندنه. 45

“سنن ابوداود”. 45

د امام “ابوداود” لنډه پېژندنه. 46

“سنن نسائي”. 46

د”امام نسائي” لنډه پېژندنه. 47

“سنن ابن ماجه”. 48

د”امام ابن ماجه” لنډه پېژندنه. 48

“سنن دارمي”. 49

“الموطا”. 49

“دامام احمد بن حنبل مسند”. 49

د “اماميه شيعه وو” د احاديثوغوره  کتابونه. 50

“اصول کافي”. 50

د”شيخ  کليني” لنډه پېژندنه. 50

د شيخ صدوق لنډه پېژندنه. 51

“تهذيب الاحکام”. 51

د شيخ طوسي لنډه پېژندنه. 51

“استبصار”. 52

“بحارالانوار”. 52

د شيخ مجلسي لنډه پېژندنه. 52

“وافي”. 53

د ملامحسن فيض کاشاني لنډه پېژندنه. 53

“وسايل الشيعه”. 53

د حرعاملي لنډه پېژندنه. 54

بسم الله… 55

خويونه. 55

بدخویه. 55

ناوړه وګړي.. 55

بخيل. 56

کشران او مشران.. 57

الهي لارښوونې.. 57

ټلوالي.. 57

الهي تقوا 57

ځورول. 58

هديره 58

ګهيځ.. 58

حرص…. 58

نېکمرغه. 59

کار. 59

ښه چلن.. 60

نېک چارى زوى.. 61

لاس… 61

قناعت.. 62

توکل. 62

ټوکې.. 62

سخي.. 63

ورین تندی.. 63

ملګري.. 63

لیده کاته. 64

پاکوالى.. 64

استغفار. 64

عاجزي.. 64

نسپالي.. 65

پلور پېر. 65

د خدای وېره 65

ښکلا.. 65

زغمناک… 66

ریا 66

ښه بوی.. 67

سوداګر. 67

اسراف… 68

یووالی.. 69

راز ساتنه. 69

حق.. 69

شهید. 70

امن او روغتیا 70

امین.. 71

غوره وګړي.. 71

لاروی.. 72

ډار اچول. 72

زړښت.. 72

عزت.. 73

پاسوالي.. 75

ځاني غوښتنې.. 75

ناپوهي.. 76

نشتمني.. 76

ایمان.. 77

ناشکري.. 78

ځوان.. 78

ناوړه چارې.. 78

د پت دفاع.. 78

خوار او ذلیل. 79

نوم بدي.. 79

سفر. 79

په سفر کى د نورو حق ته پاملرنه. 80

له څارویو سره نېکي.. 80

رښتین.. 81

دښمن.. 83

بېځایه رټنه. 83

خپلمنځي جوړجاړى.. 83

روغتيايي احاديث.. 84

مسواک… 85

سلام  اچول. 87

د ګاونډي حق.. 89

اولاد. 90

اخر وخت او قیامت.. 92

د جمعې د ورځې خطبه. 94

شمع. 94

اذان.. 94

بډې.. 95

وصیت.. 95

انګېرنې.. 95

لارښود. 95

جهاد. 95

قریش… 96

واکمني.. 97

کرنه. 97

د کهف سورت.. 98

لوڼې.. 99

د اسلامي ټولنې د وګړيوخپلمنځي اړيکې.. 99

عیال. 100

د غونډې آداب.. 100

شعر. 101

پرنجى او پړمخکۍ.. 102

ځان سینګارول. 102

نامحرمو ته کتل. 103

د ايمان نښې.. 103

وفا 104

الهي تقدير. 104

اړتیا پټه ساتل. 104

ساتېري.. 105

متقي شتمن.. 105

نفقه. 105

سخي او بخیل. 105

سخاوت.. 106

بدګوماني.. 107

دروغ.. 108

قیامت.. 111

منځلاري.. 113

الفت او مينه. 114

امانت.. 115

امت.. 117

اسلامي مذاهب.. 118

لاروي.. 120

عاجزي او تواضع. 121

کنځل کول. 121

غيبت.. 123

غيرت.. 126

فتوا 127

کنځلې.. 128

فراغت.. 129

هېر. 130

پرښتې.. 131

خواړه 131

مسافر. 134

غصب.. 134

غفلت.. 135

غنيمت ګنل. 136

عورت (ستر). 138

عيب.. 139

عطر. 143

عفت.. 143

عقل. 144

د خير غوښتنه. 146

تمه. 146

عاقبت.. 147

عبادت او بنده 147

عُجب ( وياړنه). 150

عدالت.. 151

عذاب.. 152

عذاب ژغورنه. 154

طلاق.. 154

زړه سوى.. 156

صلوات.. 158

سوله. 160

صدقه. 161

د مؤمن پاڼه. 163

زغم او صبر. 164

ګهېځ.. 167

شيطان.. 168

شهوت.. 170

شهادت.. 170

شوخي.. 171

پېژندنه. 171

توره 173

ښکار. 173

شکر او مننه. 173

سپارښتنه (شفاعت). 174

مياشتې.. 176

وينځل. 177

شريک او برخوال. 177

شرک… 178

شرافت.. 179

شراب.. 179

شرابخور. 181

مړانه او شجاعت.. 181

بيړه 181

ورته والى = يو شان والى.. 182

شبهات.. 183

شاهدي ورکول. 183

خوشحالول. 184

خوړل. 185

د مؤمن خوشحالول. 186

سخت زړي.. 186

نښې.. 187

د فيزيولوژيکي انګېزو په اړه احاديث.. 191

د بشري نوعي د پايښت په اړه احاديث.. 192

مور. 193

د اروايي او روحي انګېزو په اړه احاديث.. 194

د سيالۍ د انګېزې په اړه 195

د مالکيت انګېزه 196

د انګېزې او عاطفې تر منځ اړيکه. 197

د انګېزو تر منځ  شخړه 197

د انګېزو کابو کول. 200

د غريزې بې لاري.. 208

مينه. 210

(الف) له خداى تعالى سره مينه. 210

( ب ) له پېغمبر اکرم سره مينه. 211

( ج) له خلکو سره مينه. 211

( د) د  خداى له پنځوليو سره مينه. 215

( ه) له اولاد سره مينه. 215

( و ) جنسي مينه. 217

( ز) له شتمنۍ سره مينه. 217

کينه. 218

آخرت گروهنه. 218

حيا 219

پر عواطفو برلاسي.. 223

پر کبر برلاسي.. 223

غم او پر خپګان برلاسي.. 224

د غم پرمهال دعا 227

دغم له منځه وړونکی.. 229

حسي ادارک… 229

له حس اخوا ادراک… 229

فکر کول. 232

بنسټګر. 234

د فکر کولو تېروتنې.. 235

زده کړه 237

د يادولو لارې چارې.. 240

تقليد او لاروي.. 240

ازمېښت او تېروتنه. 241

شرطي سازي Conditioning.. 242

اندنه او فکر کولوته هڅونه. 242

دزده کړې اصول. 243

بدله ورکول. 249

په زماني واټن کې زده کړه 250

تکرار. 250

رغنده سيالي.. 251

په پوښتنې د پام راړول. 252

په مثال او تشبيه د پام رااړول. 253

انځورول. 255

امبريالوژي (جنين پوهنه). 257

کوچني.. 259

د خوړو اداب.. 259

ځوان ته د پېغمبراکرم نصيحت.. 260

شخصيت.. 260

د مېرمنې د ټاکنې غوره کچه. 262

دوستي.. 262

زړه 263

بنيادم. 265

ځان ساتنه. 266

اروايي روغتيا 266

کرهڼه. 268

ورهڼه. 268

ډاډمني او روغتيا 269

ځواک… 270

اروايي درمل. 271

د اولاد روزنه او درناوى يې.. 276

لوڼې.. 285

د جګړې د بنديانو ملاتړ. 287

ښځه. 288

د ښځمنوملاتړ. 290

له دوه ځانو(اميندوارو) ښځوملاتړ. 293

واده، سم کوروالى او د اولاد پر زوکړه اغېزمن لاملونه. 297

ايمان.. 303

له ظالم سره مرسته. 305

وفا 305

الهی تقدیر. 305

تر مړينې وروسته ژوند. 305

دوه مخي.. 306

اسانخوښی – راحت طلبي.. 309

یقین او زهد. 309

مسکین.. 309

احسان.. 310

غوره کړنې.. 311

ناوړه کړنې.. 311

خپلمنځي اړیکې.. 313

تله. 313

ډار. 314

تسبيح.. 314

تسليت.. 315

په جنازه کې ګډون.. 315

د عقايدو څارنه. 316

تقيه. 316

کبر. 317

تکلف… 318

تکليف… 318

کنجوسي.. 318

يوازېتوب.. 320

غښتليتوب.. 320

توبه. 322

توفيق.. 323

د نورو سپکاوى.. 323

تور. 324

ثواب.. 324

کوډګر. 325

جبر او اختيار. 325

ټولى.. 326

غوړه مالي.. 327

د سترګو وهل ( نظرېدل ). 327

حج.. 328

حجامت.. 328

حد او پولې.. 329

حرام اوحلال. 329

حساب.. 331

حسرت.. 331

حق اوحقيقت.. 332

حقوق.. 333

شفاعت.. 333

د مؤمن حقوق.. 333

پر مسلمان د مسلمان حقوق.. 334

حکمت.. 335

حماقت.. 337

څاروي.. 337

کورنۍ.. 338

خبر. 339

خداى.. 340

زړه وژونکي.. 340

تاوتريخوالى.. 340

خوشحالي.. 341

ژغورنه. 342

خندا 344

خوب.. 345

خواري.. 347

غوښتل. 347

نېکي.. 348

خواړه 350

لمر. 352

خطاطي.. 352

په ژوند کې بسياېنه. 353

خپلوان.. 353

خياطي – ګنډل. 354

خيانت.. 354

خير. 357

شتمني.. 358

درمل. 360

پوهه. 360

ښوونکى.. 366

د عالم مړينه. 367

عالمان.. 367

ورمندون- قضاوت ( منځګړتوب). 367

نېک… 368

وصيت.. 369

اودس… 369

واکمني.. 370

وليمه. 370

هجرت.. 371

ډالۍ.. 371

ګاونډى.. 372

د شرافت لامل. 372

د ورکاوي لاملونه. 372

د خداى ياد. 373

د مرګ ياد. 374

مرسته. 375

پلارمړى (يتيم). 376

يقين.. 377

د خداى وحدانيت (توحيد). 379

يهود. 379

ډوډۍ.. 380

نبوت.. 380

نجوا ( پسپسکې). 381

نرمي.. 381

نږدېوالى.. 383

نصيحت او خيرغوښتنه. 383

نعمت.. 384

ښېرا 385

لمونځ.. 385

د شپې لمونځ.. 388

اوبه. 390

نهيلي.. 390

اړتيا 391

نيت.. 391

چل. 392

مېلمه. 393

ورکاوى.. 394

بېوسي.. 395

نوک… 395

ناپوهه. 396

نفلونه. 396

نوم. 397

لیک… 397

مړه خوا 398

وېښته. 398

مؤمن.. 399

لورنه. 403

مهر. 404

مسئووليت.. 404

نشه يي توکي.. 405

جومات.. 405

مسلمان.. 406

سلامشوره 407

مصيبت ( کړاو ). 408

معاشرت.. 411

مينه. 411

ستاېنه. 413

سړيتوب او انسانيت.. 414

خلک… 415

مړينه. 417

پراخي.. 418

ګومان.. 419

بې لاري.. 419

ګناه. 420

غوږ. 423

غوښه. 424

ګوښه کېناستل. 425

ځېل. 425

لعنت.. 425

لواط.. 426

زنا – بدلمني.. 427

نبوي کورنۍ.. 428

امام مهدي عليه السلام. 447

حضرت فاطمه الزهرا 447

حسنين.. 451

د امت غوره مېرمن.. 453

له حضرت علي سره مينه. 453

اصحاب.. 454

ماعون.. 455

مبارزه 456

شخړه 456

مجازات.. 457

غونډې.. 457

پور. 459

قسم. 460

غچ ،کسات.. 460

قضاوقدر. 461

قوم. 461

غښتلتيا 462

غوسه کول. 462

نېکچاري.. 468

کورنۍ ته هڅاند. 470

د نن کار سبا ته پرېښوول. 471

وژنه. 472

کعبه. 473

کفر او کفران.. 474

کمال. 475

ډنډۍ وهل. 475

ژړا 477

قرآن.. 479

قدر او منزلت.. 483

سوکړه- قحطي.. 484

قبر. 484

فقه او فقهاء. 486

فضيلت اوغورواى.. 487

فقر او نيستي.. 488

ځانمني.. 490

ملاماتوونکي لاملونه. 491

بلنه. 491

تېراېستنه. 492

دنيا 493

ملګرى.. 494

دوستي.. 494

له قحطۍ د ژغورنې لاملونه. 495

ليده كاته او زيارت.. 495

دينار او درهم ( پيسې). 496

دين.. 497

رښتيا 498

ربا 498

د رجب مياشت.. 499

د روژې مياشت.. 500

روژه 501

غازي.. 506

رسوايي.. 506

د مسلمانانو چارو ته پاملرنه. 507

بډې.. 507

رنګونه. 507

ورځې.. 508

روزي.. 509

غوړي.. 510

د خوب ليدل. 510

څوكۍ او مقام. 511

ريا او د ځان مشهورول. 512

ژبه. 515

زكات.. 519

د چا لمونځ نه قبلېږي.. 521

ځمكه. 521

تېرى– ظلم. 522

سپارښتنې.. 523

له اسلامه وتلي.. 524

ښېرا 524

مظلوم. 524

ښكلا.. 526

ځيركي.. 526

جګړه مار. 527

خداى ته سجده كول. 527

ګهيځ پاڅېدل. 528

خبرې او حديث.. 528

د خداى پرتم. 530

پړه 530

لوبې.. 531

مولا  او مشر. 532

د اوبو وركړه 532

چوپتيا 532

د واکمن ماڼۍ.. 535

ملعون.. 535

پت.. 535

اور. 536

داسې وخت به راشي.. 536

ملګرتوب.. 539

هيله. 539

ازار. 541

ازمېښت.. 541

بلا.. 541

خداى چې له بنده خوښ شي.. 543

د بدمرغۍ نښې.. 544

آفتونه. 544

پيدايښت.. 544

ښوونه. 545

مزدوري.. 546

ځانګړې اجازه 546

احتکار. 547

اخلاص…. 548

ښه خوى.. 549

ادب.. 551

ميراث.. 552

اسلام او د مسلمانانوحقوق.. 552

د خوړو ورکړه 554

مشري او چارواکي.. 555

پرنېکيو امر و له بديومنع. 556

امنيت.. 558

نهيلى.. 559

انتظار. 559

زغم. 559

پند. 559

فکر. 560

انفاق او لګښت.. 561

اولياء الله… 561

ايمان.. 562

بازار. 565

سوداګري.. 566

بښنه. 567

بدمرغي او نېکمرغي.. 569

بدعت.. 571

شر او بدي.. 573

برابري.. 573

د رسول اکرم ورور. 574

برکت.. 574

کينه او دښمني.. 575

بنده او بندګي.. 579

جنت او دوزخ.. 581

خپلسري.. 588

ناروغ او پوښتنه يې.. 588

بدله او اجر. 591

تقوى او پرهېزګاري.. 592

پاکي.. 594

مور و پلار. 594

پوښتنه. 600

طبابت.. 601

پستي.. 601

پښېماني.. 602

جامې.. 603

پېغمبران.. 604

تړون،ژمنه او وعده 605

بريا 606

سپکاوى.. 606

مجاهد فقيه. 609

علي (ک) ته د پېغمبراکرم سپارښتنې.. 610

حكمتونه. 620

د حلم آثار او څانګې.. 621

د علم څانګې.. 621

د ودې څانګې.. 622

د عفاف څانګې.. 622

د مړه خواينې يا  ځان ساتنې څانګې.. 622

د حيا څانګې.. 622

د وقار څانګې.. 623

پر خير د ټينګار څانګې.. 623

له شره د كركې څانګې.. 623

د ناصحانو د لاروۍ څانګې.. 624

د ناپوهه نښې.. 624

د اسلام نښې.. 625

ايمان  نښې.. 625

د علم نښې.. 625

د رښتين نښې.. 626

د مؤمن نښې.. 626

د پراخې سينې خاوند نښې.. 626

د توبه ګار نښې.. 626

د شكر كوونكي نښې.. 626

د خاشع نښـې.. 627

د صالح نښې.. 627

د ناصح نښې.. 627

د يقين لرونکي نښې.. 627

د مخلص نښې.. 628

د زاهد نښې.. 628

د نېک انسان نښې.. 628

د تقوا لرونکي نښې.. 628

د متکلف نښې.. 629

د ظالم نښې.. 629

د رياکار نښې.. 629

د منافق نښې.. 629

د کينه کښ نښې.. 630

د اسراف کوونکي نښې.. 630

د غافل نښې.. 630

د لټ نښې.. 630

د دروغجن نښې.. 631

د فاسق نښې.. 631

د خاين نښې.. 631

د يمن د والي کولو پر مهال. 634

حضرت معاذ بن جبل ته د پېغمبر اکرم (ص)  سپارښتنې.. 634

د پېغمبر اکرم (ص) غوره ويناوې.. 635

پوهه،ناپوهي او عقل. 637

د پېغمبر اکرم (ص) موعظې.. 639

بختور. 640

په حجة الوداع كې د پېغمبر اکرم (ص)  خطبه. 641

د پېغمبر اکرم (ص)  لنډې خبرې.. 645

لس ډلې.. 674

عادلانه چلن.. 675

د بدچاريو پايلې.. 676

توبه ګار. 677

د ګناه جبرانول. 677

تر ټولو ناوړه انسان.. 678

منافق وپېژنئ.. 678

د امت سمونه. 679

ريا 679

فطري دين.. 680

د اولاد لاسنيوى.. 680

له کورنۍ سره غوره چلن.. 680

د ماشوم ژړا 681

بډې.. 681

له درې څيزونو وېره 681

حلاله روزي.. 681

ډېرښت.. 682

سفر. 682

نېک چاري.. 683

ګناهکار. 683

له مسلمان سره خيانت.. 683

رهبانيت منع دى.. 684

د مؤمن او کافر توپير. 684

د لمانځه ثواب.. 684

وړ  مشر. 685

د پېغمبر اکرم د لارښوونې او روزنې مثال. 685

د عالمانو ډولونه. 686

ګاونډ. 686

د جنتيانو د روح په څېر بدن.. 687

په سلو کې نهه نوي برخې عقل يې پېغمبر اکرم ته ورکړ. 687

زه د نېکو اخلاقو لپاره مبعوث شوى يم. 688

د صبر او ايمان تړاو. 688

رسول الله ته ورته انسان.. 688

حقيقي لارويان اوبې لاري.. 689

پینځه نبوي سنتونه. 689

له خلکو سره جوړجاړى.. 689

له فقيرانوسره مینه. 690

دعا 690

د پېغمبر اکرم دعا 692

د نويو جامو اغوستو پر مهال دعا 694

له مجلسه د پاڅېدو پرمهال دعا 695

جومات ته د ننووتو او وتو دعا 695

د ويدېدو پرمهال دعا 696

د دسترخوان دعا 696

د دسترخوان د برکت دعا 696

خوړو ته د لاس نږدې کولو د مهال دعا 697

د دسترخوان ټولولو پرمهال دعا 697

د خوړو او شيدو پر مهال دعا 697

د تازه ميوې د ليدو پرمهال دعا 698

تشناب ته د ننووتو دعا 698

د خداى ستاېنه. 699

له تشنابه د راوتوپر مهال دعا 699

له هديرې د تېرېدو پر مهال دعا 699

د قبر د زيارت دعا 699

د خوشحالۍ او خپګان پرمهال دپېغمبراکرم دعا 700

د خوښ څيز د ليدو پر مهال دعا 700

د سهار تر لمانځه وورسته دعا 700

په سجده کې دعا 701

له لمانځه د راستنېدو پر مهال دعا 701

په هر لمانځه پسې دعا 702

د نوي کال پرمهال د پېغمبر اکرم دعا 702

د شعبان پر پینځلسم (پينځلسي) د پېغمبر(ص) دعا 703

د شعبان پر پینځلسمه دپېغمبر(ص) بله دعا 704

د مياشتې د ليدو پر مهال دعا 706

د روژې د مياشتې د ليدو پرمهال دعا 706

٣٦٠ ځل ستاېنه او شکر. 707

د قرآن د حفظولو لپاره دعا 707

د دښمن له شره د امان لپاره دعا 708

په سهار کې دعا 708

د مياشتې د ليدوپرمهال دعا 709

د رجب د مياشتې د ليدو پرمهال دعا 709

د شعبان د مياشتې د ليدو پرمهال دعا 710

دمياشتى د ليدو پرمهال دعا 710

خداى ته پناه وړل. 710

محمدي دعا 711

د لارښوونې دعا 711

د برښنا،ورېځو او تالندې پر مهال دعا 712

د پېغمبر(ص) دعا 712

د بد خلقۍ آفتونه. 713

د يارانو خوشحالول. 713

د خوړو له زېرمولو ډډه کول. 713

د يو بل په ليدوخوشحالېدل. 713

يارانو ته سپارښتنه. 714

ست.. 714

له خلکو سره له شخړې ژغورل شوى و. 714

اوه ځانګړنې.. 714

فقيرانه ژوند. 715

فقيرانو ته زکات او صدقه. 715

زه خداى روزلى يم. 715

د هر څه بښنه. 715

شپږ ناوړه ځانګړنې.. 715

سرتېرو ته سپارښتنه. 716

څلور ګران کسان.. 716

له علي سره مينه ولره 717

د چا د  تېرايستو سوچ مه کوه 717

د وېښتانو د ږمنځولو ګټې.. 717

د برېتو کمول. 717

ښايسته بوي ثواب لري.. 718

د ځمکې ګواهي.. 718

د مخه ښې پر مهال دعا 718

د نفس د پاکوالي لامل. 719

د مؤمن نښه د پېغمبرانو سنت.. 719

د سپينوجامو سپارښتنه. 719

په جامه کې ساده ګي.. 719

څوک چې مې له سنته مخ واړوي؛له ما څخه نه دى.. 719

سپين چرګ يې ساتلى و. 720

د پېغمبراکرم د سترګو رڼا 720

غوره خلک… 720

تر ابراهيم هم غيرتي.. 720

درې حلالې لوبې.. 721

د لمانځه فرمان.. 721

اهل بيتو ته د خداى ځانګړي نعمتونه. 721

له خدایه شرم. 722

د ډوډۍ خوړلو ‏آداب.. 722

ډېرګرم خواړه 722

فالوده 722

د خوړو د لوښي برکت.. 723

د خوړو وخت.. 723

تواضع. 723

په هرې مړۍ پسې شکر. 724

سرکه. 724

د څارويو پښتورګي يې نه خوړل. 724

دخوړو پر مهال‏ يې پڼې اېستې.. 724

حلوا 725

‏سخته ناورغي.. 725

‏ دوه ګرایه ‏دي.)) (سنن النبي). 725

د جنابت غسل. 725

لمونځ.. 726

د ګناهونوکفاره. 727

په خپل لاس مرسته. 728

هغه آیت چې فضیلت یې تر زر آيتونو ډېر دی.. 728

سورة اعلى.. 728

د ښايست شکر. 729

جامې.. 729

د امام حسن اوحسين لپاره د پېغمبر(ص) تعويذ. 730

د شعبان مياشت.. 731

د خداى او د پېغمبر مياشت.. 731

غوره دعا 731

د پېغمبر(ص) شفقت.. 731

د فضيلت د بيان پرمهال د پېغمبراکرم ادب.. 732

د مؤمن ذکر. 732

د ساداتو د زيارت سنت.. 732

د پېغمبر(ص) د وجود رڼا 732

ړومبى مخلوق.. 733

په زړه پورې څېره 733

د خداى او پېغمبر ترمنځ يوه پرده 733

د خداى او پېغمبراکرم ټاکلى وخت.. 734

پېغمبراکرم ته د خداى ډالۍ.. 734

د پوهانو فضيلت.. 734

اسلام. 734

د پېغمبراکرم مناظره 735

له تېرو به لاروي وکړئ.. 742

د پېغمبر اکرم  ليکونه. 743

د ايران پاچا ته ليک… 743

“نجاشي” د حبشې  پاچا ته ليک… 744

په مدينه کې د پېغمبراکرم منشور. 744

د دين آفت.. 746

د ښېګڼو سرچينه. 747

امانت ساتنه. 747

چې نه کار هلته څه کار. 747

 

 

د څېړونکي خبرې

موږ ته د رسول الله صلى الله عليه و آله وسلم احاديث د سني او شيعه راويانو له لارې رارسېدلي دي،چې د راټولېدو، کره کتنې او په بېلابېلو ټولګو کې يې راټولول يو ارزښتمن “ديني-تاريخ” چار دى او د ديني او پوهنتوني زده کړيالانو د فرهنګي کچې د لوړولو لپاره ددې څېړنې راټول شوي مطالب تر يوه بريده د اسلامي مذاهبو ترمنځ د “حديث” په اړه تفاهم او يو خوله توب راښيي،په دې هيله،چې تر دې وروسته نوى کهول په ډاډمنه توګه د اسلامي مذاهبو له روايتونو ګټنه وکړي او خپله علمي تنده پرې ماته  کړي او د پرديو د فرهنګي يرغل پر وړاندې له ديني غښتلي فرهنګي ملاتړه برخمن شي .

 

په درنښت ورور مو؛

اجرالدين اقبال

١٣٨٨ل د جدي شپږمه

د ١٤٣١ س  د محرم الحرام لسمه

 

 

                             

بسم الله الرحمن الرحيم

 

د اسلامي نړۍ حديثي ټولګې

(الف) د اهل سنتو د احاديثوغوره کتابونه :

١- “صحيح بخاري”:

ددې کتاب مؤلف “محمدبن اسماعيل بخاري” (رحمة الله عليه) دى، چې د اهل سنتو معتبر حديثي کتاب دى .”امام بخاري” دا کتاب په شپاړسوکلو کې تاليف کړى،چې اوه  زره پینځه سوه دري شپېته (٧٥٦٣) احاديث لري .

 

د”امام بخاري” لنډه پېژندنه

“محمدبن اسماعيل بن مغيره بن احنف جعفي”،چې په “امام بخاري” مشهور دى،کنيه يې “ابوعبدالله” دى او د”شوال” پر اولسم ١٩٤ س زېږېدلى دى .

د “امام بخاري” د احاديثو کتاب په “صحيح بخاري” مشهور دى او د اهل سنتو له “صحاح سته وو” ځنې دى،چې ورته تر قرآن وروسته صحيح کتاب  ويل کېږي .

 “امام بخاري” خپل کتاب ته د “الجامع الصحيح المسند من حديث رسول الله وسننه وايامه” نوم  غوره کړى؛خو په خلکو کې په “صحيح بخاري” مشهور دى . 

د”امام بخاري” کتاب اوه زره پینځه سوه دري شپيته ( ٧٥٦٣) حديثونه  لري،بې تکراره پکې دوه زره شپږسوه دوه ( ٢٦٠٢) ا حاديث دي،چې له شپږسوو زرو ( ٦٠٠٠٠٠)  احاديثو يې را اېستي دي .

“امام بخاري” ډېر شاګردان درلودل؛لکه “مسلم بن حجاج” د”صحيح مسلم”  خاوند،”ابوعبدالرحمان النسائي” ‎‎ د”سنن نسائي” خاوند، “ابوعيسى ترمذي” د “سنن ترمذي” خاوند،”ابن قتيبه”،”ابوزرعه الرازي”،”ابوحاتم الرازيان”  او نور….

د “امام بخاري” نورو آثارو؛لکه “الادب المفرد” ، “الاسماو الکني”، “تاريخ صغير”،”تاريخ اوسط”،”تاريخ کبير”،”ثلاثيات بخاري” او”السنن” ته   اشاره کړاى شو.

“امام بخاري” د کمکي اختر پر شپه پر ٢٥٦س “سمر قند” ته نږدې د”خرتنګ” په کلي کې وفات شو.

 

“صحيح مسلم”

  ددې کتاب مؤلف “مسلم بن حجاج نيشابوري” (رحمة الله عليه) دى،چې اهل سنتو ته  تر “صحيح بخاري” وروسته معتبر کتاب دى،چې د دولس زرو(١٢٠٠٠) احاديثو ټولګه ده .

 

د”امام مسلم” لنډه پېژندنه

“مسلم بن حجاج بن مسلم القشيري نيشابوري” (رحمة الله عليه) پر ٢٠٤س په “نيشابور”کې وزيږېد،کنيه  يې “ابوالحسن” او لقب يې “امام الحافظ” و . د امام مسلم له آثارو مشهور کتاب “صحيح مسلم” دى، چې تر”صحيح بخاري” وروسته د اهل سنتو په “صحاح سته وو” کې معتبر کتاب ګڼل کېږي .

“امام مسلم” خپل کتاب ،چې دولس زره (١٢٠٠٠) احاديث لري، د پینځه ويشت کلوپه موده کې وليکه .

 د کتاب ځانګړنې يې دادي : ښه اوډون شوی او بې له نېمګړتيا او زياتوالي لنډ شوي او احاديث يې په څلورو واسطو له “رسول الله” روايت کړي دي او د راويانوله پلوه احاديث يې د ډاډ وړ دي . 

د “مسلم” نورو آثارو؛لکه “المسندالکبير” ، “الجامع” ، “الکني والاسماء”، “اوهام المحدثين” او”طبقات التابعين” ته  اشاره کړاى شو .

“مسلم بن حجاج” پر ٢٦١س  د “رجب” پر پینځه ويشتمه په “نيشابور”کې وفات شو.

 

“جامع ترمذي”

چې په”صحيح ياسنن ترمذي” مشهور دى . ددې کتاب مؤلف “محمدبن عيسى ترمذي” دى،چې له علماوو او فقهاوو يې پکې د احکامو اوغېر احکامو احاديث راغونډکړي دي .  

        

د”امام ترمذي” لنډه پېژندنه

نوم يې “محمدبن عيسى بن سوره بن موسى السلمي الترمذي” دى،چې په ٢٠٩س کې په “ترمذ” کې زېږېدلى.  

 “ترمذي”،چې په کومه پېړۍ کې ژوند کاوه،د احاديثو د علم د پرمختګ پېړۍ وه،چې په پايله کې “ترمذي” له ډېرو پوهانو د حديث علم زده کړ او له هغو يې روايتونه وکړل،چې د “امام بخاري” شاګردي يې هم  کړې ده او له “بخاري” او”مسلم بن حجاج” دواړو يې احاديث روايت کړي دي .

د “ترمذي” له آثارو : د”الجامع الکبير” کتاب دى،چې په “صحيح ترمذي” يا”سنن ترمذي”مشهور دى او نور کتابونه يې”الشمائل النبويه”،”التاريخ”او”العلل”دي .

“ترمذي” د عمر په پاى کې پر سترګو ړوند شو او پر ٢٧٩س  په “ترمذ” کې ومړ .

 

“سنن ابوداود”

مؤلف يې “سليمان بن اشعث” دى،چې پر “ابوداودسجستاني” مشهور دى،دا کتاب څلورزره اته سوه ( ٤٨٠٠) احاديث لري،چې ډېرى يې فقهي دي . 

 

د امام “ابوداود” لنډه پېژندنه

نوم يې “سليمان بن اشعث بن اسحاق بن بشير بن شداد بن عمران السجستاني الازدى” دى،چې په اصل کې د”سيستان” دى او پر ٢٠٢ س کې زېږېدلى دى . “ابوداود” په احاديثو کې د خپلې زمانې له مخکښانو و، چې “ابوعبدالله نسائي” [ د سنن نسائي ليکوال ]  او ډېرو ترې  روايتونه کړي دي .

د “ابوداود” له  آثارو د احاديثو کتاب دى،چې په “سنن ابي داود”مشهور دى،چې د اهل سنتوله “صحاح سته و” دى .

“ابوداود” په خپل  کتاب کې څلورزره اته سوه ( ٤٨٠٠) احاديث راټول کړي،چې له پينځو سوو زرو( ٥٠٠٠٠٠) احاديثو يې چوڼلي او هغه احاديث يې راوړي،چې فقهاوو پرې استدلال کړى او فقهي احکام پرې ولاړ  دي . د “ابوداود” له نورو آثارو “المراسيل” او”کتاب الزهد” ته اشاره کړاى شو . “ابوداود” پر ٢٧٥س  په “بصره” کې وفات شو.

 

“سنن نسائي”

مؤلف يې “ابوعبدالرحمان احمدبن علي بن شعيب نسائي” دى،چې د احاديثوله پلوه د”سنن ابي داود”او”صحيح ترمذي” سره ډېر نږدې دى .                   

 

د”امام نسائي” لنډه پېژندنه

نوم يې “احمدبن علي بن شعيب” او  په “شيخ الاسلام” مشهور دى، کنيه يې  “ابوعبدالرحمان” دى اوپر ٢٢٥ س د “خراسان” په “نسا” کې پيداشوى بيا “مصر” ته تللى او هلته اوسېدلى او په فقه او حديث کې د زمانې  له مخکښانو و.

ويل شوي چې : (( د”دمشق” پر لور په سفرکې “نسائي”  د حضرت “علي” (ک) او “معاويه” بن ابي سفيان په هکله وپوښتل شول،هغه حضرت “علي” (ک)  پر”معاويه” بن ابي سفيان غوره وباله،چې په پايله کې معتصبينو  له جوماته دباندې  وغورځاوه او له دمشقه ووت .))

د “نسائي” له آثارو د هغه د احاديثو کتاب دى،چې په “سنن نسائي” مشهورشوى او “المجتبى” هم ورته  وايي . 

د “نسائي” له نورو آثارو “خصائص اميرالمؤمنين علي” ، “مسندعلي”،”مسند مالک” ، “الضعفاء” او”المترکين” ته اشاره کړاى شو .

“نسائي” د خپل عمرپه پاى کې مکې ته ولاړ او پر ٣٠٣س  هملته ومړ.    

 

 

“سنن ابن ماجه”

مؤلف يې “محمد بن يزيد بن ماجه قزويني” دى،چې احاديث يې د فقهي مسائلو پر بنسټ اوډون شوي او څلور زره درې سوه يوڅلوېښت (٤٣٤١) احاديث لري .

 

د”امام ابن ماجه” لنډه پېژندنه

نوم يې “ابوعبدالله محمد بن يزيد ماجه قزويني” دى،چې پر ٢٠٩س  د “ايران” په “قزوين” کې زېږېدلى دى .

د “ابن ماجه” له آثارو ځنې د احاديثو مشهور کتاب “سنن ابن ماجه” دى، چې د اهل سنتوله “صحاح سته وو” څخه دى

 کتاب يې په “فقه” کې د اوډون له پلوه غښتلى دى او کوم احاديث يې، چې راوړي،د فقهي مسائلو له مخې يې ترتيب کړي او تکراري حديث پکې نه  ليدل کېږي او له نوروځانګړنو يې  ښه ترتيب اوباب بندي  ده .

“ابن ماجه” په خپل کتاب کې څلور زره درې سوه يوڅلوېښت ( ٤٣٤١)  حديثونه  نقل کړي،چې درې زره دوه ( ٣٠٠٢)  حديث يې په نورو  “صحاحو”کې راغلي او يو زر درې سوه نهه دېرش (١٣٣٩)حديثونه  په نورو صحاحو کې نه دي راغلي .

د “ابن ماجه”  له نورو آثارو د “تفسيرالقرآن” او”تاريخ قزوين” نومونه يادولاى شو. “ابن ماجه” پر ٢٧٣ س  وفات شو.

 

“سنن دارمي”

مؤلف يې “عبدالله بن عبدالرحمان بن فضل بن بهرام بن عبدالصمد” دى، چې کتاب يې پر “الجامع الصحيح” مشهور دى .

“الموطا”

مؤلف يې “مالک بن انس بن مالک اصبحي حميري” دى،کنيه  يې “ابوعبدالله”  او د “اهل سنت او جماعت” له څلورو امامانو دى .”امام مالک” دا کتاب د عباسي خليفه؛”منصور”په غوښتنه ليکلى دى .

 

“دامام احمد بن حنبل مسند”

 مؤلف يې “ابوعبدالله احمدبن محمدبن حنبل شيباني” دى او د “اهل سنت او جماعت” له مخکښانو دى او په “مسند” کتاب کې يې دېرش زره احاديث دي .

 

 

 

د “اماميه شيعه وو” د احاديثوغوره  کتابونه

“اصول کافي”

د “محمد بن يعقوب کليني رازي” تاليف دى،چې د خپل عمر وروستي  شل کاله يې په “بغداد”کې تېر کړل اوهماغلته ومړ او دا کتاب يې په “بغداد” کې وليکه . هغه ړومبى امامي محدث دى،چې د ديني رواياتو په راټولولو،نظم ،ترتيب او تبويب يې پيل وکړ.

 کتاب يې تقريبا شپاړلس زره حديث لري،چې د”شيعه وو” معتبر حديثي کتاب ګڼل کېږي  او درې برخي لري : د “عقايدو اصول”،”فقهي احکام” او “خطبې او موعظې”،چې د”الروضة” په نامه يادېږي .

 

د”شيخ  کليني” لنډه پېژندنه

کليني د اماميه شيعه وو يو  فقهي شخصيت دى،چې د “ايران” په “رى” کې زېږېدلى  او ډېر عمر يې په “بغداد” کې تېر کړى او په “فقه” او”حديث” کې ترې آثار پاتې دي . 

٢-“من لايحضره الفقيه”:

 مؤلف يې “ابوجعفرمحمدبن علي بن بابويه قُمي” دى،چې په “شيخ صدوق” مشهور دى . دغه کتاب پينځه زره نهه سوه شل ( ٥٩٢٠) حديثونه  لري،چې د “محمد بن زکريا” د کتاب “من لايحضره الطبيب” په سياق يې ليکلى دى .

 

د شيخ صدوق لنډه پېژندنه

“شيخ صدوق” د شيعه مذهب له سترو پوهانو څخه دى ،چې پر٣٠٦س په قُم کې زېږېدلى او پر”شيخ صدوق” مشهور دى . په “رى” او “خراسان” کې ا وسېدلى او پر ٣٨١ س په “رۍ” کې وفات شو. په اسلامي علومو،تاريخ او شعر کې ترې تقريباً درې سوه (٣٠٠) کتابونه پاتې دي .

 

“تهذيب الاحکام”

 مؤلف يې “محمد بن حسن طوسي” دى،چې په “شيخ طائفه” مشهور دى؛ هغه د شيعه فقهاوو رئيس دى او د ډېرو اسلامي علوموپه هکله يې معلومات درلودل، کتاب يې ديارلس زره پينځه سوه نوي ( ١٣٥٩٠)  حديثونه  لري .

 

د شيخ طوسي لنډه پېژندنه

“شيخ طوسي” د اماميه شيعه وو فقيه او ليکوال  دى،پر ٣٨٥ س کال زيږېدلى  او له خراسانه “بغداد” ته ولاړ،چې هلته څلوېښت کاله پاتې شو او بيا “نجف” ته ولاړ او پر ٤٦٠ س کې په “نجف” کې ومړ. 

 

“استبصار”

 مؤلف يې هم  “ابوجعفرمحمدبن حسن طوسي” دى  او پينځه زره پينځه سوه يوولس (   ٥٥١١) احاديث لري .

 

 

 “بحارالانوار”

مؤلف يې “محمد بن باقربن محمد تقي مجلسي” دى،چې په خپله زمانه کې د فقې او تفسير ستر عالم و او د “شيخ بهايي” شاګردي يې هم کړې ده .”مجلسي”په خپل کتاب کې په نورو کتابوکې خپاره واره احاديث راغونډ کړل . په کتاب کې يې اعتقادي،تاريخي،د انبياوو او امامانو قيصې او بېل بېل فقهي بابونه شته .

 

د شيخ مجلسي لنډه پېژندنه

“شيخ مجلسي” د اماميه شيعه وو له پوهانو دى،چې پر١٠٣٧ س په “اصفهان” کې زېږېدلى د احاديثو ډېره برخه يې په “فارسي” ژباړل شوې او په اسلامي علومو او تاريخ کې ترې ډېر آثار پاتې دي .

 

“وافي”

مؤلف يې “محمد بن مرتضى” دى،چې په “ملامحسن فيض کاشاني” مشهور دى او په يوولسمه هجري قمري پېړۍ کې د اماميه وو له سترو پوهانو څخه و.

 کتاب يې د “کافي”، “من لايحضره الفقيه”،”تهذيب” او”استبصار” د کتابو ټولګه ده.همداراز ددې کتابونو خپاره واره احاديث يې راټول کړي، په دې توپير،چې تکراري احاديث يې چاڼ کړي دي .

 

د ملامحسن فيض کاشاني لنډه پېژندنه

“ملامحسن فيض کاشاني” په يوولسمه هجرى پېړۍ کې د اماميه وو له سترو علماوو څخه دى،په فقه،حديث،تفسير او فلسفه کې د نظر خاوند دى او تر اتياو( ٨٠) پورې کتابونه يې تاليف کړي ،”ملا محسن” پر١٠٩١ س په “کاشان” کې ومړ.

 

“وسايل الشيعه”

  مؤلف يې “محمدبن حسن شامي” دى،چې په “حُر عاملي” مشهور دى ده په خپل کتاب کې هغه احاديث راټول کړي،چې په څلورمه هجري قمري پېړۍ کې د شيعه و د احاديثوپه کتابو کې راغلي او روايتونه يې پرې ورزيات کړل او د فقهي مسايلو له مخې يې اوډلي دي .

 

د حرعاملي لنډه پېژندنه

“حر عاملي” د شيعه مذهب فقيه او تاريخپوه دى،چې پر ١٠٣٣ س  په “لبنان” کې زېږېدلى او”عراق” او “خراسان” ته يې سفرونه کړي او د عمر تر پايه په “خراسان” کې پاتې شو .

 

 

بسم الله

ð “بسم الله الرحمن الرحيم”د هرې ليکنې کونجي ده.(کنز : ٢٤٩٠ حديث)

 

خويونه

ðپه مؤمنانو کې هغه تر ټولوغوره دى،چې خوى يې تر نورو ښه وي . (ابوداوود – الدارمي )

ðمؤمن په ښه خوى د شپې د تهجد کوونکيو او همېشنيو روژه تيانو مقام ته رسي .( ابو داوود)

ð څوک چې امانت ساتى نه وي ،مؤمن نه دى او څوک چې پر خپله ژمنه وﻻړ نه وي؛نو دين نه لري . (بيهقي)

 

بدخویه

ðڅوک چې بدخويه وي (؛نو) ځان يې په عذاب کړى دى .(بحار ٧٣/ ٢٩٨)

ناوړه وګړي

ðزما په امت کې ډېر ناوړه(ناخوښه) هغه دى،چې خلک يې د زيان رسونې له وېرې درناوى کوي . ( تحف العقول : مخ ٥٨ )

ðهغه ډېر ناوړه دى،چې خپل آخرت په دنيا پلوري . ( مکارم الاخلاق: مخ ٤٣٣)

ðڅوک چې مسلمان وغولوي،يا ورته زيان ورسوي يا ورته دسيسه جوړکړي ( ؛نو) له ما څخه نه دى . ( تحف العقول : مخ ٤٢)

ðد خداى ډېر غوره بندګان هغه دي،چې په ليدو يې انسان ته خداى ور يادېږي او ډېر ناوړه يې هغه دي،چې چغلي کوي او دوستان سره بېلوي اوپه دې لټه کې وي،چې د خداى د بندګانو پاکې لمنې په يو ډول ګناه ککړې کړي او يا يې په کړاو او پرېشانۍ اخته کړي .( بيهقي )

ðاى چې پر ژبه موايمان راوړى؛خو لا مو زړه ته نه دى ننووتى! د مسلمانانو غيبت مه کوئ او پټ عيبونه يې مه راسپړئ ؛ځکه که داسې وکړئ؛ نو خداى به هم درسره همدغسې وکړي،چې د رسوايۍ او سپکاوى لامل به مو شي .( ابوداوود)

 

بخيل

 ð بخيل له “خداى” او خلکو لرې او “اور” ته نږدې دى . (بحار٧٣/ ٣٠٨)

ðډېر بخيل هغه دى،چې په “سلام” اچولوکې بخل کوي . ( کنز ٢ / ٦٤ )

 

کشران او مشران

ð هغه له ما څخه نه دى،چې پرکوچنيانو و نه لورېږي  او د مشرانو حق ونه پېژني . ( کنز: ٥٩٧٠ مخ)

ðڅوک چې له کوچنيو سره په مينه او له لويانوسره په درناوي چلن و نه کړي؛نو له موږ ځېنې نه دى . ( “ترمذي” – “ابوداود”)

 ðهر ځوان،چې د بوډا عزت او درناوى وکړي؛نو خداى به ورته په بوډاتوب کې داسې څوک وګوماري،چې عزت يې وکړي . (ترمذي)

 

الهي لارښوونې

ð الهي لارښوونې پر ځاى کړئ،چې “الله”درباندې ولورېږي  (ميزان: ٧٠٠٩ مخ)

 

ټلوالي

ð دچاچې له هرې ډلې سره مينه وي (؛نو) خداى به يې د قيامت پر ورځ له هماغې سره راپاڅوي . ( کنز: مخ ١٠ )

ð (په قيامت کې به) له هغه سره يې،چې ښه دې ايسي . (امالى مفيد، مخ ١٥٢ )

الهي تقوا

ð څوک چې غواړي په خلکو کې عزتمن وي ؛نو”الهي تقوا” دې غوره کړي . (بحار ٧٠ / ٢٩١)

 

ځورول

ðچا چې مؤمن وځوراوه ؛نو زه يې ځورولى يم . ( بحار ٦٧/ ٧٢٩  )

ð دخداى بندګان مه ځوروئ . ( کنز: ٤٣٧٤٠ ح )

ð غوره انسان هغه دى،چې مسلمانان يې د لاس او ژبې له ازاره خوندي وي . ( وسائل/٨ ٥٩٨ )

 

هديره

ð هديرو ته ولاړشئ،چې آخرت دريادوي . ( کنز ١٥/٦٤٦ )

 

ګهيځ

ð ګهيځ ژر په خپلې روزۍ اونورو اړتياوو پسې ولاړشئ،چې ګهيځ له وخته پاڅېدل برکتي اوله برياسره مل دي . ( کنز ٤/ ٤٨ )

ð د سهار خوب  روزي کموي . ( کنز ٦ / ٤٧٣ )

 

حرص

ðهغه  ډېر شتمن دى،چې د حرص په لومه کې نه وي نښتى.(مستدرک ١٢/ ٥٩ )

نېکمرغه

ðډېر نېکمرغه هغه دى،چې له عزتمنو سره ناسته ولاړه لري .( بحار ٧٤/١٨٥)

ð هغه نېکمرغه دى،چې د خپلو عيبونوکره  کتنه  ولري  او کړه  وړه  يې د نورو له عيب لټولو منع کړي . ( کنز ١٦/ ١٤٢)

 

کار

ðد خداى عزتمن او ستر کارونه ښه ايسي او سپک او کوچني يې نه . ( المعجم الکبير ٣/ مخ ١٣١)

ð همېشنى اوپرله پسې کار د خداى ښه ايسي،که څه هم لږ وي . (کنز ٣ / ٥٧ )

ð د کار سم پاى ته رسول،د هر کارکچه ده . ( کنز ١٥ / ٦٩٤ )

ð د ښه کار کول  تر پيلولويې  ښه دى .( بحار ٦٩ / ٤٠٥ )

ð پر ښه کار ګومارنه،د کوونکي هومره ثواب لري .(کنز ٦/ ٣٦٠)

ð که کوم کار چې دې کاوه؛نولومړى يې پاى وسنحوه او راتلونکى يې  وګوره . ( کنز ٣/ ٩٩)

ð هر کار،چې دې زړه غواړي،ويې کړه؛خو بېشکه چې بدله او سزا به يې ګورې . ( حلية الاولياء ٣/ ٢٥٣)

ðبېشکه هغه  د خداى تعالى ښه ايسي،چې کوم کار کوي او ښه يې پاى ته ورسوي . ( ميزان الحکمه: ١٤٣٧١ح ) 

ð څوک چې ناوړه کار وکړي (؛نو پر اخرت سربېره ) په دې نړۍ کې هم سزا ويني. ( کنز: ٤٣٧١٣ح )  

ðهغه دې خوښ وي،چې کار و کسب يې له حرامو پاک وي . ( يعقوبي تاريخ ٢/ ٥٩ )

ðڅوک چې بې له پوهې کوم کار کوي؛نو زيان يې تر سمونې ډېر دى . (تحف العقول: مخ ٤٧ )

 

ښه چلن

ðڅوک چې نرم طبيعته نه وي ؛نو تر ټولو ښو به بې برخې وي.  ( صحيح مسلم )

ðپه حقيقت کې زه د ښوکارونو او خويونو بشپړولو ته مبعوث شوى يم.  ( بحار ١٦/ ٢١٠ )

ðله خلکوسره نرم چلن  نه کول،په حقيقت کې تر ټولو نېکيو بې برخي ده . ( وسائل ١١/ ٢١٤ )

ðڅوک چې مؤمن خوشحاله کړي؛نوپه حقيقت کې زه يې خوشحاله کړى يم . ( کافي ٢/ ١٨٨)

ðپه ورين تندي له خپل ورورسره مخامخ شه .( بحار ٧٤/ ١٧١)

ðخلکو سره ښه چلن کول نيم دين دى او ورسره دوستي او نرمي کول نيم ژوند دى . ( الکافي  ٢\١١٧)

ðډېر عاقل هغه دى،چې له خلکو سره خورا ښه چلن کوي . (من لايحضره الفقيه  ٤\٣٩٤)

ðدرې ځانګړنې دي،چې که په چاکې نه وي،کړنې يې نه پوره کېږي 🙁 ١) داسې تقوا،چې له ګناه يې منع نه کړي (٢) داسې خوى،چې له خلکو سره پرې ښه چلن وکړي (٣) او داسې زغم،چې د ناپوهانو ناپوهي پرې وزغمي . ( الکافي  ٢\١١٦)

ðماته مې پالونکي له خلکو سره د ښه چلن په اړه  دغسې امر کړى؛لکه د فرايضو يې،چې کړى دى .( الکافي ٢\١١٧)

ðله ښځوسره ښه چلن وکړئ .(نهج الفصاحه)

 

نېک چارى زوى

ð بېشکه نېک چارى زوى د جنت يو ګل دى . ( کافي ٦ /٣ )

 

لاس

ð پاسنى لاس (بخشش ورکونکى) تر کوزني لاس (بخشش اخستونکي) غوره دى . ( کنز ٦ / ٣٦٣ )

ðكه څوك غواړي شتمن وي؛نو پر هغه دې ډېر ډاډه وي،چې د خداى په لاس كې وي،نه پر هغوچې له نورو سره وي . (الكافي  ۲\ ۱۳۹ )

ðيو بل ته لاس وركړئ؛ځكه دا كار دوستي زياتوي . (مستدرك الوسايل  ۹\ ۵۷)

 

قناعت

ð قناعت نه تمامېدونکې پانګه ده . ( وسائل ١١/ ٢٢٠ )

ðقناعت د برکت لامل دى . ( الجعفريات : ١٢٢)

ðلږه غوښتنه، د قناعت ښکلا ده . (جامع الاخبار: ١٢٢)

ðقناعت ناپايه زېرمه ده .( ارشادالقلوب  ١\١١٨)

ðد خداى پر ورکړې روزۍ قناعت کول،د انسان سترګې يخوي .( مستدرک الوسايل  ١٥\ ٢٢٤)

ðابوذره!هغه غني دى،چې د خداى پر ورکړې روزۍ قناعت يې کړى دى . ( يوت  ١٥\٢٢٧)

 

توکل

ð د چا چې غښتلتيا ښه ايسي؛نو پر خداى دې توکل وکړي . ( بحار ٧١/١٥١ )

ټوکې

ð زه په ټوکو کې يوازې حق وايم (؛يعنې باطلې او ناسمې خبرې به پکې نه وي) (ترمذي)  

ð له (بېځايه) ټوکو ډډه وکړئ؛ځکه د نورو پر وړاندې مو سپکوي . ( وسائل ٨/ ٤٧٨)

  ð حضرت انس روايت کوي : چا له رسول اکرم (ص) سپرلۍ ته اوښ وغوښت . آنحضرت ورته وويل :زه درته يو جونګى درکوم .سړي وويل : جونګى به څه کړم ؟ آنحضرت ورته وويل: اوښ خو له اوښه وي (؛يعنې هر جونګى اوښ وي؛نو هر اوښ،چې درکړ شي ؛نو جونګى به وي .)   ( “ترمذي” – “ابوداوود”)

 

سخي

ð علي! سخي وسه .( مشکاة الانوار: مخ ٤٠٥ )

ðسخي يې خداى او بندګانو ته نږدې وي او بخيل يې له خداى او بندګانو او(همداراز) له جنته لرې او دوزخ ته نږدې وي،بېشکه خداى ته “ناپوهه”سخي تر”عابده” بخيله ډېر ګران دى .(ترمذي)

 

ورین تندی

ð ورين تندى کينه له منځه وړي .( بحار ٧٤/ ١٧٢)

 

ملګري

ð انسان له خپل ملګري  اغېزمنېږي  .( مستدرک: مخ ٦٢)

ð له ناوړه ملګري سره تر ناستې يوازېتوب ښه دى .( مواعظ عدديه :٥٠ مخ)

ð له احمق سره له دوستۍ ډډه وکړئ؛ځکه د ګټې پر ځاى زيان درسوي . ( کنز ١٦/ ٢٦٧)

ðيوازېتوب تر ناوړه ملګري غوره دى .( بحار ٧٧/ ١٧٣)

 ðښه ملګرى د عطار په څېر دى، که له خپلو عطرو څه در نه کړي (؛نو) له بويه خو يې ګټه دررسي . (سنن ابي داوود )

ð له ناوړه ملګري ځان وژغوره،چې ته پرې پېژندل  کېږې . (کنز ٩/ ٤٣)

  

لیده کاته

ð له نورو سره ليده کاته مينه او دوستي ټينګوي . (ميزان  ٧٩٣٩ ح )

ð ورځ ترمنځ ليده کاته کوئ،چې مينه مو زياته شي.( کنز ٩/ ٣٠ )

ðله خپلوانوسره ليده کاته،د قيامت د ورځې حساب اسانوي او د ناوړه مړيني مخه نيسي . ( بحار ٧٤/ ٩٤)

 

پاکوالى

ð پاکوالى  د ايمان نښه ده . ( بحار ٦٢/ ٢٩١)

 

استغفار

ð استغفار ګناهونه له منځه وړي . ( کنز ١/ ٤٧٦)

 

عاجزي

ðعاجزي د لمانځه ښکلا ده .(بحار ٧٧/ ١٣١)

ð څوک چې خداى ته عاجزي او تواضع وکړي (؛نو) خداى يې مرتبې لوړوي . ( کنز ٣/ ٥٠ )

 

نسپالي

ð له نسپالۍ سخت زړي راولاړېږي .( کنز ٣/ ١٨٢)

 

پلور پېر

ð پلورونکى،چې د پښېمان پېرودونکي له معاملې تېر شي ( پلورل شوى مال بېرته واخلي) (؛نو) خداى به يې  د قيامت پر ورځ له ښويېدنې تېرشي . ( کنز ٤/ ٩٠)

د خدای وېره

ð څوک چې له خدايه ډارېږي(؛نو) خداى به يې وېره په ټولو څيزونوکې واچوي . ( ترغيب ٤ /٢٦٧)

 

ښکلا

ð بېشکه چې خداى ښکلى دى او”ښکلا” يې ښه ايسي .(صحيح مسلم ١/ ٦٥)

ðځان ساتنه د بلا ښکلا ده.تواضع د نسب د اصيلولۍ ښکلاه  ده. فصاحت د خبرې ښکلا ده.عدالت د ايمان ښکلا ده. ډاډ د عبادت ښکلا ده.ياد اوساتنه د روايت ښکلا د. ياد د پوهې ښکلا ده. ښه ادب د عقل ښکلا ده. پراخه تندى د زغم ښکلا ده. سرښندنه او ایثار د زهد ښکلا ده. د منت پرېښوول د نېکۍ ښکلا ده او عاجزي د لمانځه ښکلا ده . (بحارالانوار ٧٤\١٣٣ )

ð د يو چا د اسلام ښکلا او کمال په دې کې دى،چې د چټي او بې مانا ويناوو او چارو يې لاس اخستى وي .(“ابن ماجه” او”بيهقي”)

 

زغمناک

ð زغمناک د “دنيا او اخرت” ښاغلى دى . ( کنز ٣/ ١٢٩ )

 

ریا

ðبېشکه چې “الله تعالى” پر ټولو رياکارانوجنت حرام کړى دى . ( کنز ٣ / ٤٧٣) 

ðښه کار په ريا مه کوه اوهېڅ کار د حيا له امله مه پرېږده.(بحار ٦٨ / ١٥٤)

ðريا (د ځانښوونې لپاره د ښه کار ترسره کول ) “وړوکى شر ک” دى . ( مسند احمد )

ðڅوک چې د ځان مشهورولو لپاره کوم کار کوي؛نو خداى يې مشهوروي او څوک چې نورو ته  د ځانښوونې لپاره څه کوي؛نو خداى هغه نورته ښه ښيي . ( بخاري – مسلم )

ðستر عابدان يا قرآن لوستونکي،چې نورو ته د ځانښوونې لپاره ښې کړنې کوي؛نو په دوزخ کې به دغم او خپګان په څاه کې ولوېږي،چې په خپله دوزخ ترې  د ورځې څلور سوه وارې پناه غواړي . (ترمذي)

ðڅوک چې ښې چارې وکړي او خلک يې وستايي؛نو دې مؤمن ته بېړنى زېرى دى . ( مسلم )

ð څوک چې ځانښوونې ته لمونځ کوي،روژه نيسي او صدقه ورکوي ؛ نو شرک دى .( مسند احمد)

ðڅوک چې خپل لمونځ دومره اوږدوي،چې خلک ورته وګوري،چې څومره اوږد لمونځ کوي؛نو “خفي شرک” دى .  (ابن ماجه)

 

ښه بوی

ðښه بوی زړه قوي کوي .( فروع ٦/ ٥١٠ )

 

سوداګر

ðمسلمان رښتينى امانت ساتى سوداګر په قيامت کې له شهيدانوسره دى . ( کنز: ٩٢١٦)

ðد قيامت پر ورځ رښتينى سوداګر د عرش ترسيورې لاندې دى . ( کنز: مخ ٩٢١٨)

ðڅوک چې د مسلمانانو په بازارو کې [روغه او رښتينې] راکړه ورکړه کوي،د خداى په لار کې د مجاهد په څېر دى او زموږ په بازارو کې محتکر د خداۍ له کتابه  د منکر په څېر دى.دسيوطي جامع الصغير٣٢٧ )                  

ðرښتين او امين سوداګر(په قيامت کې) له پېغمبرانو،رښتينو او شهيد انو سره دى .(ترمذي، الدارمي، الدارقطني )

 

چغلګري ( د خبرې وړل راوړل )

ð په تاسې كې هغه ډېر ناوړه دى،چې چغلي كوي،ډنډورې خپروي،دوستان يو له بله بېلوي او په بې ګناهو كې عیبونه او ټكې پيدا كوي .( الكافي ۲\ ۲۶۹)

ðابوذره! چغلګر په اخرت كې ان يوه شېبه هم له الهي عذابه نه خلاصېږي . ( وسايل ۱۲\۳۰۷)

ðله پينځو څيزونو ډډه وكړئ : ( ۱) كينه ( ۲ ) پال نيونه (۳)   ظلم (۴) بدګوماني ( ۵) او چغلي . ( عوالي الاللي ۱\ ۲۸۹ )

 ðهغوى د خداى ډېر غوره بندګان  دي،چې په ليدو يې انسان ته خداى وريادېږي او ډېر ناوړه يې هغوى دي،چې چغلي کوي او دوستان سره بېلوي او په دې لټه کې دي،چې د خداى د بندګانو پاکلمنۍ په يو ډول ګناه ککړې کړي او يا يې په کړاو او پرېشانۍ اخته کړي .  (بيهقي)

ðچغلګر به جنت ته ولاړ نشي. ( الترغيب ٣/ ٤٩٥)

 

اسراف

ðڅوک چې اسراف کوي ،خداى به يې نشتمن کړي . ( الحياة ٤/٢٠ )

 

یووالی

ðله ټولنې سره وسئ؛ځکه لېوه له رمې لرې پسه خوري . (مسنداحمد ٦/ ٤٤٦)

  ðاختلاف مه کوئ؛ځکه ړومبنيو مو اختلاف وکړ؛نو هلاک شول . ( کنز: ٨٩٤ح )

 

راز ساتنه

ðد خپل ورور د راز  رابرسېرول خيانت دى؛نوله دې کاره لاس واخلئ . ( بحار ٦٨/ ١٥٤)

ðد خپلو چارو سر ته رسولو ته له راز والۍ مرسته وغواړئ .( د نهج البلاغې شرح  ۱۱\ ۲۲۱)

ðد نېکۍ څلور خزانې دي : (۱) د اړتيا پټول (۲) په پټه صدقه وركول (۳) د ناروغۍ پټول (۴) او د كړاو پټول . ( الامالي للمفيد : ۸مخ )

ðڅوک چې په دنيا کې پر خپل ورور پرده واچوي (؛نو) خداى به په قيامت کې پرې پرده  واچوي . ( ترغيب وترهيب ٢/  ٢٣٩)

 

حق

ðډېر پرهېزګار هغه دى،چې “حق”ووايي،په ګټه يې وي که په زيان .( امالي صدوق : مخ ٢٧)  

ðحق ووايه او د خداى لپاره د پړې اچوونکيو له پړې مه ډارېږه .(کنز: ٤٣٥٥٥ح)

ðد خداى په لارکې د ګرموونکيو له پړې مه وېرېږئ . ( معاني الاخبار: مخ ٣٣٥)

ðحق ووايه،که څه هم تريخ وي . ( الخصال : مخ ٥٢٦)

ð”حق” دروند او تريخ دى او”باطل” سپک او خوږ . ( مکارم الاخلاق: مخ ٤٦٥)

ðته چې د چا حق په پام کې نيسې؛خو هغه يې نه نيسي؛نو د دوستۍ وړ نه دى .(يعقوبى تاريخ : مخ ٦٦)

 

شهید

ðشهيد تر ټولو ړومبى جنت ته ننوځي . ( ميزان الحکمة: ٢٦٣٥)

ðڅوک چې د خپل مال په ساتنه کې ومري؛نو شهيد دى .(دعائم الاسلام: ١/ ٣٩٨)

ðڅوک چې په اوداسه ويده شي اوپه هماغه شپه ومري؛نو د خداى په نزد شهيد دى . ( بحار ٧٦/ ١٨٣)

امن او روغتیا

ðامن اوروغتیا دوه نعمتونه دي،چې شکر يې نه پرېښوول کېږي . ( الخصال: مخ ٣٤)

 

امین

ðڅوک چې “امين” نه وي ؛نو ايمان نه لري . (بحار ٧٢/ ١٩٨)

 

مجاهدین

ðد خداى د لارې مجاهدين د جنتيانو مشران دي .( بحار ٨ / ١٩٩)

ðڅوک چې له خپل ورور سره مرسته وکړي اوګټه ورورسوي؛نو د خداى د لارې د مجاهدينو هومره ثواب وړي.  ( ثواب الاعمال: مخ ٢٨٨) 

 

غوره وګړي

ð خلکو ته ګټور ډېر غوره دى .( بحار ٧٥/ ٢٣)

ðغوره هغه دى،چې تاسې ښه کار ته راوبلي .( الخيروالبرکة:  ١٣٥مخ)

ðخداى دې پر هغه ولورېږي،چې خپله ژبه وساتي،خپله زمانه او وخت وپېژني او پر سمه لار ګام کېږدي . (  کنز: ٦٨٩٤ح )

ðخداى ته هغه بنده ډېر ګران دى،چې بندګانو ته يې ډېر ګټور وي . ( تحف العقول: ٤٩ ح )

ðڅوک چې خپل پېټى په خپله يوسي؛نوپه حقيقت کې له کبره لرې کېږي . ( مکارم الاخلاق: مخ ١١٠ )

 

لاروی

ðبېشکه هغه مې لاروى دى،چې په ماپسې  ولاړ شي او زما په پله پل کېږدي او زموږ کړه وړه عملي کړي . ( بحار ٦٨ / ١٥٤)  

ډار اچول

ðيو مسلمان هم مه ډاروئ ؛ځکه ډارول يې ستر ظلم دى .(کنز ٤٣٧٠٩ ح)

 

زړښت

ð”بوډازناکار”،”ظالم واکمن” او”نشتمن کبرجن” هغه ډلې دي،چې خداى ورسره خبرې نه کوي او د قيامت پر ورځ پرې رحم نه کوي او دردناک عذاب ورته سترګې پر ﻻر دی . (الکافي ٢\٣١١)

ðڅوک چې د بوډا پر فضيلت ځان پوه کړي او د عمر له امله يې درناوی وکړي،پاک خداى(ج)به هغه د قيامت د ورځې له ډاره خوندي کړي . (ثواب اﻻعمال:١٨٩)

ðد مؤمن بوډا درناوى د الهي ﻻرښوونو درناوى دى. (وسايل ١٢\٩٩)

ðپه يقين،چې خداى(ج)ته تر کنجوس عابد بوډا،په ګناهونو کې ډوب سخي ځوان ډېرګران دي . (جامع اﻻخبار ١١٢)

ðزما ناپوهه،شتمن،ظالم بوډا او نشتمن کبرجن ښه نه ايسي. (مستدرک الوسايل ١٢\٣٢)

ðله بوډاګانوسره مو تل برکت مل وي . ( بحار ٧٥/ ١٣٧)

ðد بوډا د دنيا غوښتنې حس ځوان دى . ( ورام ١/ ٢٧٨)

ð انسا ن بوډا کېږي؛خو له شتمنۍ او د عمر له زياتوالي سره يې حرص ډېرېږي . ( بخاري – مسلم )

ð د بوډا زړه له دنيا سره په مينه او په اوږدو هيلو ځوان وي .( بخاري-مسلم)

ðد بوډا مسلمان درناوى د خداى له درناويو دى .(الکافي  ٥\١٦٥)

 

عزت

له خلکو سره  له شخړې ډډه وکړئ،چې غفلت رابرسېروي او عزت له منځه وړي . (بحارالانوار ٧٢/ ٢١٠)

ð تواضع د عزت لامل ده؛نو تواضع وکړئ،چې خداى مو لوړ پوړي کړي او صدقه د شتمنۍ د زياتوالي لامل ده؛نو صدقه ورکړئ،چې خداى درباندې ولورېږي او بښنه د انسان د عزت لامل ده؛نو له خلکو تېر شئ، چې خداى مو عزتمن کړي . (مستدرک الوسايل ٧/ ١٦٠)

ð د چا چې خداى مل او ملګرى وي؛نو نه ډارېږي او څوک چې خداى عزتمن کړي؛نو نه  خوارېږي .( مشکاه الانوار :١٢٥)

ðډېر عزتمن هغه دى،چې څه ورته ګټور نه وي پرېږدي يې. ( الامالي صدوق : مخ ٧٣)

ðد خلکو عزت وکړئ،چې  عزت مو وکړي .( مشکاة الانوار: مخ ١١٤)

ðڅوک چې عزت غواړي؛نوله ګناه دې ځان لرې ساتي .(بحار ١٧/ ٤٨)

ðد قوم مشر،چې درته راغى؛نو عزت يې وکړئ .( الکافي  ٨\٢١٩)

ð در کړ شوې ډالۍ ومنئ ؛ځکه يوازې “خر” ډالۍ بېرته ستنوي .(په دې روايت کې د کرامت ظاهري مفهوم ډالۍ ورکول برېښي ) . ( وسايل  ١٢\١٠٣)

ðمسلمان چې خپل غمځپلي مسلمان ورورته تسلي او ډاډ ورکړي ؛ نو خداى يې د احترام په جامو پوښي . ( مستدرک الوسايل  ٢\٣٥١)

ðڅوک چې خپل مسلمان ورور په کومه خبره خوشحاله او کړاو يې لرې کړي؛نو تل به د خداى تر پراخه سيورې لاندې وي او تر هغه چې پر دې چار بوخت وي؛د خداى رحمت به پرې وي .(ثواب الاعمال : ١٤٨ )

ðڅوک چې د خوار مسلمان عزت وکړي؛نو د قيامت پر ورځ،چې يې له خداى سره ليده کاته وي؛خداى به ترې خوښ وي .(من لايحضره الفقيه٤\ ١٣ )

ðخداى تعالى وايي :څوک چې زما مؤمن بنده ازاروى؛نو له ماسره جګړه کوي او څوک چې یې عزت وکړي؛نو له غوسې به  مې خوندي وي . (عدة الااعي : ١٦٥مخ )

 

پاسوالي

ðد خداى په لار کې يوه ورځ پاسوالي،تر يوې مياشتې د ويښې شپې تېرونې او روژه نيونې غوره ده. ( عوالي اللآ لي ١/ ٨٧)    

 

ځاني غوښتنې

ðزه خپل امت ته له دوو څيزونو ډېر وېرېږم ؛ځاني غوښتنې او اوږدې هيلې . ( سفينة البحار ٢/٧٢٨)  

ðله ځاني غوښتنو سره مبارزه وکړئ،چې زړونه مو حکمت زده کړي . (ميزان : ٢٧٦٧ح )

ðڅوک چې د  ځاني غوښتنوپه لارکې ډېرې هلې ځلې کوي؛نو له زړه يې د ايمان خواږه اخستل کېږي .( تنبيه الخواطر ٢ / ١١٦)

ðد خپل امت په اړه تر ټولو بلاوو ډېرپه “هوى” [د نفساني غوښتتې [ او “طول  امل” [ د ډېرو هيلو خيال پلونه [ ډارېږم . (بيهقي )

ð د خپل امت په اړه تر ټولو بلاوو ډېر په “هوى”[ځاني غوښتنو] او”طولا مل” [خيال پلوونو]  ډارېږم . (بيهقي)

ð د خپل امت په اړه تر ټولو بلاوو ډېر په “هوى”[ځاني غوښتنو] او”طولا مل” [خيال پلوونو]  ډارېږم . (بيهقي)

ðهغه د خداى د لارې مجاهد دى،چې د الهي اطاعت په لار کې له ځان سره مبارزه وکړي .(اعلام الدين : ٢٦٥مخ )

ðغوره جهاد دادى،چې انسان له خپل دننني نفس سره مبارزې ته راپورته شي .( معاني الاخبار : ١٦٠مخ )

ð نفس دې  ناوړه دښمن دى . (چې خپل نفس دې کابو کړ؛نو ستر دښمن دې کابو کړى) ( بحار ٧٠/٣٦)

 

ناپوهي

ðدا ناپوهي ده، چې خپله پوهه ټوله رابرسېره کړې .( تنبيح الخواطر ٢/ ١٢٢)

نشتمني

ðڅوک چې ځان فقير او نشتمن ښيي ( ؛نو) نشتمنېږي . (تحف : ٤٢ )   

ðد خلکو شتو ته له تمې ډډه وکړئ،چې دا يو ډول نيستي او فقر دى . (بحار ٦٩/ ٤٠٨)

 

ایمان

ðغوره ايمان دا دى،چې پوه شې خداى درسره په هر ځاى کې دى . ( کنز : مخ ٦٦)

 ðايمان د کميس په څېر دى،چې کله يې څوک اغوندي اوکله يې وباسي . (دسيوطي جامع الصغير)

ðد خداى لپاره دوستي او دښمني،ژبه د “الله” په ذکر بوختول،څه چې ځان ته خوښوې،نورو ته يې هم خوښ کړې او څه چې ځان ته نه خوښوې؛نورو ته يې هم خوښ نه کړې؛نو دا د ايمان غوره مرتبې دي . (مسند احمد)

٩٤٥-د زنا،غلا،شرابخورۍ،لوټ،وژنې او خيانت پرمهال په وګړي کې “ايمان” نه وي؛نو ځکه مؤمنانو! له دې ځانګړنو ځان وساتئ .  ( صحيح بخاري- مسلم )

ð د اسلام بنسټ پر پينځو ستنو درول شوى دى :

 (١)پردې حقيقت شاهدي ورکول،چې  بې له “الله”بل خداى او معبود نشته،محمد (ص) يې بنده او استازى يې دى . (٢) لمونځ کول (٣) د زکات ورکول (٤ ) د خداى د کور حج کول (٥  ) د رمضان د مياشتې روژه نيول .( بخاري – مسلم )

ð ايمان څه له پاسه اويا څانګې لري،چې تر ټولو غوره يې د “لا اله – الا الله”ويل او ټيته يې له لارې د خڼدونو لرې کول دي او”حيا” د “ايمان” يوه څانګه ده . ( بخاري  – مسلم )

ðپېغمبراکرم (ص) د ايمان په اړه وپوښتل شو؟ويې ويل : هله مؤمن يې،چې په خپلو ښو کړنو درته خوشحالي اوپه ناوړو درته رنځ او خپګان پيدا شي . ( احمد)

 

ناشکري

ðتر ټولو ګناهونو د نعمت د ناشکرۍ سزا ډېر ژر وي .(وسائل ١١/٥٤١)

ðد نعمت له ناشکرۍ ځان وساتئ،چې ناشکري د بدمرغۍ لامل دى . (تفسيرالامام العسکري : ٤٤٧)

  

ځوان

ðبېشکه د خداى هغه ځوان ښه ايسي،چې ځواني يې د الهي لارښوونو په عملي کولو کې تېره کړ ې وي .( ميزان ٥/ ٩)

 

ناوړه چارې

ðله هغه  چار ډډه وکړه،چې د عذر غوښتو لاملېږي .(الدعوات: مخ ١٠ )

 

د پت دفاع

ðڅوک چې د مؤمن ورور د پت دفاع وکړي؛نودا به يې د دوزخ د اور ډال شي . ( الامالي طوسي: مخ ١١٥)

ðڅوک چې واوري،چې يو تن نارې سورې وهي : مسلمانانو! زما چاره وکړئ؛خو ستونزه يې اواره نه کړي؛نو مسلمان نه دى .( کافي ٢/ ١٦٢)

ðڅوک چې د غيبت او بدوينۍ پر وړاندې د خپل ورور دفاع وکړي؛نو پر خداى يې حق دى،چې له اوره يې ازاد کړي . (بيهقي) 

 

خوار او ذلیل

ðهيڅ مسلمان ته روا نه ده،چې ځان خوار او ذليل کړي .(يعقوبى تاريخ : مخ ٦٧)

نوم بدي

ðله نوم بدو سره ناسته ولاړه د انسان د نوم بدۍ لامل دى .(مستدرک ٢/ ٦٥)

سفر

ðلومړى د سفر ملګرى ومومئ او بيا سفر وكړئ . ( الكافي  ۴\ ۲۸۶)

ðسفر د عذاب يوه برخه ده؛نو په سفر كې،چې مو چارې پاى ته ورسېدې؛نو بايد په بيړه خپلې كورنۍ ته راستانه شئ . (بحار الانوار  ۷۳\ ۲۲۲)

ðسفر وکړئ،که په سفرکې موشته لاس ته رانه وړل؛نو(تجربي)عقل خو به مو زيات شي .( مکارم الاخلاق : مخ ٢٤٠)

ðسفر وکړئ،چې روغتيا ومومئ او روزي ترلاسه کړئ .( بحار ٨١/ ١٧٣)

ðدرې ناوړه خلك دادي 🙁 ۱) چې ځان ته سفر كوي (۲) ډالۍ نه مني ( ۳) او خپل مرىى وهي . ( الامان : ۵۳)

ðدا د سفر د ملګري حق دى،كه ناروغ شو؛نو ملګري دې يې ورته تر درېو ورځو پورې سفر وځنډوي . ( الكافي  ۲\ ۶۷)

ðاواز  او شعر د مسافر توښه ده؛خو چې ناسزا پکې نه وي . ( من لايحضره الفقيه  ۲\۲۸۰)

 

په سفر کى د نورو حق ته پاملرنه

ðانصارو له وريجو ډکه کاسه د خداى رسول ته ډالۍ راوړه، پېغمبر (ص) حضرت سلمان، مقداد او ابوذر  هم راوغوښتل،هغوى ډېر ژر له خوړو لاس واخست او بښنه يې وغوښته،د خداى رسول ورته وويل : ((تاسې خوڅه ونه خوړل؟!په تاسې کې،چې زه پر هر چا ګران يم ؛نو ډېره دې وخوري .))

 

له څارویو سره نېکي

ðد معراج پر شپه جنت ته ولاړم،هلته مې د هغه سپي خاوند وليد،چې خپل سپي ته يې اوبه  ورکړې وې .( بحار ٦٢/ ٦٥)  

ðڅاروي مه مثله کوئ،څوک يې چې  مثله کړي،خداى پرې لعنت وايي . (اصول کافي)

ðزړه سوى وکړئ،ان که د چوغکې د حلالو په باب هم وي (؛نو) خداى به درباندې د قيامت پر ورځ ورحمېږي .(صحيح بخاري)

ðکه څوک يوه چوغکه خوشې او بې ګټې [اخستو] ووژنې(؛نو) د قيامت پر ورځ به همدا چوغکه خداى(ج) ته عرض وکړي : پالونکيه! زه پلاني خوشې ووژلم،زه يې ګټنې ته نه يم وژلې. (صحيح بخاري)

ðمېږي يو پېغمبر وچيچه او په امر يې د مېږيو ځاله وسوځول شوه. خداى ورته وحې ولېږله،چې ته خو يوازې يومېږي وچيچلې؛خو تا يو تسبيح ويونکى امت وسېځه . [بخاري : ٣٠١٩ح]

 

رښتین

ðله تاسې رښتينى به موپه قيامت کې راته ډېر نږدې وي . (بحار ٧٧/ ٦٧)

ðرښتيا پر ځان لازم کړئ او تل رښتين وسئ؛ځکه رښتيا ويل (انسان ته) سمه او ښه لار ورښيي او سمه لار يې جنت ته رسوي او داچې انسان تل رښتيا ووايي او رښتيا ويل يې خوى وي؛نو د “صديقيت” او “رښتينولۍ” مقام ته رسي او د “الله” پر وړاندې د رښتينو په ډله کې شمېرل کېږي . تل له دروغو ځان وساتئ؛ځکه په دروغو روږدېدل، (انسان )بدې لارې ته راکاږي او بده لار دوزخ ته تللې او انسان،چې په دروغو روږد شي او دروغ ويل يې خوى شي؛نو د خداى پر وړاندې په دروغجنو کې ليکل کېږي . ( بخاري – مسلم )

ðتل رښتين وسئ،چې خداى مو د رښتنيو په ډله کې وشمېري او دروغجن مه واست،چې خداى مو په دروغجنو کې ونه ليکي . ( بخاري – مسلم )

ðيوه ورځ رسول اکرم (ص) اودس کاوه او اصحابو،چې د اودس اوبه پر خپلو مخونو او تنو اچولې؛آنحضرت ورته وويل : دا کار ولې کوئ ؟ هغوى ورته وويل : ((د خداى او له استازي سره يې د مينې له امله.)) آنحضرت ورته په ځواب کې وويل : څوک چې په دې خوشحالېږي،چې له “الله” او رسول سره يې حقيقي مينه لري؛نو پرې لازمه ده،چې تل رښتيا ووايي،په ورسپارلي امانت کې خيانت و نه کړي او له ګاونډ يانوسره ښه چلن وکړي .(بيهقي)

ð تل رښتين وسئ،چې خداى مو د رښتيو په ډله کې وشمېري او دروغجن مه  وسئ،چې خداى مو په دروغجنوکې ونه ليکي .( بخاري – مسلم)
ð رښتين او امين سوداګر(په قيامت کې) له پېغمبرانو،رښتينو  او شهيدانوسره دى .  (ترمذي،الدارمي، الدارقطني)

 

دښمن

 ð حضرت جبرائيل په هيڅ څيز كې ماته له خلكوسره په دښمنۍ كې د نه زیاتي هومره سپارښتنه نه ده كړې (له خلكو سره په دښمنۍ كې به زیاتی نه كوئ) . ( الكافي  ۲\ ۳۰۲)

ðزما د دښمن دوست ،زما دښمن ګنل کېږي .( بحار ٧٧/١٧٤)

ðد هر چا خپل عقل ملګرى او ناپوهي يې دښمنه ده.( بحار ٧٧/ ١٧٤)

 

بېځایه رټنه

ðخپل ورور دې هغه ته د ورپېښو ستونزو له امله مه رټه؛ځکه شونې ده،چې خداى پرې ولورېږي او وژغورل شي او ته په خپله پر هماغه کړاو اخته شې .( وسائل ٢/ ٩١٠)

 

خپلمنځي جوړجاړى

ðتر فرضو پر ځاى کولو وروسته د خلکو ترمنځ جوړجاړى غوره چار دى . (سفينة البحار٢/٤٠ )  

ðد خلکو ترمنځ جوړجاړى تر ټولو لمونځونو او روژو غوره دى . (سفينة البحار ٢ /٤٠)

ðپر مصلح دروغ نشته . (اصول کافي: ٤ ټ ،باب اکذب ،٢٤  حديث)

ðڅوک چې د دوو تنو ترمنځ جوړجاړى کوي؛نوکه ښه خبره وکړي يا د ښو نسبت وکړي (که څه هم واقعيت ونه لري؛نو) دروغحن نه دى. (عشريه : ١٨ مخ .)

 

روغتيايي احاديث

ðهوږه وخورئ،چې درملنه مو وشي؛ځکه د اويا دردونو شفا ده . (سفينة البحار ١ / ١٣٩ )

ðانګوردانه دانه وخورئ،چې دا خوندور خوراک دى . (سفينة البحار ١/ ٥٣٥ )

ðپه سباناري کې کجورې وخورئ،چې د ګېډې چينجي وژني.(صحيفة الرضا : ٤٩ او٥٨ احاديث)

ð کدو ډېر پخوئ؛ځکه خپه زړه خوشحالوي .(عيون اخبارالرضا:٣٠باب)

ðانار وخورئ؛ځکه هره دانه يې په معده کې زړه خوشحالوي او شيطان تر څلوېښتو ورځو پورې لرې کوي .( اخبار الرضا: ٣٠ باب )

ðوڅکې(مميز) وخورئ ؛ځکه :

١) صفرا لرې کوي ٢ ) بلغم له  منځه وړي . ٣ ) رګونه ټينګوي . ٤ ) ذهني کمزوري له منځه وړي . ٥ ) خوى ښه کوي . ٦ ) خوله پاکوي . ٧ ) اوغم له  منځه وړي . (روضة الواعظين : ٣١٠مخ )

ð ناروغ ته پرنجى د روغتيا او د بدن د راحت نښه ده.( الکافي ٢/ ٦٥٦)

ðفراغت او روغتيا دوه نعمتونه دي،چې ډېرى خلك پرې ازميېل کېږي . ( بحارالانوار  ۷۸\۱۷۰)

ðتر څلورو څيزنو مخكې له څلورو څيزو مه غافلېږه : ( ۱) ځواني دې تر زړښت مخكې ( ۲) روغتيا دې تر ناروغۍ مخكې (۳) شتمني دې تر نشتمنۍ مخكې ( ۴) او ژوند دې ترمړينې مخكې. ( الخصال  ۱\۲۳۸)

ðامنيت او روغتيا هغه نعمتونه دي،چې  شكر يې(معمولا) نه اېستل كېږي . ( بحارالانوار  ۷۸ \ ۱۷۰)

 

مسواک

ðخولې مو د قرآن لارې دي ؛نوپه مسواک يې پاکې کړئ . (محجة : ١/٢٩٦ )

ð مسواک وکاروئ !مسواک وکاروئ . ( کنز: ٢٦١٧٠ ح )

ðپه مسواک کارولو خوله پاکېږي او خداى خوشحالېږي .(کنز:٢٦١٥٦ح)

ðد خپلوغاښونو منځونه پاک کړئ . ( بحار ٦٢/ ٢٩١)

ð د مسواک وهلو ( ١٢ ) ځانګړنې دي :

١ ) خوله پاکوي .٢) خداى خوشحالېږي .٣ ) غاښونه سپينوي .٤ ) خيرى له منځه وړي . ٥ ) بلغم کموي . ٦ ) خوراک ته اشتها پيداکوي . ٧ ) نېکي ډېروي . ٨ ) له سنتو سره اړخ لګوي . ٩ ) پرښتي پرې شاهدې وي . ١٠ ) ورۍ ټينګوي . ١١ ) د قرآن  د لوستو لار وينځي . ١٢ ) دوه رکعته لمونځ،چې مسواک ورته وهل شوى وي تر هغو اويا رکعتو لمانځه غوره دى،چې مسواک ورته نه وي وهل شوى .(خصال: باب الواحد الى اثنى اعشر ٦ مخ )

ð ( قرآن چې لولئ؛نو)خولې مو د قرآن لارې دي؛نو په مسواک کارولو يې خوږ بويه کړئ (او پوه شئ،چې) خداى ته تر مسواک وهلو وروسته دوه رکعته لمونځ تر اويا رکعتو بې مسواکه لمانځه غوره دى (همداراز)مسواک غاښونه سپينوي او د خرابۍ مخه يې نيسي او ورۍ ټينګوي،د خولې لاړې کموي،خوړو ته اشتها زياتوي،د عبادت بدله زياتوي،په سنتو عمل کول دي او له پرښتو سره ملګرتوب دى او(پردې سربېره)د پالونکي د خوشحالۍ لامل ګرځي . ( الدعوات : ١٦٠)

ðڅلور څيزونه د الهي استازيو له سنتو دي : ( ١) عطر ( ٢) له خپلې مېرمن سره مينه ( ٣) مسواک ( ٤) نکريزې ( اخصال : ١\٢٤٢)

ðکه پر امت مې نه سختېداى؛نوامر مې کاوه،چې په هر لمانځه کې مسواک وکاروي . ( الکافي : ٣\٢٢)

ðخوله مو په خلالولو پاکه کړئ . (الوسايل  ١٦\٣١٧)

 

سلام  اچول

ðلومړى سلام واچوئ او بيا خبرې وکړئ؛خو چا چې تر سلام اچولو مخکې خبرې پيل کړې؛نو ځواب يې مه ورکوئ . (اصول کافي/٤ټوک باب تسليم ١ او٢ حديثونه )

ðسلام د خداى تعالى يو نوم دى او پخپلو کې يې دود کړئ . مسلمان،چې پر يو قوم تېرېږي او سلام پرې واچوي؛نوکه د سلام ځواب يې ورنه کړي؛نو تر هغه  ډېر غوره او سپېڅلى به يې ځواب ورکړي . (روضة  الواعظين : ٤٥٩ مخ )

ð ډېر بخيل هغه دى،چې په سلام اچولوکې بخل کوي . (روضة الواعظين : ٤٥٩ مخ )

ðسلام اچول او نېکې خبرې د بښنې له لاملونو څخه دي . (جامع الا خبار:١٠٤ مخ )

 ð يو له بل سره په سلام او روغبړ ملاقات وکړئ اوپه دعا بېل شئ .( طرايف الحکم: لومړى /٢١٧)
ðهغوى خداى او استازي(ص) ته يې  ډېره نږدې دي،چې خپلې خبرې په سلام ويلو پيلوي .( اصول کافي/ ٤ټوک، باب التسليم،٣ حديث ) .

ðړومبى سلام اچوونکى له کبره لرې دى .(ميزان الحکمه: ٨٨٤٨ح )

ðڅوک چې تر نورو ړومبى سلام پيل کړي؛نوله کبره به خلاص وي . (بيهقي)

ð مؤمن خپلې خبرې په سلام پېلوي . ( ميزان: ١٤٣٨ )

ðخداى او استازي ته يې هغه ډېر وړ دی،چې لومړى سلام واچوي . ( الكافي ۲\ ۶۴۴)

ðلومړى سلام بيا كلام؛نو چاچې تر سلام مخكې خبرې پيل كړې؛نو ځواب يې مه وركوئ . ( وسايل الشيعة  ۱۲\۵۶)

ðهغه ډېر بېوسې دى،چې دعا نه كوي او هغه ډېر كنجوس دى،چې سلام نه اچوي . ( الا مالى للطوسي : ۸۸)

ðوړ ده،چې سپور  پر (پلي) سلام واچوي .(مستدرك الوسايل ۸\ ۳۷۲)

ðڅوك چې له غونډې پاڅېد؛نو نور دې په سلام ورسره خداى پاماني وكړي . ( الجعفريات : ۲۲۹ )

ðپه دنيا كې زړه سوى وكړئ،كه څه هم په يو سلام اچولو وي . (جامع الاخبار : ۸۸مخ )

ðسلام اچول مستحب او ځواب يې فرض دى . ( الكافي ۲\ ۶۴۴)

ðسلام د پاک خداى له نومونو دى؛نو پخپلو كې يې ښكاره كړئ . ( په لوړغږ سلام اچوئ )  . ( روضة الوا عظين ۲\۴۵۹)

ðپه جنت كې داسې ځايونه دي،چې ظاهر يې له باطنه او باطن يې له ظاهره ليدل كېږي او زما هغه امتيان به پکې اوسېږي،چې ښه خبرې كوي،وږي مړوي،په لوړ غږ سلام اچوي او د شپې،چې خلك ويده وي؛نو لمونځ كوي بيا يې وويل : كله هم پر مسلمانانو له سلام اچولو ډډه مه كوئ . ( الواغظين  ۲\ ۳۷۱)

 

د ګاونډي حق

ðهغه به زما پر”نبوت” ايمان نه وي راوړى،چې په مړه خېټه شپه تېره کړي او ګاونډى يې وږى وي . (اصول کافي٤ټوک،باب الحوار،١٤ حديث)

ð د ګاونډيانو په باب سپارښتنه درته کوم . ( کنز ٩/٤٩ )

ðپر خداى قسم!مؤمن نه دى (درې ځل يې وويل)،چې ګاونډى ځوروي. ( صحيح بخاري)

ðمؤمن نه دى،چې په مړه خېټه وېده شي او ترڅنګ  ګاونډى يې وږى وي .(بيهقي)

ðتر  کور اخستو لومړى يې ګاونډ وګوره بيا کور او تر سفر مخکې د خپل سفر ملګرى پيدا کړه . ( سنن ابي داود ٢/ ١٤٧ )

ð څوک چې پر خداى او قيامت ايمان لري ؛نو د خپل ګاونډي عزت دې کوي .( مسند احمد ٤/ ٣١)

ðد ګاونډي ځوروونکى به جنت ته نه ننوځي .( اثنى عشريه : ١٥ مخ )

 ðجبرئيل تل ماته دګاونډي په باب سپارښتنه کوله(ان تردې)،چې ګومان مې وکړ،دوى به په خپلو کې له يو بله ميراث يوسي. ( صدوق:مجلس ٦٦ ،لومړى حديث .)

ðدګاونډي درناوى؛لکه د مور درناوى دى .(کافي :٤ټوک،باب حق الجوار ،٢حديث .)

ðګاونډيان  درې ډوله دي :ځېنې درې حقه لري؛(١) داسلام  حق  (٢) دګاونډيتوب حق (٣) دخپلوۍ حق .ځينې يې دوه حقه لري ؛(١) اسلام  (٢) دګاونډيتوب حق.ځينې يې يوحق لري او هغه کافر دى،چې (يوازې) د ګاونډيتوب حق لري . (روِضة  الواعظين :٣٨٩ مخ )

ðڅوک چې پر خداى او د قيامت پر ورځ ايمان لري؛نو د خپل ګاونډي عزت دې وکړي .(ا ثنى عشريه: ١١ مخ )

ðله څلورو خواوو تر څلوېښتوکورونو پورې ګاونډيان شمېرل کېږي . (اصول کافي: ٤ټوک،باب حدالجوار،لومړى حديث )

 

اولاد

 ðخپلو کوچنيانو ته د “لااله الاالله” کلمه ورزده کړئ او د مړينې پر وخت يې هم ورتلقين اوپه خوله کې ورکړئ . (بيهقي)

 ð د خپلو اولادونو درناوى وکړئ او ښه په ادب يې وروزئ .(ابن ماجه)

ðپر خپلو اولادونو مو د پېغمبرانو نومونه کېږدئ؛”عبدالله” او”عبدالرحمن” ډېر غوره نومونه دي .

ðله اولادونوسره مو په عدالت چلن وکړئ؛که دا موښه ايسي،چې هغوى درسره په نېکۍ او لطف چلن وکړي .( سفينة  البحار:٢ / ٦٨٤ )

ð صالح اولاد خو د خداى له لوري يو ګل دى،چې په خپلو بندګانو کې يې ويشي . ( الکافي ٦ / ٢ )

ð د صالح اولاد درلودل د سړي په نېکمرغيو کې ګڼل کېږي.(الکافي٦/ ٣)

ð مهربانې لوڼې غوره اولاد دى،چې تل د مور و پلار په چوپړ کې وي، مينه ناکې،برکتي او پاکې وي . ( الکافي ٦/ ٥)

ð غوره اولاد مو لوڼې دي . (مکارم الاخلاق: ٢١٩)

 ð پر دې امت د “علي” حق؛ لکه پر اولاد د پلار حق دى . (تاريخ مدينه دمشق ٤٢/ ٣٠٨ – ميزان لاعتدال ٣/ ٣١٦ )

ð اولادونو ته مو لامبو او غشى ويشتنه زده کړئ .( الکافي ٦/ ٤٧ )

ð پر پلار د اولاد حق دا دى : که زوى و؛نو له مور سره دې په ورين تندي چلن کول او درناوى دې يې کوي،ښه نوم دې پرې کېږدي،قرآن دې ور وښيي، پاک دې کړي او لامبو دې ورزده کړي او که نجلۍ وه؛ نو له مور سره دې په ورين تندى چلن کوي او درناوى دې يې کوي . ښه نوم دې پرې کېږدي،د “نور سورت” دې ورياد کړي او د “يوسف” سورت دې نه ورښيي او (په عمومې ځايونو کې) دې يې د خلکو کتو ته نه راښکاره کوي او ژر دې ورته مېړه وکړي او که نوم يې ورباندې “فاطمه” ايښې وه؛نو کنځلې دې ورته نه کوي،لعنت دې پرې نه وايي او نه دې يې وهي . ( الکافي ٦/ ٤٨ )

 

 اخر وخت او قیامت

ðزما دې پر هغه ذات قسم وي،چې زما  ساه يې  په لاس کې ده؛قيامت تر هغه نه راځي،څو خپل مشر ووژنئ او په خپلو کې په جګړه  شئ او دنيا مو ډېرو ناوړو ته مېراث شي . (سنن ابي داود)

ðيو په بل پسې د اسلام لارښوونې څنډې ته کېږي او مشران بې لارې کوونکي کېږي او ورپسې درې دجاله راښکاره کېږي.(د حاکم مستدرک)

ðکه چارې نا اهلوته وسپارل شي (؛نو) قيامت ته سترګې پر لار وسئ . ( صحيح بخاري )

ðتر هغه چې  پر ځمکه د”الله”نوم يادېږي (؛نو) قيامت نه راځي. (صحيح مسلم )

ðپر تاسې به داسې وخت راشي،چې نه به له چا سره حلالې پيسې وي او نه به ديني ورور وي،چې څو شېبې کېنې او مينه ورسره وکړي او نه به کوم (نبوي) سنت عملي کېږي . (سيوطي:جامع الصغير)

ðپر خلکو به داسې وخت راشي،چې که څوک پر خپل دين ټينګ ولاړ وي؛ نو لکه  د اورسکروټه يې،چې په لاس کې نيولې وي . (سنن ترمذي)

ðپر خلکو به داسې وخت راشي،چې څوک به د”بېوسۍ” او”بدکارۍ” ترمنځ اختيارمن وي؛نو پر داسې مهال  بايد”بېوسي” پر “بدکارۍ” غوره وګڼې .  ( سيوطي : جامع الصغير)

ðتر ما وروسته به داسې مشران وي،چې واکمنۍ ته به جنګېږي او يو بل به وژني . (دسيوطي  جامع الصغير)

ðداسې وخت به راشي،چې رښتين به دروغجن او دروغجن به رښتين،امين به خائن اوخائن به امين ګڼل کېږي .ژر به فتنې راپېښې شي،چې “ناست”وګړي به پکې تر “ولاړ”  غوره وي  او “ولاړ” به تر “روان” غوره وي او تلونکي به تر ځغاستونکي غوره وي [څوک چې په فتنوکې ډېره لږه برخه لري،ورته غوره ده ] او څوک چې په فتنو پسې ولاړ شي؛نو هلاک به يې کړي؛نوځکه چا چې پټنځى وموند؛پکې دې پټ شي. [ بخاري : ٧٠٨١ ح]

ðپرخلکو به داسې وخت راشي،چې ورته به بې توپېره وي،چې مال يې له کومه لاس ته راوړى،حلال دى  که حرام ؟قيامت ته نږدې دا ډېر لږ پېښېږي،چې د مؤمن خوب سم ونه خېژي؛ځکه د مؤمن خوب د نبوت له ( ٤٦) برخو يوه برخه دى او څه چې د نبوت په باب وي،بېخي پکې دروغ نه وي . [بخاري : ٧٠٧١ ح]

 

د جمعې د ورځې خطبه

ðڅوک چې د جمعې پر ورځ د امام په خطبه کې خبرې کوي،د هغه خره په شان دى،چې څوکتابونه پرې بار وي . (دامام احمدحنبل مسند)

 

شمع

ðڅوک چې نورو ته د ښېګڼو ښوونه کوي او خپل ځان هېروي،د شمعې په څېر دى،چې ځان سوځوي او نور رڼا کوي .(دسيوطي جامع الصغير)

 

اذان

ðاذان،چې اورئ[؛نو په خپل زړه کې يې] داسې يې ووياست؛لکه چې مؤذن يې وايي . ( صحيح بخاري )

ðد اذان او اقامت ترمنځ دعا نه ردېږي . (سنن ابي داود)

ð [د لمانځه په جماعت کې دې]ستاسې تر ټولو ښه قاري امامت وکړي او ډېر ښه مو يې اذان ووايي .(من لايحضره الفقيه )

ðاذان مو،چې تر غوږ شو؛نو د مؤذن په څېر يې ووايئ. (بخاري : ٦١١ح )

 

بډې

ðخداى لعنت کړي:بډې ورکونکى او بډيخور او منځګړى يې. ( مستدرک الوسايل  ١٧\ ٣٥٥)

 

وصیت

 ðشتمن مسلمان دې د خپلې شتمنۍ په باب وصيت وکړي او روا نه ده، چې دوه شپې پرې تېرې شي او وصيت يې نه وي ليکلى . [بخاري :٢٧٣٨ح ]

انګېرنې

ðانګېرنې په درېو څيزونو کې دي:اس،ښځه او کور.(بخاري : ٢٨٥٨ح)

 

لارښود

ðتر هغه د لارښود د خبرو اورېدل او د لارښوونو منل لازمي دي، چې پر ګناه يې امر نه وي کړې؛نوکه امر يې  وکړ(؛نو) نه ښايي خبرې يې واورېدل شي او لارښوونې يې ومنل شي. ( بخاري : ٢٩٥٥ح)

 

جهاد

ðيوسړى پېغمبر اکرم ته راغى او جهاد ته د تلواجازه يې وغوښته. آنحضرت ( ص) ورته وويل : موروپلار دې ژوندي دي ؟ ويې ويل : هو! رسول الله ورته وويل : ستا جهاد د هغوى خدمت کول دي .  [ بخاري : ٣٠٠٥ح]

ðخلکو! “جهاد” د جنت له ورونو يو “ور”دى،چې خداى تعالى يې خپلو ځانګړو بندګانو ته پرانځي . (عوالي الاللي :٢\٩٨)

ðجهاد وکړئ،چې اولادونو ته مو سر لوړي پرېښې وي.(الکافي : ٥\٨)

ðډېر کنجوس هغه دى،چې په سلام اچولو کې کنجوسي کوي او ډېر بښاند هغه دى،چې خپل ځان او شتمني د خداى په لارکې وبښي. (الجعفريات : ٧٦مخ )

ðامت ته مې دپينځو څيزونوسپارښتنه کوم : (١) اورېدل .( ٢) اطاعت کول . (٣) مهاجرت کول .( ٤) جهاد . ( ٥) او ډله ييزکارونه کول . څوک چې بل د جاهليت د زمانې دود ته راوبلي؛نو خداى د جهنم په يوه قبرکې يې ننباسي . ( مستدرک الوسايل  ١١\٩)

 

قریش

ðحضرت “انس” (رض) وايي : نبي اکرم (ص) وويل :زه د قريشو د زړونو د لاس ته راوړنې لپاره ورکړه کوم؛ځکه چې جاهليت ته نږدې دي . ( بخاري: ٣١٤٦ ح)

واکمني

ðتاسې واکمنۍ ته د رسېدولپاره هڅه کوئ؛خو د قيامت پر ورځ به پښېمانه شئ . واکمني شيدوره ده(زيات خوندونه لري)؛خو پرېکون (مړينه) يې خورا ناوړه د‌ى .

  [ بخاري : ٧١٤٨ح]

 (الف) نو خداى چې کوم بنده ته د اولس مسؤوليت ورترغاړې کړي؛خو په نصيحت او خيرغوښتنې کې يې لنډون  او تقصير وکړي؛نو جنت به بوى نه کړي .

(ب) واکمن ته،چې د مسلمانانو د ټولي مسؤوليت ورترغاړې شي او د خيانت په حال کې ومري؛نو خداى پرې جنت حراموي . [بخاري : ٧١٥٠او٧١٥١احاديث ]

ðحضرت “جابربن سمرة” (رض ) وايي: پېغمبراکرم (ص) وويل : دولس تنه به اميران شي بيا يې څه وويل؛خو ما وا نه ورېدل پلار مې وايي : رسول اکرم (ص) وويل : هغو‌ى ټول به له قريشو وي .[بخاري : ٧٢٢٢- ٧٢٢٣ احاديث ]

 ðکه څوک واکمن په داسې څيز خوښوي،چې خداى پرې خپه  کېږي؛نو د خداى له دينه وتلى دى .

 

کرنه

 ðڅوک چې څه وکري او مرغان يې (هم) ترې وخوري؛نو صدقه ورته حسابېږي .(٢٩٩٧ح – نهج الفصاحة )

 ð شنو ته ليدل ، د سترګو کاته زياتوي .(٣١٥٨ح – نهج الفصاحة )

 ð شنو،روانو اوبو او ښکلي مخ ته کتل سترګې روښانوي . ( ١٢٩١ح – نهج الفصاحة  )

ð مسلمان،چې ونه کېنوي يا تخم وکري اوکوم انسان، الوتونکى يا څاروى يې څه ( مېوه) وخوري؛نو صدقه ورته حسابېږي .( بخاري : ٣٢٢٠ حديث ح – نهج الفصاحة )  

ðڅوک چې کومه ونه کېنوي ؛نوخداى ورته د ونې د مېوې هومره بدله ليکي .(٢٦٧٤ ح – نهج الفصاحة)

ðڅوک چې ونه وکري؛نو هر ځل چې ترې انسان يا د خداى مخلوق څه وخوري؛نو صدقه ورته حسابېږي .(٢٩٢١حديث – نهج الفصاحة )

ðپسرلى مو چې وليد(؛نو)قيامت ډېر ډېر رايادوئ.(جهان بيني اسلامي،استاد مطهري)

ðمؤمن چې ونه يا څه وکري،چې انسان،مارغان يا څاروي يې ترې وخوري ؛نو ورته صدقه ده . ( مستدرک الوسايل  ١٣\٤٦٠)

 

د کهف سورت

ðڅوک چې د جمعې پر ورځ د”کهف سورت” ولولي (؛نو) دوو جمعو ترمنځ ورته (په زړه کې ځانګړې) رڼا پيدا کېږي . (بيهقي)

 

لوڼې

ð د چاچې لور وزېږي او په قدر يې وپوهېږي او و يې نه ځوروي او د مينې او چلن تر مخې يې له زامنوټيټه ونه ګڼي؛نو خداى به ورته په بدل کې جنت په برخه کړي .  ( احمد- دحاکم مستدرک )

 ðد چاچې درې لوڼې يا درې خويندې يا دوې خويندې يا دوه لوڼې وي او ښه يې وروزي اوښه چلن ورسره وکړي او واده يې هم کړي ؛نو جنت ورپه برخه دى .( ابوداود- “ترمذي” ) 

 ðپه ډاليو ورکولو کې مو له اولادونوسره يوشان چلن وکړئ او که په دې باب مې څوک غوره ګاڼه؛نو هغه به ښځې وې (؛يعنې که مساوات او يوشانوالى لازم نه و؛نو امر مې کاوه،چې تر زامنو،لوڼو ته زيات ورکړئ) ( د سعيدبن منصورسنن – “طبراني” الکبير)

 

د اسلامي ټولنې د وګړيوخپلمنځي اړيکې

 ðد اسلامي ټولنې وګړي د يوې تنې د غړيو په څېر دي،که سترګه يې درد وکړي؛ټول بدن يې دردېږي اوکه سر درد شي؛نو ټول بدن ورسره دردېږي .( مسلم )

ð مسلمان پر مسلمان پينځه حقونه لري : ١- د سلام ځوابول  ٢- د ناروغۍ  پوښتل . ٣- په جنازه کې يې ګډون کول ٤- بلنه منل .٥- د”پرنجي” پر مهال يې “يرحمک الله” ويل . ( بخاري – مسلم )

 

عیال

ðمخلوق  د الله تعالى “عيال” دى؛نو هغه خداى ته ډېرغوره دى،چې له عيال سره ښه چلن کوي . (بيهقي)

ð ټول مخلوقات د خداى عيال دى؛نو د خداى په بندګانوکې تر ټولو هغه غوره دى،چې له عيال سره يې ډېره مينه لري .(بيهقي)

 

د غونډې آداب

ð د دوو ترمنځ بې له اجازې يې مه کېنه.( د ابوداود سنن )

ðڅوک چې له غونډې ووت او راستون شو؛نو له نورو سره پر خپل ځاى د کېناستو وړ دى . (مسلم)

ðڅوک چې په دې خوشحالېږي،چې خلک يې درناوي ته راپورته شي؛ نو ځان ته دې په دوزخ کې ځاى جوړ کړي .( “ترمذي” – “ابوداود”)

ðلکه عجم،چې درناوي ته يو بل ته راپاڅي؛نو دغسې زما درناوي ته مه راپاڅئ . ( ابوداوود)

 

 

شعر

ð ځينې ويناوې کوډې،ځينې پوهې ناپوهۍ او ځينې شعرونه حکمت دي . ( مستدرک الوسايل ٦/ ١٠٠)

 ð شعر په خپله يو ډول خبرې اوکلام دى،ښه يې ښه او بد يې بد دی . (الدارقطني )

ð (د منځپانګې له پلوه) ځينې  شعرونه حکمت دي . (بخاري)

ð رسول اکرم (ص) وويل :”لبيد بن ربيعه” ښه رښتينى شعر ويلى ((الاکل شى ماخلاالله باطل)؛پوه شئ،چې بې له”الله هر څه فنا کېدونکي دي .  ( بخاري – مسلم )

ð”عمرو بن شرير”له خپل پلار “شريربن سويد ثقفي” روايت کوي،چې په يوه سفرکې په رسول اکرم (ص)  پسې پر سپرلۍ سپور وم، آنحضرت راته وويل : د “اميه بن صلت” شعرونه دې ياد دي؟ ورته مې وويل : هو! راته يې وويل : و يې وايه . ما ورته يو بيت ووايه . بيا يې راته وويل:و يې وايه، ما يو بيت ووايه . بيا يې وويل : و يې وايه . بيا مې ورته تر سلو بيتو پورې وويل . ( مسلم )

ðاو په يو روايت کې راغلي،چې آنحضرت وويل:”اميه” د اشعارو له پلوه اسلام ته ډېر نږدې شوى و اوپه بل روايت کې (فتح الباري ١٥/٤٣٠ ) يې وويل : (( امن شعره وکفرقلبه ) شاعري يې مسلمانه؛خو زړه  يې کافر پاتې شوى دى .

 

پرنجى او پړمخکۍ

ðپړمخکۍ،چې درشي؛نو پر خوله لاس کېږدئ؛ځکه شيطان پکې ننوځي . ( مسلم)

 

ځان سینګارول

ð د خداى دا ښه ايسي،چې پر بنده يې د لورنې اغېزې څرګندې وي . (“ترمذي” )

ð ښه وخورئ،وڅښئ او نورو ته هم صدقه ورکړئ او ښه واغوندئ؛خو چې “اسراف” کبر او د ځانښوونې نيت پکې نه وي . (نسائي – ابن ماجه)

ð وېښتان مو سم کړئ او پاکې جامې واغوندئ . ( احمد- نسائي )

ð ساده ژوند کول د ايمان يوه څانګه ده .(ابوداوود)  

ðد فطري دين څلورځانګړنې دي :  ١- سنتول .٢- تر نامه لاندې د وېښتانوخريېل . ٣- د برېتولنډول . ٤- د نوکانو پرې کول . ٥- تخرګونو وېښته خريېل .  

ð هرڅوک دې د خپلو وېښتانوعزت وکړي .(؛يعنې خپل وېښتان ښه وساتئ.) (ابوداوود )

ð له حضرت عبدالله بن عمروعاص(رض) روايت دى،چې رسول اکرم (ص) به خپله ږيره په اوږدو او لنډو جوړوله . (ترمذي)

 

نامحرمو ته کتل

ð رسول اکرم (ص) علي ته وويل : علي ! که ناڅاپه دې پر نامحرمې نظر ولوېد؛نوڅه باک نه لري؛خو دويم ځل کتل درته روا نه دي . ( احمد- “ترمذي” – ابوداوود)

 

د ايمان نښې

ð خداى چې تر ما مخکې په کوم امت کې پېغمبر معبوث کړى؛ نو يو شمېر وړ مرستندويان او اصحاب يې درلودل ،چې پر دود به يې تلل او لارښوونې به يې عملي کولې بيا داسې شول،چې ناوړه يې ځايناستي کېدل ؛داسې چې څه يې ويل،عمل يې پرې نه کاوه او داسې چارې يې کولې،چې دنده يې نه وه؛نوڅوک چې په خپل مټ ور پسې راپاڅي او جهاد وکړي؛نو مؤمن دى او څوک چې يوازې پر ژبه يې مقابله وکړي؛نو هم مؤمن دى او څوک چې (له ژبني جهاده هم بېوسې و) او يوازې په زړه يې ورسره جهاد وکړ(؛يعنې د زړه له کومې يې ورسره کرکه لرله)هم مؤمن دى؛خوکه دغسې (درې) ځانګړنې يې نه لرلې ؛نو د ږدن د دانې هومره”ايمان”پکې نشته. (مسلم)

ðد بنده ايمان هله سمېږي،چې زړه يې سم شي او زړه پر ژبه سمېږي ؛ نو له خداى سره داسې ليده کاته وکړئ،چې د مسلمانانو شتمنیو ته مو لاس نه  وي غځولى او پر ژبه مو نه وي بې پته کړي .(بحارالانوار ٦٨\ ٢٩٢)

 

وفا

ð دين نصيحت (اخلاص،زړه سوى او وفا) دى . و موپوښتل: له چا سره زړه سوى او وفا؟راته يې وويل : له الله تعالى،له استازي (ص) سره يې، د مسلمانانو له مشرانو او تر ټولو مسلمانو پرګنوسره .  (مسلم )

 

الهي تقدير

ð رقيه او تعويذ،دارو،درمل او هغه چارې،چې ستونزې او کړاوونه پرې لرې کېږي؛دا ټول په الهي تقديرکې شمېرل کېږي. (احمد،”ترمذي”،ابن ماجه)

 

اړتیا پټه ساتل

 ð د خداى بېوزلى او ګڼ اولادى  بنده خوښېږي؛خو چې عفت ولري (؛يعنې بېوزلي يې دې ته نه اړباسي،چې له نامشروع لارو څه لاس ته راوړي؛دغسې نورو ته هم خپله بېوزلي نه څرګندوي). (ابن ماجه)

ð څوک چې وږى وي يا څه ته اړتيا لري؛خو څوک يې پر ځان خبر نه کړل ؛ نو د يو کال د حلال رزق ورکړه يې د خداى په ذمه ده . (بيهقي)

 

ساتېري

ð له ارام پالنې او ساتېرۍ ځان وژغوره؛ځکه د خداى ځانګړي بندګان دغسې نه دي . (احمد)

  

متقي شتمن

ð د خداى متقي،شتمن او نامشهور بنده خوښېږي .(؛يعنې له شتمنۍ او تقوا سره سره يې ځان مشهورکړى نه دى .)

ð په نړۍ کى د خداى له احکامو لاروي وکړه (متقى وسه) او په هرې بدۍ پسې نېکي وکړه،چې ورباندې ووينځل شي او د خداى له بندګانوسره ښه چلن  وکړه. (“احمد”– “ترمذي” – “الدارمي”)

 

نفقه

ð د يتيم (پلارمړي) پر سر لاس راکاږه او بېوزليو ته خواړه ورکړه. (احمد)  

ðنورو ته نفقه ورکړئ،چې خداى يې تاسې ته درکړي .( بخاري– مسلم)

 

سخي او بخیل

ðسخي،خداى او بندګانو ته يې نږدې وي او بخيل له خداى او بندګانو يې او(همداراز) له جنته لرې او دوزخ ته نږدې وي،بېشکه خداى ته “ناپوهه سخي” تر “عابد بخيله” ډېرګران دى . (ترمذي)

ð د بنده په زړه کې کله هم حرص،بخل اوايمان نه يو ځاى کېږي . (نسايي)

 ðچلي،بخيل او منت اېښوونکى جنت ته نه ځي . (ترمذي)

 

سخاوت

ðعلي! سخي وسه،چې سخيان د خداى ښه ايسي.كه څوك درته د كومې اړتېا لرې كولو ته راغى؛نو اړتيا يې لرې كړه؛نو که څه هم هغه د بخشش وړ نه و؛خو ته د بخشش وركولو وړ يې .( مشكاة الانوار : ۲۳۳)

ðسخي انسان خداى،خلكو او جنت ته نږدې او له اوره لرې وي اوكنجوس له خداى،خلكو او جنته لرې  او اور ته نږدې وي.( مستدرك الوسايل : ۷ \۱۳)

ð سخي هغه دى،چې خپله شتمني د خداى لپاره وبښي او څوك چې د خداى د احكامو د مخالفت په لار كې بخشش وركړي؛ نو د خداى غوسه اوغصب به يې پر اوږو كړی وي او پر ځان به ډېر كنجوس وي .( بحار الانوار: ۶۸\۳۵۵)

ðد سخي خواړه شفا دي او د كنجوس د ناروغۍ لامل دي. ( بحارالانوار  ۶۸\۳۵۷)

ðسخاوت يوه ونه ده،چې بېخ يې په جنت كې او څانګې يې تر دنيا راغلي دي؛نو څوك يې چې كومه څانګه ونيسي؛نو د جنت لوري ته يې راكاږي . ( وسايل  ۹\۱۹ )

ðد “اولياء الله” فطرت (او خټه) له سخاوت او ښه خوى سره اغږل شوې ده . ( مستدرك الوسايل ۷\۱۳)

ðمنت ايښوول د سخاوت آفت دى . ( الحضال  ۲\ ۴۱۶)

ð ډېرسخي هغه دى،چې د خپلې شتمنۍ زكات وركړي او ډېر بخيل هغه دى،چې د فرض زكات له وركړې ډډه  وكړي .(مشكاة الانوار  ۲۳۱مخ )

ð اسلام د كنجوسۍ په څېر بل هيڅ څيز نه پوپنا كوي . (الكافي ۴\ ۴۵)

 

بدګوماني

ðپر يو بل له بدګومانۍ ډډه وکړئ،چې دا ډېره دروغجنه خبره ده،د يوه بل کمزورۍ مه وايئ او د ځووپه شان د يو بل عيبونه مه راسپړئ،پر يوبل مه ګواښېږئ، يو له بل سره کينه مه لرئ او مه ورسره دښمني کوئ اومه يوبل ته شا کړئ؛بلکې دخداى بندګانو! يو له بل سره وروڼه وسئ . (بخاري – مسلم )

ðڅوک چې نرم خويه نه وي؛نو تر ټولو ښو به بې برخې وي . (مسلم)

ðبدغونى او بدژبى جنت ته نه ځي. ( ابوداود)

ðد خلکو له بدګومانۍ ځان وژغورئ . ( تحف العقول : مخ ٥٤)

دروغ

ð د مؤمن په طبيعت کې بې له “خيانت” او”دروغو” بل هر څه  ورننووتاى شي. ( احمد –بيهقي)

ð څوک چې دروغ وايي؛نو پرښتې يې د خولې له بدبويۍ يوميل لرې کېږي .(ترمذي)  

ð دا ډېر ستر خيانت دى ،چې له ورور سره دې دروغ ووايئ،حال داچې هغه درته رښتيا وايي . (ابوداوود)  

ð په دروغو شاهدي ويل له “شرک بالله” سره مساوي ده. (ابوداوود– ابن ماجه) 

 ð څوک چې په دروغو د چا مال تر لاسه کړي يا يې ضايع کړي؛نو له خداى سره په داسې حال کې ويني،چې پر “جذام” به اخته وي . (ابوداوود)

ð حضرت”عبدالله بن عامر” روايت کوي،چې يوه ورځ آنحضرت (ص) زموږکره راغلى و  او مور مې راته غږکړ: راشه،چې څه درکړم . آنحضرت مې مور ته وويل : زوى ته دې څه ورکوې ؟ مور مې ورته وويل : کجورې . آنحضرت ورته وويل : پام مو وسه،که خبره دې عملي نه کړې؛نو په کړن ليک کې دې دروغ ليکل کېږي . (ابوداوود- بيهقي)

ð څوک چې د خلکو خندولو ته په خبرو کې دروغ وايي؛نو پر هغوى دې افسوس وي؛نو پر هغوى دې افسوس وي .(احمد- ترمذي – ابوداوود – الدارمي )

ð له چا سره،چې په کومه مسئله کې مشوره وشوه؛نوپه اړه يې امين او ورته امانت سپارل شوې ده. (ترمذي)

ð څوک چې خبرې کوي او شاوخوا ته يې وکتل (؛نوپوه شه)چې خبرې يې امانت دي . (ترمذي– ابوداوود)

ðدروغجن ځکه دروغ وايي،چې ځان ورته کوچنى ښکاري. (مستدرک ٢/١٠٠) 

ðدروغجن ته همدا بس دي،څه چې اوري،وايي يې .(مسلم)  

ðڅوك چې په لوى لاس راپورې دروغ وتړي؛نو دوزخ يې ځاى دى .( كشف الغمه : ۴۶۰ )

ðزياتې ټوكې كول ابرو له منځه وړي، ډېر دروغ او خندا ايمان پوپنا كوي او ډېر دروغ ويل انسان بې ارزښته كوي . (روضة الواعظين : ۲ ۴۱۹ )

ðهر ډول دروغ ويل ګناه ده ؛خو دا چې يو مؤمن ته ګټه ورسي يا پرې له دې نه شر لرې كېږي ( مستدرك الوسايل  ۹\ ۹۵ )

ðدروغ د خبرې آفت دى . ( بحارالانوار  ۶۶\ ۳۸۹)

ðد نارينه ايمان هله بشپړېږي،څه چې ځان ته خوښوي،خپل مؤمن ورور ته يې هم خوښ كړي او په ټوكو كې هم له دروغو ډډه وكړي. ( بحارالانوار ۶۶\ ۳۸۹)

ð دروغ د نفاق له ورونو يو ور دى . ( مجموعة ورام  ۱\۱۱۳)

ðڅوك چې په موږ اهلبيتو پورې دروغ وتړى؛نو د قيامت پر ورځ ړوند او په يهودي دين راپاڅي او كه د دجالو پر مهال وي؛نو ايمان پرې راوړي .( بحارالانوار  ۲\۱۶۰)

ðدروغ ويل په درېو ځايوكې سم دي:(۱) خپلې مېرمن ته د مېړ ه دروغ ويل (۲)د هغه سړي دروغ ويل،چې دوه تنه سره پخلا كوي (۳) اوخپل دښمن ته د چارواكي دروغ ويل؛ځكه په جګړه كې چل روا دى. (الجعفريات  ۱۷۰ مخ )

ðله دروغو ځان وژغورئ ؛ځکه انسان مختورى کوي .( تحف العقول : مخ ١٤)

ð دروغ ويل انسان مختورى کوي او چغلي د قبر عذاب راوړي .( کنز ٣/ ٦١٩ )

ð دروغ ويل ،روزي کموي . ( ميزان: ١٧١٦٣ ح )

ðدروغ ويل خيانت دى . ( بحار ٧٢/ ١٩٢)

ðد يو چا دروغ ويلو ته همدا بس دى،چې څه يې اورېدلي وي، ويې وايي .( مکارم الاخلاق : مخ ٤٦٧)

ðيو ستر دروغ دادي،انسان چې په خوب کې څه نه وي ليدلي؛خو ووايي چې ليدلي مې دي .[ بخاري : ٧٠٤٣ ح]

ðپر دروغوشاهدي ورکول له خداى سره د شرک سره برابره ده . ( ابو داوود – ابن ماجه )

ðدروغجن دروغ نه وايي؛خو داچې په ځان کې ټيټوالى احساسوي. (بحار ٧٢\٢٤٩ )

ð دروغجن د خپل نفس د خوارېدو له امله دروغ وايي. (بحار ٧٢ټ)

 

قیامت

ðخداى د قيامت پر ورځ درېو تنو ته نه ګوري او ورته دردوونکى عذاب دى :

 ١- بوډا زناکار.٢- دروغجن واکمن.٣- کبرجن شتمن . (مسلم )

ð په قيامت کې به غږ  وشي : چاچې خداى ته څه کړي؛خو بل هم ورسره شريک کړي؛نو ثواب دې يې له هماغه واخلي؛ځکه خداى د ټولو شريکانو له ګډونه  غني او مړه خوا دى . (احمد)

ð”خوله انصاري” (رضى الله عنها) روايت کوى،چې رسول اکرم وويل: ځينې خلک په ناحقه د مسلمانانوپر مالونوخېټه اچوي؛نوځکه يې د قيامت پرورځ اورپه برخه کېږي . [ بخاري : ٣١١٨ ح]

ð زه او قيامت ددې دووګوتو په څېر(يو بل ته نږدې) يو. (بخاري،مسلم)

ðهر څوک تر مرګ وروسته هرومرو پښېمانېږي؛ځکه که”ښه” وي؛ نو پښېمانه وي،چې ولې مې تر دې ﻻ ډېر ښه کارونه ونه کړل او که “بد” وي؛ نو پښېمانه وي،چې ولې مې ترې ﻻس نه اخسته .(ترمذي)

ð په قيامت کې به د مؤمنانو قيامت(او پاڅون)خورااسان وي،ان تردې چې د يو فرض لمانځه د وخت هومره به لنډ وي .(بيهقي)

ð څوک چې د شپې تهجدو ته پاڅي؛نو بې حساب وکتابه جنت ته ننوځي. (بيهقي)

ð د قيامت پر ورځ به پېغمبران،اسلامي عالمان اوشهيدان شفاعت کوي .(ابن ماجه )

 ð له معمولي او کوچنيو ګناهونو ځان وژغورئ؛ځکه په اړه يې پوښتل کېږئ. ( “ابن ماجه” ، “بيهقي”،”الدار مي”)

ð د خداى چې کوم بنده ښه ايسي؛نو له دنيا يې داسې خوندي ساتي؛ لکه چې خپل ناروغ له اوبو څښلوخوندي ساتئ.(په دې شرط،چې اوبه ورته زيانمنې وي) ( احمد -ترمذي)

ðد قيامت پر ورځ ښه خوى تر ټولو ارزښتمن څيز دى،چې د کړنو په تله کې ايښوول کېږي . ( الکافي  ٢\٩٩)

ðله تېري ډډه وکړئ،چې د قيامت د ورځې د تيارو لامل دى .(الکافي ٢\ ٣٣٢)

ðد قيامت ځمکه له اوره ده؛خو بې له هغه ځايه،چې د مؤمن سيورى پرې وي او( په دنيا کې) د مؤمن صدقې دا سيورى رامنځ ته کړى . (وسايل  ٩\٣٦٩)

ðهغوى د قيامت پر ورځ دخداى تعالى پر وړاندې ډېر ناوړه خلک دي، چې خلک يې له شره خونديتوب له امله درناوى کوي .(الکافي : ٥\٣٢٦)

 

منځلاري

ðد نبوت د پينځه څلوېښتمې برخې يوه برخه ښه ډالۍ،ښه خوى او منځلاري ده.( الخصال  ١\١٧٨)

ðله خلکو سره مينه،نيم عقل او نرمي نيم ژوند دى او منځلارى له ستونزو سره نه مخېږي . ( الجعفريات : ١٤٩)

ðد انسان د ژغورنې درې څيزونه : ( ١) په پټه او ښکاره له خدايه ډار ( ٢)په خوشحالۍ او غوسه کې عدالت کول (٣) او په شتمنۍ او نېستۍ کې منځلاري . او درې څيزونه پوپنا کوونکي دي : ( ١) په ځاني غوښتنو پسې تلل .( ٢) کنجوسي،چې پر انسان برلاسې شي ( ٣) او کبرکول . (احکايات : ٩٧)

ðڅوک چې د ژوند په لګښتي چارو کې منځلاري کوي،پاک خداى يې روزي خوندي کوي او څوک چې اسراف وکړي ؛نو خداى يې بې برخې کوي .( الکافي  ٤\٥٤)

ðعلي! په تا کې د عيسى د مريمې د زوى څه يوونکي شته؛يوې ډلې ستا په مينه کې زياتى وکړ،چې هلاکه شوه،بلې ډلې ستا په دښمنۍ کې زياتى وکړ،چې هغه (هم) هلاکه شوه او چې کومې منځلاري وکړه ؛نو وژغورل شوه . (الامالي للطوسي : ٣٤٤)

ðخداى چې کومې کورنۍ ته ښه وغواړي؛نو په دين کې ورته ژوره پوهه ورکوي،په ژوند کې ورته نرمي وربښي او په چارو کې يې منځلاري په برخه کوي او کوچنيان يې د مشرانو درناوى کوي او که ونه غواړي؛نو پر خپل حال يې پرېږدي .( الجعفريات : ١٤٩مخ )

ðعلي! په تا کې دعيسى (ع) څه يوونکي شته؛يهودانو ورسره دومره دښمني وکړه،چې ان په مور يې ورته تورونه وتپل او نصاراوو ورسره دومره مينه وکړه،چې داسې ځاى ته يې ورساوه،چې د هغه لپاره نه و . (شواهدالتنزيل  ٢\٢٢٨)

 

الفت او مينه

ð مسلمانان د لورنې،مينې او نرمۍ له پلوه پخپلو کې د يوې تنې په څېر دي،که يو غړى يې په درد شي؛نو نور هم ورسره دردېږي . (بخاري –مسلم)

ð مؤمن د مينې مورينه  ده؛نو که څوک له نوروسره مينه نه لري او نور يې هم له ده سره نه لري؛نو هېڅ ډول خېر پکې نشته. (بيهقي-احمد)

 

 

 

امانت

ðامانت ساتنه د روزۍ لامل دى او له نورو سره خيانت،بېوزلي اونېستي راولي .( تحف العقول: ٤٥)

ðد قيامت پر ورځ زړه سوى او امانت ساتنه د “صراط” دوه  خواوې دي؛نو زړه سواند او امانت ساتى،چې ترې تېرېږي،په بيړه د جنت پر لور ځي او په امانت کې خاين او سخت زړى،چې ورته ورسي؛نو له دې دواړو کړنو بېخې څه ګټه نه ويني او له صراطه د جهنم پر لور ورکږېږي . ( الکافي : ٢\ ١٥٢)

 ðپر چا چې اطمينان لرئ؛خپل امانت ورکړئ،که څه هم ښه يا بد وي . (الکافي : ٦٣٦)   

ðڅوک چې په امانت کې خيانت وکړي؛له موږه نه دى.(الکافي٥\ ١٣٣)

ðچا چې درباندې اعتماد کړى؛نو امانت يې وروسپاره او چاچې درسره خيانت کړى؛نو ته ورسره خيانت مه کوه.(تهذيب الاحکام٦\٣٤٨)

ðڅوک چې مړي ته غسل ورکوي؛نو بايد امانت يې وساتي،چې د امانت ساتلو په بدل کې يې د بدن د هر وېښته په مقابل کې د هر مريي د ازادولو هومره ثواب دى او همداراز پاک خداى يې سل درجې لوړوي . رسول اکرم وپوښتل شو: د مړي د امانت ساتنې مفهوم څه دى ؟ ورته يې وويل : عورت،نيمګړې او عيبونه يې پټ کړي او که دا کار و نه کړي ؛نو ټول ثواب يې پوپنا کېږي او خداى به يې په دنيا  او آخرت کې نيمګړې اوعيبونه رابرسېره کړي . ( وسايل  ٢\٤٩٧)

ðزما امت به تر هغه په خیر او ښو وي ،چې له يو بل سر خيانت و نه کړي او امانت خپل خاوند ته وروسپاري،زکات ورکړي،لمونځونه وکړي او مېلمه پال وي او که دا چارې و نه کړي؛نو په وچکالۍ او قحطۍ به اخته شي . ( وسايل  ٩\٢٥ )

ðڅوک چې امانت سپک وګڼي؛داسې چې په بېرته ورکړه کې يې ټکنى  کړی وي ؛نو له موږه نه دى . ( مستدرک الوسايل  ١٤\ ١٢)

ðد چا ډېرو لمونځونو،روژو،حج تلو،د زکات ورکړې،ښو چارو  ډېرښت او د شپې زمزمو ته مه ګورئ؛بلکې رښتيا ويلو او د امانت سپارلو ته يې وګورئ . (الاختصاص : ٢٢٩ مخ)

ðشپږ کړنې دي که چا يوه وکړه؛نو په قيامت کې دا کړنه هڅه کوي،چې نوموړى جنت ته ننباسي اووايي : خدايه ! دې وګړي زه په دنيا کې تر سره کړې يم او هغه دا دي :لمونځ ،زکات ،حج،روژه ، د امانت ورکړه او زړه سوى . ( الامالي للمفيد: ٢٢٧مخ )

ðڅوک چې رښتینولي،امانت ساتنه،حيا او ښه خوى ولري؛نو ايمان يې بشپړ دى، که څه هم سر تر پا يه ګناهګار وي . (التمحيص : ٦٧مخ )

ðڅوک چې په نړۍ کې په امانت کې خيانت وکړي او خاوند ته يې  ور و نه سپاري؛نو که مړ شي د رسول الله پر امت به نه وي مړ شوی  او له خداى سره به په داسې حال کې ليده کاته کوي،چې پرې غوسه وي . (من لايحضرالفقيه ٤\١٥)

 

امت

ðچې کله مې په امت کې بدعتونه راښکاره شول؛نو د عالم دنده ده، چې خپل علم راښکاره کړي او که داسې ونه کړي؛نو خداى به يې لعنت کړي . ( الکافي ١\٥٤)

ðزما د امت د غوره وګړيو ځانګړنې دا دي :په مسافرت کې روژه نه نيسي،د  مسافرت لمونځ کوي او په ورين تندي نېکي کوي او چې کله هم کوم ناوړه کار وکړي ؛نو بښنه غواړي او د امت مې ډېر ناوړه هغه دي،چې په مېلو چړچو کې ژوند کوي،ښه خواړه خوري،ښې جامې اغوندي او په خبرو کې رښتيا نه وايي . ( الکافي٤\ ١٢٧)

ðد امت غوره وګړي مې په لږو اوبو اودس کوي .(مستدرک الوسايل  ١\ ٣٤٩)

ðجبرئيل راباندې د شپې په پاڅون او تهجدو دومره سپارښتنه وکړه، چې ګومان مې وکړ،چې ډېر غوره امتي به مې هېڅکله نه ويدېږي (وسايل ٨\١٥٤)  

ðچې کله خداى زما پر امت غوسه شي او عذاب پرې نه راکوزوي؛نو قيمتي پرې راوړي او عمرونه يې لنډېږي،سوداګر لږه ګټه کوي،مېوې ښه وده نه کوي اوسيندونه نه ډکېږي،باران پرې نه اوري او ډېر ناوړه وګړي پرې واکمنېږي .( الکافي ٥\٣١٧)

ðما ته په اوونۍ کې پر دوشنبه او پنجشنبه د امت کړنې راوړاندې کېږي؛نو هر مؤمن بښل کېږي؛خو هغه چې ترمنځ يې کينه وي او ورته ويل کېږي : دواړه تر هغه پرېږدئ،چې زړونه يې له کينې پاک شوي نه وي . ( صحيح مسلم )

ðزما د يارانو مثال په خوړو کې د مالګې په څېر دی،چې بې مالګې خواړه خواږه او خوندور نه  وي . (جامع الصغيرسيوطي)

ðزما امت د باران په څېر دى؛نه پوهېږي،چې پيل يې خير دى او که پاى . (دامام احمدحنبل مسند)

 

اسلامي مذاهب

ð امت به مې پر “درې اويا” ډلوو واېشل شي،چې يوازې  يوه يې ژغورل کېږي . (المعجم الکبير ١٩/٣٧٧)

ð خوارج د دوزخيانو سپي دي . (د ابن ماجه سنن ١/ ٦١)

ð”قدريه”زما د امت “مجوسيان” دي،که ناروغ شي،پوښتنې ته يې مه ورځئ او که ومري؛په جنازه کې يې ګډون مه کوئ . ( سنن ابي داوود ٢/ ٤١٠   شرح مسلم للنووي ١/ ١٥٤)

[ تبصره: قدريه د جبر د مسلک لارويان دي،چې ګروهمن دي،نړۍ په مازې جبر اداره کېږي او موږ پکې هيڅ اراده نه لرو. دا فکر امويانو په اسلام کې خپور کړ.]

ð زما د امت دوه ډلې له اسلامه برخمنې نه دي :”مرجئه” او “قدريه” . (الخصال ١/٧٢)

[ تبصره:مرجئه هغې ډلې ته وايي،چې يوازې په زړه کې ايمان بسيا بولي؛نه کړنې.]

ð علي ! زما په امت کې ستا مثال د”عيسى د مريمې د زوى” په څېر دى؛ چې قوم يې پر وړاندې درې ډلى شو: يوه ډله مؤمنان ول،چې هماغه حواريون ول . يوې ډلې ورسره دښمني راواخسته،چې هماغه يهوديان ول  او يوې ډلې يې په اړه “غلو” وکړه او بې ايمانه شول . زما امت هم ستا په اړه درې ډلې کېږي : يوه ډله په تا پسې ځي،چې هماغه مؤمنان دي . يوه ډله دې دښمنان دي،چې ستا په اړه هماغه شکمن دي او يوه ډله ستا په اړه غلو کوي او هغه به ستا منکران وي  او على! ته،ستا لارويان او د دوى مينوال په جنت کې دي او دښمنان او غاليان به دې په اور کې وي .(بحار الانوار: ٢٥/ ٢٦٤ -المناقب،الموفق الخوارزمي ٣١٧ مخ، مجمع الزوايد ٩/ ١٧٣  المعجم الاوسط ٦ / ١٣٥٤  کنزالعمال ١/ ٢٢٣ )

 

لاروي

ð د الهي لارښوونو منل سترګې يخوي . (مستدرک الوسايل  ١١/ ٢٥٧)

ð ډېره ناوړه ډله هغه ده،چې د الهي احکامو د سرغړونه په باب يو له بل سره ژمنه وکړي . ( مستدرک الوسايل ١٦/ ٤٥)

ð په کومو چارو کې چې د خداى له احکامو سرغړاندې کېږي؛نو د مخلوق لاروي روا نه ده . (د نهج البلاغى شرح ١٦ /١٥٨)

ð په علي پسې تلل د خوارۍ لامل دى او سرغړونه ترې کفر دى . په دې اړه رسول اکرم وپوښتل شو،چې څرنګه؟ آنحضرت ورته وويل: علي تاسې د حق پر لار بيايي؛نو که پېغور ورکړئ،خوارېږئ او که سرغړونه ترې وکړئ،پر خداى کافرانېږئ . ( الکافي ٢/ ٣٨٨)

ðمتعال خداى پر تاسې زما اطاعت فرض کړى دى او زما له سرغړونې يې منع کړي ياست او پر تاسې يې زما لاروي او تر ما وروسته د”علي بن ابيطالب” لاروي لازمه کړې ده؛لکه چې پر تاسې يې زما اطاعت فرض کړى او زما له حکمه سرغړونه يې منع کړې او هغه يې زما ورور،وزير، وصي او وارث کړى دى . (په حقيقت کې) هغه له ما څخه دى او زه له هغه څخه يم، دوستي ورسره ايمان او دښمني ورسره کفر دى،دوست يې زما دوست او دښمن يې زما دښمن دى او هغه، د هغه مولى دى،چې زه يې مولى يم  او زه د هر نارينه او ښځمنې مسلمان مولى يم او زه او علي د دې امت پلرونه يو. (بحارالانوار ٢٩/ ٢٦٣)

 

عاجزي او تواضع

د تواضع  ځانګړنه ده چې :انسان په غونډه کې له خپل ځايه کوز کېني،څوک چې  ګوري،سلام پرې اچوي،له شخړې ځان ژغوري،که څه هم په حقه وي او داچې ښه يې نه ايسي،چې په نېکۍ او تقوا وستايل شي. (الجعفر يات : ١٤٩)

ð په همسا تګ (هم) د تواضع له نښو ده،په هر قدم اخستو زر نېکي ورکول کېږي او زر درجې يې لوړوي . ( بحارالانوار ٧٣/ ٢٣٤ )

ð تواضع د اصل و نسب ښکلاه ده . ( جامع الاخبار : ١٢٢)

 ðڅوک چې د خداى لپاره تواضع وکړي؛خداى يې مقام لوړوي .( مستدرک الوسايل ١١/ ٢٩٧ )

ð څوک چې درې ځانګړنې ولري،” الهي لقاء” ته رسي او له هر وره، چې وغواړي جنت ته ننوځي : د چا چې ښه خوى وي،په پټه او ښکاره له خدايه وډار شي او شخړې ته شا کړي،که څه هم په حق وي .(الکافي ٢/ ٣٠٠)

 

کنځل کول

مؤمن ته کنځلې کول فسق دى. (من لا يحضره الفقيه ٣/ ٥٦٩)

 

فصاحت

موږ اهلبيتو ته اوه ځانګړنې راکړل شوي،چې تر موږ وړاندېنيو ته پوره نه دي ورکړل شوي : ( ١) ګهيځ پاڅېدل (٢) فصاحت ( ٣) ستريا ( ٤) مړانه ( ٥) زغم ( ٦) پوهه ( ٧) او له خپلې مېرمنې سره مينه. ( الجعفريات  ١٨٢ )

ð فصاحت د خبرې ښکلا ده . (جامع الاخبار : ١٢٢)

 ðمسواک وهل د نارينه فصاحت زياتوي . (مکارم الاخلاق : ٤٨ مخ)

 

ديني پوهه

 ðهغه عبادت بې ارزښته دى،چې پکې پوهه او اندنه نه وي.   ( الجعفريات : ٢٣٨ )

ð خلکو ! په پوره دين او ژورې پوهې حج ته ولاړ شئ . (مستدرک الوسايل ١٠ / ١٧٣ )

ð ديني پوهه تر لاسه کول غوره عبادت دى . (منية المريد ٣٧٤ )

ð هر څيز يو بنسټ لري او د دې دين بنسټ ديني پوهه ده. (عوالي الاللي ٤/ ٥٩)

ð په حقيقت کې يوازې په مؤمن کې پينځه څيزونه راټولېداى شي،چې خداى جنت ورته لازم کړي : په زړه کې رڼا،په اسلام کې پوهه،په دين کې ورع ( د ټولو ښو کارونو کولو او د ټولو بدو چارو نه کولو ته ورع وايي)،له خلکو سره مينه کول او ښه خوى .(بحار الانوار ١/ ٢١٩)

ð څوک چې ديني پوهه ولري،څومره ښه سړى دى،که د کومې اړتيا لپاره ورته ورشې،په ګټه يې  ده او که ور نه شي،په خپله ګټه يې ده. (مستطرفات السرائر: ٥٧٨ )

ð ايا د پوره ديني پوهې خاوند (= فقيه) درته وښيم؟ هو يا رسول الله! ويې ويل : هغه چې خلک له الهي رحمته نهيلي نه کړي او د خداى له مکر (او غوسې) يې خوندي نه کړي،هغه چې خلکو ته د ګناه جواز ورنه کړي او قرآن يوې بلې لارې ته د لېوالتيا لپاره پرېنږدي؛ځکه په هغه علم کې څه خير نشته،چې په ژورې پوهې ولاړ نه وي او په هغه عبادت کې هم خېر نشته،چې د ژورې پوهې پر بنسټ نه وي او (همداراز) په کومو لوستو کې،چې تدبر نه وي،(هغه هم) ارزښت نه لري . (الجعفريات ٢٣٨ مخ )

 

غيبت

ð غيبت د انسان دين تر هغه خوړونکې ناروغۍ ډېر ژر له منځ وړي،چې په ګرد بدن کې خپرېږي . ( الکافي ٢/ ٣٥٦)

ðمؤمن ته پر مؤمن تېرى حرام دى او ورته حرام دي،چې يوازې يې پرېږدي يا يې غيبت وکړي يا يې ناوړه ځواب کړي . ( الکافي ٢/ ٢٣٥ )

ð له غيبته ډډه وکړئ،چې تر زنا يې ګناه ډېره ده؛ځکه د”زنا کار” توبه قبلېږي؛خو غيبت  کوونکى تر هغه نه بښل کېږي، چې غيبت شوى يې و نه بښي . (مجموعه  ورام  ١/ ١١٥)

ð پر ښځو مو د زنا تور مه تپئ؛ځکه دا کار طلاق ته ورته دى او (هم) له غيبته ځان وژغورئ؛ځکه دا کار کفر کولو ته ورته دى او پوه شئ،چې تور او غيبت زرکلنې کړنې پوپناه کوي . ( جامع الاخبار: ١٥٧ )

ðچاچې له تنه د حيا جامې راواېستې؛نو غيبت يې روا دى(؛يعنې د بې حيا غيبت روا دى.) (الاختصاص : ٢٤٢ )

ð څوک چې پر خداى او د قيامت پر ورځې ايمان لري؛په هغه غونډه کې ناسته نه بويه،چې کوم مشر ته پکې  کنځلې يا د کوم مسلمان غيبت کېږي . ( تفسير القمي ١/ ٢٠٤)

ð د قيامت پر ورځ يو څوک خداى ته حاضر وي او کړنليک يې ورکوي؛خو خپلې نېکې کړنې پکې نه ويني . وايي: خدايه! دا خو زما کړنليک نه دى؛ځکه خپل عبادات پکې نه وينم. ورته ويل کېږي: پالونکى دې نه تېروځي او هېر هم نه لري،نېکې کړنې دې د خلکو د غيبت له امله له منځه ولاړې بيا يو بل راولي او کړنليک يې ورته ورکوي،چې ډېرې نېکۍ پکې ويني؛نو وايي : خدايه! دا خو زما کړنليک نه دى؛ځکه ما خو دا ټولې نېکې چارې نه دي کړي،ورته ويل کېږي : پلاني ستا غيبت وکړ؛نو ځکه يې ټولې نېکۍ په تا پسې وليکل شوې .( جامع الاخبار ١٤٧ )

ð هغه دروغ وايي،چې انګېري له حلالو زېږېدلى،حال داچې تل په غيبت د خلکو په غوښو خوړلو بوخت دى . له غيبته ډده وکړئ،چې د دوزخ د سپيو خوراک دى . ( الامالي للصدوق ٢٠٩)

ð د قبر عذاب له چغلۍ،غيبت او دروغو راولاړېږي. (مستدرک الوسايل ٩/ ١٢١)

ð څوک چې د مسلمان نارينه او ښځې غيبت وکړي،خداى تعالى يې تر څلوېښتو شواروزو پورې لمونځ او روژه نه قبلوي؛خو داچې غيبت شوى يې وبښي.( جامع الاخبار ١٤٦)

ð څوک چې د مسلمان غيبت وکړي؛نو لکه څوک يې،چې په لوى لاس وژلى وي . (مستدرک الوسايل ٩ / ١٢٥)

ð د معراج په شپه مې ځېني سړي وليدل،چې شونډې يې د خلکو د غيبت له امله په اورينو بياتي ګانو غوڅول کېدې . (مستدرک الوسايل ٩ / ١٢٦ )

ð په”معراج” کې مې پر داسې وګړيوسترګې ولګېدې،چې د مسو په څېر په تکو سرو نوکانو يې خپل مخونه او سينې توږلې،په اړه يې له جبراييل وپوښت؛راته يې وويل:دوى په دنيا کې د خلکوغوښې خوړې (د خداى د بندګانوغيبت يې کاوه) او د هغوى پر پت او ابرو يې لوبې کولې .( ابوداوود )

ð غيبت تر زنا ډېر ناوړه او درنه ګناه ده (؛ځکه) خداى زناکار په توبه بښي؛خو غيبت کوونکي،چې څو له غيبت شوي عذر نه وي غوښتى؛ نو نه يې بښي .(بيهقي)

ðغيبت دې ته وايي،چې د خپل ديني ورور په باب داسې څه ووياست،چې نه يې  خوښېږي . ( کنز ٣/ ٥٨٦ )

ð د يوچا د غيبت جبرانول دا دي ،چې له خدايه ورته بښنه وغواړې . ( کنز ٣/٥٨٨ )

 

غيرت

ðغيرت له ايمانه راولاړېږي اوکنځلې له ناوړه خويه . (الجعفريات ٩٥)

ð ابراهيم غيرتي و او زه ترې ډېر غيرتي يم او خداى دې د بې غيرتو مسلمانانو او مؤمنانو پوزې پرې کړي . (الکافي ٥ / ٥٣٦ )

ð حضرت”سعد بن عباده” رسول اکرم ته وويل : که له خپلې مېرمنې سره مې سړى وليد؛نو د څلورو ګواهانو تر راوستو پورې ورته وګورم؟ آنحضرت ورته وويل: هو!سعد وويل : پر هغه قسم،چې ته يې په حقه پېغمبر کړى يې،چې په وس کې مې وي؛نو تر هغه ړومبى به يې کار پوره کړم . پېغمبر اکرم وويل: واورئ،چې مشر مو څه وايي،هغه غيرتي دى او زه ترې ډېر غيرتي يم او متعال خداى تر ما ډېر غيرتي دى . (شيباني ٣ / ٢٤٥ )

ð حضرت عايشې بي بي له پېغمبراکرم سره غيرت(او کينه) کوله؛په خپله وايي: يوه شپه پېغمبر اکرم رانه ووت،غيرت مې راولاړ شو،چې شونې ده د مېرمنې کره تللى وي . پېغمبر اکرم راغى او ويې ليدل،چې زه څه کوم،راته يې وويل :غيرت دې راولاړ شوى دى؟ ورته مې وويل: زما په څېر څنګه پر تا په څېر کينه ونه کړي؟ پېغمبراکرم ورته وويل: شيطان دې درته راغلى دى. (شيباني ٢/ ٢٤٦)

ðهمداراز له حضرت عايشې بي بي روايت شوى دى چې :حضرت “صفيه” بي بي خورا  ښه پخوونکې وه، يوه ورځ پېغمبر زما کره واو “صفيې” بي بي ورته خواړه راوړل؛نو زه ورته دومره په کينه کې شوم؛ لکه څوک چې له يخنۍ لړزېږي او د هغې لوښى مې مات کړ او بيا پښېمانه شوم او پېغمبر اکرم ته مې وويل:ددې کار کفاره څه ده؟راته يې وويل : د لوښي په څېر يې لوښى او د خوړو په څېر يې خواړه. (شيباني ٢/ ٢٤٦)

ð غيرت (او کينه) دوه ډوله ده : ( ١) يو ډول د خداى خوښېږي او بله نه،په ريبت کې کينه د خداى خوښېږي او په غير ريبت کې نه. (ناصف ٤ / ٣٧١ )

[ ريبت : په هغه ځاى کې چې شک  او د شر او بدۍ نښې لېدل کېږي]

 

فتوا

ð څوک چې بې علمه خلکو ته فتواوې ورکوي،د اسمان او ځمکې پرښتې پرې لعنت وايي. ( کمال الدين ١ / ٢٥٦ )

 ð څوک چې چارې يو له بل سره پرتله کوي او احکام ترې استنباطوي،بې علمه فتواوې ورکوي او ناسخ و منسوخ،محکم او متشابه نه پېژني،هلاکېږي او نور هم هلاکوي . ( الکافي ١ / ٤٣ )

[ تبصره: په دې اړه د “زبير بن بکار” د “الموفقيات” کتاب ٧٥ مخ وګورئ]

 

کنځلې

ð مؤمن ته کنځلې کول د فسق لامل دى،جګړه ورسره  کفر دى،غوښه خوړل (غيبت کول) يې ګناه  او د مالونو حرمت يې د وينې د حرمت په څېر دى . ( الکافي ٢/ ٣٥٩ )

ð څوک چې کوم پېغمبر ته کنځلې وکړي بايد ووژل  شي او څوک چې د پېغمبر  صحابي ته کنځلې وکړي بايد په کمچينه ووهل شي. (مستدرک الوسايل ١٨ / ١٧٢ )

ð څوک چې علي ته کنځلې  وکړي؛نو ما ته يې کړي اوچاچې ماته کنځلې وکړې؛نو خداى ته يې کړي دي او څوک چې خداى ته کنځلې وکړي،دوزخ ته ننوځي او پر سخت عذاب اخته کېږي . (مستدرک  على الصحيحين ٣/ ١٢١ )

ð خلکو ته کنځلې مه کوئ،چې ترمنځ مو دښمني راولاړه نشي. ( الکافي. ٢/ ٣٦٠ )

ðمړيو ته کنځلې مه کوئ،چې ژوندي (خپلوان) يې خپه نشي . (الدعوات ٢٧٨)

ðمؤمن ته کنځلې کول د انسان د هلاکت لامل دى . ( الکافي ٢/ ٣٥٩ )

ð که کنځلې انځورېداى؛نو خورا ناوړه انځور به يې  درلود. ( الکافي ٢/ ٣٢٤ )

[ تبصره: دا مثال د عامو خلکو د پوهېدو لپاره ويل شوى دى،وګورئ: دملا صالح ما زندراني  د اصول کافي شرح ٩/ ٣٦١ ]

ð ايا هغه دروښيم،چې ماته بېخي ورته نه دى؟ ورته وويل شو: هو يا رسول الله ! ويې ويل: بد ژبى کنځل مار،چې کنجوس،کبرجن،کينه کښ سخت زړى او له هر ډول نېکۍ لرې دى او انسان يې له يوه شره هم خوندي نه دى . (الکافي ٢ / ٢٩١)

ðمؤمن ناوړه وينا نه کوي،لعنت نه وايي،سپکې سپورې او کنځلې نه کوي .( شيباني ٤/ ١٧٨   ناصف ٥/ ٣٧)

 

فراغت

ð روغتيا او فراغت دوه نعمتونه دي،چې ډېرى خلک پرې ازمېيل کېږي .( الخصال ١/ ٣٤ )

ð روغتيا او فراغت دوه نعمتونه دي،چې انسان ترې غافل او بې پروا دى . ( من لا يحضره الفقيه ٤/ ٣٨١)

ð زه د درې ډلو ضامن يم : څوک چې په دنيا کې له نېستۍ سره مخ شوى وي او د شتمنېدو لپاره څه لار نه لري . څوک چې پر کوم کړاو اخته شي او خلاصېداى ترې نشي او څوک چې پر بې پايه خپګان اخته شوى وي . (بحارالانوار ٧٠/ ٨١)

ð دنيا خو يو ساعت ده؛نو له خدايه په اطاعت کې يې تېره کړئ او الهي اطاعت ته د ورننووتو لار،په خلوت کې ده،چې انسان تل پر تفکر بوخت وي او خلوت هله وي،چې انسان قناعت وکړي او د ژوند له ډېر لګښته لاس واخلي او تفکر هم په فراغت تر لاسه کېږي او د فراغت بنسټ په زهد ولاړ دى،چې تقوا پوره زهد دى او تقوا ته د ننووتو لار له خدايه ډار دى او د ډار نښه،د خداى د مقام درناوى،د خداى د لارښوونو منل او له محرماتو يې ډډه کول دي او د الهي ډار بله نښه پوهه ده؛لکه چې پاک خداى وايي:په واقع کې له بندګانو يوازې پوهان له هغه ډارېږي . ( مصباح الشريعه: ٢٢)

 

هېر

ð هېر د پوهې آفت دى . (الخصال ٢/ ٤١٦)

ð څوک چې پر ما درود ويل هېر کړي؛نو د جنت لار به يې ورکه کړې وي.( الامالي للطوسي: ١٢٤)

ð ډېر ناوړه هغه بنده دى،چې کبر وکړي او مغرور شي او خداى هېر کړي .( بحار الانوار ٧٣/٢٠٣ )

ð څوک چې د خوړو په پيل کې د((بسم الله الرحمن الرحيم)) ويل هېر کړي؛نو د خوړو په پاى کې دې د “توحيد” سورت ووايي . (بحارالانوار ٨٩/ ٣٥٣ )

ðپينځه څيزونه دي،چې “هېر” له منځه وړي او “ياد” زياتوي او د خولې لاړې کموي 🙁 ١) مسواک ( ٢) روژه ( ٣) د قرآن لوستل ( ٤) شات ( ٥) اللبان (کندر) . (مکارم الاخلا ق : ١٦٦)

پرښتې

ð خداى چې کوم بنده ته خير وغواړي؛نو جنتي پاسواله پرښته ورته رالېږي، چې پر سينه يې لاس راکاږي او سينه يې پراخوي او د زکات ورکړې ته يې هڅوي . (وسايل الشيعه ٩/ ٢٠ )

 ð خداى له بربنډتوبه منع کړي ياست؛نو له الهي عزتمنو پرښتو حيا وکړئ،چې کړنې مو ليکي؛خو يوازې د اودسماتي،جنابت او غسل پر مهال مو (ځان ته) پرېږدي . (بحارالانوار ٥٦ / ٢٠٠)

 

خواړه

ðحلال  خواړه  زړه رڼا کوي .( الحکم الزاهرة ١/ ٤٨٢)

ðد فاسقانو خواړه مه خورئ .( بحار ٧٧/ ٨٤)

ðخواړه مو په مالګه پيل او پاى ته ورسوئ؛ځکه دا کار د جذام، لېونتوب او پيس په څېر د دوه اويا بلاوو مخه نيسي.(الکافي: ٦\٣٢٦)

ðڅوک چې خدای وپېژني او د شان خاوند يې وبولي؛نو خپله خوله دې د(بې ځايه او بې ګټې) خبرو او ګېده دې له خوړو منع کړي او ځان دې روژه تي او د شپې پاڅېدو ته په زحمت کړي . (الکافي ٢/ ٢٣٧ )

ðخواړه مو په تول کړئ؛ځکه برکت پکې وي .( الکافي ٥ / ١٦٧)

ð خواړه هله پوره کېږي،چې څلور ځانګړنې ولري : حلال وي،زيات لاسونه پکې وي،په پيل کې “بسم الله الرحمن الرحيم” او په پاى کې يې “الحمدالله” وويل شي. (الکافي ٦ / ٢٧٣ )

ð سړى چې له خپلې کورنۍ سره پر دسترخوان کېني او د خداى په نامه په خوړو پيل وکړي او په “الحمدالله” يې پاى ته ورسوي؛نو د دسترخوان (پلوشې او برکت) پورته خيژي،چې وبښل شي . ( الکافي ٦/ ٢٩٦)

ð (اصلي) خواړه (؛لکه غنم،جوار اوربشې او…)يوازې ګناهګاران احتکار او زېرموي . (من لا يحضره الفقيه ٣/ ٢٦٦ )

 ð حيران يم هغه ته چې د درد او ناروغۍ له ډاره له (ځينو) خوړو پرهېز کوي؛نو ولې د اور له ډاره له ګناه کولو پرهېز نه کوي (او ځان نه څاري) ؟ (من لايحضره الفقيه ٣ / ٣٥٩)

ð د خوړو پر مهال مو څپلۍ او بوټان وباسئ؛ځکه دا ښکلى دود او د پښو د ارامۍ لامل دى . (وسايل ٥ / ٩٦ )

ð تر خوړو وروسته خلال وکړئ؛ځکه د غاښونو د روغتيا او بنده ته د روزۍ د جلبولو لامل دى . (مستدرک الوسايل ١٦/ ٣١٧)

ð په حقيقت کې تر خوړو مخکې او وروسته اودس کول،د بدن د شفا او روغتيا او د روزۍ د برکتي کېدو لامل ګرځي. (المحاسن ٢/ ٤٢٤)

ðڅوک چې “لږ خورى” وي ؛نو بدن يې روغ رمټ پاتې کېږي او چې ډېرخورى وي؛نو بدن يې رنځور او زړه يې سختېږي .(مجموعه ورام ٢/ ٢٢٩)

ðزړه په ډېر خورۍ مه وژنئ؛ځکه زړونه دکښت په څېر دي،چې که اوبه پرې ډېرې شي؛نو خرابوي يې .(  جامع الاخبار: ٢١٤ مخ )

ðخواړه په مالګه پيل او هم پاى ته ورسوئ؛ځکه د ( ٧٢ ) دردونو شفا پکې ده . ( بحارالانوار٧٧/٥٨)

 

د خوړلو څښلو آداب

 ðتر خوړو وړاندې او وروسته د لاسونو او خولې وينځل د برکت لامل دي .( “ترمذي” – “ابوداوود”)

ð که د خوړو پر وخت د “الله”نوم وانه خستل شي؛نو شيطان پکې د ځان ګډون روا بولي.( صحيح مسلم )  

ð د سړو خوړو خوړل ډېر برکتي وي . (الدارمي )

ðډډه مې چې وهلي وي ؛نو خواړه نه خورم . ( صحيح بخاري)

ð د اوښ په څېر په يوې ساه اوبه مه څښئ؛بلکې دوه درې ځل پکې ساه واخلئ،تر څښلو مخکې “بسم الله” او وروسته ترې حمد او د خداى شکر ووياست. (ترمذي)

ð رسول اکرم د څښلو په لوښي کې  پوکى منع کړى دى . (ابوداوود – ابن ماجه )  

ð تر خوړو وروسته دعا دا ده : د هغه خداى ستاېنه ده،چې  پر موږ يې خواړه وخوړل اوبه يې راباندې وڅښلې او له مسلمانانو يې کړو.(“ترمذي” – ابوداوود )

 

مسافر

 ðپه دنيا کې داسې وسه؛لکه چې مسافر يې او ځان په مړيو کې وشمېره.( الامالي للطوسي: ٣٨١ )

ðمسافر چې ناروغ شي؛نو دواړو لوريو او مخکې او شاته چې وګوري او څوک  و نه ويني؛نو پاک خداى يې تېر ګناهونه بښي.( ارشاد القلوب ١/ ١٩٠)

ðپه نړۍ کې د مسافر يا لاروي په څېر ژوند وکړه. (صحيح بخاري)

 

غصب

ð څوک چې ځمکه پر ناحقه غصب کړي،د قيامت پر ورځ مکلفېږي،چې خاوره يې پر اوږو کړي . ( وسايل  ٢٥/ ٣٨٨)

ð څوک چې په ناحقه يو لوېشت ځمکه تصرف کړي،پاک خداى به يې ددې ځمکې اوه پوړه ترغاړې کړي،چې په قيامت کې په همدې حال راپاڅېږي . (مستدرک الوسايل  ١٧ / ٩١ )

 ð په يقين چې خداى هره ګناه بښي؛خو د هغه ګناهونه نه بښي،چې:

(1) په دين کې بدعت راولي. (2) د کارګر مزدوري ورنه کړي . (3)چې ازاد انسان (د مريي په توګه) وپلوري .(عيون الاخبار الرضا ٢/ ٣٣)

ð که څوک درې ځانګړنې ولري (؛نو) ايمان يې پوره کېږي : (1)که خوشحال وي؛نو خوشحالي يې ناحقو ته اړ نه باسي. (2) که غوسه وي؛ نو غوسه يې له حقه وانه ړوي (3) او چې د واک خاوند وي،هغه څه ته لاس اوږد نه کړي،چې ورته نه دي .( المحاسن ١/ ٦ )

 

غفلت

ðتر اړتيا ډېر خواړه مه خورئ؛ځکه زړه سختوي،چې همدا سختوالى زړه مسموموي،غړي د خداى له بندګۍ سستوي او غوږونه او زړه (او همت) د پند او موعظې له اورېدو منع کوي،له ډېرو کتو ډده وکړئ؛ ځکه د ځاني غوښتنو تخم کري او د غفلت لاملېږي .( اعلام الدين: ٣٣٩ )

ð غفلت په درېو څيزونو کې دى  : د خداى له ياده غفلت .د ګهيځ له لمانځه تر لمر راختو پورې غفلت او د مړينې تر وخته د انسان پخپل دين کې غفلت.( جامع الاخبار : ١٣١)

ð څوک چې د غافلانو په منځ کې خداى يادوي؛لکه په تښتېدونکيو کې چې د خداى د لارې مجاهد وي . (الکافي ٢/ ٥٠٢ )

ð څوک چې هر شپه د قرآن لس آيتونه لولي؛نو نوم يې په غافلانو کې نه ليکل کېږي . (الکافي ٢/ ٦١٢ )

ðجنت ته ننووتم؛نو ومې ليدل،چې ډېرى جنتيان “بُلبلې” دي،د ُبلبلې په اړه پېغمبر اکرم وپوښتل شو. ورته يې وويل: څوک چې په خير کارونو کې عقلمن او له ناوړو کارونو غافل وي او د مياشتې درې ورځې روژه نيسي.(قرب الاسناد ١/ ٣٧ )

ð هغه  ډېر  غافل دى،چې د دنيا د حالاتو له ادلون بدلونه پند نه اخلي او هغه تر ټولو ډېر ستر انسان دى،چې دنيا ته په کوم ارزښت قايل نه وي. ( بحارالانوار ٧٠/ ٨٨)

ð د ماښام او ماسخوتن ترمنځ دوه رکعته نفل لمونځ خداى ته د انسان د ګرانېدو لاملېږي .( تهذيب الامکام ٢/  ٢٤٣ )

 

غنيمت ګنل

ð د زړه د نرمښت پر مهال دعا غنيمت وګڼئ؛ځکه د (الهي) رحمت لامل ده.( الدعوات : ٣٠)

ð د پسرلي ساړه غنيمت وګڼئ؛ځکه څه چې له ونو سره کوي،هماغه مو له بدنونو سره کوي او د مني له سړو ځان وژغورئ؛ځکه  څه چې له ونو سره کوي،هماغه مو له بدنونو سره کوي .( بحارالانوار ٥٩/ ٢٧١)

 

حضرت عمار (رض)

ð واى پر عمار،چې تېري کوونکې ډله به يې ووژني،عمار به هغوى د جنت لوري ته رابلي او هغوى به عمار اور ته رابلي .( د امام احمد حنبل  مسند ٣/ ٩١ ،صحيح بخاري ١/ ١١٥١، د “حاکم” مستدرک ٢/ ١٤٩، فتح البارى ١/ ٤٥١ ،د “ابن کثير” السيرة النبويه ٢/ ٣٠٧ )

ð عمار له حق سره دى او حق له عمار سره،چېرې چې حق وي،عمار به هم وي . (الطبقات الکبرى ٣/ ٢٦٢، تايخ مدينه دمشق ٤٣/ ٤٧٦)

 

عمر

ðزړه سوى عمر اوږدوي او پټه صدقه د خداى د غوسې اور  وژني . (وسايل ٩/ ٣٩٧)

ð يوازې دعا قضا و قدر اړوي او يوازې له نورو سره نېکي کول عمر اوږدوي او په يقين انسان،چې ګناه کوي،له روزۍ بې برخې کېږي . (مستدرک الوسايل ١٥/ ١٧٨)

ð خلکو! روزي اېشل شوې او څوک له خپلې برخې تېرى نشي کړاى ؛ نو ځکه يې د لاس ته راوړو لپاره ښه عمل وکړئ او عمر محدود دى او هېڅوک تر ټاکل شوي عمره زيات عمر نشي کړاى؛نو د مړيني او د کړنو د حسابۍ د رارسېدو له مخه (د آخرت د توښې راټولو لپاره) وځغلئ. (مستدرک الوسايل ١٣/ ٢٩)

ð څوک چې غواړي پاک خداى يې عمر ډېر او روزي پراخه کړي؛نو زړه سوى دې وکړي . (الکافي ٢/ ١٥٦)

ð پر اوږد عمري نېکعمله دې خوښي وي او داچې پالونکى يې ترې خوشحاله دى؛نو لوري ته يې ستنېدنه هم  ښه ده. پر اوږد عمري بدعمله دې افسوس وي او داچې پالونکى يې ترې خپه دى؛نو ورستنېدنه يې هم ناوړه (او سخته) ده.( روضه الواعظين  ٢/ ٤٧٥)

ð څوک چې خپل پاتې عمر په نېکيو تېر کړي؛نو د تېروګناهونو په باب نه نيول کېږي؛خو که څوک پاتې عمر په ګناه تېر کړي؛نو د وړاندې او وروسته ګناهونو په باب نيول کېږي .( الامالي للصدوق ٥٧ مخ)

 

عورت (ستر)

ð مورو پلار دې د اولاد عورت ته نه ګوري او همداراز اولاد دې د پلار عورت ته نه ګوري .( وسايل ٢/ ٥٦)

ð زما له اهلبيتو به يو سړى ووژل شي او (لوڅ لغړ) به راوځړول شي، کومې سترګې چې عورت يې وويني؛نو جنت به ونه ګوري . ( بحارالاانوار ٤٦/ ٢٠٩)

[ تبصره: دا روايت د حضرت زيد بن على (رض) په باب دى،چې د امام باقر د حيثيت او درناوي لپاره راپاڅېد او شهيد شو او امام ابوحنيفه ددې غورځنګ غړى و،په دې باب وګورئ : د افغانستان له ملي راډيو تلويزيونه  د امام اعظم په نامه په ١٣٨٦ل  کې خپور شوى سريال .]

 

عيب

ð جبرئيل تل راته ويل،چې بدي په بدۍ مه ځوابوه دا خو لا څه چې پيلوونکى يې وسې . (الکافي ٢/ ٣٠٢)

ðڅه چې پخپله پرېښوواى نشې (؛نو) نور خلک دې نه ټپسوروي او څه چې ورپورې اړه نه لري،خپل ملګرې دې نه ځوروي . (الامالي للمفيد:٢٧٨)

 ð په يوه ښار کې يوه ډله وه،چې پخپله يې عيبونه درلودل؛خو د خلکو د عيبونو په اړه چوپه خوله وو؛نو خداى هم د هغوى عيبونه را و نه سپړل  (او نا ليدلي يې وګڼل) او په ښار کې يوه ډله وه،چې په خپله يې عيبونه نه درلودل؛خو د خلکو عيبونه يې راسپړل؛نو خداى هم د هغوى عيبونه راوسپړل،چې تر مړينې په همدې (راسپړل شويو عيبونو) وپېژندل شي. (الامالي للطوسي : ٤٤)

ð اى هغې ډلې،چې پر ژبه مو ايمان راوړى او له زړه نه! د مؤمنانو د نيمګړتياوو او عيبونو د راسپړلو په لټه کې مه وسئ؛ځکه څوک چې د خپل ورور عيب راسپړي،خداى يې هم عيب راسپړي او خداى چې د چا عيبونه راوسپړي؛نو رسوا کوي يې،که څه  هم پټ او د کور دننه يې وي . ( المؤمن : ٧١)

ð علي! يوازې مؤمن درسره مينه لري او يوازې د منافق بد ايسې .( امام احمد حنبل مسند ١/ ٥٤ – صحيح مسلم ١/ ٦٠ د ابن ماجه سنن ١/ ٤٢  – د نسايي سنن ٨/ ١٦٦ – شرح مسلم للنوي ٢/ ٦٢ – د قرطبي تفسير ٧/ ٤٤ )

ð علي! ته به له ناکثانو،قاسطانو او مارقانو سره وجنګېږې.

(د حاکم نيشاپوري مستدرک ٣/ ١٥٩  _ کنزالعمال ١١/ ٢٩٢  – مجمع الزوايد ٥/ ١٨٦ – علل الدارقطي ٥/ ١٤٨ – الاستيعآب ٣/ ١١١٧ – اسدالغابه ٤/ ٣٣ – البدايه والنهايه ٧/ ٣٣٧ – ميزان الاعتدال ١/ ٢٧١)

[ تبصره: ناکثان بيعت ماتي ول،چې د جمل په جګړه کې وو . قاسطان؛ يعنې ظالمان،د صفين په جګړه کې او مارقان خوارج وو،چې د نهروان په جګړه کې له علي(ک) سره وجنګېدل،رسوا او ابدي بدمرغه شول .

خوشحال بابا وايي :

چې په جنګ کې د علي له لوري ومړل

په هغوى ګواهي ده، چې مرحوم دي. ]

 

ð علي! ته صديق اکبر او فاروق يې،چې حق او باطل بېلولاى شې،ته د مؤمنانو مشر يې او شتمني د کافرانو مشره ده. ( ذخائر العقبى ٥٦ مخ  – کنزالعمال ١١/ ٦١٦ –  المعجم الکبير ٦/ ٢٦٩ – سير اعلام النبلا ٢٣/ ٧٩ – الاستيعاب ٤/ ١٧٤٤ – تاريخ الاسلام ٤٦ / ٣٩١  – ينابيع الموده ٢/ ٣١٧ )

ð څوک چې زما اطاعت وکړي؛نو د خداى به يې کړى وي او څوک چې زما و نه مني؛نو د خداى به يې نه وي منلي او څوک چې د علي اطاعت وکړي؛ نو زما اطاعت به يې کړى وي او څوک چې د علي اطاعت و نه کړي؛ نو زما به يې نه وي کړى .(د حاکم نيشاپوري مستدرک ٣ / ١٢١)

ð ابوبکره! زما او د علي لاس په عدالت کې يو برابر دى .

 ( د بغداد تاريخ ٥/ ٢٤٠ – ميزان العتدال ١/ ١٤٦  – تاريخ مدينه دشمق ٤٢/ ٣٦٩ – د خوارزمي مناقب ٢٩٦ مخ  – السيره الحلبيه ٢ / ٢١١ – ينابيع الموده ٢/ ٢٣٦  – بحارالانوار ٤٠/ ١١٩ )

ð علي! ته د اور وېشونکى يې . ( د ابن مغازلي شافعي مناقب ٦٧ مخ)

[ تبصره: د دې روايت په هکله امام احمد حنبل وايي:على د جنت او  دوزخ وېشونکى دى؛ځکه دوست يې جنتي مؤمن دى او دښمن يې منافق دوزخي دى .]

   ð دعلي يادول عبادت دى .

 ( الجامع الصغير ١/ ٦٦٥- البدايه والنهايه ٧/ ٣٩٤ – کنزالعمال ١١/ ٦٠١ –  د ابن مردوديه مناقب على ٧٥ مخ – دابن مغازلي شافعي مناقب ٢٠٦ )

ð د علي مخ ته کتل عبادت دى .

( د ابن مغازلي شافعي،مناقب، ٢٠٦ مخ –الاصابه ٨/ ٣٠٨ – اسدالغابه ٥/ ٥٤٧ –د حاکم مستدرک ٣/ ١٤١ – المعجم الکبير ١٨/ ١٠٩ – کنزالعمال ١١/ ٦٠٠)

ð علي له حق سره دى او حق له علي سره او چېرې،چې علي وي،حق هم هلته دى .

( سنن ترمذي ٥/ ٢٩٧ – د حاکم مستدرک ٣/ ١٤٤– د فخررازي تفسير ١/ ٢٠٥ – د ذهبي تاريخ الاسلام ٣/ ٦٣٥ )

 

شات

ð شات ( د خولې بد) بوى او تبې رغوي .( مستدرک الوسايل ١٦/ ٣٦٦)

ð خداى شات برکتي کړي او د دردونو شفا يې پکې اېښې او اويا پېغمبرانو ته يې مبارک کړي دي .( مکارم الاخلاق ١٦٥)

ðخداى په شاتو کې برکت اېښى او د دردونو شفا ده او اويا پېغمبرانو متبرک کړي دي . ( مستدرک الوسايل  ١٦\٣٦٧ )

ð درې څيزونه دي،چې حافظه غښتلې کوي او بلعم له منځه وړي : د قرآن لوستل،د شاتو او کندر خوړل .( مستدرک الوسايل: ١٦ / ٣٦٧)

ðد حجامت په نشتر يا د شاتو په شربت کې شفا ده.(مستدرک الوسايل : ١٦/ ٣٦٧)

ðخداى په شاتوکې برکت اېښى،شات د دردونو شفا ده او اويا پېغمبر انو برکتي ګڼلي دي . ( صحيفة الرضا: ٢٠٧ حديث )

 

عطر

ستاسې له نړۍ مې يوازې ښځه او عطر ښه ايسي .( الکافي ٥ / ٣٢١)
[ تبصره: د دې روايت مخاطبين هغه اصحاب وو،چې رهبانيت او ګوښه کېناستوته لېوال وو]

ð عطر زړه غښتلى کوي .( الکافي ٦/ ٥١٠)

ð خپل حبيب جبرئيل راته وويل : ورځ ترمنځ عطر وکاروه او د جمعې د ورځې عطر کارول مه هېروه . ( الکافى ٦/ ٥١١)

ð بايد هر يو د جمعې پر ورځ عطر وکاروي، که څه هم د مېرمن له بوتله مو وي . ( الکافي  ٦/ ٥١١)

ðهره ښځه،چې عطر وكاروي او له کوره بهر ووځي؛نو كور ته د بېرته راستنېدو پورې پرې لعنت ويل كېږي . ( الكافي ۵\ ۵۱۸)

 

عفت

د خداى حياناک،زغمناک او پاکلمنى انسان خوښېږي،چې له ګناهونو او مکروهاتو ځان ژغوري . (الکافي ٢/ ١١٢)

ð لومړي جنت ته ننووتونکي دا دي : شهيدان،هغه تر لاس لاندې،چې د خپل واکمن لارښوونې مني او زړه يې پرې سوځي او عابد پاکلمنى، چې له ګناهونو او مکروهاتو ځان ژغوري . (الامالي للمفيد: ٩٩)

 ð عفاف او پاکلمني د ازمېښتونو او سختيو ښکلا ده . (بحارالانوار ٧٤ / ١٣٣)

ð له پلرونو سره مو ښه وکړئ،چې زامن مو درسره ښه وکړي او د خلکو له ښځو سترګې پټې کړئ،چې ښځې مو پاکلمنې او عفيفې وي. ( وسايل  ٢٠/ ٣٥٦)

 

عقل

ðعقل لومړنى موجود و،چې پاک خداى پيدا کړ. ( من لايحضر الفقيه ٤\٣٦٨)

ðعقل د هر انسان  د ژوند اړم دى .( کافي ١/٢٩ ) 

ðد “تدبير” په څېر “عقل” نشته .( المحاسن ٢/ ٦٠١)

ðعاقل بايد له خپلې زمانې با خبروي .(مکارم الاخلاق : ٤٧٢)

ðدچا د عقل د کچې د څرګندتيا پورې دې د چا مسلماني تاسې هک پک نه کړي .( مسندالشهاب ٢/ ٨٨)

ð خداى تر عقل بل غوره څيز خلکو ته نه دى ورکړى،دعقلمن خوب د ناپوهه تر شپې پاڅېدو او لمونځ يې دخداى په لار (؛لکه جهاد،حج او….) کې د ناپوهه تر مسافرته غوره دى او خداى هر پېغمبر او استازى په عقل پوره رالېږلى او عقلونه يې د خپلو امتونو تر ګردو عقلونو غوره وو.( الکافي ١/ ١٢)

ð ناپوهي سخته نيستي او عقل ګټوره شتمني ده.( الکافي ٢/ ٦٤٣)

 ð له خلکو سره مينه کول نيم عقل دی .( الکافي ٢/ ٦٤٣)

ð تر ايمان وروسته دعقل بنسټ له خلکو سره مينه کول او هر نېک چاري او بدچاري ته “خيرغواړي” ده. (وسايل ١٦/ ٢٩٥)

ð خداى عقل وپنځاوه او ورته يې وويل: ستون شه؛نو ستون شو بيا يې وويل : مخ کړه؛نو مخ يې کړ،بيا يې ورته وويل : تر تا ګران مې نه دى پنځولى ( پېغمبر اکرم زياتوي 🙂 خداى تعالى محمد (ص) ته د عقل نهه نوي برخې ورکړې او يوه يې پر خلکو ووېشله .(بحارالانوار ١/ ٩٧ )

ð له عقلمن سره مشوره وکړئ او مخالفت ورسره مه کوئ،چې پښېمانه به شئ . (مستدرک الوسايل ٨ / ٣٤٤)

ð پر عقلمن لازم ده،چې پر خپلې زمانې پوه وي،خپل شان ته مخ کړي او خپله ژبه وساتي . ( بحارالانوار ٦٨/ ٢٧٩ )

ð ډېر عقلمن هغه دى،چې له خلکو سره ډېره نرمي (او ښه چلن) وکړي او ډېر خوار هغه دى،چې خلک سپک کړي .( ٧٢ / ٥٢ )

 ðعقل پر درېو برخو وېشل شوى دى،که چا درلودې؛عقل يې پوره دى او که نه عاقل نه دى : د خداى تعالى ښه پېژندنه،ښه طاعت او مننه او پر الهي لارښوونو ښه زغم.( الخصال ١/ ١٠٢ )

 

د خير غوښتنه

ðڅوک چې له خدايه خير وغواړي او د خد اى په ورکړه خوشحاله وي؛ نو هرومرو خدای ورته ګتور څيزونه ورکوي . (الکافي ٨/ ٢٤١)

 

تمه

ðله تمې ډډه وکړئ؛ځکه حرص او تمه زړه خرابوي او پر زړه د دنياغوښتنې ټاپه لګوي.تمه د ټولو ګناهونو کونجي او د ټولو سرغړونو مشره ده او ټولې نېکې چارې له منځه وړي . (بحارالانوار ٧٤/ ١٨٤)

ð په حقيقت کې تمه ښويه ډبره ده،چې ان د پوهانو پښه هم پرې ښويېږي .(مجموعه ورام ١/ ٤٩ )

ð تمه ګر ډېر نشتمن دى . (مستدرک الوسايل: ١٢/٦٨)

  ð د بدمرغۍ له نښو دي : وچ سترګتوب،سخت زړي،د دنيا راټولونې ډېر حرص او پر ګناه ټينګار کول . (الکافي ٢/ ٢٩٠)

 ð يو سړى رسول اکرم (ص) ته راغى او ورته يې وويل : څه راته وښيه ! ورته يې وويل : پر تا (لازم) دي،څه چې له خلکو سره دي ( په اړه يې) نهيلى وسې ( او زړه پرې مه تړه)،چې غنا (خو له واره) حاضره ده . له تمې ډده وکړه، چې سملاسي نيستي ده . سړي  بيا يې وويل: نور څه هم راوښيه ! ورته يې وويل : کوم کار ته چې دې ملا تړله؛نو د پاى په اړه يې ښه غور او تدبر وکړه؛نو که په خير دې و،و يې کړه او که پاى يې په هلاکېدو وه؛نو ډده ترې وکړه. (الوافي  ٤/ ٤١٧)

 

عاقبت

 ðمؤمن د روح قبضولواو د “ملک الموت” تر راښکاره کېدو پورې له (خپل) ناوړه عاقبته په ډار کې وي او الهي رضا ته په رسېدو يقين نه لري .( تاويل الايات الظاهرة: ٥٢٤)

 

عبادت او بنده

ð ډېر غوره هغه دى،چې له عبادت سره مينه ولري او ټينګ يې په غېږ کې نيولى وي او د زړه له کومي ورته ګران وي او په پوره وسې يې ترسره کړي او يو وخت ورته وټاکي،چې پکې ورته مهمه نه وي،چې دنيوي څه تنګسه يا پراخي پرې راځي . ( الکافي ٢/ ٨٣ )

ðڅوک چې خداى ډېر ياد کړي (؛نو) خداى ته به ګران وي .(کافي ٢/٤٩٩)

ðپټ عبادت غوره عبادت دى .( کنز ٣/ ٦٧٣)

ð يوساعت فکر کول ،تر شپېتو کالو عبادته غوره دى . ( کنز ٣/ ١٠٦ )

ð ځانمني د اويا کالو عبادت له منځه وړي .( کنز ٣/٥١٤)

ðپه مينه دعالم مخ ته کتل عبادت دى .( النوادر: مخ ١١٠)

ðپه جومات کې لمانځه ته په تمه کېناستل عبادت دى . (ميزان الحکمه : ٨٣٠٤ ح )

ðڅوک چې د خپل مؤمن ورور اړتيا ترسره کړي ؛نو د داسې چا په څېر به وي،چې ټول عمر يې پرعبادت تېرکړى وي . (الامالي طوسي : ٤٨١ )

ð د لا (اله) الا (الله) د کلمې ويل غوره عبادت دى . (التوحيد: ١٨ مخ)

 ð عبادت اويا برخې دى،چې مهم يې د حلالې روزۍ تر لاسه کول دي . (الکافي  ٥/ ٧٨)

ð ډېر پټ عبادت ته ډېره بدله ورکول کېږي .( وسايل ١/ ٧٩)

  ðد دين د پوهېدو لپاره هڅه کول غوره عبادت دى . (بحارالانوار ١/ ٢١٧)

 ð پراخۍ ته سترګې پر لارېدل غوره عبادت دى .(کمال الدين  ١/ ٢٨٧)

ð سکون او ارامي د عبادت ښکلا ده . (جامع الاخبار: ١٢٢)

ð سستي د عبادت آفت دى .( الخصال ٢/ ٤١٦)

ðقيامت به هله درېږي چې : ګناهګارانو ته پاملرنه وشي او ښه راغلاست ورته وويل شي. منصفان کمزوري شي  او (دلقکها) نژدي شي او عبادت خلکو ته اوږد او سختېږي،د صدقې ورکړه زيان او په امانت کې خيانت کول ګټه وبولي او (په خپل ګومان) لمونځ کول يې (پر خداى) منت اېښوول وي . (بحارالانوار ٦/ ٣١٥)

ð خداى تعالى وايي:کوم بندګان،چې جنتي کوم؛نو په جسمي ناروغۍ يې اخته کوم يا مرګ پرې سختوم،چې راته له ګناه پاک راشي بيا يې جنت ته ننباسم .( الکافي ٢/ ٤٤٦)

 ð صالح بنده ته چې کنځلې وشي؛نو په ځواب کې وايي : زه روژه يم، سلام پر تا! کنځلې درته نه کوم . خداى تعالى وايي: بنده مې د بل بنده له شره روژې ته پنا يووړه؛نو ما هم د دوزخ له اوره وژغوره .(الکافي٤/ ٨٨)

ð خداى تعالى وايي :زه له هغه بنده حيا کوم،چې د دعا لاسونه پورته کړي او د فيروزې غمى يې په ګوته کړى وي؛خو نهيلى يې ستون کړم . (وسايل ٥/ ٩٥)

ð زه د هغه بنده د مړينې اساني او له اوره ژغورنه تضمينوم،چې د لمانځه وختونه او د لمر (راختو او لوېدو) موقعيت څاري . (مستدرک الوسايل  ٣/ ١٤٨)

ð داسې بنده هم وي،چې د يوې ګناه لپاره زر کاله نيول شوى وي؛خو مېرمنې به يې په جنت کې په نازو نعمت کې وي . ( الکافي ٢/ ٢٧٢)

 

عبرت اخستل

ð په دنيا کې د عبرت اخستونکي انسان ژوند د ويده انسان د ژوند په څېر دى،چې ګوري؛خو نه يې لمسوي او له زړه پر دنيا د غولېدو دودونه بد ګڼي،چې د الهي عذاب وړ دي او ځان ترې پاکوي او هغه پر ځان عملي کوي،چې خداى پرې خوشحالېږي  او ( په دنيا  د زړه نه تړلو) په اوبو ټول هغه ځايونه وينځي،چې دنيا ته د بلنې له امله (په زړه کې ورته) ښکلى انځور شوي . عبرت،عبرت اخستونکى له درېو څيزونو برخمنوي : په دې پوهېدل،چې څه کوي،په څه چې پوهېږي،عملي کوي يې او په څه چې نه پوهېږي،پوهېږي . (مصباح الشريعه: ٢٠١)

 

عُجب ( وياړنه)

ð وياړنه د خېل آفت دی . (الکافي ٢/ ٣٢٨)

ð که مؤمن ته تر وياړنې ګناه غوره نه واى ( په دې غاورتوب،چې ګناه نه کوي)؛نو خداى  بېخي د ګناه کولو لپاره د خپل مؤمن بنده لاس ازاد نه پرېښود.( مشکاْةالانوار ٣١٤)

ð خداى تعالى وايي : مؤمن بنده مې د فرايضو په کولو راته نږدېوالى مومي،په بل هېڅ څيز دا چار نشي کړاى او په يقين مؤمن بنده مې د عباداتو يو وره ته مخه کوي؛خو زه يې پرې تړم،چې ځانمنى نشي او پوپناه يې  نه کړي . (التوحيد ٣٩٨)

ð “موسى بن عمران” ( ع) ابليس ته وويل : هغه کومه ګناه ده،چې که بنيادم يې وکړي؛نو ته پرې برلاسي مومې؟ ويې ويل : که ځانمنى شي او خپلې کړنې ډېرې وبولي او خپل ګناهونه په سترګو کې لږ  وبرېښوي . (الکافي ٢/ ٣١٤)

 ð خداى حضرت “داوود” عليه السلام ته وويل : داووده! ګناهګارانو ته زېرى ورکړه او نېکان وډاروه . “داوود” ويل : خدايه! څرنګه دا کار وکړم؟ ورته يې وويل :ګناهګارانو ته ځکه زېرى ورکړه،چې زه يې توبه قبلوم او ګناهونه يې بښم او نېکان ځکه وډاروه،چې پخپلو کړنو ځانمني نشي .

ð درې ګناهونه د هلاکت لامل دي : کنجوسي په ځاني غوښتنو پسې تلل او ځانمني . (الحکايات ٩٧ )

 

عدالت

ð له عادل واکمن سره يو ساعت تېرول تر اوياوو کالو عبادته غوره دى او پر ځمکه،چې د خداى لپاره حد جاري شي؛نو تر څلوېښتو ورځو باران  ورېدو غوره دى . (وسايل ٢٨/ ١٢ )

ð د يو ساعت عدالت جاري کول،د هغو اويا کالو  تر عبادته اوچت دى،چې د شپې پکې په تهجدو بوخت وي او د ورځې روژه وي او د خداى په نزد د يو ساعت ظلم کولو سزا د شپېتو کالو ګناه کولو تر سزا ډېره ده. (مشکاة الانوار: ٣١٦)

ð ډېرعادل هغه دى،څه چې ځان ته خوښوي،نورو ته يې هم خوښ کړي او څه چې ځان ته بد ګڼي،نور ته يې هم بد وګڼي . (معاني الاخبار ١٩٥)

ð عدالت د ايمان ښکلا ده . ( بحارالانوار ٧٤/ ١٣٣)

ð يو ساعت د”عدالت خپرول” تر يوه کال عبادته غوره دي . (مستدرک  ١١/ ٣١٧)

ðحضرت “جابر بن عبدالله” (رضى الله عنه) وايي : يوه ورځ رسول اکرم ( ص) په “جعرانه” نومې ځاى کې غنيمتونه وېشل . چا ورته وويل : عدالت وکړه! رسول اکرم ( ص) ورته وويل : که عدالت ونه کړم (؛نو) بدمرغېږم . [ صحيح بخاري : ٣١٤٨ح]

 

عذاب

خداى په قيامت کې له درېو ډلوعذاب لرې کوي :څوک چې پر الهى قضا و قدر راضي وي . څوک چې پر مسلمانانو زړه سواند وي  او څوک چې نورو ته د خير يه چارو لار ورښيي . (مستدرک الوسايل ١٢/ ٤٣١)

ð پېغمبر اکرم د “حاتم طايي” زوى ته وويل : خداى تعالى ستا له پلاره د سخاوت له امله يې سخت عذاب لرې کړ. (مستدرک الوسايل ١٥/ ٢٦٠)

ð څوک چې د خلکو پت ته له لاس غځولو ډډه وکړي؛نو خدای يې په قيامت کې له عذابه ژغوري او څوک چې پر خلکو له خپلې غوسې ځان وژغوري،پاک خداى يې له الهي عذابه ساتي .( الکافي ٢/ ٣٠٥)

ð د بني اسرائيلو پر يوه ټبر د شپې الهي عذاب راپرېووت او چې  سهار شو؛څلور ډلې يې ځپلې وې : سازيان،ډمان، د خوړو زېرموونکي (محتکرين) او سودخواره . (مستدرک الوسايل ١٣/ ٢٧٣)

 ð  خداى ژبې ته داسې عذاب ورکوي،چې د بدن نورو غړيو ته يې نه ورکوي : ژبه خداى ته وايي : ما ته ولې داسې عذاب راکوې،چې نورو ته يې نه ورکوې ؟ ورته ويل کېږي: له تا داسې خبره راووته،چې ختيځ او لويديځ ته ورسېده او له امله يې (د بې ګناه) وينه تويه شوه او مال په حرامو غصب شو او ناموس څيري شو. پر عزت او پرتم مې قسم! زه به دې هرومرو پر داسې عذاب اخته کړم،چې د انسان د بدن يو غړى به هم پرې اخته نه کړم. (المجتبي: ٢٥)

  ð خدای به هغه زړه په عذاب نه کړي،چې د قرآن لوښى وي . ( الامالي للطوسي: ٦ )

 ðپر هغه قسم،چې زه يې زېرى ورکوونکى نبي رالېږلى يم،چې خداى موحد په اور نه کړوي او (هم) موحدين سپارښت کوي،چې قبلېږي هم. (الامالي للصدوق : ٢٩٥)

ð خداى چې پر کوم امت غوسه شي او عذاب پرې نه راولي؛نو داسې چارې ورسره کوي :نرخونه ورته لوړوي،عمرونه يې لنډوي،سوداګري يې ګټه نه لري،د مېوو حاصلات يې ښه نه وي،سيندونه يې له اوبو نه ډکېږي، باران پرې نه اوري او ډېر ناوړه (واکمن) پرې واکمنېږي. ( الکافى ٥/ ٣١٧)

 

عذاب ژغورنه

ðدرې څيزونه د ژغورنې لامل دي : ( ۱) په پټه او ښكاره له خدايه وېره(۲) په خوښۍ او غوسه كې عدالت كول (۳) او په شتمنۍ او بېوزلۍ دواړو كې منځلاري او درې  څيزونه د پوپنا كېدو لامل دي : (۱) په ځاني غوښتنو پسې تلل(۲) كنجوسي كول (۳) او ځانمني.(الحكايات : ۹۷مخ )

ðدرې څيزونه د ژغورنې لامل دي : ( ۱) ژبه دې وساته (۲) پر ګناهونو دې وژاړه  (۳) او د كور دې  خادم وسه . ( بحار ۶۸ \ ۲۷۹)

 

طلاق

ð خداى ته هغه کور ډېر ګران دى،چې په واده اباد شي او هغه کور يې ډېر بد ايسي، چې په طلاق وران شي . (الکافي ٥/ ٣٢٨)

ð کومه ښځه،چې بې دليله له مېړه طلاق اخلي؛نو د جنت بوى پرې حرام دى .( روضة الواعظين ٢/ ٣٧٦ )

ð طلاق  ډېر (کږلي) منفور حلال دى .( مستدرک الوسايل ١٥/ ٢٨٠ )

  ð واده وکړئ او طلاق مه ورکوئ؛ځکه په طلاق د خداى عرش لړزېږي . (عوالي الاللي ٢/ ١٣٩)

 

 

ضمانت او تضمين

ð څوک چې (له ګناه) د خولې او عورت د ساتنې تضمين راکړي؛ نو جنت ورته تضمينوم . (وسايل ١٦/ ١١٠)

 ð چاچې د حج په اړه د کوم مړي د وصيت ضمانت کړى وي او بې عذره ورته شا کړي؛نو پاک خداى يې لمونځ،روژه او دعا نه قبلوي او په هر شواروز کې ورته سل ګناهونه ليکي،چې ډېره وړه يې له مور و لور سره د زنا هومره ده. (جامع الاخبار: ١٥١)

ð څوک چې د مسلمان ورور د اړتيا د لرې کولو تضمين وکړي؛نو خداى يې اړتياوو ته تر هغه نه ګوري،چې د خپل مسلمان ورور اړتيا يې نه وي لرې کړي . (الجعفريات : ١٩٨)

ðد خداى له فرائضو غفلت مه کوئ،څه چې درته تضمين شوي،پرې بوخت شئ (اخرت ته پاملرنه فرض او د انسان روزي تضمين شوې ده)  (ارشاد القلوب ١/ ٦١)

ðپاک خداى وايي : څوک چې پوهېږي،ګټه او تاون د خداى په لاس کې دى او له ما د کومې اړتيا لرې کول وغواړي؛نو ورته يې پوره کوم .( ثواب الاعمال : ١٥٣)

ð څوک چې له خپلې دنيا سره مينه لري؛نو خپل اخرت ته به يې زيان رسولى وي . (کنزالفوائد ١/ ٦١ )

 

زړه سوى

 ð په زړه سوي کې غوره چار (د خپلوانو) نه ازارول دي .(قرب الاسناد : ١٥٦ )

ðڅوک چې غواړي عمر يې اوږد او روزي يې پراخه شي؛نو پرهېزګاري او زړه سوى دې وکړي . ( الزهد : ٣٩ مخ)

ð جبرئيل خبر کړم،چې د جنت بوى له زر کاله لرې واټنه بويېږي؛خو د موروپلار عاق شوى،سخت زړه او بوډا زناکار به يې بوى نه کړي .( بحارالانوار  ٧١/ ٩٦ )

ð څوک چې د زړه سوي او خپلوانو ته د رسېدو لپاره کوم ګام واخلي؛ نو خدای ورته د سلو شهيدانو ثواب ورکوي او هر ګام ته يې څلوېښت زره نېکۍ ليکي او څلوېښت زره ګناوې يې هم پاکوي او همدومره درجې يې لوړوي او؛لکه داسې دى،چې په پوره زغم يې  يوازې خداى ته عبادت کړى دى . ( بحارالانوار ٧١/ ٨٩)

ð په قيامت کې زړه سوى او امانت ساتنه د صراط پر دواړو غاړو (د دېوال په څېر) وي،چې زړه سواند او امانت ساتى ترې تېرېږي او اور ورته زيان نشي رسولاى . (مستدرک الوسايل ١٥/ ٢٤٠ )

ð څوک چې يو څيز راته تضمين کړي،څلور څيزونه ورته تضمينوم :  زړه خوږى دې وي،چې د خپلوانو ورسره مينه پيدا شي،روزي يې زياتېږي،عمر يې اوږدېږي او خداى يې هغه جنت يې ننباسي،چې وعده يې ورسره کړې . (عيون اخبار الرضا ٢/ ٣٧ )

ð درې څيزونه له اخلاقي مکارمو دي : هغه ته ورکړه،چې ته يې بې برخې کړى يې . له هغه سره اړيکه،چې درسره يې اړيکه پرې کړې او د هغه چا بښل،چې تېرى يې درسره کړى وي  . (مستطرفات السائر :  ٦٥١)

ð زړه سوى سيمې ابادوي،عمرونه اوږدوي،که څه هم اوسېدونکي يې نېکان نه وي . (مستدرک الوسايل ١٥/ ٢٤١ )

ð زړه سوى عمر اوږدوي او نيستي له منځه وړي . (الجعفريات : ٥٥)

ðان که په يو سلام اچولو هم وي؛نو زړه سوى وکړئ . (الجعفريات ١٨٨)

 ð  تر ټولو ښو چارو ډېر ژر د زړه سوي بدله تر لاسه کېږي . (الکافي ٢/ ١٥٢)

ð ډېر داسې قومونه دي،چې نېکان نه دي؛خو زړه سوى لري او (په پايله کې) شتمني يې ډېرېږي او عمرونه يې اوږدېږي؛نو که نېکان وي، څنګه به وي؟( الکافي ٢/ ١٥٥)

ð د خپل امت حاضر او غايبو او هغوى ته چې تر قيامته زېږېږي، وصيت کوم،چې زړه سوى وکړي،که څه هم يوه کلنه لار وي؛ځکه زړه سوى ديني چار دى . ( الکافي ٢/ ١٥١)

ðڅوک چې غواړي رزق يې پراخه او عمر يې اوږد شي؛نو پر خپلوانو دې زړه سوى وکړي . ( صحيح بخاري – صحيح مسلم )

 ð څوک چې له خپلوانو سره ښه چلن نه کوي او زړه سوى پرې  نه کوي ؛ نوجنت ته نشي تلاى . ( صحيح بخاري – صحيح مسلم )

 

صلوات

ð څوک چې ووايي،خداى دې محمد (ص) ته د هغه وړ اجر ورکړي؛نو زر ورځې به يې اويا ليکوال په کار اچولي وي (؛ځکه ددې کار ثواب دومره ډېر دى،چې يو تن يې په زرو ورځو کې په کړنليک کې ليکي).  (بحار الانوار ٩١/ ٦٣)

ð خداى تعالی پرښتې لري،چې پر ځمکه ګرځي او زما د امت سلامونه او درودونه رارسوي . ( وسايل الشيعه ١٤ / ٣٣٨)

ðهغه ډېر کنجوس دى،چې زما نوم واخستل شي؛خو درود راباندې ونه وايي .( کنز: ٢١٤٤ح )

ðپر ما “درود” ويل،د”پل صراط” رڼا ده .( کنز: ٢١٤٩)

ðبېشکه د خداى پرښتې په نړۍ کې ګرځي او ماته مې د امت سلامونه او درودونه رارسوي .( سنن نسائي – دارمي )

ð څوک چې پر ما صلوات ويل هېر کړي؛نو د جنت لار يې ورکه کړې ده.( بحارالانوار ٩١/ ٥٣)

ð څوک چې پر ما صلوات ووايي؛خو پر کورنۍ مې ونه وايي؛نو جنت به بوى نه کړي،حال داچې د جنت بوى له پينځو سو کالو واټنه بويېداى شي . ( الامالي للصدوق : ٢٠٠)

ð صلوات په لوړ غږ ووياست؛ځکه نفاق له منځ وړي . (الکافى: ٢/ ٤٩٣)

ð دعا هله قبلېږي،چې پر ما او اهلبيتو مې صلوات وويل شي.(بحار ٩١/ ٦٦)

 ð پر ما صلوات مو،د دعا د قبلېدو،د پالونکي د خوشحالۍ او د کړنو د قبلېدو لامل دى . (بحار ٩١/ ٦٨)

ð څوک چې په کومه ليکنه کې پر ما صلوات وليکي؛نو څو چې دا ليکنه وي، پرښتې به ورته بښنه غواړي (اللهم صل على محمد و على آل محمد )  (بحار ٩١ / ٧١)

ðد هرې دعا او اسمان ترمنځ يوه پرده ده او دا پرده هله لرې كېږي،چې پر پېغمبر او كورنۍ يې درود ( صلوات ) وويل شي او كه  دا كار و نشي؛ نو دعا بېرته راګرځي . ( بحارالانوار ۲۷\ ۶۰ )

ð پر ما او اهلبيتو مې صلوات ويل د نفاق د منځه وړو لامل دى. (الکافي ٢/ ٤٩٢)

ðڅوک چې راباندې صلوات ووايي؛نو خداى او پرښتې پرې صلوات وايي؛ نو که څوک لږ صلوات وايي يا ډېر!!! (الکافي ٢/ ٤٩٢)

ðڅوک چې راباندې يو صلوات ووايي؛خداى ورته لس صلواته رالېږي،لس ګناهونه يې بښي او لس درجې يې لوړوي .(مستدرک الوسايل ٥/ ٣٣٧)

ð نيمګړى صلوات راباندې مه وائئ : وپوښتل شو: څرنګه؟ آنحضرت ورته وويل: دا چې “اللهم صل على محمد” ووياست،حال داچې بايد “اللهم صل على محمد و على آل محمد” ووياست.

(شرف النبي ٢٤٨ مخ – “الصواعق المحرقه” ٢/ ٤٣٠ – حاشيه الطحاوي على مواتي الفلاح ١/ ٨ )

 ð اصحابو کرامو پېغمبراکرم وپوښت : پر تا باندې په سلام اچولو پوه شو؛خو صلوات درباندې څرنګه دى؟ ورته يې وويل:” اللهم صل على محمد و على آل محمد کما صليت على ابراهيم و آل  ابراهيم.”

 (صحيح مسلم ٢/ ١٦ – سنن ابن ماجه ١/ ٢٩٣ – صحيح بخاري ٤/ ١١٨)

[ تبصره: زموږ ځيني ويناوال او ليکوال يوازې ((صلى الله عليه وسلم)) وايي او ليکي،حال داچې د پېغمبر څرګنده لارښوونه ده،چې بايد ((صلى لله عليه و اله وسلم)) وويل او وليکل شي . ]

 

سوله

ð سوله د مسلمانانو ترمنځ روا ده؛خو نه هغه وخت،چې حرام حلال يا حلال حرام شي . (من لا يحضره الفقيه ٣/ ٣٢)

ð که پر کوم مسلمان ورور مو مينه راغله؛نو ورته يې څرګنده کړئ؛ ځکه چې د اړيکو د ټينګښت لامل ګرځي.(النوادر للراوندي ١٢ مخ)

ð د خلکو پخلاينه تر يو کال روژې نېونې او لمونځ کولو غوره ده. (وسايل ١٨/  ٢٤٠ )

 

صدقه

ð د صدقې په ورکړه (له اسمانه) روزي راکوزه کړئ . ( فقيه ٤/ ٣٨١)

ðخپلوان دې،چې اړمن وي ؛نو نورو ته صدقه ورکول څه پکار؟( فقيه ٤/ ٣٨١) 

ðصدقه د بديو اويا ورونه تړي .( بحار ٩٦/١٣٢)

ðد صدقې په ورکړه،خپل ناروغان له ناروغۍ وژغورئ . (بحار ٩٦/ ١١٨)

ðغوره صدقه داده،چې يو مسلمان پوهه تر لاسه کړي او بل مسلمان ته يې  وښيي .( کنز: ١٦٣٥٧ح )

ðپټه صدقه ورکول،د خداى غوسه سړوي .(بحار ٩٦/ ١٣٠)

ð صدقه د ناوړه مړينې مخه نيسي. (الکافي ٤/ ٢)

ð د صدقې ورکړه مال ډېروي او صدقه ورکړه،چې خداى درباندې ولورېږي.( الکافي ٤/ ٩)

ð د بېوسي لاسنيوى،له غوره صدقو ځنې ده .( الکافي ٥/ ٥٥)

 ð تر خپلې اړتيا د زياتو څيزونو ورکړه،غوره صدقه ده. (وسايل ٩/ ٤٦١)

ðشتمني د صدقې په ورکړه نه لږېږي؛نو بخشش وکړئ او مه ډارېږئ. (مستدرک الوسايل ٧/ ١٥٣)

ð صدقه د ناوړو پېښو مخه نيسي. (مستدرک الوسايل ١٢/ ٣٤٣)

ð د قيامت ځمکه سره ده؛خو بې د مؤمن د سيوري له ځاى،چې  صدقو يې دا سيورى جوړ کړى دى . (الکافي  ٤/ ٣ )

ð ګهېځ مو په صدقه پېل کړئ؛ځکه بلاوې ترې نشي تېرېداى.( مفتاح الفلاح ١٦٤)

  ðخداى د صدقې له ورکوونکي اويا ډوله ناوړه مړينې او بلاوې لرې کوي، چې لږ تر لږه يې غم او خپګان دى . (مستدرک الوسايل ٧/ ١٦١)

ð ګدا چې د شپې درته راشي؛نو مه يې ځوابوئ .( الکافي ٤/ ٨ )

ð که خپلوان مو اړ ول،نورو ته د صدقې ورکړه روا نه ده. (مستدرک الوسايل ٧/ ١٩٦)

 ð مسکين د نړۍ پال استازى دى،چې خلک پرې و ازمېيي؛څوک چې څه ورکړي؛نو خداى به هم پرې ولورېږي او څوک چې يې ځواب کړي،خداى به يې بې برخې کړي . (مستدرک الوسايل ٧/ ١٩٩)

ð د اړتياوو د څرګندولو پر مهال د ګدا خبرې مه پرېکوئ، پرېږدئ، چې پوره خبرې وکړي او له حاله يې خبر شئ.(مستدرک الوسايل ٧/ ١٩٩)

ð ناروغان مو د صدقې په ورکړه ورغوئ او شتمني مو د زکات په ورکړه وساتئ .  (مستدرک الوسايل ٧/ ١٩٩)

ð توحيد نيم دين دى او د روزۍ د لاس ته راوړو لپاره صدقه ورکړئ ( د صدقې د ثواب کچه د وګړي په توحيد پورې اړه لري)  (التوحيد ٦٨)

ðله خلکو سره ښه چلن صدقه ده . ( روضة الواعظين  ٢\٣٨٠)

ðزه داسې صدقه درښيم،چې د خداى او استازي يې ښه ايسي او هغه د مرور پخلا کول دي .( مجموعه ورام ١/٦ )

 

د مؤمن پاڼه

ð د علي مينه،د مؤمن د کړنليک عنوان دى .

 (الجامع الصفين ٢/ ١٨٢ – کنزالعمال ١١/٦٠١ – فيض القدير ٤/ ٤٨١ – د بغدادتاريخ ٥/ ١٧٧ – تاريخ مدينه دمشق ٥/ ٢٣٠ – لسان الميزان ٤/ ٤٧١ – ينابيع الموده ١/ ٢٧٢ ، مناقب ابن مغازلي ٢٤٣ –  النصايح الکافيه ٩٤ مخ)

ð تر مرګ وروسته د مؤمن د کړنليک لومړى سرليک،دده په اړه د خلکو نظر دى،که ښه و (؛نو) ښه دى او که بد و؛بد دى او مؤمن ته (تر مرګ وروسته) لومړى ډالۍ داده،چې خداى يې هغه او د جنازې ګډونوال بښي . ( الامالي للطوسي ٤٦ مخ)

 

زغم او صبر

ð زغم  او وقار دوې ښې ځانګړنې دي . ( صحيح مسلم)  

ð چارې په وقار ترسره کول،د خداى له لوري دي او پکې بيړه کول د شيطان له لوري دي . (ترمذي)

ð ښه خوى،چارې په وقار او ډاډ ترسره کول او منځلاري د پېغمبرۍ (نبوت) د څلروېشتمې برخې يوه برخه ده . (ترمذي)

ðزغم  نيم ايمان دى .( بحار ٨٢/١٣٧)

ð “زغم” ايمان ته داسې دى؛لکه سرچې تنې ته وي . ( کنز ٣/٢٧١)

ð له دوو خويونو ځان وساتئ : له نه زغم او ناغېړۍ . (فقيه ٤/٣٥٥)

ðزغم اوحوصله د خداى ده او بيړه د شيطان . ( المحاسن ١/٢١٥٩)

ðزغم او وقار(مړانه) دوه ښه ځانګړنې دي . ( صحيح مسلم )

ðپوهه د مؤمن ملګرې ده،زغم يې وزير دى،عقل يې دليل او حجت دى،کړنه يې لارښود دى،لورنه يې پلار دى،نېکي يې ورور دی او زغم يې د لښکر بولندوی دی . ( بحارالانوار  ٦٦\٣٦٧)

ðپرهېزګاري عزت دى،زغم ښکلا ده او صبر د سپرلۍ ډېره غوره وسيله ده .( مستدرک الوسايل  ١١\٢٦٣)

ðزه زغم ته مرکز،کړنې ته کان او صبر ته هستوګنځى يم . (پورته سرچينه ١١\٢٨٩)

ðافسوس کول زغم  ته زيان او آفت دى . ( بحارالانوار  ٦٦\٣٨٩)

ðد خداى تعالى حياناک،زغمناک اوعفاف ښه ايسي. (الکافي ١\١١٢)

ðد مؤمن ايمان هله بشپړېږي،چې دا درې ځانګړنې ولري :زغم چې له ناپوهۍ يې منع کړي . تقوا چې له ګناه يې وژغوري او لورنه،چې دوستي يې ښه کړي . ( مستدرک الوسايل  ١١\٨٨)

ðکه په چا کې درې څيزونه نه وي؛نو هيڅ کړه يې نه ټینګېږي : تقوا چې له ګناه يې منع کړي .خوى چې له خلکو سره چلن وکړي او  زغم، چې د ناپوهه ناپوهي ورته پرمخ ووهي .( الحضال  ١\ ١٤٥ )

ðصبر نيم ايمان دى .( ارشادالقلوب  ١\ ١٢٧) 

ðڅوک چې د خپلې مېرمنې پر ناوړوخويونو صبر وکړي؛نو خداى به ددې صبر لپاره ورته د شاکرانو هرمره ثواب ورکړي . (مکارم الاخلاف : ٤٣١)

ðپر خلکو به داسې وخت راشي،که څوک پر خپل دين صبر وکړي؛نو د داسې چا په څېر به وي،چې سکروټه  يې په ورغوي کې نيولې وي .  ( بحارالانوار  ٢٨\٤٧)

ðپر تنګلاسۍ صبرکول او پراخۍ ته هيلمنېدل تر خيانت او له ناوړو پايلو يې غوره دي . ( مستدرک الوسايل  ١١\٤٧)

ðڅوک چې د روزګار کړکېچونو ته د صبر چمتوالى نه  لري؛نو بېوسېږي . ( الکافي ٨\ ٨٦ )

ð څوک چې پر مصيبت صبر وکړي (؛نو) خداى يې بدله ورکوي . ( فقيه ٤/٣٧٧)

ð صبر درې ډوله دى : پر مصيبت صبر،پر طاعت صبر او له ګناه کولو صبر. (الکافي ٢/ ٩١)

ð صبر د سپرلۍ غوره وسله ده .مستدرک الوسايل ١١/ ٢٨٣

 ð خداى وايي : د بنيادم د ټولو کارونو اجر له لسو تر اوه سو ګرايه دى؛ خو صبر چې (يوازې) ماته دى؛نو زه يې بدله ورکوم او د صبر ثواب د خداى د علم په زېرمتون کې دى او صبر؛يعنې روژه. (وسايل ١٠/ ٤٠٤)

ð پر خداى ايمان هله پوره کېږي،چې بنده پينځه ځانګړنې ولري : پر خداى توکل،خداى ته د چارو ورسپارل،د خداى حکم ته غاړه اېښوول، د خداى پر قضا راضي کېدل او پر الهي کړاوو او ازمېښتونو صبر کول . ( بحارالانوار ٧٤/ ١٧٩ )

ð خداى تعالى روزي د (واقعي) لګښت په کچه او صبر د کړاو د سختۍ په کچه راکوزوي . ( بحارالانوار ٧٩/ ٧٣)

ðچې کله ( په قيامت کې) د حساب دفترونه پرانستل کېږي او د عدالت تلې درېږي؛نو کړاو ځپلي ته نه تله وي او نه د حساب دفتر او دا آيت لوستل کېږي:” انما يوفى الصابرون امرهم بغير حساب” ؛ بېشکه چې صابرانو ته پوره بې حسابه اجر ورکول کېږي .(مشکاة الانوار ٣٠٠ مخ)

 

ګهېځ

 ð څوک چې د ګهيح له لمانځه تر لمر راختو پورې د خپل لمانځه پر ځاى کېنې؛نو خداى يې د دوزخ له اوره ساتي.(من لا يحضره الفقيه١/ ٥٠٤)

ð بنده چې سهار کړي او پر چا د تېري نيت ورسره نه وي؛پاک خداى يې ټول ګناهونه بښي . (الکافي ٢/ ٣٣٤)

ð خداى وايي: د آدم زويه! د ګهيځ تر لمانځه څه ساعت وروسته او د مازېګر تر لمانځه څه ساعت وروسته ما ياد کړه،چې د ټولو چارو کفايت دې وکړم . (بحارالانوار ٨٣/ ٢٩٧)

 ð بنده چې سهار کړي او په تن روغ رمټ او روزۍ ګټلو ته خوندي وي؛ نو داسې دى،چې دنيا (ورته مخه کړي او) غوره کړى يې دى .( الامالي للصدوق : ٣٨٥ )

ð کوم امتي مې،چې سهار کړي او موخه يې “غيرالله” وي؛نو د خداى (له بندګانو) څخه نه دى . (المحاسن ١/ ٢٠٤)

ð د چاچې دنيا د شپې او ورځې ستره بوختيا وي؛نو پاک خداى نيستي ورته په سترګو کې ږدي او چارې يې ورته جړوي او له دنيا همدومره ګټه اخلي،چې خداى ورته ټاکلې ده او د چاچې آخرت ګهيځ او ماښام ستره بوختيا وي؛نو پاک خداى په زړه کې غنا ورته ځايوي او چارې يې سموي . (الکافي ٢/ ٣١٩)

 

شيطان

ð مؤمن،چې پر خپلو پينځو لمونځونو ټينګ وي؛نو شيطان ترې ډارېږي؛خو که لمونځ پرېږدي؛شيطان پرې برلاسېږي او لويو ګناهونو ته يې راکاږي .( الکافي ٣/ ٢٦٩)

ð څوک چې د اولاد خاوند شي؛نو بايد په ښي غوږ کې يې اذان او کيڼ کې يې اقامه ووايي؛ځکه دا چار يې له شړل شوي شيطانه ساتي. (الکافي ٦/ ٢٤)

ð که څوک له خپلو ويلو يا، چې په اړه يې څه ويل کېږي،چرت يې پرې خراب نه وي؛نو  يا بې لارې يا د شيطان ملګرى او شريک دى . (الکافي ٢/ ٣٢٣)

ð په حقيقت کې شيطان له تاسې په کوچنيو ګناهونو خوښېږي او هغه ګناه نه بښل کېږي،چې کوونکى يې کوچنۍ وګڼي او ووايي:په دې (وړې) ګناه خو به ونه نيول شم . (مستدرک الوسايل ١١/ ٣٤٧)

 ð ابليس چې کله ( له خپل مقامه) کوز راوشړل شو؛خداى ته يې وويل : ستا پر عزت،جلال او ستريا قسم! د آدم ځوځات به پرېنږدم،څو يې روح له تنې بېل شي.( بحار ٦/ ١٦)

ð خلکو! په واقع کې (نامحرم ته په) بده کتل شيطاني کتل دي،که داسې مو وکړل؛نو له خپلې مېرمن سره کوروالى وکړئ . (من لا يحضره الفقيه ٤/ ١٩)

 ð په جماعت لمانځه چې درېږئ،ليکې مو سمې کړئ او يو بل ته جوخت ودرېږئ،چې شيطان درباندې برلاس نشي .( تهذيب الاحکام ٣/ ٢٨٣)

ð په کورونو کې کوترې مه ساتئ او د ورځې يې دباندې الوځوئ؛ځکه په کورونو کې يې ځالې د شيطان ځاى دى.( وسايل ٥/ ٣١٨ )

ð څوک چې ما په خوب کې وويني؛نو سم خوب يې ليدلى دى،په حقيقت کې شيطان په خوب او وېښه کې زما او زما د وصيانو په بڼه کېداى نشي.( بحار ٣٠/ ١٣٢)

ðبېشکه شيطان خپله پوزه د بنيادم پر زړه ږدي،که د خداى د ياد (بوى) يې بوى کړ (؛نو) تښتي او که د خداى د هېرې (بوى) يې حس کړ؛ نو زړه يې ښوى تېروي،چې ورته “وسواس خناس وايي” ( شيطان باطل او چټي فکرونه د انسان زړه ته اچوي)  (بحار ٦٠/ ١٩٤ )

 ð په حقيقت کې شيطان په انسان کې داسې ننوځي؛لکه وينه،چې په رګونو کې روانه وي . ( بحار ٦٠/ ٢٦٨)

ð که شيطانان د بنيادمانو له زړونو ګردچاپېره نه ګرځېداى؛نو انسانانو د اسمان ملکوت ( او باطن) کتل . (تخريج زين الدين ابي الفضل العراقي ٣ / ٩ )

 

شهوت

ðتر دې وروسته مې خپل امت ته له درې څيزونو ډېر ډارېږم : حرامې بوختياوې ،پټې شهوتپالنې او سود. (الکافي ٥/ ١٢٤)

ð پر هغه دې خوښي وي،چې نغذ شهوت د ناليدلي وعدې (قيامت) لپاره پرېږدي . (الاختصاص : ٢٣٣)

ð شهوت مو لږ کړئ،چې د فقر زغمل درته اسان وي او ګناهونه مو لږ کړئ، چې له مړينې سره مخامخېدنه درته اسانه شي.(ارشاد القلوب ١/ ٦١)

 

شهادت

ð ( دخداى په لار کې) شهادت ډېره اوچته مړينه ده.(بحار٩٧/ ٨)

 ðڅوک چې په رښتيا شهادت غواړي؛نو که شهيد هم نشي؛نو خداى ورته د شهادت اجر ورکوي . (عوالي الاللي ١/ ١٠١)

ð څوک چې د خپل غصب شوي حق د لاس ته راوړو په ترڅ کې ومري ؛ نو شهيد دى . (الکافي ٥/ ٥٢)

ð پاک خداى لومړى د پېغمبرانو بيا پوهانو او ورپسې د شهيدانو سپارښت مني،چې منل کېږي هم . (بحار ٨/ ٣٤)

ð  چې  قيامت شي؛نو د پوهانو د قلم ارزښت د شهيدانو له وينې سره پرتله کوي؛نو (په پايله کې) د پوهانو د قلم رنګ د شهيدانو پر وينه لوړاوى مومي.(الخصال ١/  ١٥٦)

 

شوخي

ð شپږچارې په مړانه کې شمېرل کېږي، چې درې په سفر او درې په حضر کې دي :

الف – د حضر چارې : د “کتاب الله” لوستل،د خداى د جوماتونو ابادول او دخداى لپاره ورروي کول .

 ب_ د سفر درې چارې : له خپلې توښې پراخ لاسي،ښه خوى او داسې ټوکې چې ګناه پکې نه وي . (صحيفة الرضا ٥١ مخ)

 ð ډېرې ټوکې ابرو، ډېره خندا ايمان او ډېر دروغ د انسان مقام له منځه وړي .( الکافي ٢/ ٦٠٦)

  ð علي! ډېرې ټوکې مه کوه؛ځکه ارزښت او پرتم دې له منځه وړي . ( عوالي الاللي ١/ ١٠١)

 

پېژندنه

ðڅوک چې زما اهلبيت ونه پېژني،له درېو حالتو به وتلى نه وي : يا منافق دى يا ارمونى دى يا په مياشتني عادت کې د مور په ګېډه شوى دى . ( مستدرک الوسايل ٢/  ٢٠ )

ð څوک چې د خپلې زمانې مشر ونه پېژني؛نو په جاهلي مړينه به مړ شوى وي .( الکافي ١/ ٣٧٧ )

ð پر حق پېژاندي دې خداى ولورېږي .( العدد القويه: ٥)

 ð علي!که ته نه واى؛نو تر ما وروسته مؤمنان نه پېژندل کېدل .

(مغازلي مناقب ٧٠ مخ، الطرائف ١/ ٧٧، عيون رضا الرضا ٢/ ٤٨، العمدة ٢٩٢، بحار ٣٨/ ١٤٩)

ðزه او علي ددې امت پلرونه يو،چاچې زموږ حق وپېژاند؛نو خدای يې پېژندلى او څوک چې له موږ انکار وکړي؛نو له خداى يې انکار کړى دى.

 ( ينابيع الموده، ١/ ٣٧٠، د الوسي تفسير ٢٢/ ٣١ ، شرح احقاق الحق سيد مرعسي ١٥/ ٥١٨)

ð څوک  چې دې درناوى وکړي؛نو خداى به يې د قيامت د ورځې له ډاړه خوندي کړي . (الکافي ٢/ ٦٨٥ )

  ðپه ژبه اقرار کول،له زړه پېژندنه او په غړيو عمل کولو ته ايمان وايي. ( بحار الانوار ٦٦/ ٦٣ )

ðايمان لس برخې لري :پېژندنه،طاعت، علم، عمل، ورع،کوښښ، يقين، صبر ، ( په الهي  قضا و قدر) راضي کېدل او تسليم؛نو که يو يې هم  نه وې د ايمان جوړښت به نيمګړى وي . (بحارالانوار ٦٦/ ١٧٥)

ð ( ګېدې مو) مه مړوئ؛ځکه په زړونو کې مو د پېژندنې رڼا مړه کوي. (بحارالانوار ٦٣/ ٣٣١)

 ð تر مرګ وروسته مې امت ته له درېو څيزونو ډارېږم : تر پېژندنې وروسته بې لاري .په فتنو کې ښويېدنه .د ګېډې او عورت شهوتپالي. (الکافي ٢/ ٧٩)

 

توره

ð ټول خيرونه په تورو او د تورو تر سيورې لاندې دي (چې د خداى په لار کې پرې جهاد وشي) او خلکو (دين هم) يوازې په توره او جهاد ټينګېږي،تورې د جنت او دوزخ کونجياني دي.( الکافي ٥/ ٢)

 

ښکار

ðڅوک چې ښکار ته ولاړ شي(له خدايه)غافلېږي . (بحارالانوار ٦٢/ ٢٨١)

ð علي ! زړه په درېو څيزونو سختېږي : دچټي څيزونو اورېدل .تفريحي ښکار او د واکمن دفتر ته تلل . ( روضة الواعظين ٢/ ٤١٤)

 

شکر او مننه

ð پر چاچې لورنې وشي؛نو “الحمدالله” دې ووايي.( وسايل ٧/ ١٧٤)

ð څوک چې د خلکو منندوى نه وي؛نو د خداى مننه هم نشي پر ځاى کولاى . ( الامالي للطوسي : ٣٨٣ )

  ð خداى د منندوى لورونې نورې هم ورډېروي . (الکافي ٨/ ٨١)

 ð ايمان پوره دوه نيمې برخې دى : صبر او  مننه .( بحار الانوار ٧٤/ ١٥٣ )

 ð مؤمن ته حيران يم،په حقيقت کې الهي قضا و قدر يې په خير دى، که  پر کړاو اخته شي،صبر کوي او که لورنه پرې وشي؛نو شکر کاږي. (المؤمن : ٢٧)

ð د شاکر خواړه ورکونکي اجر د هغه روژتي په څېر دى،چې د خداى لپاره يې روژه نيولې وي او څوک چې د روغتيا پر مهال منندوى وي؛نو بدله يې د ناروغ او زغمناک کړاو ځپلي په څېر ده. د لورول شوي د منندوى ثواب د هغه قانع د ثواب هومره دى،چې له هغې لورنې بې برخې شوى دى . ( الامالي للطوسي : ٣٨٣ )

ð څوک چې له خلکو مننه ونه کړي؛نو د خداى شکر به يې نه وي پرځاى کړى . ( مواعظ عدديه : ٣٧ ) 

ð هغه ډېر ښه شکر اېستونکى دى،چې له خلکو سره ډېره مننه وکړي. (کنز ٣/٢٢٦)

 

سپارښتنه (شفاعت)

څوک چې زما له ځوځات سره په لاس،ژبه او شتمنۍ لاسنيوى وکړي، سپارښتنه يې راباندې لازمېږي .(مستدرک الوسايل ١٢/ ٣٧٦)

ð څوک چې زما قبر ته راشي؛نو سپارښت يې راباندې لازمېږي .

 ( الدرمنثور ١/ ٢٣٧ ، سنن الدارقطني ٢/ ٢٤٤ ، جامع الصغير ٢٠/ ٦٠٥، مجمع الزوايد ٤/ ٢)

ðد قيامت پر ورځ  د څلورو تنو شفاعت كوم،كه څه هم د ځمكې د اوسېدونكيو هومره ګناهونه يې كړي وي : زما د اهلبيتو مرستندوى. څوك چې د پرېشانۍ پر مهال يې اړتياوې لرې كړي . څوك چې له زړه او خولې ورسره مينه ولري او څوك چې په لاس دفاع وكړي . ( وسايل الشیعة : ۱۶\۳۳۳)

ð څوک چې خپل فرض لمونځ ځنډوي او په وروستي وخت کې يې کوي،په قيامت کې زما له سپارښنې بې برخې دى . (مستدرک الوسايل ٣/ ٩٧)

  ð په حقيقت کې زما سپارښتنه د خپل امت د ګناهګارانو لپاره ده. ( ان که ستر ګناهونه يې هم کړي وي)  (من لا يحضره الفقيه ٣/ ٥٧٤)

ð څوک چې خپل لمونځ سپک ګڼي،سپارښتنه مې ورته نه رسي او حوض ته مې راتلاى نشي . ( الکافي ٦/ ٤٠٠)

ðپه قيامت کې د څلورو تنو شفاعت کوم : څوک چې تر ما وروسته زما د ځوځات درناوى کوي،چې د هغوى اړتياوې پوره کوي،چې هغوى ته د ورپېښو ستونزو په هوارولوکې هڅې کوي او چې هغوى له زړه اوخولې ښه ګڼي . (بشارةالمصطفى :٣٦)

ðزما شفاعت د امت  د ګناهكارانو په برخه كېږي؛نه د هغوى چې شرك او ظلم يې كړی وي . ( روضة الواعظين  ۲\ ۵۰۱)

ðزما شفاعت د بې انصافه ظالم نه په برخه كېږي .(مستدرك الوسايل ۱۲\۹۹)

 مياشتې

ðڅوک چې د اختر او د پينځلسي پر شپه ويښ وي؛نو زړه به يې پر هغه ورځ نه مري،چې زړونه مړه وي .( وسايل ٧/ ٤٧٨)

ð رجب د خداى مياشت ده،شعبان زما مياشت او رمضان زما د امت مياشت ده. (وسايل ٨/ ٩٨)

ð خيراتونه د شعبان په مياشت کې خپرېږي .(وسايل ١٠/ ٣١٥)

ð څوک چې د شعبان په مياشت کې پر خداى د ايمان او الهي اجر له امله روژه ونيسي؛نو بښل کېږي . ( وسايل ١٠/ ٤٧٨)

ð د شعبان په هره پنجشنبه کې اسمانونه ښکلي کېږي؛نو پرښتې وايي: خدايه! نننى روژه تي وبښه او دعا يې قبوله کړه،څوک چې په دې مياشت کې يوه ورځ روژه شي،پاک خداى يې بدن پر اور حراموي . (وسايل ١٠/ ٤٩٣)

ð شعبان زما مياشت او رمضان د خداى مياشت ده؛نو څوک چې زما په مياشت کې روژه ونيسي،د قيامت پرورځ به يې سپارښتګر يم او څوک چې د خداى په مياشت کې روژه ونيسي،خداى تعالى يې د قبر په هيبت کې مل او ملګرى کېږي .( وسايل ١٠/ ٥٠٦)

 

وينځل

ð څوک چې تر خوړو وړاندې وروسته لاسونه ووينځي؛نو ژوند به يې هوسا او بدن به يې له ناروغۍ خوندي وي . (مفتاح الفلاح ١٧٢)

 

شريک او برخوال

ð که په ختيځ کې څوک ووژل شي او په لويديځ کې يې څوک پر وژنې خوښ وي؛نو د قاتل په څېر دى او د وينې په تويولو کې يې برخوال دى . (بحارالانوار ١٠١/ ٣٨٤)

ð څوک چې د کوم ښه چار لپاره د چا سپارښت وکړي يا پر نېکيو امر او له بديو منع وکړي،يا د کوم ښه چار لپاره چا ته لار وښيي؛نو پکې برخوال دى او څوک چې د ناوړه کار د کولو حکم يا وړانديز وکړي؛نو پکې برخوال دى . (مستطرفات السرائر: ٦٤٣ )

ð لکه شريکباڼى،چې يو له بل سره حساب کوي او آمر،چې تر لاس لاندې سره محاسبه کوي؛نو بنده چې تر دې سخته له ځان سره محاسبه وکړي؛نو هله به مؤمن شي . (محاسبه النفس ١٣ مخ)

 

شرک

 ð د مشرکانو عبادتځايونو ته د هغوى د اختر په ورځو کې مه ورځئ؛ ځکه الهي قهر پرې  نازلېږي . (الجعفريات : ٨٢ )

 ð خداى (د حجاز) جزيره له شرکه پاکه کړه؛خو چې طالع ليدل او پال نيونه يې خلک بې لارې نه کړي .(بحار ٥٥/ ٢٧٧)

 ð زه مې د امت د ګناهګارانو سپارښت کوم؛خو چې شرک او تېرى يې نه وي کړى . (الخصال ٢/ ٣٥٥)

ð چاچې شرک نه وي کړى او ومري؛نو که ښه وي يا بد،جنت ته ځي. (التوحيد ١٩ )

 ð پر تاسې له وړوکي شرکه ډېر ډارېږم . ورته وويل شو: دا څه دي؟ آنحضرت وويل: ريا او ځانښوونه .(د نهج البلاغې شرح ٢/ ١٧٩ )

ðڅلور تنه دي،چې خپلې کړنې بايد له سره ونيسي (مخکېني ګناهونه يې بښل شوي دي): ناروغ،چې روغ شي . مشرک،چې مسلمان شي او حاجي ،چې حج وکړي . (مستدرک الوسايل ٢/ ٦١)

ðڅوک چې خپل لمونځ دومره اوږدوي،چې خلک ورته وګوري،چې څومره اوږ د لمونځ کوي؛نو دا “خفي شرک” دى.   ( ابن ماجه )

ðپه قيامت کې به غږ وشي : چاچې د خداى لپاره څه کړي؛خو بل يې (هم) ورسره شريک کړى؛نو ثواب دې يې له هماغه واخلي؛ځکه خداى د ټولو شريکانو له ګډونه غني اومړه خوا دى .)) ( مسند احمد)

 

شرافت

ð له دينوالو سره ناسته ولاړه،د دنيا او آخرت د شرافت لامل ده . (الکافي ١/ ٣٩ )

ð جبرئيل راته وويل : محمده! څنګه چې غواړې،ژوند وکړه؛خو په پاى کې مرې . څه چې غواړې مينه ورسره ولره،چې هغه به (هم) له لاسه ورکړې . څه چې غواړې ويې کړه (؛خو پوه شه،چې له خداى سره) به دې ليده کاته وشي . د مؤمن  شرف د شپې لمونځ دى او عزت يې د خلکو له ابرو تويولو ډډه کول دي .  (بحارالانوار ٨٤/ ١٤١)

  ð بې تواضع شرافت،بې پرهېزګارۍ کرامت او عزت او بې نيته عمل ګټور نه دي . (وسايل ١/ ٤٨)

ð د انسان شرافت او ارزښت په دين او مړانې کې يې دى . (الکافي ٨/ ٧٩)

 

شراب

ð څوک چې پر هغه دسترخوان کېني،چې شراب پرې اېښي وي؛نو ملعون دى . ( المحاسن ٢/ ٥٨٥)

ð څوک چې پر خداى او اخرت ايمان لري،نه ښايي پر هغه دسترخوان کېني،چې شراب پرې اېښي وي . (الخصال ١/ ١٦٣)

ð په واقع کې شراب د ټولو ګناهونو ريښه ده . ( الکافي ٦/ ٤٠٢)

ð د شرابخور پوښتنه نه بويه،په جنازه کې يې ګډون نه بويه،شاهدي يې نه بويه او چې مرکه وکړي،واده ورسره مه بويه او نه بويه،چې څه ورسره امانت کېښوول شي. (الکافي ٦/ ٣٩٦)

 ð څوک چې تل شراب خوري،په قيامت کې د بوتنمانځي په څېر د خداى حضور ته ورځي . (الکافي ٦/ ٤٠٤ )

ð خداى درې تنو ته د رحمت په نظر نه ګوري : منت اېښوونکى،مور و پلار چې عاق کړى وى او شرابخور.(مستدرک الوسايل ١١/ ٣٦٩ )

ð شراب څښل د روزۍ مخه نيسي.( ١٢/ ٣٣٤)

ð په يوه زړه کې شراب او ايمان (دواړه) نه ځايېږي . (بحارالانوار٧٦/ ١٥٢)

ðهره نېشه ييز (څيز) حرام دى؛نو د څه چې زيات نېشه ييز وي،لږ يې هم حرام دي . (الکافي6/408)

ðخداى لعنت کړي :شراب،شراب ساز، د شرابو ساتونکي، ساقي، شرابخور او   شرابو لېږدوونکى او هغه چې شراب ورته وړي . (مستدرک الوسايل  ١٧\٧٥)

ðپېغمبر اکرم د شراب په جوړولو کې دغه لعنت کړي دي : ((د انګورو بڼوال (باغوان)،د شرابو جوړونکي،وړونکي، پلورونکي، پېرونکي ، سوادګر، منځګړي، شراب ورکوونکي او شرابخور . (وسايل ١٢ \٦٥)

 

شرابخور

ðد شرابوعملي که د نشې په حال کې ومري؛نو له خداى سره به د بوت نمانځي او مشرک په څېر وويني . ( مسند احمد)

 

مړانه او شجاعت

ð ظلم د مړانې آفت دى .(الخصال ٢/ ٤١٦ )

 ð ښه مېړنى هغه دى،چې پر خپلو ځاني غوښتنو برلاسى وي . ( من لا يحضره الفقيه ٤/ ٣٩٤ )

ð موږ اهلبيتو ته اوه ځانګړنې ډالۍ شوي دي،چې تر موږ وړاندې وروسته (دا ټولې يوځاى) چا ته نه دي ورکړل شوي: ګهيځ پاڅېدل، فصاحت،ستريا،مړانه،پوهه ،( له پوهې سره) عمل، له خپلې مېرمنې سره مينه . (بحارالانوار٦٦/ ٤٠٣ )

 

بيړه

ð په حقيقت کې خلک خو بيړې پوپنا کړل او که (د چارو په کولو او هوډ نېونه کې) يې درنګ کولاى؛نو هېڅوک نه پوپنا کېده.( المحاسن ١/ ٢١٥ )

ðحوصله او ارامي د خداى او بيړه د شيطان ده . (مشکاه الانوار: ٣٣٤)

ð په حقيقت کې ښې چارې،چې په بيړه وشي؛نو د خدای خوښېږي. (الکافي ٢/ ١٤٢ )

 ð له خلکو سره په چلن کې له بيړې ډده وکړئ،ښايي هغه مؤمن وي او پوه نشئ . حوصله او نرمي وکړئ او (پوه شئ)،چې بيړه کول د شيطان يوه وسله ده او د خداى نرمي او حوصله ډېره ښه ايسي . (علل الشرايع ٢/ ٥٢٣)

 

ورته والى = يو شان والى

ð ښځې چې ځان نارينه و ته ورته کوي او نارينه يې ښځو ته ورته کوي؛نو خداى پرې لعنت وايي . ( الکافي ٥/ ٥٥٢)

 ð څوک چې د پېغمبرانو په څېر ژوند غواړي او مړينه يې د شهيدانو په څېر وي او د رحمان خداى په پيدا کړي باغ کې مېشت شي؛نو بايد علي خپل امام وبولي او له دوستانو سره يې دوست وي او په هغو امامانو پسې ولاړ شي؛ځکه هغوى زما ځوځات او کورنۍ ده او زما له خټې پيدا شوي دي . خدايه! زما پوهېدنې او پوهه يې روزي کړه! زما د امت پر هغوى دې افسوس وي،چې ورسره مخالفت وکړي،خدايه زما سپارښت يې مه په برخه کوه . (الکافي ١/ ٢٠٨ )

 

شبهات

  ð څوک چې په شبهاتو کې له ورننووتو ډډه وکړي؛نو خپل دين يې ژغورلى دى .  (بحارالانوار ٢/ ٢٥٩ )

 ð ابوذره!په واقع کې پرهېزګاران هغوى دي،چې له هغو څيزونو ډډه کوي،چې ډارېږي شبهې ته به پکې ننوځي . (مستدرک الوسايل ١٧/ ٣٢٣)

 ðحلال او حرام څرګند شوي دي او شبهات يې په منځ کې دي؛نو چا چې شبهات پرېښوول؛نو ځان به يې پر حرامو له اخته کېدو کولو ساتلى وي او څوک چې پر شبهاتو لګيا شي، په پاى کې به پوه نشي؛خو حرام به يې کړي وي . (الکافي ١/ ٦٧)

ð دخداى لاندې څيزونه خوښېږي :د شهوتونو په رادننه کېدو کې تېزې سترګې. د شبهاتو په راکېووتو کې پوره عقل . سخاوت که څه هم د څو کجورو ورکړه وي او مړانه که څه هم د يو مار وژل وي . (بحارالانوار ٦١/ ٢٦٩ )

 

شاهدي ورکول

ð څوک چې د قاضي پر وړاندې په دروغو شاهدي ورکوي؛نو شاهدي يې لا پاى ته نه وي رسېدلې،چې په دوزخ کې ورته هستوګنځى چمتو شوى وي او همداراز د هغه هم،چې شاهد وي؛خو شاهدي پټوي . ( الکافي ٧/ ٣٨٣ )

ð دروغجن شاهد د بې لارو او ناوړو په ليکه کې دى . (دمائم الاسلام ٢/ ٥٠٨)

 ð د هغه ګدا شاهدي نه منل کېږي،چې په ډاګه ګدايي کوي . ( تهذيب الاحکام  ٦/ ٢٤٣)

 

د ماښام خواړه

ðد ماښام د ډوډۍ خوراک مه پرېږدئ، که څه هم د لږې کجورې هومره وي، په يقين وېرېږم، چې امت مې د ماښامنۍ په پرېښوولو (ژر) زوړ شي؛ځکه ماښامنۍ زوړ او ځوان ته قوت وربښي. (وسايل ٢٤/ ٣٣٠ )

 ðڅوک چې دوې شپې سر پر سر ماښامنۍ و نه خوري؛نو بدن يې کمزورى کېږي،چې تر څلوېښتو ورځو پورې يې بېرته پوره کولاى نه شي.( بحارالانوار ٦٣/ ٣٤٥)

 

خوشحالول

 ð د مؤمنانو خوشحالول،د خداى ډېر ښه ايسي . ( الکافي ٢/ ١٨٩)

ðڅوک چې غواړي له ما سره يو ځاى شي او په قيامت کې يې زما شفاعت په برخه شي؛نو زما پر اهلبيتو دې صلوات ووايي او هغوى دې خوشحاله کړي .( وسايل ٧/ ٢٠٣)

ð بنده چې کومه کورنۍ خوشحاله کړي؛نو خداى له دې خوشحالۍ يو مخلوق راپنځوي،چې که دا بنده د قيامت پر ورځ له څه ستونزې يا عذاب سره مخ شي؛ورته مخې ته راځي او وايي :”ولي الله” مه ډارېږه؛ نو بنده دې مخلوق ته وايي : خداى دې درباندې ولورېږي؛که دنيا راسره واى؛نو له تا ځار وه؟هغه ورته وايي : زه د هماغه پلاني کورنۍ خوشحالي يم . (ثواب الاعمال ١٤٩)

ð مسلمان ورور ته روژه ماتى ورکړه او خوشحالول يې تر (ثوابي) روژې درته ستر دى . (الجعفريات ٦٠ مخ )

ð د مسلمان ورور خوشحالول د بښنې لامل دى .( کشف الغمه ١/ ٥٥٢)

 

خوړل

ð په مړه خېټه خوړل د (پيس)برګي ناروغۍ رامنځ ته کوي . ( الامالي للصدوق ٧٤٣)

ð لوږه د رڼا حکمت دى او مړښت له خدايه د لرېوالي لامل دى . (بحارالانوار ٦٣/ ٣٣١)

 ð د مکې د سيمې هومره سره راکړل شول؛خو پالونکي ته مې وويل: دومره نه غواړم؛بلکې غواړم يوه ورځ موړ او بله وږى وسم؛که موړ  وم، تا به ستايم او شکر به دې باسم او که وږې وم  دعا به کوم او تا به يادوم . (الکافي ٨/ ١٣١)

 

د مؤمن خوشحالول

ðڅوک چې مؤمن خوشحاله کړي؛نو زه به يې خوشحاله کړى يم او چاچې زه خوشحاله کړم؛نو خداى يې خوشحاله کړى دى . (سفينة البحار ٢ / ٧٣١)

ðخداى ته تر ټولو غوره چار د مؤمنانو خوشحالول دي .(اصول کافي :٣ټوک – باب ادخال السرورعلى المؤمنين : ١ او٤ حديث )

ðڅوک چې د خپل مؤمن ورور د دنيا له سختيو يوه سختي لرې کړي ؛ نو خداى به يې د آخرت له سختيو يوه سختي لرې کړي . (اثنى عشريه : ١١ مخ )

ðخداى ته ډېرې غوره کړنې دا دي : ١) مؤمن خوشحاله کړې . ٢) لوږه ترې لرې کړې . ٣) له غمونو يې وژغورې .  (اصول کافي : ٣ ټوک، باب ادخال السرور،  ١١  حديث )

ðتر لمانځه وروسته ډېر غوره عمل د مؤمنانو خوشحالول دي . (سفينة البحار: ١ټوک ،٦١٤ او٣٥٢ مخونه  )

ðبنده هغه مهال خداى ته ډېر نږدې وي،چې مؤمن بنده يې خوشحاله کړي . (سفينة البحار: ١ټوک ٦١٤او٣٥٢ مخونه)

 

سخت زړي

ð د چاچې سخت زړي ښه نه ايسي؛نو پر پلار مړي دې ولورېږي،چې د خداى په حکم يې زړه يې نرم شي؛ځکه پلار مړى د حقوقو خاوند دى. (من لا يحضره الفقيه ١/ ١٨٨)

ð د ډېرخور بدن ناروغېږي او زړه يې سختېږي .( الدعوات  ٧٦ مخ)

ð خواړه مو د خدای په ياد،دعا او صلوات پای ته رسوئ او ورپسې (سملاسي) مه څملئ،چې زوړنه مو سختوي .(الدعوات :76 مخ)

ð سخت زړى له خدايه ډېر لرې وي .( الامالي للطوسي ٣ مخ)

ð د بدمرغيو له نښو دي : (له ژړا) د سترګو وچوالى،د زړه سختي،د دنيا د راټولو سخت حرص او پر ګناه کولو ټينګار.( الکافي ٢/ ٢٩٠)

ð تاسې پر (مړيو) خپلوانو له خاورو اچولو منع کوم؛ځکه د سخت زړۍ لاملېږي او څوک چې سخت زړى شي له پالونکي لرې کېږي .(علل الشرايع ١/ ٣٠٤)

 

نښې

ð د يوه اوږده حديث په ترڅ کې راغلي چې : مسيحي مشهور راهب “شمعون بن لاوي” [چې نيکه يې د حضرت عيسى عليه السلام له حواريونو و] رسول اکرم ته راغى او پوښتنې يې وکړې،چې ځينې يې دا دي : د اسلام نښې راته ووايه . ورته يې وويل:ايمان،علم او عمل . ويې ويل : د ايمان، علم  او عمل نښې راته ووايه . ورته يې وويل: ايمان څلور نښې لري : د “الله تعالى” پر “توحيد” اقرار کول،له زړه يې پر خداى، کتابو او استازيو ګروهه درلودل . علم هم څلور نښې لري : پر خداى علم،د خداى د دوستانو پېژندل،پر الهي فرايضو پوهېدنه  او پرې څارنه،چې سم تر سره شي او له لاسه  و نه وځي. عمل دا دى: لمونځ،روژه،زکات او اخلاص (،چې دا په زړه پورې اړه لري)او همدا راز ويې پوښتل : د رښتين نښې راته ووايه . ويې ويل : څلور نښې لري چې دا  دي : چې د واقعيت له مخې خبرې  وکړي،د خداى زېرى او ژمنې تاييد او تصديق کړي،ژمنه پوره کړي او تړون مات نه کړي . د مؤمن نښې راته ووايه . ويې ويل : مهرباني،پوهېدنه او حيا. د زغم نښې راته ووايه.ويې ويل: په نادودو کې صبر کول، ښو چارو ته هوډ کول،عاجزي او حوصله.د توبه ګار نښې راته ووايه. ويې ويل: بې له ټګۍ برګۍ د خداى لپاره کار کول،باطلو ته شا کول،له حقه لاس نه اخستل او خير ته حرص کول . د منندوى نښې راته ووايه . و يې ويل :  پر نعمت شکر اېستل، پر کړاو صبر،پر قسمت قناعت،د غير الله درناوى نه کول . د خاشع نښې راته ووايه . ويې ويل : په پټه او ښکاره د الهي لارښوونو لاروي او څارنه،د ښو چارو کول،د قيامت په باب فکر کول او له خداى سره مناجات . د صالح نښې راته ووايه. ويې ويل: خپل زړه دې نږه کړي،خپل کړه او کسب دې سم کړي او ټولې چارې دې سمې روغې رمټې کړي. د ناصح نښې راته ووايه . ويې ويل :  په حق پرېکړه وکړي،د خلکو حق دې ورکړي،بې له دې،چې څه ترې وغواړي،څه چې ځان ته غواړي،هماغه نورو ته هم وغواړي او پر هېچا تېرى ونه کړي . د باوري خلکو نښې راته ووايه . ويې ويل : د خداى پر شتون باور وکړي او ايمان پرې راوړي،يقين وکړي،چې مرګ حق دى او ترې وډار شي،يقين وکړي،چې د قيامت ورځ حق ده او د هغې ورځې له رسوا کېدو وډار شي. يقين ولري،چې جنت حق دى او شوق ورسره ولري، يقين ولري،چې دوزخ حق دى او په ښکاره ترې دژغورنې لپاره هڅه وکړي،يقين وکړي چې حساب حق دى او له ځان سره محاسبه وکړي. د مخلص نښې راته ووايه . ويې ويل: (د شرک،کفر او کينې له چټليو) د زړه روغ رمټ ساتل، د غړيو روغ رمټ ساتل(چې څوک نه ځوروي او ګناه پرېږدي) خير رسول او د شر نه رسول . د زاهد نښې راته ووايه . ويې ويل: حرامو ته نه لېوالتيا،(له شهوتونو) ډډه کول،د فرايضو ترسره کول،که تر لاس لاندې وي،د  اطاعت او لاروۍ ښه دود وپېژني او که برلاس وي؛نو تر لاس لاندې خلکو سره د چال چلن پر دود پوه وي او تعصب ونه لري،په زړه کې يې کينه نه وي ،که څه  هم چا ورسره بد کړي وي؛نو دى ورسره نېکي وکړي،سره له دې،چې زيان يې وررسولى وي،دى ورته ګټه ورسوي،له ظالم تېر شي او د خداى د حق لپاره تواضع وکړي . د نېک انسان نښې راته ووايه . ويې ويل : د خداى په لار کې دوستي،د خداى په لار کې دښمني،د خداى لپاره ملګرتوب،د خداى لپاره بېلتون،د خداى لپاره غوسه،د خدای لپاره خوشحالي،د خداى لپاره کړنه،خداى ته لېوالتيا او د خداى لپاره ډار،پاکي،اخلاص،حيا څارنه او احسان کول . د پرهېزګار نښې راته ووايه . ويې ويل : له خدايه وډار شي او له عذابه ځان وژغوي،داسې ماښام سهار کړي؛لکه چې هغه يې ويني،دنيا مهمه ونه ګڼي او د ښه خوى له امله دنيا ستره ونه بولي. د متکلف نښې راته ووايه . ويې ويل : په چټي چارو کې شخړه نه کول،تر ځان لوړ سره جګړه ماري نه کول،څه ته چې رسېداى نشي، ورته تمه نه درلودل . د ظالم نښې راته ووايه . ويې ويل : تر لاس لاندې په زور وځوروي،د حق دښمن او په څرګنده تېرى او (له ظالمانو سره مرسته) کوي . د ريا کار نښې راته ووايه . ويې ويل : د خلکو په مخ کې په خدايي کار کې حرص کول؛خو چې ځان ته شي؛نو ناغېړي کوي،دا يې ښه ايسي،چې خلک يې ټولې چارې وستايي او د خپلې نېکنامۍ لپاره هڅه کوي . د منافق نښې راته ووايه . ويې ويل : باطن يې ناکاره وي،ژبه يې له زړه سره، وينا يې له کړنې سره او دننه يې له برسېره سره اړخ نه لګوي. د کينه کښ نښې راته ووايه . ويې ويل : غيبت،غوړه مالي او په مصيبت کې شماتت . د اسرافکار نښې راته ووايه. ويې ويل: په باطلو وياړي،د هغه څه خوړل (او لګول)، چې په لاس کې يې نه وي. د هغه څه اخستل او خوړل،چې له شان سره يې مناسب نه وي . دغافل نښې راته ووايه. و يې ويل: د زړه ړوندوالى،تېروتنه،لوبې او هېره يې نښـې دي . د لټ نښې راته ووايه . ويې ويل : د لنډون تر پولې په چارو کې لټي کول،د کار د خرابۍ او پوپنا کېدو تر پولې لنډون،د ګناه له پولې اوښتل (او د فرايضو پرېښوول) او ستړيا . د دروغجن نښې راته ووايه. ويې ويل: په خپله رښتيا نه وايي،نور رښتين نه ګڼي،چغلي کوي (خبر وړي راوړي) او تورونه تپي. د فاسق نښې راته ووايه . و يې ويل : لوبې  کول،چټي چارې کول،دښمني کول او تور لګول .د خاين (او بې عدالته) نښې راته ووايه . و يې ويل : له خدايه سرغړاندي،د ګاونډي ځورونه،له نږدې خلکو سره کينه درلودل او سرغړاندۍ ته لېوالتيا.( د جنتي ژباړه ،تحف العقول ٢١ مخ.)

 

د فيزيولوژيکي انګېزو په اړه احاديث

ð بنيادم يوازې په درې څيزونو کې حق لري : ( ١)کور،چې پکې و اوسېږي . ( ٢) جامې،چې وا يې غوندي . ( ٣) اوبه او ډودۍ . ( شيباني ٤/ ١٤٢)

ð مسلمانان په دريو څيزونو کې برخوال دي :” اوبه ، واښه، اور” . (ابوداود،کتاب البيوع ٤٧٧ ٣ ګڼه حديث)

ð که څوک موږ ته کار کوي؛نو ښځه دې وکړي،که خادم نه لري، خدمتګار دې ونيسي،که کور نه لري،جوړ دې يې کړي . (ابوداود،کتاب الخراج والادراه ٢٩٤٩ ح)

ð که ناروغ مو څه ته اشتها درلوده؛نو وريې کړئ . (ابن ماجه لومړى ټوک، ١٤٣٩ حديث)

ð تر اودسماتي وروسته دعا: د خداى شکر دى، چې دا رنځ يې رانه لرې کړ او ارام يې کړم . ( ابن ماجه لومړى ټوک، ٣٠١ حديث)

ð که له تاسې هر يو خپله ورځ په ډاډه زړه او روغه سټه او ورځنيو خوړو پيل کړئ(؛نو)داسې ده،چې لکه ټوله دنيا ورکړ شوې وي .( ترمذي، کتاب الزهد ٩ / ٢٠٨ )

ð بنيادم تر خپلې ګېډې بدتر لوښى نه دى ډک کړى، بنيادم ته همدومره خواړه بس دي، چې ملا يې پرې سمه شي (انرژي واخلي) او که خوله يې و نه نيواى شوه ؛نو د معدې له څلورو برخو دې درې برخې خوړو اوبو او سا اېستو ته پرېږدى . (او يوه برخه دې مړوي.)  (ترمذي  ٢/ ٢٢٤)

 

د بشري نوعي د پايښت په اړه احاديث

ð واده کول زما له سنتو دي؛نو څوک چې زما پر سنتو عمل و نه کړي، له ما ځنې نه دى.واده وکړئ؛ځکه زه پر امتونو ستاسې پر ډېرښت وياړم،د چاچې له وسې پوره وي؛ واده دې وکړي او چې بېوسى وي روژه دې ونيسي؛ځکه روژه د شهوت مخه نيسي . ( ابن ماجه لومړى ټوک ١٨٤٦ حديث)

ð له مهربانې او زېږندونکې ښځې سره واده وکړئ؛ځکه زه پر ملتونو ستاسې پر ډېرښت وياړم . ( ابو داود ٢ټ / ٢٠٥٠ ح)

ð له تاسې چې هر يو کوروالى کوئ؛نو صدقه ده.( مسلم ٧/ ٩١ او ٩٢ مخونه)

ð له حضرت “جابر بن عبدالله” روايت دى،چې : پېغمبر اکرم تر ګوتو وهلو او ملاعبې مخکې کوروالى منع کړى دى . ( ابن قيم الجوزيه: الطب السبوي ٢٣٤ مخ)

ð د پېغمبر اکرم په يوه ځاى کې دمه شوه،يو صحابي کونج ته ولاړ او د يو مارغه هګۍ يې راوړه. مارغه د پېغمبراکرم او اصحابو پر سر په الوتو شو. آنحضرت ويل : تاسې کوم يو دا مارغه ځورولى دى؟ يوه ويل : ما يې هګۍ راوړې . آنحضرت ورته وويل: بېرته يې يوسه او په بل روايت کې راغلي،چې پرې ولورېږه او هګۍ يې بېرته يوسه . (احمد ١/ ٤٠٤ )

 

مور

ð يو سړي د خپلې مور د بدخويۍ په اړه پېغمبر اکرم ته شکايت وکړ؛ خو په ځواب کې يې ورته وويل : چې نهه مياشتې يې پر ګېده وې؛نو بدخويه نه وه! سړي وويل : هغه بدخويه ده. آنحضرت ورته وويل: او چې دوه کاله شيدې يې درکړې؛نو داسې نه وه! سړي وويل: هغه بدخويه ده. هغه وخت چې ستا لپاره د شپې نه ويدېده او د ورځې يې تنده تېروله؛نو داسې نه وه . سړي وويل : بدله مې يې ور پوره کړه. پېغمبر اکرم وويل : څه دې ورته ورکړل؟ويې ويل: پر شا مې حج ته بوتله. ورته يې وويل:ان د لنګوال د يو درد بدله دې هم نه ده ورکړې . ( زمخشري،کشاف تفسير: ٢/ ٤٤٥)

ðمور ته دې پام وسه! مورته دې پام اوسه! مورته دې پام اوسه! بيا دې پلار ته او ورپسې څوک چې درته نږدې وي .(نهج الفصاحه : ١٠٩ مخ)

 

د اروايي او روحي انګېزو په اړه احاديث

ðهر زوکړي پر “فطرت” زېږوي او دا مور و پلار يې دي،چې هغه يهودي، مسيحي او مجوسي کوي؛لکه څنګه چې څاروي،پوره څاروي زيږوي،ايا پکې نيم پوزې ګورئ؟ حضرت ابوهريره وويل : که غواړئ، ويې لولئ: فطرة الله التى فطر الناس عليها .

(بخاري – مسلم، ابوداود او ترمذي (شيخ منصورعلي ناصف، التاج الجامع  في احاديث الرسول ٥ / ١٩٦)

ð هر انسان په فطرت زېږي،تر هغه چې خولى يې پرې وازېږي؛نو په دې وخت کې يې مورو پلار يهودي او نصراني کوي . (احمد ٣/ ٤٣٥ )

ð له حضرت “حذيفه بن يمان” روايت دى،چې پېغمبر اکرم موږ ته دوه حديثونه وويل،چې د يو عملي کول مو وليدل او د بل عملي کېدو ته سترګې پر لار يو. موږ ته يې وويل : امانت د خلکو د زړونو په تل کې کېناست بيا قرآن نازل شو او له قرآنه يې زده کړل او له سنتو يې زده کړل . (بخاري – مسلم  او نووي: ١/ ٢٢٢)

ð پالونکي مې راته امر وکړ،نن يې چې راته څه وښوول،تاسې ته يې(هم) دروښيم، چې نه پوهېږئ:”بنده ته مې،چې څه شتمني بښلې (ورته) حلاله ده او ما خپل ټول بندګان حنيف (مؤحد او پر دين ولاړ)  پيدا کړي دي؛خو شيطانان ورته ورغلل او له خپل دينه يې بې لارې کړل او څه چې مې ورته رواکړي ول،پرې يې حرام کړل او ورته يې وويل داسې څه د خداى سيالان کړئ،چې په اړه يې ما کوم دليل نه دى نازل کړى .) (مسلم  او شيباني ٤/ ٣٢)

 

د سيالۍ د انګېزې په اړه

ð زه تر تاسې مخکې ځم او زه درباندې ګواه يم،پر خدای قسم،چې همدا اوس خپل (د کوثر) حوض وينم،د ځمکې د زېرمو کونجيانې راکړل شوې . پر خداى قسم،ستاسې په باب مې له دې وېره نه ده، چې تر ما وروسته به مشرکان شئ؛بلکې له دې مې وېره ده، چې د دنيا په اړه به په سيالۍ کې اخته شئ .( بخاري او مسلم ( شيباني ٤ / ١٨٣)

ð پر خدای قسم،زه پر تاسې له فقره نه ډارېږم؛بلکې له دې ډارېږم،چې دنيا درباندې پراخه شي؛لکه چې پر ړومبنيو مو پراخه شوې وه او د هغوى په څېر پکې په سيالۍ اخته شئ او د هغوى په څېر مو پوپنا کړي.  (بخاري،کتاب، فرض الخمس باب الجزية والموادعة)

ð يوازې په دوو څيزونو کې سيالي وکړئ : چا ته چې خداى قرآن وربښلى وي او شپه و ورځ پرې لګيا وي، لارښوونې يې عملي کوي؛نو يو څوک ووايي،چې کاشکې د پلاني په څېر ما ته هم راکړل شوي واى، چې د هغه په څېر مې عمل کولاى او بل هغه چې خداى ورته شتمني ورکړي وي او انفاق او صدقه ترې ورکوي؛نو يو بل ووايي چې: کاشکې د هغه په څېر ماته هم راکړ شوې واى،چې ما هم صدقه ورکولاى . ( د امام احمد حنبل مسند ٤/ ١٠٥ )

ð له حضرت “عبدالله بن عمر” نه روايت دى چې:پېغمبر به اس د سيالۍ لپاره چمتو کاوه . ( بخاري، مسلم، ابوداود،ترمذي، نسايي شيباني ٢/ ١٦٣ )

 

د مالکيت انګېزه

ð که بنيادم د سرو دوه سيندونه درلوداى بيا يې هم ښه اېسېدل،چې درېم هم ولري،يوازې خاوره ده،چې بنيادم مړولاى شي(او بس) او خداى د توبه ګار توبه قبلوي . (ترمذي، ابواب الزهد ٩/ ٢٠٥ )

ð زوړ زړه له دوو څيزونو سره په مينه کې ځوان وي : اوږد ژوند او ډېره شتمني .( پورته منبع )

 

د انګېزې او عاطفې تر منځ اړيکه

ð خدايه! له لوږې پناه دروړم؛ځکه ناړه ملګرې ده . (ابوداود، نووي ، ٢/ ١٠١٣ مخ)

ð خداى تعالى وايي : روژه زما لپاره ده او زه يې په خپله بدله ورکوم، روژه تي ته دوه خوشحالۍ دي،يو د روژه ماتي پر وخت او بل له خپل پالونکي سره د ليدو پر مهال . (نسايي ٤/ ١٥٩ )

ðمسلمان ورور ته روژه ماتى ورکول او زړه يې خوښول تر (ثوابي ) روژې نيولو ورته ډېرثواب لري .(الجعفريات : ٦٠مخ)

 

د انګېزو تر منځ  شخړه

ð زما مثال د هغه سړي په څېر دى،چې اور بل کړي او همداچې شاو خوا يې رڼا شي؛نو پتنګان او حشرات پکې ځانونه غورځوي،دى يې شړي؛خو هغوى بيا هم ځان اور ته غورځوي،دا دى زما او ستاسې مثال. زه تاسې د ملا له بنده نيسم او له اوره مو لرې کوم او وايم : پام! پام،چې اور دى!؛ خو تاسې مې ټېل وهئ او ځانونه پکې اچوئ .(مسلم ١٥/ ٤٩ )

ð هغه ځيرک دى،چې خپل نفس کابو کړي او تر مرګ وروسته  نړۍ ته کار وکړي او هغه بېوسه دى،چې خپل نفس د خپلو هوسونو او غوښتنو تابع کړي او له خدايه هيلې غواړي .( ترمذي،احمد او ابن ماجه (شيباني ٤/ ١٨٤ )

ð دنيا ښه او خوږه ده او تاسې پکې د خداى ځايناستي ياست،چې وويني،څرنګه چلن کوئ؛نو له دنيا او ښځو ډډه وکړئ؛ځکه د بني اسرائيلو لومړۍ فتنه (او ازمېښت) له ښځو وه. مسلم،نووي ١/ ١٠٣، ١٠٤ )

ð زما تر مړينې ورسته ښځې نارينه و ته ډېره زيانمنه فتنه ده . بخاري، مسلم ( نووي ١/ ٢٩٠)

ð پر تاسې له دې څيزونو ډېر ډارېږم : شهوت، پيسې، ګېډه، عورت او بې لارې کوونکې فتنې .( شيباني: ٤ / ٣٠٩)

ð له دنيا مې ښځه او عطر خوښېږي او لمونځ مې د سترګو رڼا ده. (نسائي،احمد او حاکم ( ناصف التاج الجامعه ٢ / ٢٧٩)

ð د حضرت عثمان بن مظعون(رض) ښځه په جړو وېښتانو حضرت عايشې بي بي ته راغله . عايشې بي بي ورته وويل: ولې داسې يې؟ ښځې ورته وويل :مېړه مې د ورځې روژه وي او د شپې پر عبادت بوخت وي . پېغمبر اکرم چې راغى(؛نو) عايشې بي بي ورته دا کيسه وکړه : رسول اکرم چې حضرت عثمان وليد، ورته يې وويل : عثمانه! رهابنيت راباندې فرض شوى نه دى؛خو ايا زه درته بېلګه نه يم؟ پر خداى قسم! زه تر تاسې ټولو له خدايه ډېر ډارن يم او تر هر چا يې ډېر پولې او حدود په پام کې نيسم اوعملي کوم . (احمد ٦ / ٢٦٤)

ð درې تنه د پېغمبر اکرم د ښځو کورونو ته ورغلل،چې د پېغمبر د عبادت په اړه وپوښتي؛نو چې خبر شول،هغه يې ډېر لږ وګاڼه؛نو ويې ويل : موږ له پېغمبر سره توپير لرو، د هغه وړاندې وروسته ګناهونه بښل شوي دي،وروسته يې يو وويل :بيا زه ټوله شپه پر لمانځه او عبادت تېروم . بل وويل : زه مدام روژه يم . درېمني يې وويل: زه هم له خپلې ښځې ګوښه کېږم او کله به هم ورسره کوروالى ونه کړم . په دې ترڅ کې پېغمبراکرم راغى او ويې ويل : دا ستاسې خبرې  وې؟ پر خداى قسم  زه تر تاسې ټولو له خدايه ډېر ډارن او پرهېزګار يم؛خو کله روژه يم او کله نه،لمونځ کوم  او د شپې چې ويده کېږم،له ښځو سره کوروالى هم کوم؛نو چاچې زما له سنتو مخ واړاوه؛نو له ما ځنې نه دى . (بخاري،مسلم او نسايي (ناصف ٢ / ٢٧٨)

ð عبدالله! ځينې ورځې روژه نيسه او ځينې ورځې يې خوره، د شپې په يوه برخه کې عبادت کوه او په يوه کې يې ويده کېږه؛ځکه بدن دې هم درباندې حق لري،سترګې دې هم درباندې حق لري او ښځه دې هم درباندې حق لري .( بخاري : ١٩ ټ / ٥١٩٩ ح، مسلم (منذري ٦٢٨ ح)

ð پېغمبر اکرم د دنيا پرېښوول منع کړي دي . (نسايي،کتاب النکاح باب النهي عن التبتل (٦/٥٩)

ð  دين اسان دى او کله هم څوک له دين سره ځان نه اړموي ؛خو دا چې مغلوب شي؛نو منځلاري خپله کړئ او نږدې شئ او خوشحاله وسئ او له ګهيځ ،مازيګر او لږ څه له شپې مرسته وغواړئ . او په بل روايت کې راغلي چې : او نږدې شئ او ګهيځ او مازيګر او لږه شپه( په عبادت کې تېره کړئ)منځلاري،خپله کړئ،چې (موخې ته) ورسئ . (بخاري (نووي ١ / ١٦٨)

امام نووي ( ١/ ١٦٨) ددې حديث په تفسېر کې وايي : د دې حديث مانا داده،چې د خداى عبادت پر داسې مهال وکړئ،چې بدن مو روغ رمټ او طبيعت مو جوړ وي،چې خوند ترې واخلئ او ستړي نشئ؛لکه څنګه چې مسافر په ګهيځ،مازيګر او د شپې په يوې برخه کې لار وهي او نور وخت استراحت کوي،چې بې ستړيا خپلې موخې ته ورسي. د نږدې شئ مانا داده،چې که يو کار پوره نشئ کولاى؛نو ورته خو  نږدې يې کړئ.

 ð پېغمبراکرم جومات ته راننووت،ويې ليدل،چې د دوو تنو تر منځ يوه رسۍ غځول شوې وه. ويې ويل : دا د څه لپاره؟ورته وويل شو،چې دا کار زينب کړى دى،چې کله بې حاله شي؛نو هغه به نيسي . پېغمبر وويل : رسۍ ايله کړئ او لمونځ مو په سم حال او  ښېرازۍ کې وکړئ او چې ستړي شئ؛استراحت وکړئ . (بخاري او مسلم ( نووي ١ / ١٦٩)

 

د انګېزو کابو کول

( الف) د حلالو له لارې کابو کول

خلکو! ستر يوازې الله دى او يوازې پاک قبلوي، ستر خدای مؤمنانو ته هماغه ويلي،چې استازيو ته يې ويلي دي . ويلي يې دي :” استازيو! له پاکو څيزونو وخورئ او نېکې چارې وکړئ” او ويلي يې دي : “مؤمنانو! له پاکو څيزونو مو چې روزي درکړې،وخورئ”.بيا آنحضرت د يوه سړي مثال راوړ،چې اوږده لار يې وهلې،ستړي او په دوړو خيرن لاسونه اسمان ته پورته کوي او پالونکيه! پالونکيه! وايي . حال داچې خواړه، څښاک او اغوستن يې حرام دي او په حرامو موړ شوى دى؛نو ددغسې وګړيو دعا خو نه قبلېږى؟

(“مسلم” او “ترمذي” (شيباني ٢/ ١٣٧ – ١٣٨) “احمد” او “دارمي”.)

ðاو ځينې وګړي په ناحقه د خداى مال ته لاس ورغځوي او د قيامت پر ورځ يې برخه اور دى .( “بخاري” او “ترمذي” (شيباني ٤/ ١٣٨)

ð حلال څرګند دي،حرام هم څرګند دي او د دوى ترمنځ شکمنې چارې دي،چې ډېرى خلک د هغوى (په حلالو او حرامو) نه پوهېږي؛نو څوک چې له شبهاتو ځان وساتي؛خپل دين او پت يې ساتلى دى او څوک چې  په شبهاتو کې ولوېد؛په حرامو کې لوېږي؛لکه د هغه شپانه په څېر،چې (خپله رمه) د پاڼ پر غاړې څروي او نږدې وي،چې ولوېږي . پوه شئ،چې هر پاچا څر ځاى لري او د خداى څر ځاى د هغه حرام دي .(بخاري، مسلم ، ابوداود، “ترمذي” او نسايي (شيباني ٤/ ١٣٨)

ð زنا کار د زنا پر مهال مؤمن نه دى . غل د غلا پر مهال مؤمن نه دى. شرابخور د شراب څښلو پر مهال مؤمن نه دى او د هغه قيمتي څيز لوټونکى د لوټلو پر مهال مؤمن نه دى،چې د خلکو سترګې وراوړي. (بخاري،مسلم،ابوداود، ترمذي،نسايي ( شيباني ٤/ ٣٠٩ – ٣١٠)

(ب ) په منځلارۍ د اړتياوو د پوره کولو دود

ð وخورئ،وڅښئ او واغوندئ؛خو له پولو مه اوړئ (اسراف مه کوئ) او کبرجن مه وسئ.[بخاري ( ناصف ، ٣ / ١٦٣)]

ð د دوو تنو خواړه،درېو ته (او په بل روايت کې څلورو تنو) ته بس دي  او د درېو تنو خواړه څلورو ته بس دي او په بل روايت کې د څلورو تنو خواړه اتو تنو ته بس دي . (شيباني ٢/ ١٣٠)

(ج) د جنسي انګېزې کابو کونه

ðد ځوانانو ټوليه! د هر يو،چې له وسې پوره وي؛نو واده وکړئ؛ځکه واده له حرامو د ژغورنې لامل دى،چې (انسان) پاکلمنى کوي او چې څوک وس نه لري،روژه دې ونيسي؛ځکه روژه شهوت لرې کوي . (بخاري ١٩/ ١٢٩ – احمد ١/ ٤٤٧)

ðپېغمبر اکرم : عکافه! مېرمن دې شته؟ ورته يې وويل : نه . ((وينځه دې شته؟)) ورته يې وويل: نه . ورته يې وويل: شتمني دې شته ؟ ورته يې وويل : هو! پېغمبر وويل : ((نو ته د شيطان له وروڼو يې، که نصراني وې؛ نو د هغوى يو راهب به وې؛خو زما سنت واده دى . په تاسې کې ډېر ناوړه “بې واده” دي او دا ډېر ناوړه،مړى مو (هم) بې واده دی . ايا له شيطان سره لوبې کوئ،ښځې صالحانو ته د شيطان تېرې تورې دي؛خو واده والا له چټليو خوندي دي .”عکافه” افسوس درباندې! “ايوب”،”داوود”،”يوسف” او “کرسف” مېرمنې درلودې ))وپوښتل شو: کرسف څوک  و؟ آنحضرت ورته وويل: (( يو سړى و، چې د سمندر پر غاړې يې درې سوه کاله عبادت کاوه،د ورځې روژه او شپه يې پر لمانځه تېروله بيا پر يوې ښځې مين شو او د خداى عبادت يې پرېښود او پر ستر خداى کافر شو بيا يې خداى له تېرو تېر شو او د هغه توبه يې ومنله .”عکافه”! پر تادې افسوس وي،واده وکړه او که نه له مذبذبانو به يې.( احمد ٥ / ١٦٣ – ١٦٤)

ð که د چا دين او خوى مو ښه ايسېده او (د خور لور) غوښتنې (او مرکې) ته مو راغى؛نو وريې کړئ،که داسې ونه کړئ؛نو پر ځمکه به ګډوډي او فساد خپور شي. (ترمذي٥ / ٣١٥  ابن ماجه ، باب النکاح)

ð د نجلۍ چې مياشتنى (عادت) راغى؛نو سمه نه ده (چې داسې جامې واغوندي،چې) بدن يې ترې معلوم شي؛خو بې له مخ او لاسونو يې . (ابوداود،کتاب اللباس ٤/ ١٤٠٤ حديث)

ðعلي!پرله پسې مه ګوره؛ځکه  لومړى کتل دې حق دي؛ خو دويم ځل نه![ ابوداوود،ترمذي” ( شيباني ٣/ ٤١ – ٤٢) ]

ð که کومه ښځه مو خوښه شوه او په زړه کې مو کېناسته؛نو ولاړ شئ او له خپلې مېرمن سره کوروالى وکړئ ؛ځکه دا چار په زړه کې راپيدا شوى اغېز له منځه وړي . [مسلم،ابوداوود،ترمذي او نسايي ( ناصف ٢/ ٣٣١)]

(د) د غوسې د انګېزې کابو کول

ð يوه مسلمان  ته هم روا نه ده،چې بل مسلمان وډاروي . (شيباني ٤/ ٩١، ناصف ٥/ ١٨ )

ð څوک چې مؤمن ته زيان ورسوي،خداى به هغه ته زيان ورسوي او څوک چې له مؤمن سره دښمني وکړي،خداى به له هغه سره دښمني وکړي . (پورته سرچينه)

ðملعون دى هغه چې مؤمن ته زيان ورسوي يا ورسره چل وکړي .( پورته سرچينه)

ð هغه مسلمان دى،چې مسلمانان يې له لاس او ژبې خوندي وي . ( ناصف ١/ ٢٧)

ð د قيامت پر ورځ د مؤمن په تله کې بې تر ښه خوى بل دروند څيز نشته، د خداى تعالى د سپکو سپورو ويونکى نه خوښېږي. ( شيباني ٤/ ١٧٨  ناصف ٥/ ٦٢)

ð مسلمان د مسلمان ورور دى،خيانت ورسره نه کوي،دروغ ورته نه وايي او يوازې يې نه پرېږدي،پر مسلمان د مسلمان ټول څيزونه حرام دي؛پت او آبرو يې،شتمني يې او وينه يې . تقوا دلته ده، د يو چا بدۍ ته دومره بس دى،چې خپل مسلمان ورور سپک وګڼي.  (نووي١/٢٥٠)

ð مفلس پېژنئ! ورته يې وويل : هغه چې پيسې او شتمني ونه لري. آنحضرت ورته وويل :  هغه مې د امت مفلس دى،چې د قيامت پر ورځ  له  لمونځ،روژې او زکات سره راشي او بلخوا يوه ته يې کنځلې کړې وي، په بل پسې يې تور تړلى وي،د يو يې مال خوړلى وي او د يوه بل يې وينه تويه کړې وي او بل يې وهلى وي؛نو  دوى هر يو ته د هغه نېک کارونه ورکول کېږي او که په اړه يې له پرېکړې کولو وړاندې نېکې چارې پاى ته ورسي؛نو له هغوى ګناهونه را اخستل کېږي او پرده وربارېږي؛نو بيا يې په اور کې غورځوي . (نووي ١/٤١)

ð پوهېږئ،چې غيبت څه ته وايي؟ ورته يې وويل :خداى او پېغمبر يې ښه پوهېږي . آنحضرت ورته وويل : دا چې ورور يې داسې څه ووايي، چې ښه يې نه ايسي . يو وپوښتل : ان که داسې څه (هم) وي،چې په هغه کې وي؟آنحضرت ورته وويل : که څه هم ستا ويلي پکې وي؛نو د هغه دې غيبت کړى او که ستا ويلي پکې نه وي؛نو تور دې ور پورې تړلى دى . ( شيباني ٣/ ٢٤٨)

ðهغوى چې ايمان مو راوړى او ايمان مو د زړه تل ته نه دى رسېدلى،مسلمان مه ازاروئ،مه يې رټئ او عيبونه يې مه راسپړئ؛ ځکه څوک چې د مسلمان ورورعيبونه راوسپړي،خداى تعالى به يې عيبونه راوسپړي او خداى، چې د چا عيبونه راوسپړي؛نو رسوا به يې کړي،که څه هم په خپل کور کې وي .( شيباني ٣/ ٤١)

ðد خبرې وړونکى راوړونکی (چغلګر) جنت ته نشي تلاى . (شيباني ٣/ ٢٤٩  نووي، ٢/ ١٠٥٢)

ðکه دوه مسلمانان د يو بل پر وړاندې توره راوکاږي؛نو قاتل او مقتول دواړه په اور کې دي . آنحضرت وپوښتل شو: قاتل خو سمه ده؛نو مقتول ولې؟ ورته يې وويل : هغه هم هڅه کوله،چې هغه بل ووژني او په بل روايت کې راغلي دي چې : د هغه بل هم نيت و،چې دا بل ووژني. (شيباني ٤/ ٢٨ او ٢٩ )

ð له حضرت”عبدالله بن مسعود”(رض) نه روايت دى،چې پېغمبراکرم ويلي دي : مسلمان ته کنځلې کول فسق او جګړه کول ورسره کفر دى . ( پورته سرچينه )

ð تر ما وروسته کفر ته وا نه وړئ او د يو بل څټونه غوڅ نه کړئ . (شيباني: ٤/ ٢٩)

ð او که د اسمان او ځمکې اوسېدونکي د مؤمن په وينه تويولو کې برخه اخلي؛نو خداى ټول په اور کې غورځوي .( ناصف ٢/ ٤ )

ð د مسلمان تر وژنې خداى ته د دنيا له منځه وړل ډېراسان دي .( پورته سرچينه)

ð د قيامت پر ورځ تر هر څه وړاندې د وينې د مسئالې په اړه پرېکړه کېږي .(پورته سرچينه)

ð له ما سره به په دې شرط بيعت کوئ چې  له خداى سره به شرک نه کوئ،غلا مه کوئ،زنا مه کوئ او کوم نفس،چې خداى حرام کړى وي، په ناحقه مه وژنئ.( شيباني ١/ ٢١)

ð له اوو پوپنا کوونکيو ځان وژغورئ : ( ١) له خدای سره له شرکه (٢) کوډې کول (٣) په ناحقه د حرام کړي هغه نفس وژنه   ( ٤) سود خوړل ( ٥) د يتيم د مال خوړل ( ٦) له جهاده تېښته ( ٧) پر پاکلمنو ښځو تور . (ناصف ٤/ ٩٣)

ð څوک چې “اهل ذمه ووژني”؛نو د جنت بوى به بوى نه کړي. (ابوداود)

(ه)  د ملکيت د انګېزې کابو کول

ðمړښت د ډېرې شتمنۍ په درلودو کې نه؛بلکې (واقعي) مړښت د نفس په غنا کې دى .

ð له ظلم ډډه وکړئ؛ځکه ظلم د قيامت د ورځې تيارې دي. له سختې کنجوسۍ ځان وژغورئ؛ځکه ستاسې ړومبني يې پوپنا کړي دي، هغوى يې اړ کړل،چې د يو بل وينه تويه کړي او د يو بل حرام حلال کړي . ( شيباني ٤/ ٣١٠)

ð بدمرغه هغه دى،چې د پيسو او جامو بنده وي،که دا ورته ورکړل شي؛نو خوښېږي او که ور نه کړل شي؛نو خوشحاله نه وي . ( نووي ١/ ٤١٧)

ð د ډېر جايداد د لاس ته راوړو هڅه مه کوئ،چې دنيا ته لېوالېږئ . (نووي ١/ ٤٢٥)

ð د صدقې ورکول شتمني نه کموي .( نووي ١/ ٤٧٨)

ð خداى تعالى ويلي دي : د آدم اولادې!انفاق وکړه،چې انفاق درسره وشي . ( نووي ١/ ٤٧٤)

ð هره ورځ پر بندګانو دوې پرښتې راکېوځي،يوه يې وايي : خدايه! نفقه ورکوونکي ته بدله ورکړه او بله يې وايي: خدايه ممسک زيانمن کړه . ( ناصف ٢/ ٥٠٤)

 ðمسلمان،چې بربنډ مسلمان په جامو پټ کړي؛نو خدای به شنې جنتي جامې ورواغوندي او هر مسلمان،چې وږی مسلمان موړ کړي؛نو خدای به پرې جنتي مېوې وخوري او هر مسلمان،چې تږى مسلمان خړوب کړي؛نو خدای به پرې جنتي سرپوښ شراب وڅښي.( ناصف ٢/ ٤١ او ٤٢ مخونه)

 

د غريزې بې لاري

ðپر امت مې د “لوط” د قوم له کانې ډېر ډارېږم . (ترمذي،الحدود ٦/ ٢٤١)

ðخداى دې هغه په لعنت کړي،چې  له کوم څاروي سره کوروالى کوي، خداى دې هغه په لعنت کړي،چې د “لوط” د قوم چار ې کوي .( دا يې درې ځل وويله) .(احمد ١/ ٣١٧ –بيهقي٨/ ٢٢٤)

ðڅوک چې له محرمې سره کوروالى وکړي (؛نو) و يې وژنئ.  ( بيهقي: ٨ / ٢٣٧)

ð نارينه چې ځان د ښځو په څېر کوي او ښځې،چې ځان د نارينه وو په څېر کوي؛نو رسول الله پرې لعنت ويلى دى .( نووي٢/ ١١٢١)

 

 

مينه

(الف) له خداى تعالى سره مينه

ð له خداى سره ځکه مينه کوئ،چې پېرزوينې درباندې کوي..،او له ما  سره له دې امله مينه ولرئ،چې له خداى سره يې لرئ او له اهلبيتو سره مې له ما سره د دوستۍ له امله مينه ولرئ .(ترمذي،ابواب المناقب: ١٣/ ٢٠١،ناصف 3/249، شيباني3 / 294)

ð ستا مينه او له هغه سره مينه مې روزي کړه،چې ستا پر وړاندې د مينې وړ وي .(ترمذي، ابواب الدعا: ١٣/ ٢٧)

ðله تا مينه غواړم او هم له هغه سره مينه غواړم،چې له تا سره مينه لري او ( همداراز له هغو کړنو سره مينه،چې ستا له مينې سره مې نږدې کوي.) ( ناصف ١/ ٢٤٧ او ٢٤٩)

ð داود (عليه السلام) پخپلو دعاګانو کې ويل : خدايه! له تا غواړم،چې درسره  مينه ولرم،له هغه سره مينه ولرم،چې له تاسره مينه لري او داسې کړه وړه،چې مينې ته مې در رسوي .

ð خدايه! داسې مې کړې،چې تر ځان، کورنۍ او سړو اوبو راته ګران اوسې . (ترمذي، ابواب الدعاء ١٣/٢٧)

ð د هغه به ايمان پوره شوى وي،چې دوستي هم د خداى لپاره وکړي او دښمني هم د خداى لپاره او نفقه هم د خداى لپاره ورکړي .( ناصف ٥/٧٨)

ð د خداى لپاره دوستي او دښمني کول،ډېر غوره کړه وړه دي . ( ناصف ٥/٧٨)

 

له پېغمبر اکرم سره مينه

له تاسې يو هم ايمان نه لري؛خو داچې زه ورته تر پلاراولاد او ټول خلکو ګران يم . (بخاري ١ / ١١٤  مسلم ٢/ ١٥ )

ð که په چا کې دا درې څيزونه وي؛نو د ايمان خواږه به يې څکلي وي.

( ١) تر هر څه ورته خداى او  پېغمبر يې ډېر ګران وي .

( ٢)  له چا سره مينه يې يوازې د خداى لپاره وي .

( ٣)  لکه چې نه يې خوښېږي په اور کې وغورځول شي (دغسې يې) ښه نه ايسي،چې کفر ته واوړي .( ناصف ٥/ ٧٨)

ð له چا سره،چې زما مينه وى؛نو په جنت کې به راسره وي .( ناصف ١/ ٤٧)

 

له خلکو سره مينه

ð  مؤمن مينه ناک دى او چې داسې نه وي (؛نو) خير پکې نشته. (احمد  ٢ / ٤٠   ٥/ ٣٣٥)

ð له يو څيز سره مينه انسان ړوند و کوڼ کړي .(ناصف ٥ / ٨٤ )

ð پر هغه خداى قسم،چې ساه مې يې په واک کې ده،جنت ته به ولاړ نشئ؛ خو داچې مؤمنان شئ او هله به مؤمنان شئ،چې يو له بل سره  مينه ولرئ،ايا د خپلمنځي مينې د پيدا کولو لاره چاره دروښيم؟پر سلام اچولو مو ترمنځ مينه پيدا کېږي .(شيباني ٢/ ٢٣)

ð خلکو!واورئ،خبر اوسئ او پوه شئ،چې د خداى داسې بندګان هم شته،چې نه پېغمبران دي او نه شهيدان؛خو دوى ته سيالي ورځي،چې څنګه هغوى له خداى سره د نږدې مقام خاوندان دي . يو بېدياني وپوښتل : هغه څوک دي؟ آنحضرت ورته وويل: هغوى چې يو له بل سره د خپلوۍ اړيکې نه لري؛خو د خدای لپاره يو له بل سره مينه او اخلاص لري،خداى هغوى د قيامت پر ورځ د رڼا پر منبرونو کېنوي،څېرې او جامې به يې له رڼاګانو وي،د قيامت پر ورځ،چې خلک ډارېږي،هغوى هيڅ ډار نه لري،هغوى “اوليا الله” (د خداى دوستان) دي،چې نه ډار لري او نه خپګان  . (احمد ٥/ ٣٤٣ )

ð  له هغو اوو ډلو،چې په قيامت کې د خداى (د رحمت) تر سيوري لاندې وي، يوه يې دا هم ده چې : دوه تنه،چې د خداى لپاره يو له بل سره دوستي ولري او پردې دوستۍ يو له بل سره ملګري وي او پر همدې يو بله له بېل شي . (ناصف ١/ ٢٣١ – ٢٣٢ ،نووي ١/ ٥٤٧ او ٦٥٩ مخونه)

ð يو سړى د خپل ورور کتو ته بلې سيمې ته روان شو،خداى ورته په لار کې يوه پرښته کېنوله،سړى چې ورورسېد؛نو پرښتې وپوښت : چېرې ځې؟ سړي وويل : د خپل وررو ليدو ته ځم . پرښتې وپوښت : څه حق دې ورباندې دى،چې ترې اخلې يې ؟سړي وويل : نه بلکې د خداى لپاره مې دوست دى،پرښتې وويل : نو پوه شه،چې زه درته د خداى استازې يم . درته ووايم،چې د خداى لپاره دې ور سره دوستي ده؛نو ته هم د خداى دوست يې.(ناصف ٥ /٨٢)

ð هله به مؤمن شې،چې څه ځان ته خوښوې،خپل ورورته يې هم خوښ کړې.( ناصف ١١/ ٢٦)

ð څه چې ځان ته خوښوې؛نو خلکو ته يې هم خوښ کړه،چې مسلمان شې.( ناصف ٥/ ١٦٦ او ١٦٧ مخونه)

ðمؤمنان په دوستۍ کې داسې يوه تنه ده،چې يو غړى يې دردمن شو؛ نو نور غړي هم ورسره ناکراره وي . (نووي ١/ ١٣٨ ، ٢/ ٦٣٢)

ð څوک چې ښې چارې وکړي او خلک يې وستايي؛نو مؤمن ته بېړنى زېرى دى . ( مسلم )

ð مؤمنان يو بل ته د هغه ماڼۍ په څېر دي،چې اجزاوو يې يو بل تينګ کړي وي .( احمد ٤ / ٤٠٤)

ð حضرت “سعد بن ربيع انصاري” له حضرت “عبدالرحمن بن عوف” سره ورور شو. “سعد” ورته وويل : زه ډېر شتمن انصاري  يم او شتمني درسره نيموم،دوې ښځې لرم،کومه چې دې خوښېږي راته ووايه،چې طلاقه يې  کړم او چې عدت يې پوره شو، درواده يې کړم. حضرت”عبدالرحمن”ورته وويل : خداى دې ستا پر اولاد او شتمنۍ برکت کېږدي، بازار مو چېرته دى؟ “عبدالرحمن” په بازار کې په راکړه ورکړه لګيا شو،ښځه يې وکړه او د مديني له شتمنو شو. ناصف(٣/ ٤٠١ – ٤٠٢ )

 ðيو بل ته لاسونه ورکړئ،چې کينې مو له منځه ولاړې شي،يو بل ته ډالۍ ورکړئ،چې مينه مو پيدا شي او دښمنۍ مو لرې شي . ( امام مالک؛ موطا: ١٦٤٢ حديث)

ðخلک د خدای عيال دى او خداى ته هغه ډېر ګران دى،چې له عيال سره يې نېکي وکړي . (بيهقي،شعب الايمان:مشکاة المصابيح ٣/ ١٣٩، ٤٩٩٨ حديث)

ðدنيا ته بې پروا وسه،چې د خدای ښه ايسې او څه چې خلک لري، ورته بې پروا وسه،چې د خلکو ښه ايسي.( نووي ١/ ٤٢٠)

ðد خداى چې کوم بنده خوښېږي؛نو “جبرئيل” راوغواړي او ورته وايي: پلانى مې خوښېږي؛نو ته يې هم خوښ کړه او “جبرئيل” دې يې هم  خوښ کړي او په اسمان کې غږ کړي :”پلانى د خداى خوښېږي؛نو تاسې يې هم خوښ کړئ”؛نو اسمانوال يې هم خوښ کړي، ورپسې يې پر ځمکه محبوبيت او ګرانښت خپرېږي او د خداى،چې کوم بنده ښه نه ايسي؛نو “جبرئيل” راغواړي او ورته وايي: پلانى مې دښمن دى؛نو ته يې هم دښمن وګڼه او “جبرئيل” يې دښمن وګڼي او اسمانوالو ته غږ کړي، چې” پلانى د خداى ښه  نه ايسي؛نو تاسې يې هم دښمن وګڼئ” او اسمانوال يې دښمن ګني؛نو بيا يې په اړه پر ځمکه کرکه او نفرت خپرېږي .( ناصف ٥/ ٧٩)

 

د  خداى له پنځوليو سره مينه

ð مسلمان چې نيالګى کېنوي يا دانه وکري او الوتونکي،انسانان او څاروي يې ترې وخوري،دا ورته صدقه شمېرل کېږي.(ناصف ٢/ ٢٣٠ )

ðيو سړى روان و او سخت تږى شو،يوې څاه ته ورسېد؛ورکوز شو، اوبه يې وڅښلې  او ترې راووت،و يې ليدل، چې يو سپي له ډېرې تندې ژبه را اېستلې او لمده خټه څټي،سړي له ځانه سره وويل:”دا سپى زما هومره تږى دى”؛نو(بيا) څاه ته کوز شو او خپله پڼه يې له اوبو ډکه کړه او په خوله کې يې ونيوه او راپورته شو او سپى يې خړوب کړ. خداى تعالى يې د کار منندوى شو او ويې باښه . اصحابو وويل: ايا د څارويو د خدمت لپاره موږ ته هم اجر راکول کېږي . آنحضرت وويل : د هر تږي ځيګر د خړوبولو لپاره بدله شته. (بخاري:الادب،٢٢ح، ٢٢٢ مخ، ابوداوود، الجهاد ٣ټ، ٢٥٥٠ح)

 

له اولاد سره مينه

ð رسول اکرم حضرت “حسن بن علي” ښکل کړ. “ازع بن حابس تيمي” هلته ناست و؛ ويې ويل :زه لس اولادونه لرم او يو مې هم نه دى ښکل کړى . رسول اکرم  ورته وويل : څوک چې ونه لورېږي،لورنه به پرې ونشي.( ناصف ٥/ ٧)

 ð يو بېديانى پېغمبر اکرم ته راغى او ورته يې وويل : تاسې کوچنيان ښکلوئ! موږ خو يې نه ښکلوو.پېغمبر اکرم ورته وويل: زه څه وکړم،چې خداى ستا له زړه مينه او لورنه اېستې ده.(ناصف ٥ /٧ )

ð حضرت “براء” وايي : پېغمبر اکرم مې وليد،چې “حسن” يې پر اوږو کړی دى او وايي: خدايه! دى راته ګران دى، تا ته دې هم ګران وي . (ناصف ٣/ ٣٥٧)

ð د پېغمبر سترګې پر “حسن” او “حسين” ولګېدې . ويې ويل: خدايه! دا دواړه راته ګران دي،تا ته دې هم ګران وي . (ناصف ٣/ ٣٥٨)

ðحضرت “بُريره” وايي : پېغمبر اکرم راته وينا کوله او”حسن” او “حسين”،چې دواړه سرې اجامې اغوستې وې، په تګ کې پر ځمکه هم لوېدل؛راغلل : پېغمبر اکرم له منبره راکوز شو او دواړه يې په څنګ کې ونيول او پر زنګانه يې کېنول،بيا يې ورته وويل : خداى رښتيا ويلي چې : شتمني او اولاد مو  فتنه (او ازمېينه) ده،سترګې مې پر دوى ولګېدې، چې روان دي او لوېږي،طاقت مې ونشو، داسې چې خبرې مې پرېښووې او په څنګ کې مې ونيول . ( ناصف ٣/ ٣٥٨)

ð څوک چې لور ولري او ژوندى يې ښخه نه کړي او سپکه يې نه کړي او و يې نه رټي او خپل زوى ترې غوره ونه بولي؛نو خداى تعالى يې جنت ته ننباسي. ( ناصف ٣/ ٣٥٨)

ð انسان چې خپل اولاد وروزي،تر يو من صدقه ورکولو ورته غوره ده.(ناصف ٥/ ٨)

ðاولاد ته د خپل پلار ډېره غوره ډالۍ داده،چې ښه ادبناکه يې وروزي. (ناصف ٥/ ٨)

ð”ادب” زوى ته د پلار غوره ميراث  دى . (پورته سرچينه)

 

( و ) جنسي مينه

ð عاشقانو ته مې د واده په څېر لار نه ده ليدلې.( ابن ماجه ١ / ١٨٤٧ حديث)

 

( ز) له شتمنۍ سره مينه

ð زوړ زړه له دوو څيزونو سره په مينه کې ځوان دى : اوږد عمر او ډېره شتمني. (ناصف : ٥/ ١٦٣)

ð مال او شتمني زما د امت د ازمېښت وسيله ده .(ترمذي)  

ð له شتمنۍ او مقام سره مينه ،د انسان دين ويجاړوي .(ترمذي)

ð هر امت يوه فتنه لري او زما د امت فتنه شتمني ده. (ناصف  ٥/ ١٦٣)

ð که بنيادم د پيسو دوه درې سيندونه درلوداى؛نو د درېمې په لټه کې به هم و.يوازې خاوره د انسان نس ډکولاى شي او خداى د توبه ګار توبه قبلوي.( ناصف ٥/ ١٦٢)

کينه

ð د وړاندنيو امتونو په درد؛يعنې کينه اخته شوي ياست.(تخريج زين الدين ابى الفضل العراقى الاحاديث احياء العلوم الدين للغزالى ٣ / ١٧)

 

آخرت گروهنه

ð”هر څوک چې ومري؛نو پښېمانېږي . وپوښتل شو : ولې؟ آنحضرت ورته وويل : که  نېک چارى و؛نو پښېمانېږي،چې ولې يې  تردې ډېرې ښې چارې نه دي کړي او که بد چارى و؛نو ولې يې ترې لاس نه اخسته . ( ناصف ٥ / ٢٠٣ )

[ دا حديث پردې سربېره،چې انسان د الهي احکامو مننې ته هڅوي، له ګناهونو او بدو چارو يې ډاروي .]

ðد دنيا په غوښتو کې اخروي زيان دى او د آخرت په غوښتو کې دنيايي زيان دى ؛نو په دنيا کې زيانمن شئ؛ځکه دا زيان د آخرت تر زيانه ښه دى . ( الکافي : ٢\١٣١)

 ð زه داسې څه وينم،چې تاسې يې نه وينئ او داسې څه اورم،چې تاسې يې نه اورئ . اسمان وژړل او حق لري،چې وژاړي . د اسمان په لوېشت لوېشت کې پرښتې خداى ته په سجده پرتې دي . پر خداى قسم ! که پر څه چې پوهېږم،تاسې هم پوه شئ. ډېر لږ به خاندئ او ډېر به ژاړئ او له خپلو مېرمنو سره به له کوروالي خوند نه اخلئ او له خپلو کورونو مو اېستلې او خداى ته مو پناه وړه.(ناصف ٥/ ٢٠٤ او ٢٠٥ مخونه)

ð لکه څنګه چې شيدې تيونو ته نه ځي،دغسې څوک چې د خداى له ډاره وژاړي؛نو هېڅکله دوزخ ته نه ځي.( ناصف ٥/ ٢٠ )

ð زه چې هر کار کوم،پکې نه دوه زړى کېږم؛خو د خپل مؤمن بنده په ساه اخستو کې دوه زړى کېږم،د هغه مړينه ښه نه ايسي او زما د هغه خپګان .( ناصف ١/ ٣٣٨ )

ð د خوندونو،مزو او خوښيو ويجاړوونکى (مرګ) ډېر يادوئ. ( ناصف ١/ ٣٣٨ )

 

حيا

ðله وړاندنيو پېغمبرانو،چې کومې خبرې رارسېدلي دي،يوه يې دا ده چې : که حيا دې نه درلوده؛نو څه چې غواړې ويې کړه.( ناصف ، ٥/ ٥٩)

ð حيا د ايمان له څانګو ده.( نووي ١/ ٥٦٢ )

  ð حيا ټول خير دى . (نووي ٣/ ٥٦١ )

ð حضرت “ابوسعيد خدري” وايي:پېغمبر اکرم تر سترمنې نجلۍ هم ډېر حياناک و، چې څه يې کتل؛خو چې ښه يې نه اېسيدل ؛نو له څېرې يې پوهېدو. (نووي ١/ ٥٦٢)

ð حضرت “عبدالله بن مسعود” له رسول اکرم (ص) نه روايت کوي،چې پېغمبر اکرم وويل : ((له خدايه بايد؛لکه چې ښايي حيا وکړئ)). ورته مو وويل : د خداى شکر دى موږ حيا کوو.راته يې ويل: داسې نه ده؛ بلکې  له خدايه حقيقي حيا دا ده، چې سر او څه چې پکې دي او ګېډه او څه چې پکې دي،وساتئ . مړينه او ورستنېدنه درياد کړئ او څوک چې اخرت غواړي؛نو د دنيا ګاڼه او ښايست دې پرېږدي او څوک چې داسې وکړي؛نو له خدايه به يې؛لکه څنګه چې ښايي،حيا کړې وي . ( ناصف ٥ / ٥٩ – ٦٠ مخونه)

ð”حيا او ايمان” تل يو له بل سره وي،که يوه نه وي؛نو هغه بل به يې هم نه وي . (پورته سرچينه)

 ð “حيا” يوازې خېر او ښه راولي . (بخاري – مسلم )

ð خلکو د مخکېنيو پېغمبرانو له ويناوو زده کړي،چې که شرم او حيا درکې نه وي ؛نوهر څه کړاى شې. ( بخاري )

ð له حضرت “عبدالله بن مسعود” نه روايت دى، چې رسول اکرم (ص) وويل :له خدايه داسې حيا وکړئ؛لکه چې د حيا حق دى. وپوښتل شو:الحمدلله موږ خو له خدايه حيا کوو. ورته يې وويل: دومره کافي نه ده (؛يعنې د حيا پر مفهوم،چې پوهېدلي ياست،دومره محدوده نه ده)؛ بلکې له خدايه د حيا حق دادى،څه مو چې په سر او مغزو کې وي،و يې ساتئ . ګېډه او څه چې پکې دي، و يې ساتئ (؛يعنې ماغزه له ناوړه افکارو او ګېډه له حرامو خوړو وساتئ) او مړينه بيا ورپسې د قبرحالات را پر زړه کړئ اوچا چې اخرت خپله موخه وټاکله؛نو د دنيا له سوکالۍ او ساتېرۍ لاس پر سرېږي او ددې څو ورځو دنيوي ژوند پر ځاى تلپاتې راتلونکى ژوندغوره ګڼي؛يعنې چاچې دا ټولې چارې ترسره کړې؛ نو پوه دې شي، چې  د “الله” د حيا حق به يې ادا کړى وي . (ترمذي)  

ð هر دين ځان ته يوه ځانګړنه لري ؛خو د اسلام ځانګړې نښه “حيا”  ده . (مالک – ابن ماجه – بيهقي)

ðحياء دوه ډوله ده : د عقل حيا او د بې عقلۍ حيا؛علم (او پوهه ) د عقل حيا ده او ناپوهي د بې عقلۍ حيا ده .  (سنن ابو داود )

ðاسلام لوڅ لغړ دى؛خو جامې يې حيا،ښکلا يې وقار،مړانه يې صالح عمل او ستنې يې پرهېزګاري ده او هر څه يو بنسټ لري،چې د اسلام بنسټ زما له اهلبيتو سره مينه ده . ( بحارالانوار : ٧٤ \٨٤)

ðحيا دوه ډوله ده : هوښياره حيا او احمقه حيا،چې پوهه هوښياره حيا ده او ناپوهي احمقه حيا ده . ( الکافي : ٢\١٠٦)

ðکه په چا کې څلور ځانګړنې وي او له سر تر پښو په ګناهونوکې ډوب وي؛نو خداى به ورته هغه پر ثوابونو واړوي،چې دادي 🙁 ١) رښتيا ويل . ( ٢) حيا .( ٣) ښه خوى . (٤)مننه . (التمحيص : ٦٧مخ )

ðابوذره ! له خدايه حيا وکړه،پر هغه خداى قسم،چې ساه مې يې په لاس کې ده،زه چې اودسماتي  ته ځم ؛نو راباندې له ګومارل شويو دوو پرښتو ځينې ځان له حيا نه په جامو کې رانغاړم  او حيا ترې کوم . ( وسايل : ١\ ٣٠٤)

ðايمان او حيا په يوه ليکه کې دي،که يو يې لرې شي؛نو هغه بل يې هم لرې کېږي .( مجموعه ورام  ٢\٨٢)

ðڅوک چې له خپلې مخې د حيا پرده لرې کړي؛نو غيبت يې څه ممانعت نه لري .( کشف الريبة : ٣٦مخ )

ðڅوک چې له حيا بې برخې شي؛نو ټول شر دى . (مصباح الشريعة : ١٨٩)

ðډېرې غوره ښځې مو هغوى دي،چې کله مېړه ته ورشي؛نو د حيا پرده لرې واچوي . ( مستدرک الوسايل  ١٤\١٦٠)

ðله خدايه ډېره حيا وکړئ . ( نهج البلاغې شرح  ١٩ \٤٧)

ðخداى تعالى دې پر هغه بنده ولورېږي،چې په حقه ترې حيا کوي او هغه داچې خپل سر او څه افکار،چې پکې دي او(همداراز) خپله ګېډه او شهوت وساتي او قبر او عذاب يې  ياد کړي او (همداراز) ياد يې وي، چې په اخرت کې د خداى لوري ته ورستنېږي . ( مشکاة الانوار : ٢٣٤)

ð “حيا او ايمان” تل يو له بل سره وي،که يوه نه وي؛نو هغه بل به يې هم نه وي . ( بيهقي )

ð”حيا”يوازې خير او ښه راولي . ( بخاري- مسلم )

 

پر عواطفو برلاسي

ð خپلمنځي کينه مه کوئ! يو بل ته مه شا کوئ او د خداى بندګانو! په خپلو کې وروڼه وسئ .( ابوداوود: الاداب ٤/ ٢٧٨)

ðپېغمبر اکرم کله هم د ځان لپاره غچ نه اخسته؛خو چې د خداى حريم به لتاړل کېده؛نو بيا يې کسات اخسته .(شيباني ٤ / ٢٢٦ )

 

پر کبر برلاسي

  د چا په زړه کې چې د بڅري هومره کبر وي،جنت ته نشي تلاى . يو سړي وويل : د انسان دا خوښېږي ،چې جامې (څادر) يې ښکلې وي . آنحضرت ورته وويل : ستر خداى ښکلى دى او ښکلا يې خوښېږي؛خو تکبر د حق نه منل او د خلکو سپک ګڼل دي .( شيباني: ٤ / ١٥٠ .   نووي: ٢/ ١٠٨٣ )

ð خداى تعالى وايي : کبريا يې مې څادر او عزت مې پرتوګ دى؛نو چا چې پردې دواړو راسره شخړه وکړه؛په عذابوم يې.( شيباني ٤/ ١٥ )

ð څوک چې ومري او تکبر او خيانت (يې نه وي کړى) او پور پرې نه وي؛نو جنت ته ځي. (شيباني ٤/ ٣٠٦)

 ðخداى راته وحې کړې،چې عاجز وسئ،چې يو بل و نه نګوئ او (هم) وياړ ونه کړئ . (نووي ٢ / ١٠٩٢ – ١٥٩ حديث)

ð يو چا وياړنې جامې اغوستې وې او وېښتان يې ږومنز کړي ول او په نازو نخرو پر لار روان و،چې ناڅاپه ځمکې تېر کړ او تر قيامته به پکې ډوب روان وي . ( شيباني ٤ / ١٥٢ )

ðڅوک چې لمن په ځان پسې راکاږي او په کبر پر لار روان وي؛نو خداى ورته د قيامت پر ورځ نه ويني.( نووي ١/ ٦٣٠ )

 

غم او پر خپګان برلاسي

ð مؤمن به تر هغه په غم او خپګان کې وي،چې ګناه يې نه وي پرېښي  .( الکافي ٢/ ٤٤٥)

ð د چاچې غمونه ډېرشي؛نو بدن يې ناروغېږي . ( تحف : مخ ٥٨)

ðرنځونه او مصيبتونه د ثوابونوکونجيانې دي .( بحار ٨٢/ ١١٥)

ðڅوک چې پر دنيا زړه نه تړي؛نو مصيبتونه ورته اسانېږي . (بحار/ ٧٧ ١٧١)

ðدنيا ته لېوالتيا غم اوخپګان زياتوي او ورته نالېوالتيا او زهد د جسم او روح  د ارامۍ لامل دى .( الخصال  ١\ ٧٣)

ðحضرت آدم خداى ته د نفس او خپګان له وسوسو شکايت وکړ. جبرئيل راکېووت او ورته يې وويل : آدمه ! (( لاحول ولاقوة الابالله )) ووايه ؛نو چې آدم وويله، د نفس اوخپګان وسوسه يې لرې شوه .

ðپر جنازو لمونځ وکړه؛ځکه دا کړنه مو خپه کوي او په خدايي چارو کې خپګان ښه بدله لري . ( الامالي للطوسي : ٢٩مخ )

 ðڅوک چې کړاى شي؛نو زړه دې يې ژړغونى وي او که نه يې شي کړاى؛نو زړه دې په خپګان کې ساتي.(مستدرک الوسایل  ۱۱ / ۲۴۰ )

ðد خداى چې کوم بنده ښه وايسي؛ نو په زړه کې يې د خپګان څپه اچوي ؛ځکه خپه زړه د خداى خوښېږي او همداراز څوک چې د خداى له وېرې وژاړي؛نولکه څنګه چې شيدې تيونو ته بېرته ننووتاى نشي؛ دغسې دى هم اور ته ننووتاى نشي او چې خداى پر چا غوسه وي؛ نو په زړه کې يې د خندا يوساز اچوي؛ځکه خندا زړه وژني او خداى د ښځو قهقه نه خوښوي .( عدة الداعي : ١٦٨٩)

ð د دنيا غوښتنه غم او خپګان زياتوي او زهد د زړه او بدن د ارامۍ لامل ګرځي.( الخصال ١/ ٧٣)

ð يوازې د دين لپاره غم او خپګان خوړل سم دى (نه د نورو څيزونو لپاره) (بحارالانوار : ١٠٠/ ١٤٢)

ðخدايه! له غم و خپګانه پناه دروړم . (المعجم المفهرس لا لفاظ الحديث النبوي ١/٤٦١)

 ðد پېغمبر اکرم يوې لور پېغمبر ته پيغام راولېږه،چې ماشوم يې مرګونى  دى او يو ځل راشه. پېغمبر اکرم پيغام راوړونکي ته وويل : ورشه او  ورته ووايه : څه چې خداى واخلي يا ورکړي،په خداى پورې اړه لري او هر څه د هغه پر وړاندې ټاکلى عمر لري او ورته ووايه،چې زغمناکه وسه او له خدايه يې اجر وغواړه.( نووي ١/ ٦٩٨ )

ð د چاچې اولاد ومري،خداى تعالى(پرښتو ته) وايي: زما د بنده اولاد مو واخست؟وايي : هو! خداى ورته وايي : د زړه مېوه مو يې واخسته؟ پرښتې وايي: هو! خداى وايي : بنده مې څه وويل : پرښتې وايي: ته يې وستايلې او استرجاع (رجوع) يې وکړه. پاک خداى ورته وايي: بنده ته مې په جنت کې کور جوړکړه او د حمد نوم پرې کېږده.( نووي ١/ ٦٩٧)

ð رسول اکرم د حضرت “سعد بن عباد” پوښتنې ته ورغى، حضرت “عبدالرحمن بن عوف” حضرت “سعد بن ابي وقاص” او حضرت “عبدالله بن مسعود” (رضي الله عنهم) هم ورسره ول . پېغمبر اکرم وژړل او حاضرينو هم ورسره وژړل . آنحضرت وويل : غوږ ونيسئ! خداى څوک د سترګو په ژړا او د زړه په خپګان  نه په عذابوي؛بلکې پخپله ژبه يې عذابوي يا پرې لورېږي .(نووي ١/ ٦٩٩ )

ðحضرت”انس” وايي : د پېغمبر اکرم زوى “ابراهيم” مرګونى و،چې پېغمبر اکرم راغى او اوښکې يې له سترګو روانې شوې . حضرت “عبدالرحمن بن عوف” وويل : ته هم اى رسول الله !؟ آنحضرت ورته وويل : د عوف زويه! ژړا رحمت دى . بيا يې وويل : سترګې اوښکې تويوي او زړه خپه کېږي؛خو يوازې هغه څه وايم،چې خداى پرې راضي کېږي . ابراهيمه! په بېلتون دې غمجن يم . (نووي ١/ ٧٠٠ )

 

د غم پرمهال دعا

ðد خداى رسول،چې به خپه و؛نو دا دعا یې ویله،چې د خرج دعا نومېږي‏ :((خدايه! پر هغه نظر دې ما وڅاره ،چې ‏کله هم نه ويده کېږي‏ او پر هغو  کلکوستنو‏ مې وساته،چې ‏‏کله هم نه را نړېږي او پر خپل قدرت دې پر ما ولورېږه او په هغه اميد،چې تا ته يې لرم، هلاک مې نه کړې. ماته دې ډېر نعمتونه راکړل؛خو ما دې سم شکر و نه کړ او څومره بلاوې،چې دې پر ما نازلې کړې؛خو ما پرې صبر و نه کړ . خدايه! چې زه دې د ناشکريو پر وړاندې ‏له نعمته بې برخې نه کړم . اى هغه خدايه،چې زه دې د کړخت پر مهال د بې صبرۍ له امله خوار نه کړم . خدايه ! ‏ودې ليدم،چې ګناه ته زړور يم؛خو رسوا دې نه کړم، له تا غواړم،چې پر محمد او آل يې درود ووايې .خدايه! دنيا مې له دين سره د يارۍ لامل وګرځوې او پرهېزګاري مې د آخرت د سعادت لامل وګرځوې . خدايه! هغه نعمتونه،چې دې راکړي او له سترګو مو پټ دي، را ته و یې ساتې او څه چې دې راکړي او راسره دي؛نو د هغه نعمتونو ساتل راته مه پرغاړه کوه . خدايه،چې د بندګانو ګناهونه درته زیان نه دررسوي او د بندګانو بښل درنه هيڅ نه کموي؛نو هغه راته راکړه،چې ‏له تا‏ هیڅ نه کموي او هغه راوبښه،چې تا ته هيڅ ضرر نه دررسوي ،چې يوازې ته بښونکى او مهربان خدای يې . اى خدايه! له تا په نږدوکې پراختيا ، صبر،پراخ رزق،روغتيا او د ټولو نعمتونو د شکر ایستنې ‏توفيق غواړم. (سنن النبي)

ðد خداى رسول،چې خپه و يا غم پرې راغی؛نو دا دعا ‏يې ويله:((يا حى ياقيوم ،يا حيا لايموت،يا حى،لا اله الا انت،کاشف الهم،مجيب دعوة المضطرين،اسالک بان لک الحمد لا اله الا آفت المنان بديع السماوات ولارض ذوالجلال ولاکرام ،رحمان الدنيا ولاخره ورحيمها، رب ارحمنی رحمة تفينني بهاعن رحمة من سواک ، يا اللهم الرحمن – اى ژوندي خدايه! ‏اى تلپاتې خدايه! ‏اى هغه ژوندیه،چې نيستي نه لري، اى ژونديه !‏ بې له تا بل خداى نشته،چې يوازې ته د هر کړکېچ او غم له منځه وړونکى او د بېوزلیو‏ د دعا منونکى يې، بې له تا بل خداى نشته  له تا يې غواړم؛ځکه ‏شکر‏ اوستاېنه يوازې تا ته ځانګړې ده. بې له تا بل خداى نشته،د نعمتونو ورکونکى او د ځمکې او اسمانونو جوړوونکى او د اکرام او جلال خاوند يې او يوازې ته په دنيا او آخرت کې لوراند ‏او لورین ‏يې،پر ما ولوريږه،چې د نورو له لورنې ‏مړه خوا شم،اى تر ټولو مهربانه . پېغمبر اکرم وويل : ((هر مسلمان،چې درې ځل دا دعا وويله؛نو خداى به يې غوښتنه ورکړي،خو ‏دا چې د ګناه او د زړه سوي د پرېکولو ‏لپاره وي.))  (سنن النبي)

 

ð څوک چې په تشويش او غم اخته شي؛نو و دې وايي : (( اللهم انى عبدک،ابن عبدک،ابن امتک ناصيتي بيدک….رسول اکرم وپوښتل شو:موږ هم دا دعا ووايو؟ورته يې وويل:هو! څوک چې دا اوري؛نو ښايي چې زده يې کړي .  ( احمد : ١\ ٣٩١)

 

دغم له منځه وړونکی

ðپر بدن غوړي مږل غم اوخپګان له منځه وړي . (سنن النبي)

 

حسي ادارک

ðله دنيا سره مينه د هرې ګناه او ښويېدنې بنسټ دى او له يوه څيز سره مينه دې ړندوي او کڼوي . (شيباني ٢/ ١١٠ )

 

له حس اخوا ادراک

ð خلکو! زه ستاسې (د جماعت) امام يم؛نو په رکوع،سجده، قيام او لمونځ پوره کولو کې له ما مه مخکې کېږئ،زه تاسې له مخې او شا وينم  ( ناصف ١/ ٢٦٠ )

ð (د لمانځه)ليکې مو سمې او منظمې کړئ؛ځکه چې زه مو له شا وينم.  (نووي ٢/ ٧٩٦ )

ðخداى راته ځمکه راغونډه کړه او ما يې ختيځونه او لوېديځونه وليدل او د امت واکمني به مې ور ورسي.(شيباني ٤/ ٢٤٠ )

ðقريشو،چې زما د “اسراء” او “معراج” کيسه دروغ وګڼله؛ نو په “حجر” کې ودرېدم او خداى راته “بيت المقدس” ښکاره کړ او ما ورته کتل او نښې او ځانګړنې يې مې ورته ويلې. (ناصف ٣/ ٢٦٠ )

ð پېغمبراکرم د مړيو غږونه اورېدل،چې په قبرونو کې به عذابېدل . حضرت “ابن عباس” وايي : پېغمبر اکرم پر دوو قبرونو تېر شو او ويې ويل : دا دواړه په عذاب دي . د کبيره ګناهونو لپاره نه په عذابېږي . بيا يې زياته کړه : بلې!يو يې چغلي کوله (خبرې يې وړې راوړې) او بل يې ځان له متيازو نه ساته .(  ناصف ١ / ٨٦ )

ð حضرت “انس” وايي : پېغمبر اکرم د يو قبر غږ واورېد او ويې ويل : دا څوک مړ شوى دى؟ورته يې وويل : په جاهليت کې مړ شوى دى. آنحضرت يې له اورېدو خوښ شو او و يې ويل: که نه ډارېدم ،چې يو بل ښخ  نه کړئ،دعا مې کوله،چې خداى درته د قبر عذاب واوروي . ( ناصف ١ / ٣٧٨)

ð زه تر تاسې ړومبى ځم او پر تاسې ګواه يم او پر خداى قسم،چې همدا اوس خپل ( د کوثر ) حوض وينم . د ځمکې د خزانو کونجيانې راکړل شوې، تاسې ته مې له دې ډار نه دى،چې مشرکان به شئ؛بلکې له دې امله دی،چې يو له بل سره به د دنيا د د سيالۍ لپاره راپورته شئ . (ناصف  ٥ / ٢٠٤ )

ð حضرت “انس” وايي : پېغمبراکرم پر لمانځه ولاړ و،چې يو ساه نيولى سړى راغى او ويې ويل:  ((الله اکبر،د سپېڅلي او برکتناک خداى ډېره ستاېنه )). پېغمبر اکرم،چې لمونځ وکړ ( ؛نو) ويې ويل : کوم يوه دا خبره وکړه؟ خلک چوپ شول او څه يې و نه ويل : پېغمبر اکرم وويل : هغه بده خبره نه ده کړې . سړي وويل :ما دا خبره وکړه . پېغمبر اکرم وويل : دولس پرښتې مې ولېدې،چې د خداى حضور ته دې خبرې وړو ته يو له بل سره سيالي کوله . (شيباني  ٢ / ٦٧ – ٦٨ )

ð حضرت “حنظله اسيدي”(رض)،چې د پېغمبر اکرم له کاتبانو و، آنحضرت ته وويل : ستاسې په حضور کې،چې يو او د دوزخ او جنت په باب راته خبرې کوئ؛نو داسې وي؛لکه چې په سترګو يې وينو او چې له تا ولاړ شو او له خپلې مېرمنې،عيال او ژوند سره بوخت شو؛نو ډېرى دا خبرې هېروو. رسول اکرم ورته وويل : پر هغه قسم،چې زما ساه يې په واک کې ده، له ماسره،چې په کوم حال او ياد کې ياست او دوام ورکړئ؛ نو پرښتې به په خپلو بسترو،کوڅې او سړک کې درته لاسونه درکړي؛ خو حنظله! د بنيادم د هر ساعت لپاره يو حالت وي او دا يې درې ځل وويله . (شيباني  ١ / ٣٢)

ðد مؤمن له ځيرکۍ ډډه وکړئ؛ځکه مؤمن د خداى په رڼا ګوري. پېغمبر اکرم بيا دا آيت ولوست : او په دې کې په نښو پوهېدونکيو ته نښې دي . ( شيباني ١ / ١٤٦ )

ð رسول اکرم د يوه انصاري باغ ته ننووت،يو اوښ يې وليد،د اوښ سترګې،چې پر پېغمبر اکرم ولګېدې؛نو و يې ژړل . پېغمبر اکرم ورغى او اوښکې يې ورپاکې کړې . اوښ ژړا بس کړه . آنحضرت وويل :  دا اوښ د چا دى؟ يو ځوان انصاري راغى او و يې ويل :زما دى . آنحضرت وويل : ددې بې ژبې څاروي په باب له خدايه نه ډارېږې،چې خداى درکړى دى؟ اوښ راته شکايت وکړ،چې ته يې ځوروې او ستړى کوې . (ابوداوود ٣ /٢٣، ٢٥٤٩ حديث) 

 

فکر کول

ðيو ساعت فکر کول تر يوه کال عبادته غوره دى . (غزالي؛احياء العلوم الدين ٤/ ٤٢٣)

ð د خداى په پنځول شويو کې فکر وکړئ او د خداى د ذات په اړه فکر مه کوئ؛ځکه څنګه چې ښايي؛هغسې يې نشئ پېژنداى .

ð پېغمبر اکرم (ص) “اشج عبدالقيس” ته وويل : په تا کې دوې ځانګړنې دي، چې د خداى او پېغمبر يې خوښېږي :هوښياري او تاني.(صحيح مسلم ١/ ١٨٩)

ðپېغمبر اکرم،حضرت “معاذ بن جبل” “يمن” ته ولېږه او ورته يې وويل : څرنګه به قضاوت کوې؟ ورته يې وويل : د خداى د کتاب له مخې.  پېغمبر اکرم ورته وويل: که د خداى په کتاب کې يې حکم نه و؟ ورته يې وويل: د رسول الله د سنتو له مخې . پېغمبر اکرم ورته وويل : که په دې کې يې (هم) حکم نه و؟ورته يې وويل : په خپل اجتهاد. آنحضرت ورته وويل: د خداى شکر دى، چې خپل استازى يې بريالى کړ. (ناصف  ٣/ ٦٦)

ð که واکمن اجتهاد وکړي او اجتهاد يې سم وي؛نو دوه اجره لري او که پکې تېر وځي ؛نو يو اجر لري . (ناصف  ٣/ ٦٦)

ðپه فکر سره دوه لنډ لمونځونه کول تر يوې شپې پر لمانځه تېرولو غوره دى . ( ثواب لاعمال : ٤٤مخ )

ðيوساعت فکر کول،تر يوې شپې پر لمانځه تېرولو غوره دى.(الزهد : ١٥مخ )

ðيوساعت فکر کول تر يوه کال عبادته غوره دى او هغه د تفکر مقام ته رسي،چې خداى د معرفت او پوهې په رڼا او توحيد ځانګړی کړی وي .( بحارالانوار ٦٨\ ٣٢٥)

ðپه دنيا کې د مېلمه په څېر وسئ او جوماتونه خپل کورونه کړئ او هڅه وکړئ،چې زړه مو نرم شي او د خداى له ډاره ډېر فکر او ژړا وکړئ . مړينه او وروسته ترې په قيامت کې سختي پخپلو سترګو کې انځور کړئ .( پوه شئ،چې) داسې څيز جوړوئ،چې پکې به و نه اوسېږئ او داسې څيز راټولوئ،چې و به يې نه خورئ؛نو د هغه خدای له پولو مه اوړئ،چې ورګرځئ . ( اعلام الدين : ٣٦٥مخ )

ðد مرګ ياد د پند اخستو لپاره،د آخرت ياد د تفکر لپاره،ورع (غوره چارو کول او د ناوړو چارو نه کول) د عبادت لپاره،د ګناه پرېښوول د بښنې لپاره او نصيحت د دعالپاره کافي دي . په چا کې چې دا يوه ځانګړنه وي؛نو د انبياوو له لومړۍ ډلې سره جنت ته ننوځي.(جامع الاخبار: ١٣٠ مخ )

ðتفکر د نېکيو هنداره،د ګناهونو کفاره،د زړونو رڼا،خلاقيت،د آخرت ښو ته رسېدل،د چارو پر پايلو خبرېدنه او د پوهې زياتېدنه ده او داسې ځانګړنه ده،چې په څېر يې خداى نه لمانځل کېږي .( بحارالانوار : ٦٨\٣٢٥)

 

بنسټګر

ð که څوک په اسلام کې د يوه ښه دود (تيږه) کېږدي؛نو اجر يې ده او هغو ته رسېږي،چې پردې دود روان وي . بې له دې،چې د لارويانو له اجره څه کم شي او (همداراز) څوک، چې په اسلام کې د ناوړه دود (تيږه) کېږدي؛نو ګناه يې دده او هغو پر غاړه ده،چې د دې دود لارويان وي،بې له دې چې د لارويانو له ګناه څه کمه شي. (حافظ، منذري، د صحيح مسلم لنډيز: ١٤٥ مخ، ٣٣ حديث)

 

د فکر کولو تېروتنې

( الف) : په پټو سترګو لاروي اوهام او خرافات

ð د وخت زامن کېږئ مه او مه وياست :که خلکو راسره ښه وکړل؛نو زه هم ورسره ښه کوم او که تېرى يې راباندې وکړ؛نو زه هم پرې تېرى کوم؛ بلکې ځان داسې روږدى کړئ،چې که خلکو درسره ښه کول؛نو ښه ورسره کوئ او که بد يې درسره کول؛نو تاسې ورسره بدي او تېرى مه کوئ .(ترمذي ٨ / ١٧٠ )

ð لمر و سپوږمۍ د خداى له نښو دوې نښې دي او د چا د مړينې يا زوکړې لپاره په تندر نه نيول کېږي .( منذري  ١/ ٤٤٥)

ð څوک چې وړاندويوني يا رمال ته ورشي او ويناوې يې ومني؛نو پر محمد(عليه السلام)،چې څه نازل شوي،پرې کافر دی .(المعجم المفهرس الفاظ الحديث النبوي  ٤/ ١٩٦)

ð څوک چې د نجوم علم زده کړي؛نو په واقع کې يې د کوډو يوه برخه زده کړې ده. ( المعجم المفهرس الفاظ الحديث النبوي  ١٢/ ٤٣٥)

[ تبصره : استاد يوسف قرضاوي (الرسول والعلم، دارالصحوه،٥٤ او ٥٥ مخونه) ليکي: دلته د نجوم علم له زده کړې  مراد دادى، چې پر خاوريني نړۍ او راتلونکيو پېښو د ستوريو حرکتونه اغېزمن دي،چې داسمه نه ده؛خو د ستور پوهنې بحث ځان ته بنسټونه او طريقې لري او  پر علمي مشاهداتو ولاړ دى .

 ( ب) د دلايلو نه چمتو والى:

ðپه څه چې نه پوهېږئ؛نو نه ښايي و يې وياست . ( المعجم المفهرس الفاظ الحديث النبوي  ٤/  ٣١٦ )

 ð له ګومان ډډه وکړئ؛ځکه ګومان ډېره دروغ خبره ده. (المعجم المفهرس الفاظ الحديث النبوي  ٤/ ٨٧)

ðڅوک چې په ناپوهۍ کې فتوا ورکړي؛نو ګناه يې د فتوا ورکوونکي پر غاړه ده. (ناصف  ١/ ٧٣)

[يعنې په ديني يا دنيوي چارو کې چې د چا پوښتنې ځواب کړې او پوښتونکى هماغسې وکړي؛نو ګناه يې د ځواب ويونکي پر غاړه ده.

پېغمبر اکرم نه يوازې له بې دليله فتوا ورکولو منع کړي يو؛بلکې له نورو هغو خبرو يې هم منع کړي يو،چې د سموالي په اړه يې ډاډمن نه يو. “ابومسعوده” وپوښتل شو: له رسول اکرم  دې (( وايي)) په اړه څه نه دي اورېدلي،چې څه لارښوونه يې کړې ده؟ ورته يې وويل :سړي ته ناوړه مرکوب دى .( امام احمد حنبل؛مسند ٤/ ١١٩، ٥/ ٤٠١)

 يعنې چې څوک داسې خبره وکړي،چې له سموالي يې ډاډه نه وي . په دې حديث کې خلک په پټو سترګو له نورو له اورېدل شويو منع شوي دي .)

دغسې د روڼ فکر کولو لپاره پخپلو کې بحث او خبرې اترې کول يوه لار ده،چې انسان له تېروتنو ژغوري او پر حقيقت يې برلاسوي . په دې اړه پېغمبر اکرم وايي : څوک چې له خدايه خير وغواړي (؛نو)نه ناکامېږي او څوک چې مشوره وکړي (؛نو) نه پښېمانېږي.(فيض القدير ٥/ ٤٤٢)

 

زده کړه

ð علم زده کړئ او خلکو ته يې وروښيئ. فرايض زده کړئ او خلکو ته يې وروښيئ. قرآن زده کړئ او خلکو ته يې وروښيئ. (دارمي ١/ ٢٢٧)

ð خلک يا پوهان دي يا زده کړي او بې له دې د دوو چارو خير نشته . ( دارمي ١/ ٢٥٢)

 ð پوه شئ،چې دنيا لعنت شوې ده او څه چې پکې دي (هم) لعنت شوي دي؛خو د خداى ياد او مثالونه يې،پوه او زده کړي . (ترمذي ٩/ ١٨٩. ابن ماجه ٢/٤١١٢ حديث)

 ðڅوک چې د پوهې د لاس ته راوړو لپاره لار ووهي؛نو خداى ورته د جنت پر لور لار هواروي .(ناصف ١/ ٦٢- ٦٣ . نووي ٢/ ٩٥٢)

ð څوک چې دعلم په لټه کې بهر ووځي، تر راستنېدو پورې د خداى په لار کې وي . (نووي ٢/ ٩٥٤)

ð څوک چې دعلم د زده کړې لپاره لار وهي (؛نو) خداى ورته د جنت پر لور لار هواروي،پرښتې ورته پخپله خوښه وزرونه غوړوي، اسمانوال او ځمکوال،ان په سمندرونو کې کبان ورته بښنه غواړي .( ناصف ١/٦٣. نووي ٢/ ٩٥٥)

ð هوښياره خبره د مؤمن يو ورک شوى څيز دى؛نو په هر ځاى کې يې چې ومونده؛دهغه ده. (شيباني ٣/ ١٣٧ )

ð که انسان ومري؛نو د کړنو ريښې يې پرې کېږي؛خو د درېو څيزونو يې نه : جاريه صدقه،هغه علم چې خلک ترې ګته اخلي او صالح اولاد، چې ورته دعا وکړي .( نووي  ٢/ ٩٥٣)

ð پرعابدانو د عالمانو لوړاوى؛لکه د سپوږمۍ،چې  پر ستوريو دى. عالمان د پېغمبرانو وارثان دي . پېغمبرانو دينار او درم (پيسې) په ميراث نه دي پريښي؛بلکې علم يې په ميراث پرېښى دى؛نو چا چې علم زده کړ، ډېره ګټه به يې کړې وي . (نووي  ٢/ ٩٥٥)

 ðپر عابد د عالم لوړاوى؛لکه ستاسې پر ډېر ټيټ زما لوړاوى . (نووي٢/ ٩٥٤ )

 ð د قيامت پر ورځ درې ډلې سپارښت کوي : پېغمبران، عالمان او بيا شهيدان . (ناصف ١/ ٦٥)

ð خلکو ته د نېکيو پر ښوونکيو خداى،پرښتې، اسمانوال، ځمکه وال ان ميږي په ځالو او کبان (په سمندر) کې درود وايي.(ترمذي ١٠/ ١٥٨ )

ðد عالم چې کړه وړه ښه وي او(خلکو ته) ښوونه وکړي،د اسمانو په ملکوت کې په ستريا يادېږي .(ترمذي ١٠/ ١٥٨)

ðزه په حقيقت کې د ښوونې لپاره رالېږل شوى يم .(المعجم ٤/ ٣٢٦)

ð خداى زه ددې لپاره نه يم رالېږلى،چې خلک پر کړاو اخته کړم او ستونزې راولاړې کړم؛بلکې د ښوونې او اسانۍ راوستو لپاره يې رالېږلى يم .( شيباني ٤/ ٢٥٧)

ð خداى دې هغه سړى خوشحاله کړي،چې زما خبره واوري او هماغسې،چې يې اورېدلې،نورو ته ورسوي؛ځکه ډېر داسې وګړي شته،چې زما خبره وررسي(؛نو) اورېدونکى به پرې ښه پوهېدونکى وي .

ð له حضرت ابوبکر (رض) څخه روايت دى،چې پېغمبر اکرم ويلي دي: حاضران دې يې غايبانوته ورسوي؛ځکه حاضر  يې ښايي داسې چاته ورسوي،چې پر هغه خبره تر رسوونکي ښه پوه شي.( ناصف ١/ ٦٦)

ð له “ابو زيد عمرو بن اخطب انصاري” (رضى الله عنه) روايت دى، چې يوه ورځ رسول اکرم د سهار تر لمانځه وروسته پر منبر تر لمر لوېدو پورې وينا وکړه،چې يوازې لمانځه ته راکېووت او په دې موده کې يې موږ له هغه څه خبر کړو،چې  موږ ته وو او وي به؛نو ځکه هغه په موږ کې ډېر پوه دى،چې دا وينا يې ښه يادې کړې وې . ( نووي ٢/ ١٢٦٢)

ðحضرت “ابوذر” وايي: رسول اکرم په داسې حال کې له موږه ولاړ،چې که کوم الوتونکي په هوا کې الوت کړى و؛نو په اړه يې يو څه موږ ته راښوولي وو. (احمد ٥/ ١٥٣)

حضرت “سلمان فارسي” وايي : چا ورته وويل : ستاسې پېغمبر ټول څيزونه ان ټټۍ ته تلل دروښوول! سلمان ځواب ورکړ: هو! آنحضرت موږ منع کړو،چې مخ پر قبله به اودسماتى نه کوئ ،په ښي لاس به استنجا نه کوئ او پر درېو ډبرو (لوټو) به ځان پاکوئ او په خرشنو،غوشيانو او هډوکي به  يې نه پاکوئ . (ابوداود ١/ ٧ )

 

د يادولو لارې چارې

ð د نبي اکرم په احاديثو کې د يادولو څلورو لارو ته اشاره شوې ده: تقليد او لاروي،ازمېښت او تېروتنه،شرطي سازي، تفکر او فکر کول.

 

تقليد او لاروي

ðحضرت”ابوحازم بن دينار” وايي : يو ځل پېغمبراکرم پر منبر لمانځه ته ودرېد او تکبير يې ووايه او لا هماغسې پر منبر ولاړ و،چې خلکو ورپسې تکبير ووايه،بيا پېغمبر اکرم رکوع وکړه او ورپسې راکوز شو او بېرته پورته شو،تردې چې د منبر په  څنګ کې يې سجده وکړه بيا پورته شو،تردې چې لمونځ يې پوره کړ. وروسته يې خلکو ته مخ کړ او ويې ويل :دا کار مې ځکه وکړ،چې په ما پسې اقتدا وکړئ او لمونځ مې ياد کړئ .

ðروايت دى،چې پېغمبراکرم د لوى اختر پر ورځ پر اوښ سپور شيطان ويشته، ويې ويل : دا ځکه چې خپل مناسک راڅخه زده کړئ؛ځکه نه پوهېږم،ښايي دا مې وروستى حج وي . ( احمد: ٣/ ٣١٨، ٢٢٧، ٣٦٦، ٣٧٨)

 

ازمېښت او تېروتنه

ð حضرت”طلحه بن عبدالله” وايي: له حضرت پېغمبر اکرم سره پر يو شمېر خلکو تېر شو،چې د کجورو پر ونو وو. آنحضرت پوښتنه وکړه : دوى څه کوي؟ ورته يې وويل : تلقيح کوي،نر په ښځه کې ږدي او ونه بلاربېږي .آنحضرت وويل: ګومان نه کوم، چې دا کار به ګټور وي . دا خبره هغوى ته ورسول شوه؛نو کار يې پرېښود.رسول  اکرم يې خبر کړ. آنحضرت وويل: که دا کار ورته ګټور وي؛ ودې يې کړي،ما خو يوازې ګومان وکړ؛نو په ګومان مې مه نيسئ؛بلکې د خداى له لوري مې چې درته څه ويل؛نو ويې منئ؛ځکه زه کله هم پر خداى دروغ نه تړم . او په بل روايت کې راغلي چې: تاسې په خپلو دنيوي چارو په خپله ښه پوهېږئ . ( صحيح مسلم ١٥/ ١١٦ – ١١٨ مخونه)

د پېغمبر اکرم دا وينا، چې “که درته ګټور وي، و يې کړي” او  “تاسې په خپلو دنيوي چارو ښه پوهېږئ”،په واقع کې شخصي تجربې او د ازمېښت او تېروتنې له لارې زده کړې ته اشاره ده او له دې لارې انسان نويو پوښتنو ته نوي ځوابونه برابرولاى شي او د خپلو ستونزو د هواري لپاه ګټورې حل لارې زده کولاي شي .

پېغمبر اکرم په زده کړه کې د شخصي تجربې اهميت ته اشاره کړې ده.

 ðله حضرت “ابوسعيد” څخه روايت شوى،چې پېغمبراکرم وويل : هر زغمناک ښويېدنه او هر حکيم تجربه لري .( ناصف ٥/ ٦٤)

[تبصره: ځکه هر حکيم يوازې د تجربې له لارې خپل حکمت ته رسي او دا تجربى يې د ډېرو ازمېښتونو له لارې تر لاسه کړي دي . ]

 

شرطي سازي Conditioning

مؤمن له يوې سوړې دوه ځل نه چيچل کېږي .( ناصف التاج الجامع للاصول في احاديث الرسول: ٥/ ٧٠. شيباني: ٤/ ٣٠٧)

 

اندنه او فکر کولوته هڅونه

 ð پېغمبراکرم وويل:(( هغه به کومه ونه وي،چې پاڼې يې نه رژېږي او د مسلمان په څېر وي،څوک يې ځواب راکوي؟)) د خلکو پام بېديانيو ونو ته شو.حضرت”عبدالله بن عمر” وويل : حدس مې وواهه،چې دکجورې ونه وي؛خو له شرمه مې ونه ويل . اصحابو وويل : رسول اکرمه! تاسې يې په خپله ووياست .آنحضرت وويل: ((د کجورې ونه . )) (بخاري  ١\ ٦١ )

ðپېغمبراکرم وپوښتل : ((پوهېږئ،چې مفلس څوک دى؟ يارانو يې وويل : موږ خو هغه ته مفلس وايو،چې نه پيسې لري او نه شتمني . آنحضرت ورته وويل :((زما د امت مفلس هغه دى،چې د قيامت پر ورځ له ځانه سره لمونځ ،روژه او زکات راوړي؛خو بلخوا يې چاته کنځلې کړې وي، پر يو چا يې تور تپلى وي ، د يوه يې مال خوړلى وي،د يوه يې وينه تويه کړې وي او يو يې وهلى وي؛نو د دې چارو له امله له ښو کارونو او ثوابونو يې ده او هغه ته ورکړي او ثوابونه يې،چې پاى ته ورسېدل، مخکې له دې،چې په اړه يې پرېکړه وشي،د هغوى له ګناهونو را اخستل کېږي او پرده وربارېږي او بيا يې په اورکې اچوي .))

 ( نووي :١\٢٤١)

ðحضرت “جابر” روايت کړى :له يوې ډلې اصحابو سره سفر ته ولاړم، په لار کې د يوه سرمات او بيا محتلم شو.د سفر  ملګري يې وپوښتل:روا ده چې تيمم وکړم؟هغوى ورته وويل:نه (؛نو) سرماتي غسل وکړ،چې له امله يې ومړ او چې کله رسول اکرم ته راغلل او پېښه يې ورته وويله (؛نو) آنحضرت وويل:((هغه يې وواژه، د هغوى خداى  دې يې ووژني،چې نه پو هېدل؛نو ولې يې نه پوښتل،پوښتل خو د ناپوهۍ درمل وي.))  (ابوداوود:لومړى ټوک ، ٣٢٦ حديث )

 

دزده کړې اصول

(١) انګېزه.

(الف) په هڅونه اوګواښنه د انګېزې راولاړول :

ðله حضرت”ابوذرغفاري” روايت دى،چې (د اسلام د بلنې په لومړيو ورځو کې) پېغمبر اکرم وويل : ((جبرئيل راغى او زېرى يې راکړ،چې که له امته دې څوک ومري او له خداى سره يې څوک شريک نه وي نيولى (؛نو) جنت ته ځي.)) ورته مې وويل : که زنا يې کړې وې، که غلايې کړې وي ؟ آنحضرت وويل:(( که زنا او غلا يې هم کړې وي ؟ بيا مې ورته وويل : ((که زنا او غلا يې هم کړې وي ؟آنحضرت وويل:((که زنا يې کړې وي،که غلا يې کړې وي؟ اوڅلورم ځل يې وويل:((که څه هم د ابوذر نه خوښېږي)).(ناصف ١\٣١)

ðپېغمبر اکرم مسلمانان د عبادت کولو او له لويو ګناهونو ځان ژغورنې ته هڅول :((هر بنده چې پينځګوني لمونځونه وکړي،د رمضان د مياشتې روژه ونيسي او زکات ورکړي او له اوو سترو ګناهونو ځان وژغوري؛ نو د جنت ورونه ورته پرانستلل کېږي او ورته ويل کېږي : په سلامتي ورننوځه.)) (ناصف  ٢\٥-٦مخونه )

ð[ اوه سترګناهونه دادي : (١) له خداى سره شرک ( ٢) په ناحقه د حرام نفس وژنه ( ٣) د يتيم د مال خوړل ( ٤) سود خوړل ( ٥) کوډې کول (٦) د جهاد له ډګره تېښته ( ٧) پرمړوښو پاکلمنو مېرمنو تورونه لګول .]

ðپېغمبراکرم مسلمانان د ښوچارو کولو او د ناوړه چاره نه کولو ته هڅولي دي : (( خداى تعالى ( په لوح محفوظ کې ) ښې او بدې چارې کښلي بيا يې ( پرښتو او خلکو ته) ويلي دي؛نو څوک چې د ښه کار د کولو هوډ وکړي ؛خو ويې نه کړي؛ نوخداى ورته پوره يو ښه کار ليکي اوکه هوډ يې وکړ او ويې کړ؛نو خداى ورته لس ښه کارونه او تر اوياوو پورې ثواب ليکي؛بلکې څو څو ګرايه او که د ناوړې چارې هوډ وکړي؛ خو ويې نه کړي؛نو خداى ورته يو پوره ښه کار ليکي او که هوډ يې وکړي او ويې کړي؛نوخداى ورته يوازې يو بد کار ليکي.)) (ناصف ١\٥٢)

ðپېغمبراکرم وايي:((ايمان په هيله نه دى؛بلکې ايمان هغه دى،چې په زړه کې څړيکه ووهي او عمل (يې ګواه وي او) تاييد يې کړي،ځينو خلکو داسې الهي بښنې ته سترګې نيولې وي،چې يو ښه چار يې هم نه وي کړى او ومري او وايي : پر خداى يې ښه ګومان لاره،حال داچې دروغ وايي،که پر خداى يې ښه ګومان درلوداى؛نو ښې چارې به يې کولاى.)

 ( البهي الخولي؛آدم عليه السلام: فلسفه تقويم الانسان واخلا قه: ١٨٥٠ مخ .)

ðکه مؤمن له هغې سزا خبر واى،چې له خداى سره ده ؛نو هيچا يې جنت ته تمه نه کوله او که کافر له هغه رحمته خبر واى،چې له خداى سره دى ؛ نو هيڅ کافر يې له جنته نه نهيلېده .)) ( نووي  ١\ ٤٠٠ )

( ب) په کيسه دانګېزې راولاړول .

د کيسې ويل د انسان پام رااړوي؛نو ځکه پېغمبراکرم له دې دوده کار اخستى دى،چې په نبوي احاديثوکې يې بېلګې ليدل کېږي . حضرت “ابوهريره” له رسول اکرمه روايت کوي چې :

ð ((يو سړي به خلکو ته پورونه ورکول او خپل مريي ته يې وويل : که کوم پوروړي ته تلې او ليده دې،چې لاس يې تنګ دى؛نو ترې تېرېږه، ښايي خداى هم له موږه تېر شي او دا سړى،چې ومړ؛نوخداى وباښه ))

 ( نووي : ٢\٩٤٥)

ð (( يوه ښځه له دې امله دوزخ ته ولاړه،چې يوه پيشو يې تړلې وه، نه يې په خپله خواړه ورکول او نه يې پرېښووه،چې واښه وخوري.))

( شيباني  ٢\١١٤)

ð((له شرابو ځان وژغورئ؛ځکه د ټولو ګناهونو ريښه ده . په پخوانيو زمانو کې يوه بې لارې ښځه پر يوه سړي مينه شوې وه،ښځې خپله وينځه ورپسې ولېږله،چې دشهادت لپاره دې راشي . سړى له وينځې سره راغى او په هر وره به،چې ننووته؛نو وينځې ورپسې ورتاړه، څو هغې کوټې ته ننووت،چې ښکلې ښځه له مريي سره ناسته وه او د شرابو منګوټى يې په څنګ کې و. ښځې وويل : رښتيادرته ووايم،ما ته د شهادت ويلو لپاره نه يې رابللى؛بلکې د کوروالي لپاره مې راغوښتى يې،يا داچې له دې شرابو يو جام وڅښې او يا دا مريي ووژنې.سړي ورته وويل:له شرابو يو جام راکړه.ښځې پرې يو جام شراب وڅښل.سړي وويل:نور هم راکړه او دومره يې وڅښل،چې په پايله کې له ښځې سره څملاست او مريى يې هم وواژه؛نو له شرابو ځان وژغورئ؛ځکه پر خداى قسم،چې شراب او ايمان سره نه يو ځاى کېږى؛خو داچې يو بل لرې کړي .))  ( ناصف  ٣\ ١٤٤)

ð (( درې تنه پر لار روان ول،چې باران پرې راکېووت،په غره کې يو غارته ننووتل،ناڅاپه له غره ډبره راولوېده او د غار خوله يې ټپه کړه او دوى پکې بند پاتې شول . يوه بل ته وويل : هر يو دې فکر وکړي،چې د خداى لپاره يې کوم کار کړی دى او د هماغه له مخې دې خداى ته دعا وکړي،چې که دا ډبره لرې شي او ووځو. يوه وويل: خدايه!ما خو بوډاګان مور وپلار او يو شمېر واړه درلودل،چې پالنه يې راپرغاړه وه ، د شپې چې راتلم ؛نو شيدې مې لوشلې او لومړى به مې مور و پلار ته ورکولې،چې و يې خوري او بيا خپلو کوچنيو اولادونوته . يو ځل راباندې ناوخته شو او کورته،چې راغلم؛نو مور و پلار مې وېده ول او شيدې مې، چې ولوشلې او مور و پلار ته راغلم؛ نو زړه مې ونه شو،چې راويښ يې کړم او دا مې هم زړه نه منل،چې تر هغوى وړاندې يې پر خپلو کوچنيانو وڅښم . اولادونو مې راته زارۍ کولې،چې ګهيځ شو؛نو که ما دا کار يوازې ستا د رضا لپاره کړى و؛نو يوه درېمڅه راته پرانځه،چې اسمان خو وګورو.خداى ورته دا کار وکړ او اسمان يې وکوت .

بل وويل : خدايه! د خپل تره پر لور مين وم او د کوروالي هيله مې ترې وکړه؛خو راسره يې ونه منله . ما ورته سل ديناره ورکړل او په ډېرو زاريو مې راضي کړه،چې کېناستم،چې خوند ترې واخلم ويې وويل: د خداى بنده! له خدايه وډار شه او مهر مې يوازې په حلالو پرانځه .زه راولاړشوم . اوس نو خدايه که داکار مې يوازې ستا د رضا لپاره کړى وي؛ نو دا ډبره خو لږه نوره هم څنګ ته کړه او ډبره څنګ ته شوه .

درېم وويل : خدايه ! يو کارګر مې د يوې پيمانې وريجو په بدل کې نيولى و،چې کار يې پاى ته ورساوه،ويې ويل :مزدوري مې راکړه.ما يې مزدوري ورکړه ؛خو هغه وويل ،چې: دا لږه ده او و يې نه منله، ما هماغه يوه پيمانه وريجې وکرلې،چې د حاصلاتو په پلورلو يې ما له شپنو سره د غواوو پاده وپېرله . هغه کارګر راته دويم ځل راغى او ويې ويل: له خدايه وډار شه(او مزدوري مې راکړه) ورته مې وويل: ولاړ شه دا غواګانې سره بوځه . کارګر وويل : له خدايه وډار شه اوملنډې راباندې مه وهه .ورته مې وويل : ملنډې درباندې نه وهم . ځه ولاړ شه او بو يې ځه او هغه ولاړ او له ځان سره يې بوتلې . اوس نو خدايه! که دا کار مې يوازې ستا د رضا لپاره کړى وي؛نو د غار خوله راته بېخي پرانځه،چې همداسې وشول او دباندې راوتل او ولاړل . (ناصف  ١\ ٥٢- ٥٤مخونه ) 

 

 بدله ورکول

تجربي څېړنو ښوولې،چې په زده کړه کې د بدلې ورکړه،خورا اهميت لري؛ خو پېغمبراکرم لا د مخه ددې دود سپارښتنه کړې وه .

ð د کارګر د خولې تر وچېدو وړاندې يې مزدوري ورکړئ . (ابن ماجه : ٢\٢٤٤٣ حديث )

ð چا چې درسره نېکي وکړه،بدله يې ورکړئ او که د بدلې لپاره مو څه نه درلورل؛نو تر هغه ورته دعا وکړئ،چې ګومان مو راشي،چې بدله مو يې ورکړه . (نووي  ٢\١١٧٥مخ  – احمد ١\٢١٤ )

ðپه هره شپه کې داسې يو ساعت شته که مسلمان پکې د دنيا او آخرت له چارو څه خير وغواړي؛نو خداى يې ورته هرومرو ورکوي(نووي : ٢\٨٤١)

ðد جمعې پر ورځ داسې يو ساعت شته،چې که مسلمان پکې پر لمانځه ولاړ وي او له خدايه څه وغواړي؛نو هرومرو يې ورکوي.( آنحضرت په خپل لاس د دې وخت لږ والى و‌ښود. (شيبا ني ٣ \٣١٤)

ðد قدر شپه د روژې  مياشتې په وروستيو لسو په طاقو کې ولټوئ . (ناصف : ٢\٨١)

ðخداى نرم خويه دى او نرمي يې خوښه ده او نرمۍ ته هغه څه ورکوي، چې سختوالى  ته يې نه ورکوي . ( المعجم   ٢\٢٨٤)

ðهڅېکله څوک پر مخ مه وهئ . ( سنن احمد٣\ ٣٢٣ )

 

په زماني واټن کې زده کړه

ðحضرت “عبدالله بن مسعود” وايي : پېغمبراکرم زموږ د ستړيا له وېرې په هر وڅو ورځو کې راته موعظه کوله . (بخاري  ١\ ٦٨ ) 

زياتوي : له پېغمبره مو د قرآن لس آيتونه زده کول او تر هغه مو ورپسې لس آيتونه نه زده کول،څو مو دا لس زده کړي نه وو. شريک ته وويل شو: يعنې عمل مو پرې کاوه؟ويې ويل : هو! (محمد سعيد رآفت؛ الرسول المعلم ونهجه فى التعليم ، ١٤٣ مخ )

تکرار

ðحضرت “انس” وايي : پېغمبر اکرم،چې خبرې کولې؛نو درې ځل يې ويلې،چې ښه پرې وپوهول شي . ( ناصف  ١\ ٧١.  نووي  ١\ ٦٦٤ )

ðد قرآن حافظ د هغه په څېر دى،چې اوښ يې تړلى وي،که و يې څاري، پاتې کېږي او که پرانځې يې او خوشې يې کړي؛نو ځي .(المعجم ١\ ٢٤ )

 ðبنده چې ګناه وکړي؛نو پر زړه يې تور ټکى راپيدا کېږي،که له ګناه يې لاس واخست او بښنه يې وغوښته او توبه يې وکړه،زړه يې پاکېږي؛خو که تکرار يې کړه؛نو دا ټکى ډېرېږي او لا ډېرېږي،ان چې ټول زړه يې ونيسى .دا هماغه زنګ دى،چې پاک خداى ويلي دي : نه؛بلکې څه يې چې کول، زړونو يې زنګ ونيو . (شيبا ني  ١\ ١٩٤)

 

رغنده سيالي

ðد قرآن په ډېرو آيتونو کې د “ايمان” ترڅنګ “عمل” راغلى دى او پېغمبراکرم به د رغنده سيالۍ له لارې يارانو ته زده کړه کوله . حضرت “کلده ابن حنبل” وايي : ((پېغمبر اکرم ته ورغلم او سلام مې پرې وانه چاوه . پېغمبر راته وويل:ستون شه او بيا راننوځه اووايه : پر تاسې سلام،  اجازه ده ،چې راننوځم .)) ( نووي  ١\٦٧٤)

 ðپوهه په زده کړه ترلاسه کېږي او زغم په زغملو او څوک چې “ښه” غوره کړي؛ ورته ورکول کېږي او څوک چې هڅه وکړي ځان له بدۍ وژغوري (؛نو) ژغورل کېږي .)) (تخريج زين الدين ابي الفضل العراقي لا حاديث کتاب احياء  علم الدين غزالي ٣\١٧٦)

٦_پاملرنه په زده کړه کې ډېر مهم عامل دى؛ځکه انسان،چې څه ته پام نه وي اړولى، زده کولاى يې نشي.

( الف ) د پام اړونې لپاره له روانو پېښو ګټنه :

ð ((پېغمبراکرم له يوه بازاره تېرېده او خلک يې دواړو لوريو ته تلل (په دې ترڅ کې) د آنحضرت سترګې پر يوه مړه “غوږبوچي” سېرلي ولګېدې، آنحضرت له غوږه ونيو او را پورته يې کړ او و يې ويل: څوک به دا په يو درهم واخلي؟ورته وويل شول : په هيڅ يې هم نه اخلو، څه پرې وکړو؟ آنحضرت ورته وويل : خوښېږي مو،چې مال مو (همداسې وړيا) وي؟ ورته يې وويل : پر خداى قسم،چې ژوندى هم و؛ نو غوږ بوچى و، اوس خو لا مړ دى . ( آنحضرت  ورته وويل : پر خداى قسم ! دا څيز،چې تاسې ته بې ارزښته دى ؛نو خداى ته دنيا تر دې هم بې ارزښته ده.))

( نووي  ١\٤١٤)

ðپېغمبراکرم ته يې يو شمېر بنديان راوستل .په دوى کې يو تيخور ماشوم هم و ،چې مور يې په منډه ورته ځان راورساوه. را و يې نيو او په سينې پورې يې جوخت ونيو او تى يې ورکړ. پېغمبراکرم وويل : په نظر مو دا ښځه به دې تياره وي،چې خپل ماشوم په اور کې وغورځوي؟ ورته مو وويل : نه پر خداى ! آنحضرت وويل : ښځه چې پر خپل ماشوم مهربانه ده؛نو خداى تر دې ډېر پر خپلو بندګانو مهربان دى .( نووي ١\٣٨٠- ٣٨٤)

 

په پوښتنې د پام راړول

ðايا له هغه مو خبر نه کړم،چې د دوزخ اور پرې حرام دى؟پر هر نرم خويه ښه سړي . (نووي  ١\ ٥٣٤)

ðدا کومه مياشت ده؟ورته ومو ويل: خداى او استازى يې ښه پوهېږي . آنحضرت چوپ شو او ګومان مو وکړ،چې پر مياشت به بل نوم ږدي؛ ويې ويل : ولې ذيحجه نه ده؟ ورته مو وويل: ده . و يې وويل : دا کوم ښار دى؟ ورته مو وويل : خداى او استازى يې ښه پوهېږي . (آنحضرت چوپ شو او ګومان مو وکړ،چې پر ښار به بل نوم ږدي . و يې ويل : بلده ( مطلب بلدالحرام يا مکه مکرمه) نه دى؟ ورته مو وويل : دى . نن څه ورځ ده ؟ ورته مو وويل :خداى او استازى يې ښه پوهېږي . حضرت چوپ شو او ګومان مو وکړ،چې بل نوم به پرې ږدي . ويې ويل : ولې د قربانۍ (او لوى اختر) ورځ نه ده ؟ ورته مووويل : هو ده. و يې ويل : ستاسې ځان، مال او پت پر يو بل داسې حرامې (او محترمې ) دي؛لکه دا ورځ،چې په دې ښاراو مياشت کې حرامه ده . ( نووي  ١\ ٢٣٧)

يادونه : دغسې په تېرو عنوانو کې دوو احاديثو ته ځير شئ : پوهېږئ چې مفلس څوک دى ؟پوهېږئ چې غيبت څه ته وايي؟

 

په مثال او تشبيه د پام رااړول

ðپاک خداى،چې زه د کومې لارښوونې او معرفت لپاره رالېږلى يم ، مثال يې د هغه باران په څېر دى،چې پر ځمکه وورېږي او د ځمکې هغه برخه،چې(ېبروره) حاصلخيزه وي،اوبه جذب کړي او بوټي او واښه راوټوکوي او يوه برخه يې،چې سخته وي؛نو اوبه پر ځان ډنډ کړي او خلک ترې ګټه واخلي،څښي يې او کر پرې کوي او يوه برخه يې،چې ښوره وي؛نو نه پکې اوبه ډنډېږي او نه پکې بوټي او واښه راټوکېږي . دا د هغه چا مثال دى،چې د خداى په دين کې پوه وي او زه چې خداى د څه لپاره رالېږلى يم، ګټه ورورسوي او په خپله (هم) پوه شي او نورو ته يې هم وښيي او د هغه چا مثال چې ګټه ترې وانخلي او د خداى لارښوونه ونه مني،چې زه  ورته رالېږل شوى يم .)) (نووي ١\١٣٥)

امام نووي ( ١\ ١٨٦ ) د حديث په تشريح کې وايي : ((په دې حديث کې رسول اکرم ،د خداى له لوري راوړې لارښوونه او معرفت له ګټور باران سره تشبيه کړى؛ځکه لکه څنګه چې باران ځمکه راژوندۍ کوي؛نو لارښوونه او معرفت هم زړونه را ژوندي کوي او څوک چې له دې لارښوونو او معرفته برخمنېږي،د پاکې او ېبرورې ځمکې سره يې تشبيه کړې،چې اوبه جذبوي او بوټي ترې راټوکېږي او څوک چې پوهه تر لاسه کوي او نورو ته يې (هم) ښيي؛خو په خپله ترې ګټه نه اخلي، له سختې ځمکې سره تشبيه کړې،چې اوبه نه جذبوي؛بلکې پکې ډنډېږي او خلک ترې ګټمن کېږي؛خو په خپله يې (نه جذبوي او) نه مني او بوټي او واښه ترې نه راټوکېږي او څوک چې نه علم زده کوي او نه عمل کوي، له ښوره ناکې ځمکې سره يې تشبيه کړي،چې نه اوبه ډنډوي او نه بوټي او واښه رازرغونوي او دا ډېر ناوړه انسانان دي،چې نه چاته ګټه رسوي او نه په خپله ګټمن کېږي . ))

ðهغه چې الهي پولې ساتي او هغه چې يې ماتوي،د هغه ډلې په څېر دى،چې په بېړۍ کې د ځاى پر سر پچه اچوي،چې د ځينو د بېړۍ پاس او د ځينو لاندې برخه رسېږي،هغوى چې په لاندې برخه کې اوبو اخستو ته پر بېړۍ د ناستوخلکو له منځه تېرېږي،ويې ويل: دا چې پاس ناست خلک په تکليف نشي؛نو ښه ده په خپله برخه کې سورى وکاږو.اوس که پر بېړى پاس خلک،دوى پرېږدي،چې سورى وباسي؛نو ټول به ډوب او پوپناه شي؛خو که مخه يې ونيسي؛نو ټول به له ډوبېدو وژغورل شي .

 ( نووي  ١\٢١٠ )

 [ تبصره : د ناوړه کار کول،نه يوازې کوونکي ته زيان رسوي؛بلکې ټولنه هم زيانمنوي،دغسې ټولنې ته د ناوړو چارو د مخنيوي هم ګټه رسي او دا په دې مانا ده،چې د ټولنې د ساتنې لپاره ګرده ټولنه، له فسادسره د مبارزې مسوؤله ده،چې دا مفهوم په پورته حديث کې ښه انځورشوى دى .]

ðد ښه او بد ملګري مثال د”عطر پلور” او “پښ” (اهنګر) په څېر دى. عطر پلور درته يا څه عطردرکوي يا يې ته ترې پېرې او يا يې له ښه بويه برخمنېږې او پښ دې جامې سوځوي او يا يې بدبوي دررسي . (نووي  ١\ ٣٣٩ ) .

 

انځورول

٧-په ورو زده کړه : 

پېغمبر اکرم ته له “ثقيفه” يو پلاوى راغى . پېغمبر اکرم ورته په جومات کې ځاى ورکړ،چې ډېر تر اغېز لاندې راشي . هغوى دا شرط کېښود، چې زکات  به نه ورکوي،په جهاد کې به ګډون نه کوي او رکوع اوسجده (لمونځ) به (هم) نه کوي . پېغمبراکرم ورته وويل : زکات مه ورکوئ،په جهاد کې برخه مه اخلئ ؛خو په هغه دين کې خير نشته،چې رکوع پکې نه وي.(شيبا ني  ٣\٢٤٠)

ðپېغمبراکرم حضرت “معاذ” ته وويل : ((ته کتابيانو ته ځې؛نو هغوى دې ته راوبله،چې يوازې “الله” حق معبود دى او “محمد” يې استازى دى .که و يې منله؛نو ورته ووايه،چې په شواروز کې پينځه وخته لمونځ فرض دى او که دا يې ومنله؛نو ورته ووايه،چې خداى پرې صدقه فرض کړې ده،چې شتمن دې يې نشتمنو ته ورکړي او که دا يې درسره ومنله؛ نو هغوى ته چې کومې شتمنۍ خورا ګرانې وي، ترې مه اخله او د مظلوم  له ښېرا وډار شه؛ځکه د مظلوم اوخداى ترمنځ پرده نشته .)) (ناصف  ٢\٣٢٢)

په دې حديث کې سپارښتنه شوې،چې دا ټولې چارې به په يوه ځل نه کوې ؛بلکې په ورو ورو او په تدريج د اهميت له مخې به پرمخ ځې .

 

 

 

 

امبريالوژي (جنين پوهنه)

ð((داسې نه ده،چې ټولې اوبه به اولاد کېږي .))( محمد علي البار؛ الوجيز فى علم الاجنة القرآني:١٤مخ )

ð ((انسان د نر او ښځې د څاڅکو له يوځاى کېدو پيدا کېږي .)) ( پورته : ٢٠ \٢١مخونه )

ð ((څاڅکى چې په زيلانځ کې شي؛خداى پرښته رالېږي،پرښته وايي : پالونکيه!شکل نيولې يا نه نيولې؟ که ووايي:شکل نه نيولې؛نو زيلانځ دا پرنډه (زيانوي او) دباندې يې غورځوي .)) (محمد علي البار خلق الانسان بين الطب والقرآن : ٢٠ \٢١٠ مخونه )

ðله حضرت “ابن مسعود” روايت دى،چې پېغمبر اکرم وايي: ((ستاسې د هر يو پيدايښت داسې دى،چې څلوېښت ورځې د خپلې مور په ګېډه کې څاڅکى ياست بيا همدومره موده د”علقه” په بڼه ياست،ورپسې همدومره موده د “مضغه” په بڼه پاتې کېږئ بيا پرښته رالېږل کېږي او ساه پکې اچوي او د څلورو څيزونو امر ورته کېږي (چې ويې ليکي ) : ( ١) روزي يې ( ٢) د عمر نېټه يې ( ٣) کړه وړه يې (٤) بدمرغي يا نېکمرغي يې . ))  ( نووي  ١\ ٣٦٥)

[ تبصره:د جنين پوهنې له مخې هم دجنين حرکت د درېمې مياشتې په وروستيو او د څلورمې مياشتې په سرکې پيلېږي .]

ð ((مخ مې هغه ته پرخاوره ږدم،چې په خپل قدرت يې پيدا کړم او غوږ او سترګې يې ورته پيدا کړې.))  (المعجم ٢\ ٤١٥)

[پورته حديث له جنين پوهنې سره اړخ لګوي،چې په جنين کې تر ليدو مخکې اورېدل راپيدا کېږي .]

ð((د نرڅاڅکى سپين او د ښځې ژېړ وي؛نو دا دواړه،چې يو ځاى شي او د نر څاڅکى د ښځې پر څاڅکي برلاس شي؛د خداى په حکم،زوى راوړي؛خو که د ښځې څاڅکى د نر پر څاڅکي برلاس شي؛ د خداى په حکم ،نجلۍ راوړي)) (مسلم٣ \٢٢٧)

ðپېغمبراکرم (ص) ته د “بني فزاره” يو سړى راغى او و يې ويل : مېرمن مې تور زوى زېږولى دى . پېغمبر(ص)ورته وويل:(اوښ لرې؟) سړي ورته وويل : هو! آنحضرت ورته وويل : (رنګ يې څنګه دى؟) سړي ورته وويل : سور دى . آنحضرت ورته وويل : په وېښتانو کې يې ايرو رنګي شته؟ورته يې ويل: ځينې يې شته . آنحضرت ورته وويل : ولې داسې شوې دي؟ سړي ورته وويل : ښايې ارثي وي . آنحضرت ورته وويل: ((ښايي دا هم ارثي وي .)) ( ناصف شيباني: ٤\ ١٧٢)

ð څاڅکى چې په زيلانځ کې ځاى ونيسي؛نو خداى پکې ددې او آدم ترمنځ هرډول تړاو ټينګوي . (محمد علي البار؛ خلق الانسان بين الطب والقرآن : ١٩٧مخ )

ð خپلو څاڅکو ته(وړ مېرمنې) غوره کړي او له خپلو سيالانو ښځې وکړي او خپلو سيالانو ته يې ور هم کړئ . ( المعجم ٦\ ٤٧٤ )

 

کوچني

ð((کوچنيانو ته مو په اوه کلنۍ کې د لمونځ کولو امر وکړئ او په لس کلنۍ کې يې دې کار ته تنبيه کړئ او بسترې يې بېلې کړئ.)) (ابوداوود : ١\٤٩٥ ، احمد ٢\ ١٨٠)

 ðپر درېو مسوؤليت نشته :(١) ويده،چې راويښ شوى نه وي ( ٢) ماشوم ،چې محتلم شوى نه وي ( ٣) لېونى ،چې روغ شوى نه وي .))

 ( ناصف  ٢\ ٣٢٨)

 

د خوړو اداب

ð((په ښي لاس خوراک څښاک کوئ؛ځکه په کيڼ لاس شيطان خوراک څښا ک کوي .))  (ابوداوود ٣\ ٣٤٩ .ترمذي ٧ \ ٣٠٥ – او ٣٠٦)

ð ((د خوړو په پيل کې”بسم الله” ووايئ او په ښي لاس د خپلې مخې خواړه خورئ .)) ( المعجم ١\٧٣)

 

ځوان ته د پېغمبراکرم نصيحت

ð ((ځوانه! څو ټکي درښيم : د خداى درناوى وکړه،چې خداى دې هم درناوى وکړي . د خداى درناوى وکړه،چې هغه به دې په مخ کې وي،که څه غواړې؛له خدايه يې وغواړه او که مرسته (هم) غواړې؛له خدايه يې غواړه او پوه شه،که ټول خلک راټول شي،چې ګټه درورسوي؛نو در و به يې نه رسوي؛خو هماغه څه چې خداى درته ليکلي وي او که ټول خلک راټول شي،چې زيان درورسوي؛خو نه يې شي دررسولاى؛خو څه چې خداى درته کښلي وي، قلمونه بند شوي او رنګونه وچ شوي دي .)) ( المعجم: ١\ ٤٨١)

 

شخصيت

ðما خپل ټول بندګان حنيف (الله لمانځونکي) پېدا کړي دي؛خو شيطان ورپسې وﻻړ او له دينه يې واړول . (ناصف ٤\١٣٨)

ð حلال (هم)څرګند دي اوحرام هم . (شيباني٤\١٣٨)

ðانسان په خپل فطرت حلال او حرام،حق او باطل،ښه او بد،فضيلت او ذلت درکولاى شي.حضرت “وابصه بن سعيد” وايي: رسول اکرم (ص)ته وﻻړم،راته يې وويل:((راغلې،چې نېکي او بدي وپوښتې؟ورته مې وويل: هو! راته يې وويل: ((خپل زړه وپوښته، په څه چې زړه (تسکين اوارام ) مومي،نېکي ده او په څه چې ونه مومي او په سينه کې ناکراره وي ، که څه هم په اړه يې درته خلک هره فتوا درکړي(؛نو)ګناه ده.))

( نووي : ٥٠ ٥ا و٥٠٦ )

ðکه څوک ددې لپاره کار کوي،چې لاس يې چاته اوږد نشي او ځان له خلکوبې اړې کړي(؛نو)دا هلې ځلې يې د خداى په ﻻر کې دي او که کار يې د بېوسې موروپلار او کوچنيو اوﻻدونولپاره وي(؛نو بيا هم) د خداى په ﻻر کې دي؛خوکه ددې لپاره کار کوي،چې شتمني يې ډېره شي او ځان خلکو ته وښيي او ووياړي(؛نو دا هلې ځلې يې)د شيطان په لارکې دي . ( تخريج زين الدين العراقي ٢\٦١)

ðخداى له ګردې ځمکې يو موټى خاوره راواخسته او آدم(ع) يې ترې جوړ او پيدا کړ؛نو ځکه يې اوﻻد د ځمکې په څېر دى؛ځينې سره،ځينې سپين،ځينې تور،ځينې ددې ټولو ګډوله دي،ځينې نرم،ځينې تريخ زيږه،ځينې ناپاکه او ځينې پاک دي . (ناصف ٤\٣٩ )

ð خلک هم د سرو سپينو په څېر دي،که ديني پوهه ولري؛نو هغوى چې په جاهليت کې غوره ول؛نو په اسلام کې هم غوره دي . (ناصف ٥\٨١)

ðڅومره مو چې له وسې پوره و،له کومو څيزونو،چې مې منع کړي ياست،ځان ترې وژغورئ او د کومو څيزونو مې،چې درته ﻻرښوونه کړې،عملي يې کړئ . ( ناصف١\٤٤)

ðموږ د پېغمبرانو ټولي ته ﻻرښوونه شوې،چې خلک پخپلو ځايو کې کېنوو او د عقل هومره يې ورسره خبرې وکړو. ( تخريج زين الدين ابي الفضل العراقي: ١\٥٧)

ð خداى چې د چا خير وغواړي؛نو په دين يې پوهوي،زه په حقيقت کې وېشونکى يم او دا خداى دى،چې لوروي او پېرزو کوي يې . (ناصف: ١\٦١)

 

د مېرمنې د ټاکنې غوره کچه

ðله ښځوسره،چې واده کېږي؛نو له دې څلورو څيزونو،يو پکې لامل وي 🙁 ١) شتمني يې ( ٢) کورنۍ يې (٣) ښکلا يې ( ٤) دينوالي يې. ته د هغې د دينولۍ له امله ورسره واده وکړه . ( المعجم ٢\ ١٦٦)

ðيو تن پېغمبرا کرم(ص)  ته راغى او د خپل واده په هکله يې ورسره سلا مشوره وکړه. پېغمبراکرم(ص) ورته وويل:واده وکړه؛خو له متدينې ښځې سره.  (وسايل ١٤\٣٠)

 

دوستي

ðبنيادم د خپل دوست او ملګري په دين دى؛نو ځير شئ،چې له چا سره دوستي کوئ . (نووي ١\اتم حديث ٣٦٨مخ )

 

زړه

ðګناهونه (يو يو) زړونو ته داسې وروړاندې کېږي؛لکه پوزى،چې له يوې پاډې يا پټې اوبدل کېږي؛نو کوم زړه چې ګناهونه ومني يو تور ټکى پکې پيدا کېږي او چې و يې نه مني؛سپين ټکى پکې منځ ته راځي او داسې سپېنېږي؛لکه ښويه ډبره،چې تر اسمانو او ځمکې ټينګه پر ځاى وي او هيڅ فتنه او ګناه ورته زيان نه شي رسولاى اوبل دومره تک تورګرځي؛لکه نسکوره کوزه،چې بې له خپلو ځاني غوښتنو بل هيڅ ښه او بد نه پېژني . (صحيح مسلم : ٢\١٧١- ١٧٣.دامام احمد مسند : ٥ \ ٣٨٦)

ð زړونه څلور ډوله دي : (١)لوڅ لغړ زړونه دي،چې څراغ ته ورته يو څه پکې بلېږي .( ٢)په پردو کې رانغښتي زړونه دي ( ٣) نسکوره زړونه ( ٤) دوه اړخيز زړونه دي .لومړى ډول د مؤمن زړه دى ،چې څراغ يې د مؤمن خپله رڼا ده.دويم ډول د کافر او درېم د منافق زړه دى او په دوه اړخيز زړه کې هم ايمان دى او هم نفاق . د ايمان مثال يې د شنو دى،چې له ښو اوبو جوړ شوى دى او د نفاق مثال يې زوه ده،چې له خيريو او وينې جوړ دى،که هر يو پر بل برلاس شي؛نو هماغه (ايمان يا نفاق ) پر زړه برلاسېږي .)) ( احمد  ٣\ ٧)

ðخداى ستاسې څېرو او شتمنيو ته نه ګوري؛بلکې زړونو او کړنو ته مو ګوري . ( ناصف  ١\٥٥)

ðله درېو ډلو سره ناسته ولاړه زړه وژني : (١) له پستوخلکو سره ( ٢) له ښځوسره خبرې( ٣) او له  شتمنو سره . ( الکافي ٢\ ٦٤١)

ðد زړه ړوندوالى،ډېر ناوړه ړوندوالى دى . ( بحارالانوار ٦٧\٥١)

ðد دين (د پاسوالۍ) لپاره ناوړه مرستندويان دادي : (١) ډارن زړه (٢) ډېر خوره ګېده ( ٣) او ډېر شهوت . ( الکافي ٦\٢٦٠)

ðد مؤمن زړه،چې له الهي ډاره لړزېږي،ګناهونه يې  د ونې د پاڼو په څېر رژېږي . (بحارالانوار67/394)

ðد بدمرغۍ له نښو (دي) :د سترګو وچوالى،د زړه سختوالى،د دنيا غوښتنې، حرص او پر ګناه ټينګار .( الکافي  ٢\٢٩٠)

ðدنيا تر هغه پای ته نه رسي،چې : د مؤمن زړه (له کړاو او سختۍ) ويلې شي او مؤمن د مړ پسه په څېر خوار شي.(مشکاة الانوار : ٢٨٨)

ðد خداى،چې کوم بنده ښه و ايسي؛په زړه کې يې ورته د خپګان څه څپه کېنوي؛ځکه د خداى خپه زړونه ښه ايسي او جهنم ته يې نه ننباسې، چې له ډاره يې داسې ژاړي؛لکه شيدې،چې د مور له تيونو راوځي او د خداى،چې کوم بنده ښه نه ايسي؛په زړه کې يې ورته د خندا څه څپې اچوي؛ځکه (د زړه له کومې)خندا زړه وژني او خداى هغوى ښه نه ګڼي ، چې له زړه خندوني وي . ( وسايل : ٧\٧٦)

ð د زړه ماتوالى د خداى رحمت دى؛نوپه دې وخت کې دعا غنيمت وګڼه . ( کنز ٢/١٠٢ )

ð بى حکمته  زړه کنډه واله دى .( کنز ١٠ /١٤٧)

ð زړونه مو د دنيا په ياد مه بوختوئ . ( کنز ٣/١٩٨)

ðپه رښتيا چې “الله تعالى” ستاسې تنو او څېرو ته نه ګوري؛ بلکې زړونو ته مو ګوري .(سنن ابي داوود)

ðد بنده په زړه کې کله هم حرص،بخل او ايمان نه يو ځاى کېږي . (نسايي)

 

بنيادم

ðخداى له تاسې د جاهليت کبر او غرور او پر پلرونو وياړنه له منځه يووړل[ اوس تاسې په دوه ډوله ياست] پرهېزګار مؤمن او ګناهګار مؤمن . تاسې د آدم اولاده ياست او آدم له خاورې و.( ناصف :٦٠-٦١مخونه )

ðپوه شئ،چې بنيادمان په بېلا بېلو پوړيو پيدا شوي دي : ځينې مؤمن زيږي،مؤمن ژوند کوي او مؤمن مريې.ېځيني کافر زيږي،مؤمن ژوند کوي (؛خو) کافر مري او ځينې کافر زيږي،کافر ژوند کوي (؛خو) مؤمن مري .  ( ناصف  ٥\ ٢٨٩)

 

ځان ساتنه

ðخلکو!خداى مو يو دى او پلارمو هم يو دى . پوه شئ،چې عرب پر ناعرب او ناعرب پر عرب،سپين پر تور او تور پر سپين غوره نه دى؛ خوپه تقوا.) ) ( احمد ٥\ ٤١١)

ð هېڅوک پر يو بل غوره نه دى؛خوپه دين يا تقوا (اوپه بل روايت کې)  ؛خو چې دين يا کړه يې ښه وي . ( احمد ٤\٤٥- ١٥٨٠مخونه )

ð پرهېزګار ډېر خداى ته عزتمن دى . (نووي  ١\١٠٣)

ð (( خداى ته د قيامت پر ورځ د ښه قدوقامت سړى راځى؛خو خداى ورته د ماشي د وزره هورمره ارزښت نه ورکوي او ويې ويل:ولولئ : د قيامت پر ورځ به ارزښت ور نه کړم.)) ( ناصف  ٤\١٧٢)

 

اروايي روغتيا

ð له چاسره،چې د آخرت غم وي،خداى يې زړه غني کوي او پرېشاني يې لرې کوي او دنيا ورته په خپله مخه کوي او له چا سره،چې د دنيا غم وي؛ پاک خداى نيستي يې ورته په مخ کې ږدي او ټولى يې پرېشانوي او له دنيا ورته يوازې هومره رسي،چې ورته ټاکل شوې ده؛نو شپه و ورځ په نېستۍ تېروي .بنده،چې کله هم خداى ته مخه کړي؛خداى ورته په مينه د مؤمنانو زړه تابع کوي او خداى ورته په بيړه ټولې ښېګڼې رسوي .))  ( شيباني ٤\ ١٨٤)

ðڅوک ضمانت راکوي،چې له خلکو به څه نه غواړي،چې زه ورته د جنت ضمانت ورکړم ؟حضرت ثوبان وويل :زه! او بيا مې له هېچا څه ونه غوښتل . ( ابوداوود ٢\ ١٢١) 

ð پر خداى قسم، چې زما ساه يې په واک کې ده،که تاسې هر يو خپله رسۍ واخلئ او پر شا خس راوړئ ؛نو دا ورته تر دې غوره ده،چې چاته ورشئ او څه ترې وغواړئ،که څه درکړي يا درنه کړي .)) ( ناصف ٢\ ٣٥)

ðد خپلو اولادونو درناوى وکړئ اوښه يې وروزئ .)) (ابن ماجه، الادب ٢ټوک، ٣٦٧١ حديث.)

ðپه روايت کې راغلي،چې د يوې نجلۍ نوم “عاصيه”(سرغړانده) وه، رسول اکرم يې نوم واړاوه او “جميله” يې ونوموله.)) ( ناصف : ٥\٢٦٧)

ðتاسې هر يو پالندوى ياست او د تر لاس لاندې پر وړاندې مسوول.د خلکو مشر،د هغوى پالندوى او د خپلو تر لاس لاندې پر وړاندې مسؤول دى؛نارينه د خپلې کورنۍ پالندوى او د خپلو ترلاس لاندې پر وړاندې مسؤول دى . مېرمن د خپل مېړه د کور پالندويه او د کورنۍ پر وړاندې مسؤوله ده . مريى د خپل خاوند د شتمنۍ پالندوى او پر وړاندى يې مسؤول دى؛نو تاسې هر يو پالندوى ياست او د خپلو تر لاس لاندې پر وړاندې مسوول ياست.)) ( ناصف  ٣\٤٧- ٤٨)

ðواقعي وسمني په ډېرې شتمنۍ درلودو کې نه ده؛بلکې په دې کې ده،چې انسان مړه خوا وي .)) (ناصف  ٥\١٦٦)

ðتر ځان ټيټو ته ووينئ،نه تر ځان لوړو ته او دا کار ددې لاملېږي،چې د خداى درکړي لورنې ناڅيزه ونه بولئ .))  (ناصف  ٥\١٦٦)

ðد خداى پر درکړي قسمت راضي وسه،چې ډېر مړه خوا وسې .))

( ناصف ٥ \١٦٦- ١٦٧)

ð مؤمن ته چې څه غم،خپګان،رنځ،ناروغي او اندېښنه رسي؛ نو له امله يې خداى ورته ګناهونه بښي .)) ( شيباني ٣\٣٤٣)

ð د خپل لاس ګټلي خواړه ډېرغوره دي،داوود(ع) د خپل لاس ګټلي خوړل .)) ( نووي  ١\ ٤٧١)

 

کرهڼه

ðکه قيامت شي او د چا په لاس کې نيالګى وي او د ولاړېدو وس يې نه وي،چې ويې کري (؛نو بيا دې هم ) دا کار وکړي . (احمد ٣\ ١٨٣ – ١٧٤ ، ١٩١ .)

 

ورهڼه

ð بوخت مؤمن د خداى ښه ايسي. (تخريج زين الدين عراقي لا حاديث کتاب احيا علوم الدين للغزالي ٢\ ٦١ )

ð د خداى هغه ښه ايسي،چې کار سم سوتره ترسره کوي.)) (بيهقي؛شعيب  للاايمان ؛طبراني )

ð خداى ته تر بېوسې مؤمنه،ځواکمن مؤمن غوره دى .)) (نووي ١\ ١٠٠ )

ðسود خوړل،ډېر ناوړه کسب دى .( الکافي ٨\٨١)

ðد روزۍ تر لاسه کول ( د لمانځه،روژى او…عبادتونو)په څېر يو فرضي،چار دى .( بحارالانوار  ١٠٠ \١٧)

ðڅوک چې په نارواوو څه لاس ته راوړي،خداى به يې فقير او نشتمن کړي.( الامالي للطوسي : ١٨٢)

ðله ناروا لارو د مال لاس ته راوړنه به هغه دوزخ ته راکاږي .( مستدرک الوسايل ١٣\٢٢)

ðد سپي ( پېر و پلور) ډېر ناوړه کسب دى .( بحارالانوار  ١٠٠ \٥٦)

 

ډاډمني او روغتيا

ð پرهېزګار ته شتمني بده نه ده؛خو روغتيا ورته تر شتمنۍ غوره ده او ډاډمني په خپله يوه لورنه ده.)) (ابن ماجه: ٢\ ٢١٤١حديث احمد: ٥\ ٣٨١)

ðڅوک چې ګهيځ کړي او ډاډمن وي او پر تن روغ(هم) او د خپلې ورځې خواړه  هم ولري؛نو داسې به وي؛لکه چې ټوله دنيا ورته ورکړ شوې وي . ( شيباني ٤\٤٥ )

ðکه الله پاک د کومې کورنۍ خير ښېګڼه وغواړي؛نو ورته د لورنې او ډاډ لار ورښيي؛خو که څوک له لورنې بې برخې شي؛نو له خير او ښېګڼې به بې برخې شوى وي .(مستدرک الوسايل  ١١\ ٢٩٣)

ðډاډ د خداى له لوري دى او بيړه د شيطان . ( وسايل : ٢٧ ١٦٩)

ðتر ډاډمنۍ اونرمۍ بل څه خداى ته ګران نه  دي .( بحارالانوار ٧٢ \ ١٤٨)

ð خدايه! بدن،غوږ او سترګې مې روغې رمټې لرې، بې له تا وړ معبود نشته . (تخريج …: ١\ ٣١٩ )

ðله خدايه يقين او روغتيا وغواړئ؛ځکه تر يقين وروسته،روغتيا غوره څيز دى،چې چاته ورکول کېږي . (ابن قيم الجوزية:الطب النبوي ٢٠٢مخ )

 

ځواک

ð څه مو چې په ځواک کې وي،پر وړاندې يې چمتو کړئ . (او ويې ويل : پوه شئ چې له ځواکه مطلب غشي ويشتل دى او دا يې درې ځل وويل . (منذري  ٢\ ١١حديث)

 

اروايي درمل

ðپه بدن کې يوه ټوټه ده،که روغ رمټه وي؛نو ټول بدن روغ پاتې کېږي او که فاسده شي؛ټول بدن فاسدېږي او هغه ټوټه زړه دى (شيباني ١\٣٢)

ðکوم ګناهونه،چې سړى د خپلى مېرمنې،شتمنۍ، اولاد، خپل ځان او ګاونډي په اړه کوي؛نوپه روژه، لمونځ، صدقې(يا زکات) او”پر نېکيو په امر او له بديو په منع” څنډل کېږي .(المعجم المفهرمن… ٥\٦٢)

ðکه څوک پر پينځوڅيزونو ټينګ ودرېږي او ايمانوال هم وي؛نو جنت ته ځي :څوک چې پينځه وخته لمونځ پرخپل وخت په اودس او په رکوع او سجدو پر ځاى کړي،په رمضان کې روژه ونيسي،چې د وسې يې وي،حج وکړي،د زړه له کومي زکات ورکړي او امانت پر ځاى کړي. “ابودردا” وپوښتل شو: له امانته موخه څه ده ؟ويې ويل : د جنابت غسل .)) ( ابوداود ١١\٤٢٩ )

ðپېغمبراکرم،به چې له کومې ستونزې سره مخ شو؛نو لمونځ به يې کاوه . ( ابوداود ٢\١٣٩١حديث )

ð بلاله! په لمانځه مو خاطر جمع کړه . ( مسند احمد ٥\٣٦٤)

ð څوک چې ښه اودس وکړي؛د بدن ګناهونه يې ان تر نوکانو لاندې وځي . (نووي ٢\ ١٠٦٢)

ðپينځګوني لمونځونه او د جمعې لمونځ تر جمعې پورې،چې څومره ګناهونه يې کړي پاکوي؛خو چې سترګناهونه يې نه وي کړي . (ناصف ١\١٣٥)

ð ((خداى وويل : هر عمل د هر چا خپل دى؛خو روژه زما ده او زه يې اجر ورکوم،روژه ډال دى؛نو روژه تي دې له کنځلو او شخړو ډډه وکړي،که چا ورته کنځل وکړه يا يې ورسره شخړه کوله؛نو ورته دې ووايي : زه روژه يم .)) ( نووي ٢\١٢١٦)

ðحج او عمره وکړئ،چې دا دواړه فقر او ګناهونه داسې له منځه وړي؛لکه د اهنګر بټۍ،چې اوسپنه او سره سپين نږه کوي او جنت د قبول حج بدله ده . (ناصف ٢\١٠٧)

ðستر خداى وايي : زه د بنده په ګومان يم،که ياد مې کړي؛نو زه ورسره يم .که په زړه کې مې ياد کړي؛نو زه يې هم په خپل زړه کې يادوم . که په غونډه کې مې ياد کړي؛نو زه يې د هغوى تر غونډې په غوره غونډه کې يادوم .که راته يو لوېشت رانږدې شي،زه يو ګز ورنږدېږم،که په قدم وهلوراته نږدېږي؛زه ورته په منډ منډه ورځم .(شيباني  ٢\ ١٠٥ )

ðپه هغو کورنو کې،چې خداى پکې يادېږي او د هغې،چې نه يادېږي، مثال يې د ژوندي او مړه انسان دى .( نووي ٢\ ٢٧ حديث ١٤٣٥مخ )

ðد ورځې د سلو تسبيح ويلو پر وړاندې مسلمان ته زر ثوابونه ليکل کېږي يا يې زر ګناهونه رژېږي . ( نووي ٢\٢٤ حديث )

ðڅوک چې تر هر لمانځه وروسته لاندې ټکي ووايي؛نوګناهونه يې بښل کېږي،که څه هم د سمندر د ځګ هومره وي 🙁 ١) سبحان الله ٣٣ ځله ( ٢) الحمدلله ( ٣٣) ځله ( ٣) الله اکبر ٣٣ ځله او ورپسې ووايي :  لا( اله ) – الا( الله ) وحده لا شريک له،له الملک وله الحمد وهو على کل شئ قدير. (نووي : دويم ټوک ، ١٢ حديث )

ð (( که لا ( اله ) – الا (الله ) العلى العظيم ،لا (اله ) – الا (الله ) الحليم الکريم ، لا ( اله ) – الا (الله ) سبحان الله رب العرش العظيم ، الحمد لله رب العالمين  ووايي؛نو خداى به دې وبښي،که څه هم بښل شوى اوسې .)) ( ناصف ٥\٩١)

ðقرآن ولولئ؛ځکه قرآن د قيامت پر ورځ قرآن لوستونکيو ته سپارښتنه کوي . ( نووي  ١\نهم حديث)

ðپېغمبر اکرم لېونتوب په قرآن رغولى دى .”ابي بن کعب” وايي: پېغمبر اکرم ته يې يو ليونى راووست . آنحضرت په لاندې قرآني آيتونو تعويذ کړ او داسې روغ رمټ شو؛لکه بېخي،چې ناروغ نه و:(١) “فاتحة الکتاب” او د”بقرې” سورت لومړى څلور آيتونه (٢) والهکم اله واحد و … او “اية الکرسي” .( ٣) د بقرې سورت درې وروستي آيتونه . (٤) دآل عمران،(( شهدالله انه لا اله الا هو …)) آيت .(٥)  د اعراف سورت (( ان ربکم …)) آيت .(٦) د مؤمنون سورت وروستۍ برخه ((فتعالى لله الملک الحق … )) (٧) د جن سورت ((وانه تعالى جدربنا….)) آيت .( ٨)د صافات لومړي لس آيتونه . (٩) د حشر سورت درې وروستي آيتونه. (١٠) او په ((قل هوالله احد)) او معوذتين . (سعيد حوا؛الرسول : ٢٨ او ٢٨٢ مخونه .) 

ðحضرت “عبدالله بن مسعود” روايت کړى : ((پېغمبراکرم لمونځ کاوه، چې په سجده کې لړم وچيچه . آنحضرت وويل : پر لړم دې د خداى لعنت وي،چې پر پېغمبر او ناپېغمبر رحم نه کوي بيا يې مالګوبى راوغوښت او چيچل شوى ځاى يې پکې کېښود او”قل هو الله احد” او معوذتين يې تر هغه لوسته ،چې درد ارام شو.)) (ابن قيم الجوزية؛ الطب النبوي ، ١٦٧مخ )

ðقرآن غوره درمل دي . (ابن ماجه : دويم ټوک ، ٣٥٠١حديث)

ðدعا هماغه عبادت دى،آنحضرت بيا دا آيت ولوست : ((مَنْ عَمِلَ سَيِّئَةً فَلَا يُجْزَى إِلَّا مِثْلَهَا وَمَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُوْلَئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ يُرْزَقُونَ فِيهَا بِغَيْرِ حِسَابٍ= څوك چې بدكار وكړي؛ نو د خپلو كړنو هومره بدله وركول كېږي او څوك چې نېكې چارې وكړي؛ نارينه وي که ښځه؛خو چې ايمان ولري؛نو جنت ته ننوځي او هلته به ورته بې حسابه روزي ورکړاى شي . (غافر/40) ))

مَا يُجَادِلُ فِي آيَاتِ اللَّهِ إِلَّا الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَا يَغْرُرْكَ تَقَلُّبُهُمْ فِي الْبِلَادِ =  يوازې هغوى زموږ په آيتونو كې شخړه كوي،چې (دكينې له امله) كافران شوي دي؛نو په ښارونو كې د هغوى ښکته او پورته کېدل (او د قدرت ښوونه) دې يې تا و نه غولوي!(غافر/4)  ( ناصف : ٥\١٠٩)

ðستاسې ستر او لوړ مقامى خداى حياناک دى او  چې بنده يې پر لور لاسونه پورته کړي او هغه (ذات) يې تش لاسى راوګرځوي،حيا کوي .( ناصف  ٥\١١ )

ðهر مسلمان،چې د ځمکې پر مخ خداى ته دعا وکړي؛پاک خداى يې غوښتنه ورکوي يا د هغه هومره بدي ترې لرې کوي؛خو په دې شرط،چې دعا يې د ګناه يا د خپلوۍ د اړيکو د پرې کولو لپاره نه وي . له ناستو يوه وپوښتل :نو ډېره دعا وکړو؟ آنحضرت ورته وويل : خداى هم ډېره دعا قبلوي . ( ناصف ٥\١١٠ )

ðدعا د راکېوتې او ناراکېوتې بلا لپاره ګټوره ده؛نو د خداى بندګانو، دعا و کړئ ! ( ناصف  ٥\١١٠)

ðڅوک چې دعا وکړي،دعا يې قبلېږي يا په همدې دنيا کې يې ورته ورکوي،يا د آخرت لپاره يې ورته سپموي،يا څومره دعاووې يې چې کړې وي،ګناهونه يې بښي؛خو په دې شرط،چې دعا يې د ګناه يا د خپلوۍ د اړيکو د پرې  کولو لپاره نه وي يايې بيړه نه وي کړي .(شيبا ني: ٢\٦٠ – ٦١  )

ðيوازې دعا ده،چې (الهي) قضا ګرځوى او يوازې ښه کول دي،چې عمر ډېروي .  (ناصف  ٥\١١١)

ð پر هغه قسم،چې ساه مې يې په واک کې ده،که ګناه مو نه کوله ؛ خداى تاسې (له منځه) وړئ او نور خلک يې راوستل،چې ګناه وکړي او له خدايه بښنه وغواړي او هغه يې وبښي. (نووي ١\١١حديث )

ðبنيادمان ټول ګناهګاران دي؛خو هغه غوره ګناهګاران دي ،چې توبه وکاږي . (شيباني  ١\٢١٣ )

ðخداى تعالى د خپل مؤمن بنده په توبه خوشحالېږي . (شيباني ١\٢١١ ) 

 

د اولاد روزنه او درناوى يې

ðما ته خداى ادب راښوولى دى . ( مکارم اخلاق ١\٣٤)

ðښه ادب اولاد ته د پلار غوره ډالۍ ده . ( دحاکم مستدرک ٤\٢٩٢)

ðپر پلار د اولاد دا حق دى : (١) ښه ادب ورزده کړي ( ٢) ښه نوم پرې کېږدي (٣) او د خپلې مور درناوى وکړي . (٤) قرآن وروښيي .( که زوى وي)، لامبو ورزده کړي،(که لور وي)،د نور سورت ورزده کړي او يوسف سوره ور ونه ښيي اوپر کور يې کېننوي او ژر ورته مېړه وکړي . (مجمع الزوايد ٨/٤٧)

ðنارينه د خپلې ښځې او اولاد پالندوى او پر وړاندې يې مسوول دى . (صحيح بخاري  ٩\٧٧ )

 ðله صالحو کورنيو او خېلونو سره واده وکړي؛ځکه اولاد ته د موروپلار خويونه لېږدول کېږي . ( آثارالصادقين : ٧ \ ٤٧٠)

ðښه خوى دښه ارث دليل دى . (غررالحکم : ٣٧٩مخ )

ðاولاد په لومړيو اووکلونو کې د موروپلار ښاغلى (او نازولى) دى او په دويمو اوو کلو کې يې مطيع او غاړه ايښوونکى دى(؛يعنې د موروپلار تر روزنې لاندې دى،چې امر او منع ورته وکړي) او په درېمو اوو کلو کې د موروپلار وزير او مشاور دى؛که خوى يې په ( ٢١) کلنۍ کې ښه و(؛نو ډېره ښه ) او که نه زړه پرې مه تړه او ته د خداى پروړاندې معذور يې . ( کافي ٦\٤٦)

ðاولادونه مو زموږ د ځيګر ټوټې دي،ماشومان يې زموږ واکمن دي . (بحارالانوار  ١٠٤ \ ٩٧)

ðاولادونه مو په درېو خويونو وروزئ : ( ١) له پېغمبر او (٢) د پېغمبرله کورنۍ سره په مينه ( ٣) او د قرآن لوستل .( کنزالعمال ١٦ \٤٥٦)

ðهر څيز يو بنسټ لري او د اسلام بنسټ زما له اهلبيتو سره مينه ده. (بحارالانوار  ٢٧ \٩١)

ðاولاد( ٧) کاله ښاغلى،اوه کاله بنده او ( ٧) کاله وزير دى .(کافي ٦\٤٦)

ðپه قيامت کې لا چا ګام نه وي اخستى،چې پوښتل کېږي : عمر دې په څه کار کې تېرکړى او ځواني دې څنګه تېره کړې؟ (يعقوبي تاريخ ٢/٩٠ )

 ðابوذره!پينځه څيزونه تر پينځو مخکې غنيمت وګڼه : تر زړښت مخکې ځواني او. ( بحار الانوار ٧٧ \ ٧٥)

ðد اولاد نېکمرغي يا بدمرغي د مور په زيلانځ کې جوړېږي. ( کنزالعمال؛ خبر: ٤٩ او يعقوبي تاريخ : ٢\ ٩٤)

ðښځه چې دوه ځانې شي؛نو دومره ستر اجر لري،چې څوک پرې نه پوهېږي . ( بحارالانوار  ١٠٤\ ١٠٦) 

ðښځې چې اولاد وزېږاوه؛نو لومړي خواړه دې يې کجورې وي (؛ځکه) که تر دې غوره خواړه واى ؛نو پاک خداى به د”عيسى” (عليه السلام ) د زوکړې پر مهال پر”مريم” خوړلي واى.)) (مستدرک الوسايل  ٢\٦١٩)

ðپاک خداى وايي: پر عزت،دبدبه او مقام مې قسم! که ښځه د ماشوم د زوکړې پر ورځ کجورې وخوري؛نو که اولاد يې زوى وي که لور، هرومرو به زغمناکه وي  (بحارالانوار  ١٠٤\ ١١٦)

ðماشوم مو چې وزيږېد؛نو په سپينه ټوکر کې يې ونغاړئ. (بحارالانوار  ٤٤\ ٢٥٠ )

ðماشوم مو چې وزيږېد؛په ښي غوږ کې ورته اذان او په کيڼ کې ورته اقامه او…ووايئ . (امام احمد حنبل؛مستد: ٦\٩ )

ðخاوره د ماشومانو پسرلى دى . (کنزالعمال١٦/٤٥٨.مجمع الزوايد: ٨/١٥٩)

ðحضرت عايشه بي بي وايي :ماشومان به يې پېغمبراکرم ته راوستل، آنحضرت به ورته مبارکي ويله او څه يې په خوله کې ورکول . (صحيح مسلم : ١٤ \١٢٧)

ðپر اولادونو مو د پېغمبرانو نومونه کېږدئ او “عبدالله” ،”عبدالرحمن” غوره نومونه دي.)) ( بحارالانوار  ١٠٤ \ ٩٢)

ðکه د “محمد” نوم مو کېښود؛نو مه يې وهئ او بې احترامي يې مه کوئ . ( مجمع الزوايد : ٨\ ٤٨ )

ðصالح اولاد،د خداى له لوري خوږبويه ګل دى،چې پر خپلو بندګانو يې وېشلى دى . ( کافي  ٦\٢)

ðحضرت “ابورافع” پېغمبر اکرم ته د “ابراهيم” د زوکړې زېرى راووړ؛ پېغمبر اکرم په زېري کې يو مريى وروباښه .(طبري تاريخ ٢\٣٦٢)

ðپه ځينو روايتونو (کافي٦\٣٢) کې راغلي، چې پر اولاد مو تر زوکړې مخکى نوم کېږدئ اوپه ځينو (بحار: ٤٤\٢٥٠ ) کې د زوکړې لومړى ورځ ښوول شو ې ده .

ðهر زيږېدلى د خپلې عقيقې ګرو دى . (بحارالانوار ١٠٤ \١٢١)

ðهر ځل چې ماشوم د مور تى روي؛نو مور ته يې په کړنليک کې د حضرت “اسماعيل” د اولادې د يو مريي د ازادولو هومره ثواب ليکل کېږي .( وسايل١٥ \ ١٧٥)

ðد ماشوم ژړا د اورېدو پر مهال به پېغمبر اکرم لمونځ  لنډاوه. (کافي  ٦\٤٨ )

ðله ماشومانو سره مينه وکړئ او په مهربانۍ ورسره وچلېږئ .(من يحضره الفقيه : ٢ \١٥٧)

ðڅوک چې د مشرانواحترام و نه کړي او پر کوچنيانو و نه لورېږي؛نو له ما څخه نه دى . ( د حاکم مستدرک ٤\١٩٧)

ðله اولاد سره دې نېکي وکړه،چې د موروپلار په څېر درباندې حق لري. (محجة البيضاء٣\٤٣٦)

ðحضرت موسى عليه السلام د دعا پر مهال خداى ته وويل : خدايه! تاته ډېرې اوچتې کړنې کومې دي؟خداى ورته وويل : له ماشومانو سره مينه . (بحارالانوار  ١٠٤\ ٩٧)

ðپېغمبر اکرم به ماشوم هم له ځان سره  سپراوه . ( کنزالعمال ٦\٢٨٩)

 ðماشومان به له پېغمبر اکرم کره تلل او د هغه د څښلواو اوداسه له لوښي يې اوبه څښلې او د تبرک لپاره يې پر سر او مخ مښلې او پېغمبراکرم به هم ترې نه منع کول . (محجة البيضاء ٤ \ ١٤٥ )

ðعلي ما روزلى دى . (سنن النبي : ٨٠ مخ )

ðله چا سره،چې ماشوم وي؛نو د ماشومتوب چلن دې ورسره وکړي . (وسايل١٥ \٢٠٣)

ðڅوک چې خپل اولاد خوشحاله کړي؛نو خداى به يې د قيامت پر ورځ خوشحاله کړي .(بحارالانوار  ٤٣ \ ٩٩)

ðرسول اکرم به د اصحابو له زامنو سره لوبې او ټوکې کولې او په خپل غېږ کې يې کېنول .(نهاية المسؤ ل فى رواية الرسول : ١\٣٤٠)

ðپېغمبراکرم د لمانځه لپاره جومات ته روان و،په لار کې کوچنيان پر لوبو بوخت ول،د پېغمبر اکرم په ليدو يې لوبې يې بس کړې او ورمنډې يې کړې،پېغمبراکرم په مينه ومنل او دوى پر پېغمبر ورختل او په خوشحالۍ يې ويل :(( کُن جَمَلى= اوښ مې شه)) پېغمبر هم په عاجزۍ ټيټ شو او پر اوږو او شا يې سپاره کړل او ورسره په لوبو شو. ياران د پېغمبراکرم له ځنډه اندېښمن شول . حضرت “بلال”،پر حال د پوهېدو لپاره راغى او دا حال يې،چې وليد؛نو کوچنيان يې منع کول؛خو پېغمبر اکرم منع کړ او ورته يې وويل : ددې کوچنيانو تر خپګان راته د لمانځه د وخت تنګول ښه دي.کوچنيان حاضر نه ول،چې له پېغمبره راکوز شي . پېغمبر اکرم حضرت “بلال” ته وويل : زما کور ته ولاړ شه او څه راوړه،چې کوچينان پرې راضي کړم . حضرت “بلال” ورته اته “غوزان” راوړل . پېغمبر اکرم په موسکا کوچنيانو ته وويل : اوښ مو په اتو غوزانو پلورئ؟ کوچنيانو په خوشحالۍ غوزان واخستل او له پېغمبره راکوز شول (؛نو په دې وخت کې)رسول اکرم وويل : ((خداى دې زما پر ورور “يوسف” ولورېږي،چې په څو شمېر ليو درهمو يې وپلوره او زه يې په اتو غوزانو.))  (عوفي جوامع الحکايات:محمد بن قاسم روش الاخبار، راهنماى پدران ومادران : ٢\٥٤)

ðد خپل اولاد درناوى وکړئ او په ښو خويونو يې وروزئ . (مکارم الاخلاق  ١\٤٢٦ )

 ðمور وپلار ته نه ښايي،چې خپلو اولادونو ته ووايي،چې احمق ياست يا نه پوهېږئ .  ( کافي  ٦\ ٥٠ )

 ðجنت ته د کنځل مار تګ حرام دى . (محجة  البيضاء ٥ \ ٢١٥)

ðاولادونه مو په ښو نومونو ياد کړئ،په ناسته کې ځاى ورکړئ او په تريو تندي ورسره چلن مه کوئ .( جامع الاخبار: ١٢٤ مخ )

 ðپينځه څيزونه به تر ژونده پرېنږدم،چې يو يې پر کوچنيانو سلام اچول دي،چې تر ما وروسته سنت (او دود) شي او خلک يې عملي کړي. ( بحارالانوار : ١٦ \ ٢١٥ )

 ðپېغمبر اکرم له کوچنيانو هم بيعت اخسته .( صحيح  مسلم  ١٤\ ١٢٦ )

ðکوچنيان مو په اوه کلنۍ کې لمانځه ته اړکړئ  اوکه په لس کلنۍ کې يې لمونځ نه کاوه؛نو غوږ يې تاو کړئ . (د ابي داوود سنن ١\ ١٣٣)

 ðلښته مو د کور په هغه ځاى کې ځوړنده کړئ،چې ستاسې کورنۍ يې ويني؛ځکه دا په خپله د هغوى د تاديب (ګواښنې) وسيله ده .(د طبراني معجم الکبير: ١٠ \٢٨٤. عقل الفريد : ٢\ ٤٢٠ )

ðڅوک چې پرخپله ژمنه ونه درېږي؛نو دين نه لري . (بحار ٧٥ \٩٦ )

ðله خپل کوچني سره مو پر کړې ژمنه وفا وکړئ . (مستدرک الوسايل ٢\٤٢  )

ðحضرت “عبدالله بن ربيعه” وايي :کوچنى وم او پېغمبراکرم راکره راغى،لوبو ته تللم او مور مې راته غږ کړ،چې راشه کجورې درکوم. پېغمبر چې دا خبره واورېده؛نو مور ته مې يې وويل : که کجوره ورنه کړې ؛نو په کړ نليک کې دې يو دروغ کښل کېږي .(حلبية سيرة٣\١٢٩. بحار: ١٠٤ \٩٢ )

ðلکه څنګه چې ستاسې خوښېږي،چې اولاد او نور درسره په نېکۍ او مهربانۍ چلن وکړي؛دغسې مو د خپلو اولادونو ترمنځ  په نېکۍ او مينه کې عدالت وکړئ . ( کنزالعمال١٦\٤٤٤)

ðاولادونو ته مو يو رنګ بخشش ورکړئ،په ورکړه کې توپير واى؛نو ښځمنو ته مې زيات څه ورکول . (کنزالعمال ١٦\٤٤٤)

ðيو سړى له خپل زوى او مريي سره پېغمبراکرم ته راغلل او رسول الله ته يې وويل : ګواه وسه،دا مريي مې خپل دې زوى ته وباښه .پېغمبر اکرم ورته وويل : تر ټولو اولادونو سره دې دا کار کړى ؟ورته وويل : نه ! پېغمبراکرم ورته وويل : زه ورته ناشاهدېږم که څه هم يوه سوې ډوډۍ وي . ( کنزالعمال ١٦\ ٤٤٦)

ðيو سړى له پېغمبراکرم سره ناست و،په دې کې يې کوچنى زوى راغى، سړي ښکل کړ او پر زنګانه يې کېناوه،ورپسې يې کوچنۍ لور يې راغله ؛خو ښکل يې نه کړه او خپلې مخې ته يې کېنوله . رسول اکرم چې دا پېښه وليده؛ورته يې وويل : ولې دې د اولاد ترمنځ په عدالت چلن ونه کړ؟ ( مجمع الزوايد٨ \١٥٦)

ðخداى دې پر هغه ولورېږي،چې له خپل اولاد سره په نېکۍ کې لاسنيوى وکړي .په دې اړه وپوښتل شو؟ ورته يې وويل : کوچنيان،چې پخپله خوښه کوم کارونه او دندې ترسره کوي،و يې مني او چې ورته سختې وي،ترې تېر شي او تېرى پرې و نه کړي او ګناه ته يې اړ نه کړي او دروغ ورته  ونه وايي او…)  ( کافي  ٦ \٥٠)

 ðحضرت “عبدالله بن جعفر” د کوچنيانو او څه نور مختصر څيرونه پلورل، چې پېغمبر اکرم پرې تېر شو؛ورته يې وويل : خدايه! په راکړه ورکړه کې يې برکت کېږدې .(مجمع الزوايد٩ \ ٢٨٦)

ðپېغمبراکرم حضرت “رافع بن حذيج”،چې تکړه غشى ايشتونکى کوچنى و،له ځان سره د “احد” جګړې ته بوت .(دطبري تاريخ : ٢\ ١٩١)

ð حضرت”سعد بن جبتة” يو کوچنى و،چې د “خندق” په جګړه کې يې په مړانه وجنګېد؛نو پېغمبر اکرم يې پر سر لاس راکښه او دعا يې ورته وکړه : پاک خداى دې د هغه پر اولاد او ځوځات برکت کېږدي . (حاکم؛مستدرک ٢\ ٦٩)

ðکوچنيان مو چې اوه کلن  (او په بل روايت کې) لس کلن شول؛نو بېل يې ويده کوئ . (بحارالانوار  ١٠٤ \ ٦٨)

 ðپر پلار د اولاد حق دى،چې ليکل،غشي ويشتل او لامبو ورزده کړي او پاک حلال خواړه پرې وخوري .(کنزالمعال  ١٦ \ ٤٤٣ )

ðد “بدر” هغه اسيران،چې د فديې د ورکړې وس نه لري ؛نو د انصارو زامنو ته دې ليک ورزده کړي .( ابن سعد؛طبقات  ٢\١٦ )

لوڼې

ðلوڼې مو غوره اولاد دى .( بحارالانوار ١٠٤ \٩١ )

ðڅوک چې خپلې لوڼې (يا لور) وروزي،لورنه پرې وکړي؛هرومرو پرې جنت واجبېږي . (مجمع الزوايد ٨\١٥٧)

ðلوڼې څومره ښه اومهربانې دي .( کافي ٦\٥)

ðلور خوږبويه ګل دى،چې روزي يې پر خداى ده.(بحارالانوار ١٠٤\٩٧)

ðکه څوک له بازاره څه وپېري او کور ته يې د ښځې او اولادونو لپاره راوړي؛ نو د هغه په څېر به وي ،چې نشتمنو ته يې د صدقې بار وړى وي او بايد،چې لومړى يې لوڼو او ښځو ته ورکړي او څوک چې خپله لور خوشحاله کړي؛لکه د”اسماعيل”د اولادې مريى يې،چې ازاد کړى وي . (بحارالانوار ١٠٤ \٦٩)

ðڅوک چې لور ولري او و يې نه شړي او و يې نه رټي او زوى ترې غوره ونه ګڼي؛خداى يې جنتي کوي . ( ازدواج دراسلام : ١٣٦)

ðرسول اکرم به چې له سفره راستون شو؛نو خپله لور”فاطمه” به يې ښکلوله او همداراز “فاطمه” به چې پېغمبراکرم ته راتله؛نو ورته به جګېده او د هغې لاس يې ښکلاوه او پر خپل ځاى يې کېنوله . (د ابي داوود سنن ٤\٣٥٥)

ðپېغمبراکرم د زرو يوه غاړه کۍ “امامة” (د ابي العاص بن ربيع لور او د پېغمبر اکرم لمسۍ ته  ور تر غاړې کړه  . ( دابن سعد طبقات : ٨\٤٠ )

ðخداى پر نجونو تر هلکانو مهربان دى،څوک چې لور يا له خپلو محارمو کومه ښځه خوشحاله کړي؛نو پاک خداى به يې په جنت کې خوشحاله کړي . ( وسايل  ١٥\١٠٤)

ðڅوك چې يوه يا دوه لوڼې لري،د قيامت پر ورځ به له ماسره ددې دوو ګوتو په څېر وي (دواړې ګوتې يې غبرګې کړې ) . ( مستدرك : ۱۵\ ۱۱۶)

ðغوره اولاد مو سترمنې لوڼې دي،څوك چې يوه لور لري؛نو پاک خداى دا ورته د جهنم د اور ډال ګرځوي او څوك چې دوې لوڼې لري؛نو پاک خداى يې له امله جنت ته ننباسي او څوك چې درې لوڼې يا درې خويندې لري؛نو صدقه او جهاد پرې نه كېږي .(روضة الواعظين : ۲\ ۲۶۹)

ðغوره اولاد مهربانه لور ده،چې د انسان ملګرې ده او د ناروغۍ پر مهال غمخوره او همېشه د خير كار ته چمتو ده . (مستدرك الوسايل  ۱۵\ ۱۱۵)

ðڅوك چې يوه لور لري؛نو هغه ته تر زرو حجونو،زرو جهادونو، زر قربانيو او د زرو مېلمنو تر پالنې غوره ده . (پورته منبع  ۱۵\۱۱۵)

ðڅوک چې خپله لور ښه وروزي او ديني دندې ښه ورزده کړي او له شتو الهي لورنو يې برخمنه کړي دا چار ورته شرف او پرده ده،چې د دوزخ له اوره يې ژغوري . ( کنزالمعال : ٤٥٣٩١حديث )

ðکورنۍ ته د ډالۍ ورکړه؛لکه له بېوزليو سره،چې مرسته کول وي او په وېش کې يې لومړى له لوڼو پيل کړئ او بيا يې زامنوته . (بحار: ١٠١ \٩٤)

 

د جګړې د بنديانو ملاتړ

 ð غوره خيرات هغه دى،چې هغه بندي ته ورکړ شي،چې سترګې يې له لوږې ټېغې وتلې وي . (جامع احاديث ٨ \٣٨٦ )

ðخيرات ورکړئ،چې لس ځانګړنې لري :

(الف) د پلارمړيو د پالنې توفيق .(ب) پر بنديانو لورنه . (المواعظ العدديه : ٢٢٠ مخ )

ðغوره صدقه د ژبې صدقه ده،چې بندي پرې ازاد شي او وينه پرې خوندي شي .( کنزالعمال  ٣\٢٧)

ðڅوک چې بندي ته خواړه ورکړي؛د خداى د رحمت تر سيورې لاندې به وي .(المواعظ العدديه : ٧٥مخ )

ðخلکو! د عبدالمطلب اولاده مو چې بندي ونيوه؛نو مه يې وژنئ؛ځکه په زور يې جګړې ته راوستى دى . ( مستدرک  ٢\٢٥١)

 

ښځه

ðغواړې چې له ډېرې غوره خزانې دې خبر کړم ؟ (چې داده) پرهېزګاره ښځه،چې ورته ګورې (؛نو) خوشحالېږې او د خپل مېړه خبره مني او پسې شا يې امانتونه وساتي .  (نهج  الفصاحة ٤٥٦ ح)

ðمېړه پالنه د ښه ښځې جهاد دى . ( مستدرك الوسايل ۸\۸)

ðغوره مېړه هغه دى،چې پر خپلو ځاني غوښتنو برلاسى وي . (مستدرک: مخ ٣٤٥)

ðکه “علي” پيدا شوى نه واى [؛نو) دفاطمې سيال به نه و. (کنوزالحقائق: مخ ١٤٢)

ðله کومې ښځې،چې خپل مېړه راضي وي او پر همدې حال مړه شي ؛نو جنت ته به ځي . ( ترمذي)

ðمؤمنې ته خياطي او ګنډل څه ښه بوختيا ده . (مستدرك الوسايل ۱۳\۱۸۶)

ðپه حقيقت كې ښځه د ګوډۍ په څېر ده،چې که څوك يې لري،نه ښايي  چې ضايع يې كړي . ( الكافي ۵\۵۱۰)

ð(په دنيا پالنه كې) په ښځې پسې تلل د پښېمانۍ لامل دى .( الكافي  ۵\۵۱۷)

ðڅنګه څوك خپله مېرمن وهي،حال داچې غواړي بيا يې په غېږ كې ونيسي . ( الكافي  ۵\۵۰۹ )

ðمسلمان نارينه ته ښه روزي داده : داسې مېرمن ولري،چې ورته ګوري، پرې خوشحالېږي او د مېړه په غيابو كې يې شتمني ساتي، خيانت ورسره نه كوي او خبره يې مني . (الكافي ۵\ ۳۲۷ )

 ðښکلې ښځه،چې په ناوړه كوركې لويه شوې وي،ترې ډډه وکړئ . ( مستدرك الوسايل ۱۴\۱۶۴)

ðښځه چې د مېړه بې اجازې له كوره دباندې ووځي؛نو تر بېرته راتلو پورې يې پر مېړه لګښت لازم نه دى . ( الكافي : ۵\ ۵۱۴)

ðڅوك چې له كومې ښځې سره  د هغې د ښكلا له امله واده كوي؛نو يوازې د ښكلا خير يې ور رسي او كه يوازې د شتمنۍ له امله ورسره واده كړي؛نو پاک خداى يې همدا ښځه ډډه او تكيه كوي؛نو څومره به ښه وي،چې په دينوالې ښځې پسې شئ . ( تهذيب الاحكام ۷\۳۹۹)

ðروژه تي،چې د ښځې بدن ته داسې وګوري،چې له جامو يې د بدن اندامونه او هډوكي وويني؛نو روژه يې ماته شوې ده .( وسايل الشيعة  ۱۰\۱۲۹)

ðښځه او (د نارينه بې لارۍ ته) غوسه د ابليس ښه سرتېري دي.(الكافي ۵\۵۱۵)

ðښځه چې د نفاس پر مهال ومري،د قيامت پر ورځ يې “ګناه ليك” نه پرانستل كېږي (او بې حسابه جنت ته ځي) . (مستدرك الوسايل ۲\۵۰)

ðنارينه،چې ځان د ښځو په څېر او چې ښځه ځان د نارينه وو په څېر كوي؛ خداى پرې لعنت او پرښتې پرې امين وايي . (مستدرك الوسايل ۵\ ۲۴۰)

 

د ښځمنوملاتړ

ðد دووکمزوريو د حق له لتاړلو مو ژغورم :

( الف ) پلارمړى ( ب) ښځې . ( نهج الفصاحه : ١٩٣مخ )

ðد خپلې ښځې خدمت کول يو ډول احسان دى .(نهج الفصاحه : ٣٠١مخ )

ðپه تاسې کې غوره هغه دي،چې خپلو ښځو ته غوره دي . (نهج الفصاحه : ٣١١مخ )

ðپه تاسې کې غوره هغه دى،چې خپلو ښځو او لوڼو،ته غوره وي . (نهج الفصاحه : ٣١٨)

ðد ښځو په اړه له خدايه وډارشئ؛ځکه هغوى درسره د بنديانو ( په توګه) دي .(پورته سرچينه : ٩ مخ )

ðپر مېړه د ښځې حق دى،چې کله خواړه خوري؛پر هغې يې هم وخوري او چې ځان ته جامې ګنډي،هغې ته يې هم وګنډي . پرمخ دې يې نه وهي او يوازې له کوره وتلو يې منع کولاى شي .(نهج الفصاحه: ٢٩٢)

ðپه تاسې کې ډېر غوره هغه دى،چې خپلې کورنۍ ته غوره وي . زه له تاسې ټولو خپلې کورنۍ ته غوره يم . عزتمن د ښځو درناوى کوي او بې عزته وګړي، ښځې سپکوي .( نهج الفصاحه : ٣١٨)

ðخداى او استازى(ص) يې له هغه بېزاره دي،چې خپله ښځه دومره وځوروي،چې ښځه ورته خپل حقوق وبښي او طلاق ترې واخلي. (بحارالانوار : ٧٣ \٣٦٦)

ðکور ته چې ننوځئ ؛نو پر مېرمن مو سلام واچوئ او که (ښځه) نه لرئ؛ نو ووايئ :”السلام علينا من ربنا”؛يعنې پر موږ دې د پالونکي له لوري سلام وي . ( تحف العقول : ١١٥)

ðخداى ټول ګناهونه بښي؛خو د ښځو مهر،چې ور نه کړئ؛دا ګناه نه بښي . (مستدرک الوسايل : ٢\٥٠٨)

ðاولادونو ته مو د ډالۍ په ورکړه کې له مساواته کار واخلئ،که وغواړم،چې څوک غوره وګڼم ؛نو هرومرو مې ښځې غوره ګڼلې .( نهج الفصاحه : ٣٦٥مخ .)

ðڅوک چې د خپلې مېرمنې مهر ور نه کړي؛نو د خداى پر وړاندې “زنا کار” دى .(عقاب الاعمال : ٤٦مخ )

ðخداى ټول ګناهونه بښي؛خو ددوو تنو نه : ( ١) چې د کارګر باړه او مزدوري ورنه کړي.(٢) چې د خپلې ښځې مهر ور نه کړي .( بحارالانوار : ١٠٣مخ )

ð حضرت جبرئيل راته د ښځو په اړه تل سپارښتنه کوله،تردې چې ګومان مې وکړ،چې بې له “زنا” ورته طلاق نه شو ورکولاى .( بحار ١٠٠ \ ٢٥٣)

ðمېړه چې خپله مېرمن په زنا تورنه کړي؛نو ټولې کړنې يې داسې ضايع  کېږى؛لکه مار چې خپل پوټکى وباسي او د بدن د وېښتو هومره ګناهونه ورته ليکل کېږي .(مستدرک الوسايل  ٣\١٦٦)

ðغوره اولاد مو لوڼې دي . ( بحار ١٠١\ ٩١)

ðتل جبرئيل راته د ښځو سپارښتنه کوله،تردې چې ګومان مې وکړ، چې د طلاق وړ نه دي .( وافي : ١\٩٦) 

ðخداى درته د ښځو په اړه د نېکۍ سپارښتنه کوي؛ځکه هغوى ستاسې  ميندې،لو ڼي اوتوړۍ  دي .( نهج الفصاحه : ١٠٩)

ðخداى تر نارينه وو پر ښځو ډېر لورين دى او سړى چې د خپلوانو له يوې ښځې سره نېکي وکړي او خوشحاله يې کړي؛خداى به يې د قيامت پر ورځ خوشحاله کړي . (فروع کافي ٦\٦)

ðخلکو! ښځې پر تاسې حق لري او تاسې پر هغوى؛حق مو دا دى،چې څوک کور ته راننباسي،خپل لمن ناپاکه نه کړي او که عفت يې له لاسه ورکړ؛نو خداى حق درکړى،چې زور پرې راولئ ؛بستره ترې بېله کړئ (او که دا نرم غبرګون ګټور نه شو؛نو په وهلو يې تنبيه کړئ؛خو نه دردناکه،که  ويې منله اوغاړه يې کېښوه؛نو عادي خواړه او اغوستن يې ستاسې پر غاړې دي . ښځې ستاسې په لاسو کې د خداى امانت دى . د قرآن په حکم مو ترې خوند اخستل پر ځان حلال کړي دي؛نوپه اړه يې له خدايه وډار شئ او په باب يې زما سپارښتنه ومنئ . (تحف العقول : ٣٣  مخ )

ðڅوک چې خپله مېرمن دومره وځوروي،چې ښځه خپل مالي حقوق ورپرېږدي (اوطلاق واخلي)؛نوخداى دې سړي ته يوازې د دوزخ په اور راضي کېږي؛ځکه لکه څنګه چې خداى د پلار مړيو په باب غوسه کېږي، د ښځوپه اړه هم غوسه کېږي . ( بحار  ٧٢\ ٣٦٥)

 

له دوه ځانو(اميندوارو) ښځوملاتړ

ðښځې ته د”دوه ځانۍ”له پيله د ماشوم د تي ورکولو تر وروستۍ شېبې پورې د هغه په څېر اجر دى،چې د خداى په لار کې پاسوالي کوي او که ښځه په دې موده کې مړه شي؛نو اجر يې د “شهيد” اجر دى.(بحارالانوار  ١٠١ \٩٧)

ð (دوه ځانوښځو!)خوشحاله نه ياست،له تاسې يوه،چې له خپل مېړه دوه ځانې وي او مېړه ترې خوښ وي؛د هغه ثواب ولري،چې د ورځې روژه وي او د شپې پر عبادت بوخت وي او چې ماشوم يې وزېږېد؛نو هر څاڅکى شيدې،چې يې له تيونو راوځي او هر ځل،چې يې تيونه رودل کېږي؛ ورته ثواب دى او که د خپل ماشوم لپاره د شپې ويښه وي؛نو اجر يې د هغه په څېر دى،چې د خداى په لار کې يې اويا زره بندګان ازاد کړي وي . (نهج الفصاحه : ١٠٥)

ðپر هغه خداى قسم،چې زه يې په حقه زېرى ورکوونکى او وېرونکى استازى رالېږلى يم!کومه ښځه،چې له خپل مېړه دوه ځانې شي،د زوکړې تر وخته د خداى د رحمت تر سيورې لاندې وي او د زېږون  د درد پر وړاندې د خداى په لار کې د بنده د ازادولو (هومره) اجر لري او د شيدو ورکولو پر مهال په هر ځل تي رودلو،خداى ورته د قيامت پر ورځ ځلانده رڼا ورډالۍ کوي،چې ټول خلک ورته حيران وي او د شيدو ورکولو پر مهال د هغه په څېر وي،چې د ورځې روژه او د شپې پر عبادت بوخت وي . ( مستدرک  ٢\٦٢٣)

ðد مسلمان نارينه د نېکمرغۍ لاملونه دادي :

 ( ١) صالحه ښځه ( ٢) لوى کور ( ٣) د سپرلۍ ښه وسيله ( ٤) صالح اولاد ( ٥) او د ښځې بختورتوب په دې کې دى،چې لومړى اولاد يې لور وي .( بحارالانوار : ١٠١ \ ٩٨ )

 

د کوچنيانو ملاتړ

ðاولاد په لومړيو اووکلو کې (د موروپلار) ښاغلي دى.په دويمو اووکلو کې (د موروپلار) مطيع او منونکي دى اوپه درېمو اوو کلو کې (د موروپلار) وزير او ورسره د مشورې لورى دى .(مکارم الاخلاق : ١١٥)

ðد پلرونو له لاسه د آخرې زمانې پر اولادونو افسوس ! وويل شو: رسول الله! مطلب مو مشرک پلرونه دي؟و يې ويل: نه؛بلکې مؤمن پلرونه دي ،چې خپلو اولادونو ته ديني فرايض نه ورښيي او که هغوى په خپله ددين احکام زده کوي .مخه يې نيسي (او حال داچې) که څه دنيوي ګټه ورته راوړي،ترې خوشحاله وي .زه له هغوى بېزاره يم او هغوى له ما .( مستدرک الوسايل : ٢\٦٢٥)

ðپېغمبراکرم يو سړى وليد،چې دوه کوچني اولادونه ورسره ول؛يو يې ښکل کړ او بل نه . پېغمبر اکرم د سړي پردې ناروا چار نيوکه وکړه او ورته يې وويل: ولې دې له اولاد سره يوشان چلن نه کوې . (مکارم الاخلاق  : ١١٣ مخ )

ðخداى دې پر هغه ولورېږي،چې په نېکۍ کې له خپل اولاد سره لاسنيوى وکړي . وپوښتل شو : څنګه؟ آنحضرت ورته څلور لارښوونې وکړئ . ( ١) د کوچني،چې څه له وسې پوره وي او و يې کړي؛نو ترې ويې مني .( ٢) د کوچني له وسې،چې څه پوره نه وي ،ترې ونه غواړي .( ٣) ګناه اوسر غړونې ته يې اړ نه کړي .(المحجة البيضاء  ٣\٤٤٣)

ðاولادونو ته مو لا مبو او غشي ويشتنه او ښځو ته د تار ورېشل ورزده کړئ . ( نهج الفصاحه : ٤١٣)

ðڅوک چې خپل اولاد ښکل کړي،خداى ورته نېکي ورکوي،څوک چې خپل اولاد خوشحاله کړي؛نو خداى به يې د قيامت پر ورځ خوشحاله کړي او څوک چې خپل اولاد ته قرآن ورزده کړي؛نو په قيامت کې اولاد موروپلارته غږ کوي او داسې جامې ورکوي،چې له رڼا يې د جنتيانو بدنونه ښکاري . ( کافي : ٦\٤٩ )

ðاولادونه مو په درېو ځانګړنو وروزئ : له خپلو انبياوو او له اهلبيتو سره يې پر دوستۍ او د  قرآن لوستل . ( الجامع الصغير: ١\ ٥١٩)

ðکه سړى خپل اولاد وروزي،تر دې ورته غوره ده،چې د ورځې “يونيم کيلو” خيرات ورکړي .( مستدرک  ٢\٦٢٥)

ðد خپلو اولادونو احترام وکړئ او په ادب او ښه دود ورسره چلن وکړئ،چې ګناهونه مو وبښل شي . ( وسايل ١٥\١٩٥)

ðيوسړى پېغمبراکرم ته راغى او و يې ويل : کله مې هم کوچنى نه دى  ښکل کړى،چې بېرته ولاړ؛نو پېغمبراکرم وويل: زما په نظر دا سړى دوزخي دى . ( فروع کافي ٦\٥٠ )

ðڅوک چې خپل کوچنى اولاد خوشحاله کړي،خداى د قيامت پر ورځ د هغه تر خپلې خوښې پورې خوشحالوي . (ميزان الحکمه : ١٠ \ ٦٦٩)

ðڅوک چې د مور او اولاد ترمنځ يې بېلتون راولي،خداى يې د قيامت پر ورځ د هغه او دوستانو ترمنځ بېلتون راولي . (نهج الفصاحه : ٥٧٥مخ )

 

واده، سم کوروالى او د اولاد پر زوکړه اغېزمن لاملونه

ðخلکو! خداى تاسې له ( ٢٤) څيزونو منع کړي ياست :(چې يو يې) مېړه دې له خپلې مېرمن سره د مياشتيني عادت پرمهال کوروالى نه کوي؛ځکه که ښځه دوه ځانې شي؛نو ماشوم به په جذام يا پيس اخته وي،چې يوازې ځان به پړ ګنئ. ( بحار ١٠٠ \٢٨٣)  

ðله نږدې خپلوانو سره واده مه کوئ؛ځکه اولاد به مو کمزورى وي . (المحجة البيضاء : ٣\ ٩٤)

ðد پېغمبر اکرم دا نه خوښېده،چې سړى تر محتلمېدو وروسته(او تر غسل مخکې) له خپلې مېرمن سره کوروالى وکړي؛ځکه شونې ده،چې اولاد يې لېونى وي؛نو يوازې ځان به پړ ګڼي.(وسايل :١٤ \٩٩)

ðماشوم ته د مور شيدې غوره خواړه دي . (وسايل ١٥\١٨٨ )

ðبهي وخورئ او يو بل ته يې ډالۍ ورکړئ؛ځکه سترګې رڼوي او په زړونوکې مينه پيدا کوي او پر دوه ځانو ښځو بهي وخورئ،چې ماشوم ښکلى کوي او په بل حديث کې راغلي چې: ماشوم نېک خويه کوي .( بحار ٦٣\١٧٦)

ðنه ښايي څوک د هرې مياشتې پر لومړۍ شپه،نيمايي شپه او وروستى  شپه له خپلې مېرمن سره کوروالى وکړي ؛ځکه دا خطر شته چې دهغې شپې اولاد ناقص العقل وي . ( وسايل  ١٤ \٩٠ )

ðغرمنى چې دې وخوړه او په خېټه موړ وې؛نو له مېرمن سره دې کوروالى مه کوه؛ځکه که اولاد دې وشي ؛نو لوڅ لغړ به وي .له خپلې مېرمن سره دې د لوى اختر پر شپه کوروالى مه کوه؛ځکه که اولاد دې ترې وشي ؛نو څلور ګوتى يا شپږګوتى به وي .

ðانسان ته نه ښايي د کوروالي پر مهال د خپلې مېرمنې عورت ته وګوري؛ځکه شونې ده د ماشوم د ړوندوالي لامل شي .(وسايل  ١٤ \٨٥)

ðڅوک دې د کور والي پر مهال خبرې نه کوي؛ځکه شونې ده،چې اولاد يې ګونګ اوکوڼ شي . ( وسايل  ١٤ \٨٧ )

ðله مېرمن سره دې په ولاړه کوروالى مه کوه؛ځکه دا د څارويو چار دى او که اولاد دې وشي؛نو شونې ده،چې په توشک به متيازې کوي.( بحار : ١٠٠ \٢٨١)

ðکه اولاد دې وزېږېد؛نو په ښي غوږکې ورته “اذان” او په کيڼ کې ورته “اقامه”ووايه،چې دشيطان له زيانه خوندي وي .(تحف العقوال :١٣ مخ )

ðماشوم مو د تي ورکولو لپاره کم عقلې او هغې ښځې ته مه ورکوئ چې د سترګو ناروغي لري؛ځکه شيدې سرايت کوي.(وسايل : ١٥ \١٨٨ )                                                                                                       

ðپه کوروالي کې د خپلې مېرمنې شرمځای ته کتل مکروه دي؛ځکه د اولاد د ړندېدو لاملېږي . په کوروالي کې خبرې کول مکروه دي؛ ځکه د اولاد  د ګونګېدو لاملېږي او همداراز تر اسمان لاندې (ازاده فضا) کوروالى هم مکروه دى . ( وسايل الشيعه ٢٠ \١٢٢)

ðد تازه او وچو انځرو خوړل په انسان کې د کوروالي وس زياتوي . (مستدرک الوسايل ١٦\٤٠٤)

ðد سر د وېښتانو ږومنځول “وبا” له منځه وړي، روزي زياتوي او د ډېر کوروالي لاملېږي .( ثواب الاعمال : ٢٢مخ )

ðښه بوى زړه غښتلى کوي او د ډېر کوروالي لاملېږي . (قرب الاسناد : ٧٨مخ )

ðله خپلې مېرمنې سره د مياشتې پر لومړى،په پينځلسمه او د مياشتې پر وروستۍ شپه کوروالى مه کوه او که څوک داسې وکړي؛ نو شونې ده اولاد يې لېونى شي.( الکافي ٥\٤٩٩)

ðعلي! خپله ناوې دې،چې کور ته راوسته او څنګ ته دې کېناسته ؛ نو پڼې يې راوباسه او پښې يې ومينځه او دا اوبه يې د کور له وره بهر تويې کړه؛که داسې وکړې؛نو خداى به ستا له کوره د بېوزلۍ اويا زره لاملونه لرې کړي،هغه اويا زره څيزونه به ستا کورته راننباسي،چې د برکت لاملېږي او اويا پرښتې رالېږي،چې د ناوې پر سر دې والوځي، تردې چې د کور هر کونج ته دې برکت ورسي او ناوې دې،څو په دې کور کې وي، له لېونتوب او جذامه خوندي وي  او په لومړۍ اونۍ کې دې ناوې د لبنياتو، سرکې، دڼيا او تروو مڼو له خوړو منع کړه. حضرت علي پېغمبر(ص) ددې منع په اړه وپوښت؟ رسول اکرم ورته وويل : ځکه دا څلور څيزونه زيلانځ (رحم) شنډ اوسړوي او کومه ښځه،چې بچي رانه وړي،هغه پوزى ترې غوره دى،چې د کوټې په يوه کونج کې پروت وي . علي ( ک) وپوښتل : ولې دې له سرکې خوړو منع کړم ؟ ورته يې وويل : ځکه د سرکې په خوراک حيض پوره نه پاکېږي او دڼيا په بدن کې حيض رالمسوي او زېږون سختوي او تروه مڼه حيض له منځه وړي او د ناروغۍ لاملېږي .علي ! له مېرمن سره دې د مياشتې په سر، منځ او پاى کې کوروالى مه کوه؛ځکه د ښځې او اولاد په لېونتوب اوجذامېدو کې چټکتيا راولي.علي! له مېرمن سره دې تر ماسپښين وروسته کوروالى مه کوه؛ځکه پيدا کېدونکى اولاد يې بېړنى (تلوار ګرندى) کېږي او د شيطان بېړنى انسان خوښېږي . علي! له مېرمن سره دې د کوروالي پر وخت خبرې مه کوه؛ځکه که اولاد دې وشي؛نوګونګېږي او هېڅوک دې د کوروالي پر وخت د خپلې مېرمن شرمځي ته نه ګوري او بايد خپلې سترګې ښکته واچوي؛ځکه شرمځي ته کتنه د اولاد د ړوندوالي لامل ګرځي . علي! هيڅ وخت د بلې ښځې په شهوت له خپلې مېرمن سره کوروالى مه کوه؛ځکه که اولاد رامنځ ته شي؛نو احتمال لري چې نرښځى يا احمقه ښځه شي .علي! که څوک له خپلې مېرمنې سره د جنابت پر حال په بستره کې پروت وي؛نو قرآن دې نه لولي؛ځکه له دې وېرېږم،چې له اسمانه پرې اور راښکته شي او ويې سوځوي (شيخ صدوق په دې اړه وايي :احتمال لري دسجدې آيتونولوستل وي؛ نه د نورو) . علي ! له مېرمن سره په داسې حال کې کوروالى کوه،چې ستا او يا د هغې پر تن جامې وي او دواړه تر پردې لاندې لوڅ لغړ مه وسئ؛ځکه ډېر شهوت تر منځ مو د دښمنۍ لاملېږي او طلاق ته مو راکاږي . علي! له مېرمن سره دې په ولاړه کوروالى مه کوه؛ځکه دا د”خره”کار دى اوکه اولاد دې وشي؛نو تر مرګه به بېوزلى وي .علي ! له مېرمن سره دې د اذان او اقامې ترمنځ کوروالى مه کوه ؛ځکه که اولاد دې وشي د وينو د تويولو حرص به ورسره وي . علي ! مېرمن دې چې دوه ځانې او اميندواره شوه ؛نو بې اودسه ورسره کورالى مه کوه ؛ځکه اولاد به دې تنګ نظرى او کنجوس وي . علي! له مېرمن سره دې د”شعبان” په نيمايي کې کوروالى مه کوه؛ځکه اولاد به دې بدبين،بدرنګ اوپرمخ به يې رټې وي .علي! له مېرمن سره دې د”شعبان” په دوو وروستيو ورځوکې کوروالى مه کوه؛ځکه اولاد به دې باجګير او د ظالمانو ملاتړ به وي او څوک به يې له لاسه يې هلاک شي .علي! له مېرمن سره دې پر بام کوروالى مه کوه؛ځکه اولاد به دې منافق،رياکار او بدعتي وي . علي له مېرمنې سره دې دسفر پر شپه کوروالى مه کوه ؛ځکه که اولاد په دې خپله شتمني په ناسمه لار کې لګوي بيا رسول اکرم دا آيت ولوست : ((په رښتيا اسراف کوونکي دشيطان وروڼه دي .))علي ! کله چې د درې شواروزو لپاره پر سفر ځې ؛نو له مېرمن سره دې کوروالى مه کوه؛ځکه اولاد به دې ستا پر ضد د هر ظالم مرستندوى وي . علي! له مېرمن سره دې د دوشنبې پر ورځ کوروالى کوه؛ځکه اولاد به دې د خداى د کتاب حافظ شي او د خداى په مقدارتو به راضي کېږي .علي ! که له مېرمن سره دې دسه شنې پر ورځ کوروالى وکړ؛نو اولاد به دې د (( لا اله – الا الله اومحمد رسول الله)) تر شهادت وروسته،خداى شهادت روزي کړي،په مشرکانو به يې ونه ځوروي او خداى به هغه خوږبويه،خوږ ژبى،زړه سواند اوسخي کړي،غيبت به نه کوي،دروغ به نه وايي او تورونه به نه تپي . علي! که له مېرمن سره دې د پنج شنبې پر شپه کوروالى وکړ او اولاد دې وشي؛نو “واکمن” يا “عالم”کېږي او که د پنجشنبې پر ماسپښين ورسره کوروالى وکړې او اولاد دې وشي؛نو تر زړښت پورې ورته شيطان نه نږدې کېږي او پالندوى کېږي او خداى به يې د دين او دنيا سلامتي ور پر برخه کړي .علي! که له مېرمن سره دې د جمعې پر شپه کوروالى وکړ اولاد  به دې مشهور او عالم کېږي او که پر همدې شپه تر ماسخوتن وروسته کوروالى وکړې اولا به د دې که خداى وغواړي؛نابغه شي .علي! له مېرمن سره دې د شپې په لومړيو کې کوروالى مه کوه اولاد به دې شونې ده،چې کوډګر شي او دنيا پر آخرت غوره وګڼي . علي ! دا وصيت مې ياد لره؛لکه څنګه چې جبرئيل راته ويلي و او ياد کړى مې دى . (الامالي للصدوق : ٥٦٦مخ ، ٩٤ مجلس )                  

 

ايمان

ðد اسلام بنسټ پر پينځو ستنو درول شوى دى : ( ١) پردې حقيقت شاهدي ورکول،چې بې له “الله” بل خداى او معبود نشته؛ محمد(ص) يې بنده او استازى دى . ( ٢) لموانځ کول . ( ٣) د زکات ورکول . ( ٤) د خداى د کور حج کول .( ٥) د رمضان د مياشتې روژه نيول . ( صحيح بخاري –  صحيح مسلم)

ðايمان څه له پاسه اويا څانګې لري،چې تر ټولو غوره يې د ((لا اله – الا الله )) ويل او ټيټه يې له لارې د خنډونو لرې کول دي او “حيا” د “ايمان” يوه څانګه ده . ( صحيح  بخاري . صحيح مسلم )

ðپېغمبراکرم د ايمان په اړه وپوښتل شو؟ ويې ويل : هله مؤمن يې ، چې په خپلو ښو کړنودرته خوشحالي او په ناوړو درته د رنځ اوخپګان پيداشي . (د امام احمد حنبل مسند)

ðهله به مؤمن يې،چې تر پلار اولاد او نورو خلکو له ماسره ډېره مينه ولرې . (بخار- مسلم )

ðهله به مؤمن يې،چې ځاني غوښتنې دې زما په لارښوونو پسې ولاړې شي . (بغوى في شرح السنة . مشکات)

ðهله به مؤمن يې،څه چې ځان ته خوښوې؛نورو ته يې هم خوښ کړې . ( بخاري – مسلم )

ðپه ايمان راوړو به جنت ته ولاړ شئ او هله به ايمانوال شئ،چې يو له بل سره مينه ولرئ او مينه په خپلمنځي سلام دودولو ډېرېږي . ( مسلم )

ðمسلمان هغه دى،چې مسلمانان يې د لاس او ژبې له ازاره خوندي وي او مؤمن هغه دى،چې خلک ترې د خپل ځان ومال په اړه خوندېينه احساس کړي . (ترمذي – نسايي)

ðپر خداى قسم! مؤمن نه دى (درې ځل يې وويل)،چې ګاونډى ځوروي . (صحيح بخاري)

ðپه مؤمن بنده کې چې پينځه ځانګړنې وي؛نو ايمان يې بشپړېږي :

 (١) پرخداى توکل . ( ٢) خداى ته د چارو ورسپارل .( ٣) د خداى حکم ته غاړه اېښوول . ( ٤) په الهي تقدير رضا او ( ٥) او د خداى د رالېږلو کړاوونو پر وړاندې زغم؛ځکه څوک چې د خداى لپاره دوستي او دښمني او د خداى په لار کې بخشش وکړي او د خداى لپاره لاس واخلي؛نو ايمان يې بشپړېږي .( اعلام  الدين : ٣٣٤)

ðد يو چا د اسلام ښکلا او کمال په دې کې دى،چې د چټي او بې معنا ويناوو او کړنو يې لاس اخستى وي .(ابن ماجه–ترمذي او بيهقي)

ðچاچې بدکار وليد؛نو په لاس دې يې مخنيوى وکړي؛که وسه يې نه وه؛نو پر ژبه يې سم کړي او که دا يې هم له وسې پوره نه و؛نو په زړه کې دې ورسره کرکه  ولري،چې دا (د زړه کرکه) د ايمان ډېر اوچته مرتبه ده. (صحيح مسلم)

ðڅوک چې امانت ساتى نه وي،مؤمن نه دى اوڅوک چې ولاړ نه وي ؛ نو دين نه لري . (بيهقي)

 

له ظالم سره مرسته

ðهغه به له اسلامه وتلى وي ،چې پوهېږې له ظالم سره مرسته کوي . (بيهقي)

وفا

ðدين نصيحت (اخلاق ،زړه سوى او وفا) دى . و مو پوښت،چې له چاسره زړه سوى او وفا ؟ راته يې وويل : له الله تعالى ، له استازي سره،د مسلمانانوله مشرانو او د ټولو مسلمانانو له پرګنوسره .(صحيح مسلم )

 

الهی تقدیر

ðرقيه او تعويذ،دارو، درمل او هغه چارې چې ستونزې او کړاوونه پرې لرې کېږى ؛دا ټول په الهي تقديرکې شمېرل کېږي .(احمدترمذي – ابن ماجه )

 

تر مړينې وروسته ژوند

ðزه اوقيامت ددې دوو ګوتو په څېر (يوله بل سره نږدې) يو. ( صحيح بخاري – صحيح مسلم)

ðپه قيامت کې به د مؤمنانو قيام (اوپاڅون) خورا اسان وي ان تردې ، چې ديو فرض لمانځه د وخت هومره به لنډ وي . (بيهقي )

ðخداى د قيامت پر ورځ درېو تنو ته نه ګوري او ورته دردونکى عذاب دى . ( ١) بوډا  زناکار ( ٢) دروغجن واکمن (٣) کبرجن شتمن . ( مسلم )

ðد قيامت پر ورځ به پېغمبران،اسلامي عالمان او شهيدان شفاعت کوي . ( ابن ماجه)  

ðپه قيامت کې به بني آدم لا له ځايه پښه نه وي پورته کړى،چې د پينځوڅيزنو په اړه به وپوښتل شي :

 (١)خپل ژوند دې په کومه لار کې تېرکړى دى .(٢) ځواني دې په کومو بوختياووکې لګولې وه . (٣) شتمني دې له کومه او څنګه لاس ته راوړې وه . (٤) او په کومولاروکې دې لګولې وه  او (٥) پر خپلې پوهې دې څنګه عمل کړى و. (ترمذي)

 

دوه مخي

ðدوه مخي د قيامت پر ورځ ډېر ناوړه دي،چې ځينو ته يو ډول او نورو ته بل ډول خبرې کوي .(صحيح بخاري – صحيح مسلم )

ðد قيامت پر ورځ د دوه مخو په خولو کې دوه اورينې ژبې وي . (ابوداوود )

ðلکه څنګه چې اوبه د ونې د ودې لامل دى،دغسې څلور څيزونه په زړه کې نفاق راټوکوي او فاسدوى يې : ( ١)اپلتې او چټيات ( ٢) خپلسري او بدلمني (٣) (د ظالم) واکمن خدمت کول او (٤) تفريحي ښکار . (الخصال : ١\٢٢٧)

ðغيرت کول،د ايمان (نښه) ده او چټيات د نفاق .(بحارالانوار٦٨\ ٣٤٢)

ðخداى تعالى حضرت علي (ک) د ايمان او نفاق ترمنځ نښه ګرځولى؛ نو د چاچې خوښېږي،مؤمن به وي او څوک چې ورسره دښمني  کوي، منافق به وي .(بشارة المصطفي :٣٣مخ )

ðڅوک چې خداى ډېر يادوي؛نو د خداى خوښېږي؛نو له “اور” او “نفاقه” ورته د ژغورنې دوه برائته ليکل کېږي . (الکافي ٢\ ٤٩٩)

ðبدن چې تر زړه ډېره عاجزي وښيي؛نو زموږ پر وړاندې دوه مخي او نفاق دى .( الکافي ٢\ ٣٩٦)

ðله موږ (اهل البيتو) سره مينه،ايمان او دښمني راسره نفاق دى. (کفاية الاثر : ٩٨ مخ )

ðد منافق مثال د نوې رسېدلې کجورې په څېر دى، چې خاوند يې په خپل کور جوړونه کې ترې ګټه اخلي؛نو په کوم ځای کې،چې غواړي يې،سمه نه درېږي؛نو ځاى يې بدلوي؛خو بيا هم سمه نه درېږي او په پاى کې يې سوځوي . (الکافي ٢\٣٩٦)

ðعلي! څوک چې درسره د قيامت تر ورځې پورې مينه لري؛نو مؤمن دى او څوک چې درسره په زړه کې  کينه لري؛نو منافق دى.(د فرات الکوفي تفسير : ٣٠٩مخ )

ðمؤمن د خپلې کورنۍ په خوښه خواړه خوري او د منافق کورنۍ يې د منافق په خوښه خوري .(مفتاح الفلاح : ١٧٥)

ðمؤمن لږ خور او منافق ډېرخور دى . (وسايل : ٢٤\٢٠٤) 

ðمؤمن لږې خبرې کوي او ډېر کار او منافق ډېرې خبرې کوى او کم عقله وي .( تحف العقول ١\٢٢١)

ðپه منافق کې دوه ځانګړنې نه ځايېږي : اسلامپوهنه او د مخ ظاهري ښکلا يې . ( تفسيرالقمي ١ \٢٢١)

ðد منافق څرګنده نښه له علي (ک) سره دښمني ده . (ترمذي ٥\٢٩٨ او  ذخايرا لعقبى : ٩١مخ )

ðعلي د مؤمن به درسره مينه وي او د منافق به درسره دښمني . ( د امام احمد حنبل مند : ١\٨٤) صحيح مسلم : ١\٦٠) سنن ابن ماجه : ١\٤٢)

ðزه مې پر خپل امت له مؤمن او مشرکه باک نه لرم؛ځکه خداى مؤمن د خپل ايمان له امله منع کوي او مشرک هم د خپل شرک له امله  خواروي؛ خو زه  پر تاسې له هغه دوه مخي منافقه ډارېږم ،چې په زړه منافق او پر ژبه پوه دى،چې کوم څيزونه وايي،ښه مو ايسي او چې چارې کوي،ښه مو نه ايسي.( بحارالانوار ٣٣\٥٨٨)

 

اسانخوښی – راحت طلبي

ðله اسانخوښۍ- راحت طلبۍ او چړچو ځان وژغوره؛ځکه د خداى ځانګړي بندګان دغسې نه دي .(د امام احمد حنبل مسند)

 

 

یقین او زهد

ðد امت لومړنى خير او نېکي مې “يقين” او”زهد” دى او لومړنۍ ويجاړي يې بخل او د دنيا حرص دى .(بيهقي)

ðزهد دې ته نه وايي،چې حلال څيزونه پر ځان حرام کړې او خپله شتمني ضايع کړې؛بلکې  د زهد اصلي کچه داده،چې پر هغه څه دې يقين ډېر وي،چې له الله تعالى سره دي،نه له تا سره او بل داچې له کړاوونو سره د مخامخېدو پرمهال يې درته په اړه د اخروي ثواب لېوالتيا پيدا شي . (ترمذي– ابن ماجه)

ð د امت لومړنى خير او نېکي “يقين” او “زهد” دى او لومړنى ويجاړي يې بخل او د دنيا حرص دى .(بيهقي)

 

مسکین

ðخدايه ! مسکين مې وساته،مسکين مې مړ کړه او په قيامت کې مې د مسکينانو په ډله کې پا څوه(حشر کړه) . (ترمذي– بيهقي – ابن ماجه )

ðخدايه! آل محمد(نبوي کورنۍ) ته د کفايت او بسيايني هومره رزق په برخه کړه .( بخاري – مسلم )

 

احسان

*نورو ته نفقه ورکړئ،چې خداى يې تاسې ته درکړي.(بخاري – مسلم )

ðپه خير او نېکو چارو کې نورو ته مه ګورئ،که درسره احسان وکړي، تاسې به يې هم ورسره وکړئ او که تېرى او بدي درسره وکړي ؛نو تاسې هم ورسره هماغسې وکړئ؛بلکې هوډ ونيسئ،که نورو درسره احسان وکړ، تاسې يې هم ورسره وکړئ که تېرى او بدي هم درسره وکړه،بيا به هم ورسره احسان اونېکي کوو او د بديو لار به نه نيسو . (ترمذي)

ð څوک چې زما د يو امتي اړتياوې لرې کړي او نيت يې خوشحالول وي؛ نو زه به يې خوشحاله کړى يم او څوک چې ما خوشحاله کړي؛نو خداى يې خوشحاله کړى دى او څوک چې خداى خوشحاله کړي؛نو جنت ته يې ننباسي. (بيهقي)

ðهېڅ ډول نېکي سپکه مه ګڼئ؛نوکه څه نه لرئ،چې مسلمان ورور ته يې ډالۍ کړئ؛ نو په خندا او ورين تندي ورسره مخ شه او چې غوښه دې پخوله؛ نواوبه پکې ډېرې کړه،چې ښوروا يې ګاونډي ته هم ډالۍ کړې . (ترمذي)

 

غوره کړنې

ðخداى ته تر ټولوغوره کړنې دادي،چې د بنده دوستي او دښمنى يوازې د خداى لپاه وي . (ابوداود)

ðخداى تعالى ته غوره کړنې دادي : ( ١) هغه ايمان ،چې شک ورته لار نه وي کړې ( ٢) هغه جهاد،چې کينه ورته نه وې ننووتې (٣) او قبول شوى حج .( الامالي للمفيد: ٩٩ )

ðد تږي خړوبول غوره چار دى .( الکافي : ٢\٢٦٠)

ðالهي فرايض عملي کړئ،چې ډېر پرهېزګاران شئ.(الکافي ٢\٨٢)

ðيوه ډله چې راغونډه شي او خداى ياد کړي ؛نو شيطان او دنيا ترې تښتي . شيطان دنيا ته وايي : ګورې چې څه کوي ؟ دنيا ورته په ځواب کې وايي : پرېږده يې،که بېل شول،( د دنيا غوښتنې کړئ ) ورته په غاړه کې اچوم . ( مستدرک الوسايل : ٥\٢٨٩)

ð ډېر غوره هغه دي،چې خلكو ته ګټور وي او ډېر ناوړه هغه دي ، چې خلك وځوروي او تر دې بدتر هغه دى،چې د شر له ډاره يې خلك احترام كوي او تر دې خو لا ډېر بدتر هغه دى،چې خپل دين د بل په دنيا وپلوري  ( الاختصال : ۲۴۳)

 

ناوړه کړنې

ðپه هغه ټولي كې رحمت نه راكوزېږي،چې پر خپلوانو يې زړه سوى پرې كړی وي . ( مشكاة الانوار : ۱۶۶)

ðڅوک چې ناوړه کار خپروي؛نولکه په خپله،چې يې کوي . (کافي ٢\٣٥٦)

ð د قيامت پر ورځ ډېر ناوړه هغه دي،چې خلك يې د شر له وېرې احترام کوي . (بحار : ۷۲\۲۸۳)

ð زما د امت ډېر ناوړه هغه وګړي دي،چې خلك يې د شرله وېرې يې احترام كوي، هغه به زما (له امته) نه وي،چې د شرله ډاره يې خلك درناوى كوي .( الحضال :۱\۱۴)

ðکنجوسي او بد اخلاقي د مسلمان ځانګړنې نه دي . (الخصال ١\ ٧٥)

ðد خداى پر وړاندې دا درې چارې خورا ناوړه دي،چې بني آدم يې هېڅکله نه کوي 🙁 ١) که څوک کوم پېغمبر ووژني ( ٢) کعبه ويجاړه کړي،چې خداى د خلکو قبله کړې ده (٣) او په حرامو له ښځې سره زنا وکړي . ( من لايحضره الفقيه ٤\٢٠ )

ðګناهونه،نعمتونه اړوي،تېرى د پښېمانۍ لامل دى،وژنه د بدمرغۍ د راكېوتو لامل دى،ظلم پر دې څېر وي او شرابخوري د روزۍ مانع كېږي، زنا مړينه رانږدې كوي او زړه سوى نه كول د دعا د نه قبلېدولامل ګرځي،د موروپلار (له خوا) عاقېدل عمر لنډوي او لمونځ نه كول د خوارۍ لامل ګرځي . ( مستدرك : ۱۲\ ۳۳۴)

ðرسول اکرم وويل : ايا ډېر ناوړه خلک دروښيم ؟ اصحابو وويل : هو! آنحضرت (ص) وويل:څوک چې د لاسنيوي او مرستې مخه نيسي،خپل مريى (ترلاس لاندې)وهي؛نو اصحابو ګومان وکړ،چې خداى له دې هم  ناوړه  موجود نه دى پیدا کړی . بيا آنحضرت(ص) وويل : ايا تردې ناوړه درته وښيم : اصحابو وويل: هو! آنحضرت(ص)  وويل : هغه چې د خير هيله ترې نه کېږي او له شره يې هم خوندي نه يې . بيا اصحابو ګومان وکړ،چې خداى خو به تر دې بل ناوړه موجود نه وي پيدا کړى . آنحضرت(ص) وويل : تردې ناوړه مو خبر کړم : اصحابو وويل: هو! آنحضرت (ص)  وويل : د هغه په مخکې، چې د مؤمنانو نوم واخستل شي؛ نو ورته کنځل کوي او لعنت پرې وايي او چې مؤمنان يې ياد کړي؛نو کنځلې ورته کوي او لعنت پرې وايي . ( الکافي ٢\ ٢٩٠ )

 

 

خپلمنځي اړیکې

ðمسلمانان د لورنې،مينې او نرمۍ له پلوه په خپلو کې د يوې تنې په څېر دي،که يو غړى يې په درد شي ؛نو نور هم ورسره دردېږي . ( بخاري – مسلم )

 

تله

ðتېر امتونه د دووځانګړنو په درلودو پوپناه شوي،چې يو يې پيمانه (کنډه) او بل يې تله وه . (مستدرک الوسايل  ١٣\٢٣٣)

 

ډار

ðعلي! له ډارن سره مشوره مه کوه؛ځکه د چارې لار درباندې تنګوي . (من لايحضره الفقيه  ٤\ ٤٠٩ )

ðعلي! پوه شه چې ډار،کنجوسي او حرص يوه غريزه ده،چې په ټولو کې د بدګومانۍ لامل دى . (علل الشرايع ٢\ ٥٥٩ )

ðنشپاتي وخورئ؛ځکه زړه غښتلى کوي او ډارن زړه وروي.( الکافي ٦ \ ٣٥٧)

ðد خداى رسول ته تردې بل هيڅ څيز هم ګران نه دى،چې څوک د خداى په لارکې “وږي ډارځپلي” ته پناه ورکړي . ( الکافي ٨ \١٢٩ )

ðمؤمن د”تېر” او”راتلونکې” دوو ډارو ترمنځ پروت دى .(مستدرک الوسايل  ١١\٢٢٦)

ðمؤمن تل له ناوړه عاقبته ډارېږي او د خداى د رضا په باب تر هغه يقين نه لري،څو يې روح له تنه وتلى او د مرګ پرښته يې ليدلې نه وي . ( تاويل الايات الظاهره : ٥٢٤ مخ )

 

تسبيح

ðتسبيح په قيامت کې د کړنو نيمه تله ده او “الحمد الله” تله ډکوي . ( الجعفريات : ١٦٩ مخ )

ðډېر په تکبير،تهليل (لا اله – الا الله )،تسبيح، حمد او د “لاحول ولا قوة الا بالله” ويلو بوخت وسئ،چې دا “باقيات صالحات” دي . (مستدرک الوسايل: ٥\٣٢٧)

 

تسليت

ðڅوک چې غمځپلي ته ډاډېنه ورکړي؛خداى به په قيامت کې ورېښميني جامې وراغوندي . ( الکافي ٣\٢٠٥)

ðڅوک چې غمځپلي ته تسليت ووايي؛نو خداى ورته د غمځپلي هومره ثواب ورکوي؛بې له دې چې د غمځپلي له ثوابه څه کم شي . ( قرب الا سناد: ٢٥مخ )

ðڅوک چې بورې ښځې ته تسليت ووايي؛نو خداى به په جنت کې ښکلې جامې وراغوندي .( مستدرک الوسايل ٢\٣٤٩)

ðتسليت ورکونه جنت ته د تلو لامل دى .( ثواب الاعمال : ١٩٨مخ)

څوک چې مصيبت ځپلي ته تسليت ووايي؛نود هغه هومره ثواب ګټي . (کنز ١٥/ ٦٥٨) 

 

په جنازه کې ګډون

ðڅوک چې د يو مسلمان جنازې ته ولاړ شي؛نو پرښتې يې د بېرته راستنېدو تر ځايه ملګرتوب کوي . ( جامع الاخبار: ١٦٦مخ )

 

د عقايدو څارنه

ðزه د خلکو د زړونو د راسپړلو او ګېډې څيرلو لپاره ګومارل شوى نه يم . ( الجامع الصغير ١\ ٤٠٣)

 

تقيه

ðبې تقيې مؤمن د بې سره تنې په څېر دى . (تفسيرالامام العسکرى: ٣٠٢مخ )

ðتقيه د الهي دين يوه برخه ده ؛نو څوک چې تقيه نه کوي؛دين نه لري . (مستدرک الوسايل  ١٢\٢٥٢) 

ðڅوک چې “تقيه”نه کوي ،ايمان نه لري . ( تفسيرالعيا شي  ١\١٦٦)

ðپرخداى قسم که “تقيه” نه واى؛نو هېچا به د شيطان په دولت کې د خداى عبادت نه واى کړى . پوښتنه وشوه، چې د شيطان دولت؛يعنې څه؟ ورته يې وويل : که “لارښود مشر” واکمن وي ؛نو د حق دولت دى او که “بې لارې مشر” واکمن وي؛نو د شيطان دولت دى . ( د سليم بن قيس کتاب : ٨٩٥مخ )

ðکه خداى غوښتاى؛نو تقيه يې درباندې حراموله او په صبر يې درته سپارښتنه کوله . پوه شئ،چې له موږ سره د مينې درلودو او زموږ له دښمنانو سره د دښمنۍ تر فرضېدو وروسته، ستاسې د ځان،شتمنيو، پوهې او وروڼو د حقوقو دساتنې لپاره تر “تقيي” بل ستر فرض نشته . (وسايل  ١٦\٢٢٤)

ðکه څوک له چا،پر يوې مسئالې د پوهېدو لپاره څه وپوښتي؛خو پټه يې کړي،حال داچې بايد رابربنډه يې کړي او د “تقيي” ځاى هم نه وي؛نو خداى  به يې د قيامت پر ورځ په اورينه کيزه دوزخ ته ولېږي. (تفسيرالامام العسکري٤٠٢مخ )

 

کبر

ðبېشکه ستر کبر،خلکو ته ټيټ کتل او د حق بې ارزښته کول دي . په دې اړه وپوښتل شو. آنحضرت وويل:په حق نه پوهېږي او وړ ته يې پېغورونه ورکوي؛نو څوک چې دا کار وکړي؛له خداى سره به يې په جګړه لاس پورې کړى وي . (الکافي  ٢\ ٣٠١)

ðابليس رانجه،لاړې او  نسوار لري،چې چرت يې رانجه دي،دروغ يې د خولې لاړې دي او کبر يې  نسوار دى .( معاني الاخبار: ١٣٨)

ðډېرى دوزخيان کبرجن دي . ( وسايل  ١٥\٣٧٨)

 ðڅوک چې وياړنې جامې واغوندي؛نو کبرجن دى،چې هستوګنځى يې دوزخ دى . ( مستدرک الوسايل  ١٢\ ٣٠)

ðڅوک چې ومري؛خو په زړه کې يې د ذرې هومره کبر وي؛نو د جنت بوى به بوى نه کړي؛خو داچې تر مړينې مخکې يې توبه کړې وي . (مستدرک الوسايل ١٢ \٣٤)

ðد چا په زړه کې،چې د کوچنۍ ذرې هومره “کبر” وي؛نوجنت ته به ولاړ نشي. پوښتنه وشوه: که په موږ کې د چا دا ښه ايسي،چې جامې او کارونه يې ښه وي؛نو کبرجن دى؟ آنحضرت : خداى په خپله ښکلى دى او ښکلا يې خوښېږي؛خو کبر د  حق تر پښو لاندې کونه او د خلکو خوارول دي . (منية المريد: ١٧٥مخ)

ð کبرحن ،خداى خواروي .( بحار ٧٣/٢٣١)

 

تکلف

ðد متکلف څلور نښې دي : په هغه څه کې شخړې کوي،چې ورپورې اړه نه لري،له خپل پورته سره لانجې کوي او په هغه څه پسې درومي، چې نه وررسي .( راوي په روايت کې څلورمه نښه نه ده ښوولې.) ( بحارالانوار : ١\١٢١)

تکليف

ðدرې تنه له مکلفيته معاف شوي : ويده تر راوېښېدو، لېونى تر عقلمنېدو او کوچني تر بالغېدو پورې . ( الطرائف  ٢\٤٧٣)

 

کنجوسي

کنجوسي اسلام تباه کوي . ( الکافي ٤\ ٤٥)

ðکنجوسي او ايمان کله هم په يوه زړه کې نه ځايېږي.(الحضال ١\٧٥)

ðد سخي خواړه “شفا” ده؛خو د کنجوس خواړه د “ناروغۍ” لامل دى . ( بحارالانوار  ٦٨\٣٥٧ )  

ðکوم درد ترکنجوسۍ بدتر دى ؟ (فقه الرضا : ٢٧٦مخ )

ðله کنجوس سره مشوره مه کوه؛ځکه خپلې موخې ته په رسېدو کې دې خنډېږي .( علل الشرائع  ٢\٥٥٩)

ðکنجوسي د دوزخ له ونو يوه ونه ده،چې ښاخونه يې په دنيا کې راځوړند دي؛نو څوک چې کنجوس وي،يو ښاخ يې نيسي او دا ښاخ يې جهنم ته راکاږي .( الامالي للطوسي : ٤٧٤مخ )

ðکنجوسي او بد اخلاقي په مسلمان کې نه ځايېږي . ( معدن الجواهر : ٢٥مخ )

ðکنجوس په اسمانو او ځمکې کې  اوکږلى (مبغوض) دى . ( الکافي : ٤\٣٩)

ðهغه حقيقي بخيل دى،چې د خپلې شتمنۍ فرضي زکات او د خپلې مېرمنې مهر نه ورکوي؛خو په بل ځاى کې يې چټي لګوي .(من لايحضره الفقيه ٢\٦٢)

ðريښتنى کنجوس هغه دى،چې زما د نامه په اورېدو،پر ما درود نه وايي . ( معاني الاخبار:٢٤٦)

ðکنجوس له خداى،خلکو او جنته لرې او دوزخ ته نږدې دى.( روضة الواعظين ٢\٣٨٤)

ðله کنجوسه ځان وژغوره؛ځکه يوه ناروغي پکې ده،چې په عزتمنو کې نشته . ( دلائل الامامه : ٤مخ )

 

يوازېتوب

ðښه ملګرى تر يوازېتوبه او يوازېتوب له بدانو سره تر کېناستو غوره دى . ( وسائل ١٢\ ١٨٨)

 

غښتليتوب

ðدا اتل نه دى،چې پهلوانان راسملوي؛بلکې اتل هغه دى،چې پرخپلې غوسې برلاس شي اوتېره يې کړي . (مستدرک الوسائل ٩\١٢)

ðپر خداى توکل کوونکي ډېر غښتلي خلک دي .(جامع الاخباره:١١٧مخ )

ð ډېر غښتلى هغه دى،چې د خوشحالۍ پر وخت خوښي يې ګناه او خوشې کار ته رانه کاږي او چې غوسه وي؛نو غوسه يې له حق خبرې لرې نه باسي .( مه لايحضره الفقيه ٤\٤٠٧)

 

وسمني او شتمني

ðڅومره ناوړه (چار) دى،چې انسان تر شتمنۍ وروسته د بېوزلي چلن کوي او په مسکينۍ کې سرغړونې کوي او تردې دواړو کړنو خو هغه ډېره ناوړه ده،چې عابد خپل عبادت پرېږدي . (الکافي ٢\٨٤)

ðشتمني؛الهي تقوا ته څومره ښه مرستندويه ده .( الکافي ٥\٧١)

ðڅه چې د خلکو په لاس کې وي،ترې نهيلى وسه؛ځکه په دې حال کې به شتمن يې . ( من لايحضره الفقيه  ٤\٤١٠)

ðشتمن چې په ورکړه کې ځنډکوي؛نو ظلم دى .(وسايل الشعيه ١٨\ ٣٣٣)

ðناپوه بوډا،ظالم شتمن او بېوزلى کبرجن مې نه خوښېږي . (الزهد : ٥٨مخ )

ðاړين مؤمن،شتمن ته د خداى استازى دى؛نو استازى،چې بې د خپلې اړتيا له پوره کولو ستون شي؛نو پاک خداى ګناهونه نه بښي او خداى پر شتمن شيطانان واکمنوي،چې چيچي به يې . (مستدرک الوسايل ١٢\٤٣٤)

ðپر هغه دې د خداى لعنت وي،چې د شتمن درناوى د شتمنۍ له امله کوي يا بېوزلى د بېوزلۍ له امله سپک ګڼي،چې دا د منافق خوى دى، چې په اسمانو کې د خداى او پېغمبرانو دښمن دى،دعا يې نه قبلېږي او اړتيا وې يې نه لرې کېږي . (ارشادالقلوب  ١\ ١٩٤)

ð د وسايلو ډېرښت شتمني نه ده؛بلکې اصلي شتمني د زړه مړښت دى. (صحيح بخاري)

ðخداى تعالى ستاسې تنو او شتمنيو ته نه ګوري؛زړونو او کړنو ته مو ګوري. (صحيح مسلم)

 

توبه

ðله ګناه توبه کوونکى داسې دى،چې هيڅ ګناه يې نه وي کړي . ( کنز : ١٠١٧٤ ح )

ðتر دې بل هېڅ څيز د خداى ښه نه ايسي،چې يو ځوان له خپلې ګناه پښېمانه شي او توبه  وکاږي . ( مشکاة الانوار: مخ ١٥٥) 

ðتوبه د ګناهګار ژغورنې ته بريالى شفيع  ده. ( بحار ٣/٣٠٦)

ðيو هم د مړيني هيله مه کوئ؛ځکه وګړى يا”ښه” دى؛که ژوندى پاتې شي،ښايي پر نېکيو يې ورزياتې شي  او يا “بد” دى ؛نوکه ژوندى پاتې شي،ښايي توبه وکاږي . ( بخاري : ٧٢٣٥ ح )

ðد توبې ور د شپېلۍ د پوکي تر وخته پرانستلى دى . (وسايل الشيعه  ١٦\٩٠)

ðتوبه ګار د داسې چا په څېر دى؛لکه هيڅ ګناه يې،چې نه وي کړي . (عيون اخبار الرضا٢\٧٤)

ðهر درد ته درمل شته او د ګناهونو درمل استغفار دى . (ثواب الاعمال : ١٦٤)

ðيوازې استغفار مړي ته ډېره ارزښتمنه ډالۍ دى . (الجعفريات : ٢٢٨)

ðاستغفار غوره دعا ده .( الکافي ٢\٥٠٤)

ðد مرګ ياد غوره موعظه ده.د آخرت ياد غوره تفکر دى . عاجزي غوره عبادت دى . د ګناهونو پرېښوول غوره استغفار دى او نصيحت غوره دعا ده؛نو په چا کې چې يوه دا ځانګړنه وي؛نو د پېغمبرانو له لومړي ټولي سره به جنت ته ننوځي . ( جامع الاخبار: ١٣٠ )

 

توفيق

ðلږ توفيق تر ډېرعقله غوره دى . ( فيض القدير٤\٦٨٨)

ðتوکل د بد فال کفاره ده . ( الکافي ٨\١٩٨)

 

د نورو سپکاوى

ð څوک چې نورسپک کړي (؛نو) پخپله (هم ) ډېر په سپکو کې شمېرل کېږي .( بحار ٧٥/١٤٢)

ðهغه تر ټولو خوار دى،چې نور خوار کړي .(من لايحضره الفقيه٤\ ٣٩٤)

ðخداى تعالى وايي : پر هغه دې افسوس وي،چې د خداى ولي او دوست سپک کړي او څوک چې داسې وکړي؛نو له ماسره به يې جګړه کړې وي .  ( مشکاة الانوار: ١٠٧مخ )

ð (د معراج په حديث کې راغلي : ) د جهنم پر څلورم وره درې جملې ليکل شوي : ( ١) څوک چې اسلام سپک کړي ؛نو خداى يې سپکوي . ( ٢) څوک چې د پېغمبر اهلبيت سپک وګڼي؛نو خداى يې سپکوي . (٣) څوک چې له ظالم سره د خداى پر مخلوقاتو په ظلم کې لاسنيوى وکړي ؛ نو خداى به يې ذليل کړي . ( الفضايل : ١٥٢)

 

تور

ðغيبت کول؛يعنې د يو څيز يادول،چې د غيب شوي ښه نه ايسي . رسول اکرم وپوښتل شو:که هغه حق وي (؛نو) څنګه کېږي ؟ ورته يې وويل: که “باطل” ووايې (؛نو) هغه خو “تور” دى . (عوالي الا للي : ١\٤٣٧)

ðڅوک چې له تورنو سره کېني؛نو تر ټولو ډېر د تور وړ دى .(من لايحضره الفقيه ٤\٣٩٤)

ðډېر ناوړه هغه دى،چې خداى تعالى په خپلو پېښوکې تورن کړي . (پورته  ٤\٣٦٢)

ðخلکو! په ما پسې تورونه ډېر شوي؛نو څوک چې په ما پسې په لوى لاس دروغ وتړي؛نو ځاى يې جهنم دى . (دسليم بن قيس کتاب : ٦٢٠مخ )

ðلکه څنګه چې يې تر ما په مخکنيو پېغمبرانو پسې دروغ تړل؛نو په ما پورې به يې هم وتړي؛نو چې چا درته زما “حديث” راووړ او د خداى له کتاب سره يې اړخ لګاوه؛نو زما حديث به وي اوکه نه؛نه به وي .( قرب الا سناد : ٤٤مخ )

 

ثواب

ðڅوک چې د پوهې او علم د زده کړې لپاره لار ووهي؛نو خداى به يې لار جنت ته ورسيخه کړي . ( الکافي  ١\٣٤)

ðڅوک چې د خداى په لار کې (په اخلاص) يوه ورځ،روژه شي؛نو خداى به ورته د يو کال روژې نيولو ثواب ورکړي .(ثواب الاعمال : ٥)

 

کوډګر

ðمسلمان کوډګر بايد ووژل شي؛خوکافر کوډګر نه . (الکافي  ١\ ٣٤)

ðله اوو پوپنا کوونکيو څيزونو ځان وساتئ :

 ( ١) له خداى سره شرک . ( ٢) کوډې . ( ٣) په ناحقه د انسان وژله . ( ٤) د پلار مړي د مال خوړل . ( ٥) سود خوړل . ( ٦) پر ناخبرو مؤمنو ښځو د زنا تور پورې کول .(٧) اوله جګړې تېښته.(وسايل الشيعه ١٥\٣٣٠ )

ð رسول اکرم د کوډګر په اړه وپوښتل شو.ورته يې وويل:په کوډو يې چې دوو عادلو نارينه وو شاهدي ورکړه؛نو وينه يې حلاله ده .(وژل يې روا دي) . ( تهذيب الاحکام  ٦\ ٢٨٣)

 

جبر او اختيار

ðد امت دوه ډلې مې له اسلامه څه ګټه نشي وړاى : ( ١) مرجئه ( څوک چې ګروهمن وي،چې انسان څومره ګناه وکړي؛نو دين ته يې زيان نه رسي) . ( ٢) جبريون ( د جبر لارې لارويان ) . ( ثواب الاعمال : ٢١٢)

ðاويا پېغمبرانو جبريون لعنت کړي دي . رسول اکرم وپوښتل شو: جبريون څوک دي ؟ ورته يې وويل : هغوى چې انګېري خداى پرې د هغوى ګناهونه او عذابونه په زورتپلي دي .( الطرائف  ٢\٣٤٤)

ðد امت دوه ډلې مې له اسلامه څه ګټه نشي وړاى : ( ١) غلات (مبالغه کوونکي)  او ( ٢) د جبرلارويان . ( الخصال 72/1 : ٢١٢)

ðهر امت مجوسي (زرتشتي) لري او زما د امت مجوسيان د جبر لارويان دي . ( کنزالفوائد ١\١٢٣ )

 

ټولى

ðڅوک چې د مسلمانانو له ټولي بېل شي؛نو له غاړې يې د اسلام رسۍ لرې شوې . رسول اکرم وپوښتل شو: څوک د مسلمانانو ټولى دى؟ ورته يې وويل : د “حق لارويان”که څه هم لږ وي . (الامالي للصدوق : ٣٣٣مخ )

ðڅوک چې له ما جلاشي؛نو له خدايه به جلا شوى وي او څوک چې له “علي” بېل شي ؛نو له مابه جلا شوى وي . (الغارات  ٢\ ٣٥٦)

ðپه (جمع/جماعت) لمونځ تر ځان ته لمانځه پينځه ويشت ځله غوره دى . ( وسايل الشيعه  ٨\ ٢٨٩)

ðڅوک چې تر ما وروسته له “علي” جلا شي؛په قيامت کې به مې ونه ويني او زه به يې هم ونه وينم . (کمال الدين  ١\٢٦٠ )

ðڅوک چې د جماعت د لمانځه لپاره جومات ته روان شي؛نو هر قدم ته يې اويا زره ثوابونه ليکل کېږي او اويا زره درجې لوړېږي او که په همدې حال کې ومري؛نو خداى تعالى اويا زرو پرښتو ته دنده ورکوي، چې قبرته يې د ليدو لپاره ورشي او خوشحال يې کړي او په يوازېتوب کې يې ملګرې شي او د قيامت تر ورځې پورې ورته بښنه وغواړي . (من لايحضره الفقيه ٤\١٧)

 

غوړه مالي

ðد غوړه مالانو پر مخ خاورې وشيندئ . (من لايحضره الفقيه٤\١١)

ðد پوهې له لاس ته راوړو پرته،د مؤمن خوى دا نه دى،چې غوړه مالي وکړي اوکينه ولري . ( مستدرک الوسائل٩\٨١)

 

د سترګو وهل ( نظرېدل )

ðخرافات،طالع ليدل او فال نيول نشته؛خو د سترګو وهل (نظرېدل) حق  دي . ( الجعفريات : ١٦٨مخ )

ðد سترګو وهل حق دي؛نو څوک چې د خپل مؤمن ورور يو څيز حيران کړي؛ نو سملاسي دې خداى ياد کړي؛ځکه که خداى ياد کړي؛ نو زيان به ورته نه رسوي .( طب الائمه : ١٢١مخ )

ðسترګې وهل يو حقيقت دى او که پر کوم څيز،چې الهي مشيت شوى وي؛ نو بيا هم د سترګو وهل پرې اغېز لري . (عوالي الاللي ١\١٤٦)

 

حج

ðحج  وکړئ،چې شتمن شئ . ( المحاسن ٢\٣٤٥)

 ðخلکو! پر بشپړ دين او له اسلامه له پوهې سره،حج ته ولاړ شئ او بې توبې له مواقفو يې مه راګرځئ . ( مستدرک الوسايل  ٨ \ ٤٥)

ðجنت د مبرور حج بدله ده.رسول اکرم وپوښتل شو: مبرور حج؛يعنې څه ؟ ورته يې وويل : په خوله ښې خبرې کول او د خوړو ورکړه . ( عوالي الاللي  ٤\٣٣)

 

حجامت

ðحجامت د وينې د ناروغۍ دوا ده .حمام کول د بلغم د ناروغۍ دوا ده  او پلى تلل د صفرا د ناروغۍ دوا ده . ( من لايحضره الفقيه ١\ ١٢٦)

ðبې له مړينې،حجامت د ټولو دردونو د شفا په سر کې دى . (طب الائمه : ٥٧مخ )

ðپر سباناري حجامت کول دوا ده او پر مړه ګېډه حجامت کول د ناروغۍ لامل دى او د هرې مياشتې پر اوولسم اوسه شنبې حجامت کول د بدن د روغتيا لاملېږي او جبرئيل راته دومره د حجامت کولوپه اړه سپارښتنه وکړه،چې ګومان مې وکړ واجب دى . (بحارالانوار٥٩ \١٢٦)

ðڅوک چې تل د چهارشنبې او شنبې پر ورځو حجامت کوي؛نو نه ښايي له ځان پرته بل څوک يې پړکړي . (دعائم الاسلام  ٢\١٤٥)

 

حد او پولې

ðپر ځمکه چې د خداى لپاره حد اجرا شي (؛نو) تر څلوېښتو ورځو باران ( ورېدو) غوره دى . ( الکافي : ٧\١٧٥)

ðمخکېني ځکه پوپنا شول،چې پر بېوزليو يې حد اجر کاوه او پر مخور او اشرافو نه . ( دعائم الاسلام ٢\ ٤٤٢)

ðخداى تعالى پولې ټاکلې دي او څوک چې له کومې پولې واوړي؛نو سزا ورکوي . ( مستدرک الوسايل  ١٨ \٩ )

ðشبهه چې درته پيدا شوه؛نو حدود مه جاري کوئ او د درنو خلکو له تېروتنو تېر شئ؛خو داچې له کومې الهي پولې اوښتى وي . ( مستدرک الوسايل  ١ \ ٢٦ )

 

حرام اوحلال

ðخلکو! حلال مې تر قيامته حلال دي .(مستدرک الوسايل١٢ \٢١٧)

ðعبادت اويا ډوله دى،چې ډېر غوره يې د حلالۍ روزۍ لاس ته راوړل دي . ( الکافي : ٥\ ٧٨)

ðعبادت  اويا ډوله دى،چې غوره يې د حلال مال لاس ته راوړل دي . (الکافي  ٥\ ٧٨ )

ðچاچې د حلال مال لاس ته راوړو لپاره ځان ستړى کړى وي او بيا ويده شي؛نو خداى بښلى به ويده شوى وي . (لامالي للصدوق : ٢٨٩ )

ðخداى تعالى د معراج پر شپه وويل: احمده ! عبادت لس ډوله دى ، چې نهه يې دحلال مال لاس ته راوړل دي . (مستدرک الوسائل  ١٣ /٢٠ )

ðامت به مې ژر پر څو اويا ډلو وېشل کېږي،په دوې کې به ډېره ناوړه ډله هغه وي،چې په چاروکې د خپل نظر له مخې قياس کوي او په دې کار حلال،حراموي او حرام ،حلالوي . (بحارالانوار  ٢\٣١٢)

ðخداى خپل بندګان پيدا کړل او ترمنځ يې حلاله روزي ووېشله او حرام يې ور وړاندې کړل ؛نو چاچې له حرامو څه وخوړل؛نو هومره يې له حلال ماله کمېږي او څوک چې حرامخور وي ؛نو په قيامت کې ورسره حساب کېږي . (بحارالانوار  ٥\ ١٤٦)

ðد حلال خور پر سر پرښته درېږي او تر هغه ورته بښنه غواړي،څو له دې کاره لاس واخلي او همداراز و يې ويل : کوم بنده،چې حرامه مړۍ وخوري؛نو څو يې په ګېډه کې وي،په اسمانو او ځمکې کې پرښتې پرې لعنت وايي او خداى هم ورته نه ګوري او څوک چې حرامه مړۍ وخوري؛ نو خداى پرې غوسه کېږي؛نو که توبه وباسي،خداى يې توبه قبلوي او که تر توبې مخکې ومري؛نو د جهنم وړ دى . (بحارالانوار  ٦٣\٣١٤)

ðموږ ټول (اهلبيت) په چارو پوهېدنو،حلال او حراموکې د يو بل په څېر يو. ( الاختصاص : ٢٦٧مخ )

 

حساب

ðمخکې له دې،چې حساب درسره وشي؛له ځان سره حساب وکړئ . (الفضايل : ١٥٢)

ðله بنده چې د قيامت پر ورځ د لومړي څيز حساب اخستل کېږي،دا دى،چې ورته وويل شي: ايا بدن دې روغ رمټ و؟ (مجموعة ورام ١\٤٤)

ðرسول الله وويل : د چاچې کړنې حساب شي (؛نو) په عذابېږي. وپوښتل شو: د خداى تعالى دا خبره “چې د هغوى حساب به اسان وي”په څه مفهوم ده ؟ ورته يې وويل : د خبرې مفهوم دا دى،چې خداى له خپلوبندګانو تېرېږي . (معاني الاخبار :٢٦٢مخ )

 

حسرت

ðپه قيامت کې به هغه تر ټولو ډېر افسوس کوي،چې خپل اودس د بل پر پوټکي وويني . ( من لايحضره الفقيه  ١\ ٤٨)

 

حق اوحقيقت

ðحق او رښتيا ووايه که څه هم تريخ وي (او د خلکو) ښه نه ايسي . (بيهقي)

ð حقيقي مؤمن هغه دى،چې له خپلې شتمنۍ بېوزليو ته (څه) وبښي يا له خلکو سره په انصاف چلن کوي . ( الکافي  ٢\ ١٤٧)

ðرسول الله د بدر پر وژل شويو ودرېد او په يوه څاه کې يې واچول او ورته يې وويل :په څاه کې لوېدليو! پالونکي مو،چې راسره ژمنه کړې، ترسره شوه، ايا له تاسې سره د خداى ژمنه پوره شوه ؟ ورته وويل شو: رسول الله له مړيو سره خبرې کوئ؟حضرت ورته وويل : که هغوى د خبرو اجازه درلوداى (؛نو) ويل يې: هو! پرهېزګاري ډېره غوره توښه ده . ( من لايحضره الفقيه : ١\١٨٠)

ðبېشکه پر هر څه حقيقت او پر هر ښه کار رڼا پرته وي؛نو څه چې له قرآن سره اړخ لګوي، و يې منئ او څه چې ورسره مخالف وي، پرې يې ږدئ  . ( الکافي  ١\٦٩)

ðڅوک چې خپله ژبه وساتي؛نو د ايمان پر حقيقت به پوه شي.(الکافي  ٢\١١٤)

ðد هر حق لپاره يو حقيقت وي او يو بنده هم د اخلاص حقيقت ته رسېداى نشي؛خو داچې کوم  کار وکړي او نه يې خو ښېږي،چې وستايل شي . ( مستدرک الوسايل  ١\ ١٠١)

ðظالم واکمن ته د حق  خبرې ويل غوره جهاد دى . (عوالي الاللي ١\٤٣٢)

 

حقوق

ðمؤمنان په خپلمنځي حقوقوکې د ږومنځې د غاښو په څېر يو له بل سره برابر دي؛خو په کړنو کې يو له بل سره توپير لري او هر سړى د خپل ملګري پر دين وي؛نو ځير دې شي،چې له چا سره ملګرتوب کوي . (مستدک الوسايل : ١\١٠١)

ðلکه څنګه چې پلار پر اولاد حق لري؛دغسې “علي” پر مسلمانانو حق لري .( بشارة المصطفى : ٢٦٩ مخ )

 

شفاعت

ðرسول اکرم حضرت “اسامه” ته وايي :د قضاوت په غونډه کې، چې کېناستې؛نو له ما څه مه غواړه؛ځکه د حق په اجرا کې شفاعت کارسازى نه دى . ( مستدرک الوسايل ١٧ \٣٥٨)

 

د مؤمن حقوق

ðمؤمن ته روا نه ده،چې تر درېو ورځو زيات له خپل مؤمن ورور سره اړيکې پرې کړي . ( بحارالانوار  ٧٢\ ١٨٩)

ðخداى تعالى له مؤمن سره تر هغه مرسته کوي،چې له بل مؤمن سره د لاسنيوي په فکر کې وي او څوک چې په دنيا کې د خپل مؤمن ورور ستونزې هوارې کړي؛نو خداى به يې په آخرت کې اويا ستونزې هوارې کړي .( بحارالانوار : ٧١\٣١٢)

ðکله هم خپل کمزوري وروڼه ټيټ مه ګڼئ؛ځکه څوک چې مؤمن ورور ټيټ وګڼي؛نو خداى دى او هغه مؤمن په جنت کې نه راغونډوي؛خو دا چې توبه وکاږي .(مستدرک الوسايل ٩\١٠٤)

ðمؤمن پر مؤمن اوه واجب حقوق لري،چې دادي :

 ( ١) په درنه سترګه وروګوري . ( ٢) له زړه ورسره مينه ولري . (٣) په خپله شتمنۍ کې يې شريک وبولي . (٤) غيبت يې و نه کړي . (٥) چې ناروغ شو،پوښتنې ته يې ورشي. (٦) په جنازه کې يې ګډون وکړي. ( ٧) اوتر مړينې وروسته يې په ښو ياد کړي .(من لايحضرالفقيه ٤\٣٩٨)

 

پر مسلمان د مسلمان حقوق

ðمسلمان پر بل مسلمان ورور (٣٠) حقوق لري ،چې ددې حقوقو بار ترې نه سپه کېږي؛خو داچې پوره يې کړي ياوبښل شي (او هغه دادي ) : ( ١) له ښويېدنې يې تېر شي. (٢) پر اوښکو يې زړه وسوځوي . (٣) له ګناهونو يې تېرشي . (٤) عذر يې ومني . (٥) پرېنږدي،چې غيبت يې وکړي . (٦) تل ورته نصيحت کوي . (٧) پر بديو يې پرده اچوي .( ٨) خپله دوستي ورسره وساتي . (١٠) په ناروغۍ کې يې پوښتنه وکړي . ( ١١) پر مړي يې شاهدي ووايي . (١٢) بلنه يې ومني  (١٣) ډالۍ يې ومني . (١٤) ليدو ته يې ورشي . ( ١٥) له ډالۍ يې مننه وکړي . (١٦) مرسته يې ښه وګڼي . (١٧) مېرمن يې  وپالي . (١٨) اړتياوې يې لرې کړي . (١٩) غوښتنې يې ومني . (٢٠) د پرنجي پر وخت ورته روغتيا وغواړي . ( ٢١) چې بې لارې شو؛نو سمه لار وروښيي . (٢٢) د سلام ځواب يې ورکړي . (٢٣) ښه خبرې ورسره وکړي . (٢٤) له اخلاصه ورسره ښه وکړي . ( ٢٥) قسم يې ومني . (٢٦) د هغه دوست خپل دوست او دښمن يې خپل دښمن وګڼي . (٢٧) په ظلم او مظلوميت دواړو کې ورسره مرسته وکړي؛يعنې د ظلم  پر وخت ورسره مرسته وکړي،چې له ظلمه يې منع کړي او چې مظلوم شي؛ نو د حق په اخستوکې ورسره لاسنيوى وکړي .(٢٨) ځان ته يې نه پرېږدي او ذليل يې نه کړي . ( ٢٩) هر ښه،چې يې ښه ايسي؛نو هغه ته دې يې هم ښه وګڼي. (٣٠) او څه چې ځان ته نه خوښوي؛هغه ته دې يې هم نه خوښوي . (وسايل الشيعه  ١٢\ ٢١٢)

ðپر مسلمان واجب دي،چې کله پر سفر وځي؛نو خپل وروڼه دې خبر کړي او چې راستون شي،پر دوستانو يې لازم دي،چې کتو ته يې ورشي. ( الکافي  ٢\١٧٤)

 

حکمت

ðخداى تعالى زما د اهلبيتو پر ژبه د حکمت څراغونه جاري کړي دي . (مستدرک الوسايل  ٦ \ ١٩٧)

ðله خداى تعالى څخه وېره د حکمت بنسټ دى .(وسايل الشيعه: ١٥ \٢٢١)

ðزه د حکمت “ښار”يم او علي يې “ور”دى ؛نو که څوک غواړي،دې ښار ته راننوځي؛نو له “وره” دې يې راننوځي .(الامالي للصدوق: ٢٦٩)

ðابوذره! چې و دې ليدل،ورور دې دنيا ته شا کړې؛نو خبرې ته يې غوږ کېږده؛ځکه پر ژبه يې حکمت جاري کېږي . (الامالي للطوسي : ٥٣١مخ )

ðپوهان وپوښتئ،له حکيمانو سره راشه درشه ولرئ او له بېوزليو سره ملګرتوب کوئ .( مشکاة الانوار : ١٣٤)

ðحکمت د مؤمن ورک شوى (څيز) دى؛نو چېرې يې،چې ومومي؛نو اخلي يې .( بحارالانوار ٢\٩٩)

ðخلکو! حکمت، د حکمت نااهلو ته مه ورکوئ ،چې تېرى به مو پرې کړى وي او هم حکمت له اهلو يې مه منع کوئ،چې تېرى به مو پرې کړى وي . ( اعلام الدين : ٣٣٦)

ðپر هغه دې خوښي وي،مخکې تردې چې د بل پر عيبو او نيمګرتياوو پسې ګرځي،د ځان په سمون بوخت وي او خپله شتمني د ګناه په لار کې نه لګوي او پر کمزوريو او بېوزليو يې زړه سوځي او له فقهاوو او حکيمانو سره يې ملګرتوب وي .( بحارالانوار  ١\ ٢٠٥)

ðنرمي د حکمت بنسټ دى . پالونکيه! څوک چې زما د امت له چارو څه پر ذمه واخلي او نرمي ورسره وکړي؛نو ته (هم) ورسره نرمي وکړه او څوک چې ورسره سختي کوي؛نو ته هم ورسره سختي وکړه. (مستدرک الوسايل  ١١\٢٩٥)

ðحکمت زما د اهلبيتو پر ژبه جاري شوى دى .( من لايحضره الفقيه ١\ ٥٣٥)

 

حماقت

ðله احمق سره له واده ډډه وکړئ؛ځکه ناسته يې بلا ده  او اولادونه يې ضايع کېږي . ( الجعفريات : ٩٢مخ )

ðعياشي او  مزې چړچې کول ډېر ناوړه حماقت دى . ( الکافي ٨\٨١)

ðڅوک چې له چا سره ملګرتوب کوي؛نو د هغه پلار،ټبر او نبيره دې وپوښتي؛ځکه دا چار له رښتينې دوستۍ او واجبو حقوقو څخه دى او بې له دې ملګرتوب يې احمقانه دى . (مصادقة الاخوان : ٧٢مخ )

ðابوذره! هله به د ايمان حقيقت ته ورسې،چې ګرد خلک په ديني چارو کې احمق او په دنيوي چارو کې عاقل وويني. (بحارالانوار  ٧٤\٨٤)

 

څاروي

ðپسه غوره څاروى دى .( الکافي ٦\٥٤٤)

ðد شرابو بيه ،د ظلم مهر او د کوټه سپي (ناښکاري) بيه حرامه ده . (وسايل  ١٧\٩٤)

ðخداى تعالى له موږه د هرڅاروي او بوټي په باب ژمنه اخستې؛نو چا چې دا ژمنه ومنله؛نو پاک او سپېڅلى شو او چاچې و نه منله ؛نو تريو تريخ شو. ( وسايل  ٢٥\١٧٨)

ðد پسونو پنډ غالى پاک کړئ ،پر پوزو يې لاس راکاږئ ،چې جنتي څاروي دي .( المحاسن  ٢\٦٤١)

ðد روزۍ له لسو برخو،نهه يې په سوداګرۍ اوپاتې يوه يې په پسه کې ده.( وسايل ١٧\١٠ )

 

 

کورنۍ

ðکورنۍ جوړه کړه ځکه روزي زياتوي . ( قرب الاسناد : ١١مخ )

ðزړه سوى د شتمنۍ لاملېږي او په کورنۍ کې مينه مړينه تمبوي . (عوالي الاللي ٣\٢٨٢)

ðعلي! د کورنۍ د غم خوړل د جهنم د اور مانع ګرځي،له خالقه اطاعت له عذابه خونديتوب دى او د خداى په اطاعت کې صبر،جهاد کول دي، چې تر شپېتو کالو عبادته غوره دى او د مړينې غم د ګناهونو کفاره ده . (جامع الاخبار: ٩١مخ )

ðپه جنت کې داسې يو مقام دى،چې يوازې عادل واکمن، زړه سواند او زغمناک عيالوار وررسېداى شي .( الخصال  ١\٩٣)

ð بندګان ټول د خداى کورنۍ ده؛نو هغه پکې ورته ډېر غوره دى،چې کورنۍ ته يې ډېر ګټور وي .( قرب الاسناد : ٥٦مخ )

ðعلي! پوه شه،چې خداى تعالى بندګانو ته روزي ورکوي او (په اړه يې) غم تا ته کوم زيان نه لري او همداراز د بندګانو روزۍ ته هم کومه ګټه نه لري؛خو( د غم ) له امله يې تا ته ثواب درکوي او بېشکه تر ټولو ښه غم،د کورنۍ لپاره غم دى .( جامع الاخبار: ٩١مخ )

ðعلي! څوک چې د خپلې کورنۍ په چوپړ کې وي؛نو متعال خداى يې له واره د شهيدانو په شمېر کې ليکي او هره شپه و ورځ  ورته د زرو شهيدانو ثواب ورکوي او همداراز يې هر قدم ته د حج او عمرې ثواب وربښي او د بدن هر رګ  ته يې په جنت کې ښار ورکوي .(بحارالانوار  ١٠١\١٣٢)

ðعلي! د کورنۍ خدمتګار يا صديق دى يا شهيد دى او يا داسې سړی دى،چې خداى ورته د دنيا او اخرت خير غوښتى دى .(جامع الاخبار: ١٠٢مخ )

 

خبر

ðښه سړى،ښه خبر راوړي او بد سړى بد خبر راوړي . (مشکاة الانوار : ٣٢٤)

ðعلي! ته د خداى حجت،باب الله،خداى ته د رسېدو لار،ستر خبر، نېغه لار او غوره بېلګه يې . ( عيون اخبارالرضاء ٢\٦)

 

خداى

ðتر متعال خداى هېڅوک هم ډېر غيور نه دى . (بحار ٦\١١٠)

ðخدا ى پاک وايي :”ستريا” مې څادر دى؛نو څوک چې په کبر زما په “ستريا” کې راننوځي ،په اورکې يې سوځوم . (منية المريد : ٣٣٠ مخ )

ðتوحيد نيم دين دى . ( التوحيد : ٦٨مخ )

 

زړه وژونکي

ð ( ١) له کنجوسو سره ناسته ( ٢) له ( نامحرمو ) ښځوسره خبرې او (٣) له شتمنو سره ملګرتوب زړه وژني . ( مشکاة الانوار : ٢٠٥مخ )

 

تاوتريخوالى

ðد پاک خداى او استازي يې پر خداى ايمان او له بندګانو سره يې په نرمۍ چلن ډېر ښه ايسي او له خداى سره شرک او له بندګانوسره يې تاوتريخوالى د خداى د غوسې لامل ګرځي .( بحارالانوار  ٧٢\٥٤)

ðنرمي د ښه انګېرنې لامل دى او تاوتريخوالى د شومۍ لامل دى . (الکافي ٢\١١٩ )

ðکه بد اخلاقي او تاوتريخوالى په انساني بڼه پيدا شوى واى؛نو ناوړه څيز به ترې نه و . ( الکافي ٢\٣٢١)

ðنرمي هر څه ښکلي کوي او حماقت هر څه ناوړه انځوروي؛نو څوک چې د نرمۍ له نعمته برخمن وي؛نو د دنيا او اخرت ښه ورکړ شوي دي او څوک چې ترې بې برخې شي؛نو د دنيا او اخرت له ښو بې برخې شوى دى. ( الجعفريات : ١٤٩)

 

خوشحالي

ðڅوک چې د خداى د غوسې په بيه خلک خوشحالوي؛نو پاک خداى به يې ستايونکى پر ملامتګر واړوي .( الکافي ٢\٣٧٢)

ðله بندګانو نه د خداى د خوشحالۍ نښه داده،چې واکمن يې عادل او د نرخونو ارزاني وي او پر بندګانو د خداى د غوسې نښه دا ده،چې واکمن يې ظالم او نرخونه ګران وي .( الکافي ١\١٦٢)

ðله چاچې خداى راضي وي او څه ترې وغواړي؛نو تر مړينې مخکې  يې ورکوي .(وسايل ١\٥٤)

ðڅوک چې په لږې روزۍ خوشحاله وي؛نو پاک خداى ترې په لږو کړو راضي کېږي .( تحف العقول : ١٠٧)

ðڅوک چې د خداى په ورکړې روزي خوشحاله وي؛نو سترګې يې روښانېږي .( التمحيص : ٥٣)

ðڅوک چې د خداى د غوسې په بيه واکمن خوشحاله کړي(؛نو) د خداى له دينه وتلى دى . (عيون اخبارالرضا ٢\٦٩)

ðڅوک چې خلک د خداى د غوسې په بيه خوشحالوي(؛نو) پاک خداى هغه خلکو ته ورپرېږدي او څوک چې خدای د خلکو د غوسې په بيه خوشحالوي؛نو خداى هغه د خلکو له شره ژغوري . ( اعلام الدين : ٣٣٤)

 

ژغورنه

ðهر بنده،چې د لمانځه وخت مهم  بولي؛نو زه يې تضمينوم،چې  ساه يې په اسانه ووځي،تشويش او کړاوونه يې لرې کېږي او د جهنم له اوره به ژغورل کېږي . ( الامالي للمفيد: ١٣٦مخ )

ðد مؤمن ژغورنه د ژبې په ساتنه کې نغښتل شوې ده . ( الکافي ٢\١١٤)

ðکه غواړې په نېکمرغۍ کې ژوند وکړې او مړينه دې شهادت وي او د قيامت پر ورځ وژغورل شې او د قيامت په سوځنده دښته کې تر سيورې لاندې او د بې لارۍ پر ورځ سمه لارښوونه غواړې (؛نو) قرآن زده کړه؛ ځکه هغه د رحمن (خداى) کلام دى،له شيطانه خوندي دى او په تله کې د دروندوالي لامل دى .(مستدرک الوسايل ٤\٢٣٢)

ðکه څوک غواړي،د ژغورنې په بېړۍ کې سپور شي او پر ټينګه کړۍ منګولې ښخې کړي او د خداى په رسۍ پورې ځوړند شي؛نو تر ما وروسته دې “علي” ښه وګڼي له دښمنانو سره دې يې دښمني وکړي او د اولاد په لارښوونو پسې دې يې ولاړ شي . (د حاکم حسکاني شواهد التنزيل  ١\١٦٨)

ðابوذره!څوک چې چوپ شي؛نو ژغورل کېږي؛نو چوپ وسه او هڅه کوه،چې بېخي دروغ ونه وياست .( سايل ١٢\٢٥١)

ðحلال اوحرام بېخي څرګند دي؛خو د دوى تر منځ شبهات شته؛نو که چا ترې ډډه وکړه،له حرامو ژغورل کېږي؛خو که څوک په شبهاتو کې ورګډ شو؛نو په حرامو به ککړشوى وي .( الکافي ١\٦٧)

ðڅوک چې پوهه د پوهې له اهله واخلي او عمل پرې وکړي؛نو ژغورل کېږي او څوک چې په پوهې دنيوي ګټې تر لاسه کوي؛نو يوازې همدا برخمنېدل به يې وي .(تهذيب الاحکام٦\٣٢٨)

ðپه رښتيا، ژغورنه په دې کې ده،چې خداى و نه غولوئ چې ( ددې په غبرګون کې)هغه هم تاسې تېرباسي؛نو ځکه څوک چې خداى تېرباسي؛ نو خداى هم هغه تېرباسي او ايمان ترې اخلي او که پوه شي؛نو ځان تېرباسي . وپوښتل شو: خداى څنګه تېرباسي ؟ آنحضرت ورته وويل : د کوم کار،چې خداى ورته ويلي،بل ته يې کوي؛نو د ريا لپاره له خدايه ووېرېږئ؛ځکه ريا له خداى سره شرک دى او د قيامت پر ورځ ريا کار ته په څلورو نومونوغږ کوي : کافره! فاجره! وعده خلافه ! او زيانکاره! کړه وړه دې له منځه ولاړل او بدلې دې پوپناه شوې،نن درته بېخي د ژغورنې لار نشته ؛نو ثواب دې له هغه وغواړه، چې ريا دې ورته کوله . (تفسير العياشي ١\ ٢٨٣)

 

خندا

ðله ډېرې خندا ډډه وکړئ ؛ځکه زړه وژني . (ميزان الحکمه : ١٠٦٨٥ح)

ðخپل زړونه په لږې خندا او لږوخوړو ژوندي وساتئ. (محجة البيضاء: ٥/١٥٤)

ðډېره خندا د ورکاوي لامل دى . (مستدرک الوسايل ٨\٤١٧ )

ðله ډېرې خندا ډډه وکړئ ؛ځکه زړه وژني او د مخ رڼا له منځه وړي . (معاني الاخبار: ٣٣٥ )

ðڅوک چې په خندا ګناه کوي؛نو په ژړا به جهنم ته ننوځي.(ثواب الاعمال :٢٢٣ )

ðډېرې ټوکې؛پت،ډېره خندا؛ايمان او ډېر دروغ د انسان ارزښت له منځه وړي . ( الامالي للصدوق : ٢٧مخ )

ðخندا زړه وژني او د ښځو کړس کړس خندا د خدای ښه نه ايسي . (وسايل  ٧\٧٦)

ðپاک خداى ماته شپږ څيزونه ناوړه ګڼلي،چې زه دا څيزونه خپلو وصي اولادونو ته او (همداراز) لارويانو ته مکروه ګڼم : ( ١) په لمانځه کې چټي کارونه ( ٢) په روژه کې کوروالى ( ٣)تر صدقې وروسته منت ايښوونه  (٤) په جنابت کې جومات ته ننووتل ( ٥) په مستراح کې خبرې کول .( ٦) اوپه هديره کې خندا. (فضائل الاشهرالثلاثة : ٧٦مخ )

 

خوب

ðد  حضرت “سليمان” عليه السلام مور ،سليمان ته وويل : زويه ! ځان د شپې له ډېرخوبۍ وژغوره؛ځکه دا چار د قيامت پر ورځ د تش لاسۍ لامل دى . ( من لايحضره الفقيه ٣\٥٥٦)

ðځمکه درې څيزونو ته چغې وهي،چې په څېر يې نورو ته نه وهي : هغه وينه،چې تويول يې حرام دي او پر ځمکه تويه شي،د زناکار د غسل اوبه،چې پر ځمکه تويې شي او څوک چې تر لمرخاته مخکې پر ځمکه ويده شي .( الخصال  ١\١٤١)

ðپه لومړي ځل له خدايه په شپږوڅيزونوسرغړاوى وشو : (١) له دنيا سره مينه ( ٢) له رياست (واکمنۍ) سره مينه (٣) له خوړو سره مينه(٤) له خوب سره مينه ( ٥) له راحت کولو سره مينه ( ٦) او له ښځوسره مينه . ( الکافي ٢\٢٨٩)

ðخوب د مړينې ورور دى . ( بحارالانوار  ٧٣\١٨٩)

ðد خوب پرمهال د (( الهکم التکاثر)) دسورت لوستل د قبر له عذابه د ژغورنې لامل دى .( الکافي ٢\٦٢٣)

ðد ورځې په سر کې خوب د بد اخلاقۍ لامل دى . قيلوله (غرمه مهال) خوب يو نعمت دى . تر ماسپښين وروسته خوب حماقت دى او د ماښام او ماسخوتن ترمنځ خوب له روزۍ د بې برخې کېدو لامل دى . (الجعفريات : ١٥٧)

ðد روژه تي خوب عبادت او ساه راکښل يې د خداى تسبيح ده. (روضة الواعظين  ٢\٣٥٠ )

ðکه د کوچنيانو او کمزوريو خوب نه واى؛نو د ماسخوتن د نفل لمونځونو وخت مې د شپې تر درېمې ځنډاوه. (علل الشرايع ٢\٣٦٧)

ðعلي! پوهېږې چې ځمکه تر لمر خاته مخکې د عالم له خوبه سختې چغې وهي او خداى ته شکايت کوي ؟ (دعائم الاسلام ١ \١٥٣)

ðغوره مو “اولى النهى” دي . وپوښتل شو:څوک دي؟ و يې وويل : هغوى چې د رښتياوو خوبونه ويني،ښه خوى لري،خواړه ورکوي،په  لوړ غږ سلام اچوي، خلک د شپې ويده وي؛خو دى عبادت کوي . (مستدرک الوسايل ٦\٣٣٤)

ðله خوبه،چې راوېښ شوئ ؛نو تر هغه لوښي ته لاس مه وړئ،څو مو مينځلى نه وي ( يا مو اودس نه وي کړى ) . (دنهج البلاغې شرح  ٢٠ \٢٧)

ðکه په خوب کې شيطان تېر اېستئ؛نو چاته يې مه وايئ.( بحارالانوار  ٥٨\ ١٧٤)

 

خواري

ðڅوک چې زما مؤمن بنده سپک کړي؛نو له ماسره به يې په جګړې لاس پورې کړى وي .( الکافي ٢\٣٥١)

 ðډېر هوښيار هغه دى،چې له خلکو سره ښه  چلن وکړي او (خلکو ته درانه وګوري) او ډېر خوار هغه دى،چې خلک سپک وګڼي. (بحارالانوار  ٧٢\٥٢)

ðچاچې مؤمن ته د بېوزلۍ او تنګلاسۍ له امله يې ټيټ وکتل؛نو خداى به يې د جهنم له پله اور ته ورګوزار کړي . (عيون اخبارالرضا ٢\٧٠)

ðد چا په مخ کې،چې يو مؤمن سپک (او ورټل) شي او دى يې د ننګې له  وس سره سره دفاع و نه کړي؛نو خداى به يې د قيامت پر ورځ د ټولو بندګانو په مخ کې سپک او خوار کړي . ( دنهج البلاغې شرح \ ٦٩)

 

غوښتل

ðکه څوک غواړي ډېر غني وي؛نو څه چې د خداى په لاس کې وي، ورته ډېرهيلمن وي،نه هغه چې له نورو سره وي . (الکافي :٢\١٣٩)

ðد مسعود زويه ! هيلې دې لنډې کړه؛داسې چې ګهيځ ووايې،چې تر مازيګره به نه يم او مازيګر ووايې،چې تر سهاره به نه يم او هوډ وکړه،چې ځان له دنيا بېل کړې . (مستدرک الوسايل ٢\١٠٨)

ðکه څوک د آدم (ع) علم  او د “نوح” (ع) فهم ( او پوهېدنې ) ته ګوري ؛نو علي ته دې وګوري . ( بحارالانوار ٣٩\٣١)

ðخداى تعالى يو څيز ځان ته خوښوى؛خو خپلو مخلوقاتو ته  يې نه خوښوي؛د خپلو بندګانو ګدايي نه خوښوي؛خو له ځانه غوښتل خوښوې او د خداى دا ډېر ښه ايسي،چې بنده ترې يو څيز وغواړي ؛ نو له خدايه د هغه د فضل په غوښتنه كې حيا مه كوئ ان كه د څپلۍ پياړمه وي . ( الكافي  ۴\ ۲۰ )

ðله خلكو غوښتنه د انسان له خپلې ابرو او پت سره معامله ده؛ نو سړى بايد ځير شي،چې ابرو يې پاتې كېږي او که ځي . ( الجعفريات : ۵۶)

 

نېکي

ð “نېکي” عمر زياتوي او “دعا” قضا وقدر بدلوي . (بحارالانوار ٩٠\ ٢٩٦)

ðد نېکۍ درې زېرمې دادي :د رنځونو پټول،ناروغي او صدقه ورکول . ( بحار ٨٢/١٠٣)

ð يوازې “نېکي” د انسان عمر زياتولاى شي . ( بحار ٧٧ /١٦٦)

ðبشپړه نېکي هغه ده،چې څه په ښکاره کوې،په پټه يې هم وکړې . (کنز: ٥٢٦٥ح ) 

ð هغه دې خوښ وي ،چې خداى ورته په لاسونوکې د نېکۍ کونحيانې اېښي وي . ( کنز ١٥/٧٦٩)

ðپه نړۍ کى د خداى  د احکامو لاروي وکړه (متقي وسه) او په هرې بدۍ پسې نېکي وکړه،چې پرې له منځه ولاړه شي او د خداى له بندګانوسره ښه چلن وکړه . ( احمد-ترمذي– الدارمي)

ðهيڅ ډول نېکي سپکه مه ګڼئ؛نو که څه نه لرئ،چې مسلمان ورور ته يې ډالۍ کړئ ؛نو په خندا او ورين تندي ورسره مخامخ شه او چې غوښه دې پخوله؛نو اوبه پکې ډېرې کړه،چې ښوروا يې ګاونډي ته هم ډالۍ کړې . (ترمذي)

ðڅوک چې د نېکۍ وړتيا لري که نه لري،نېکي ورسره وکړه؛ځکه که وړتيا نه لري؛نو ته خو د کرامت او لورنې وړتيا لرې .(وسايل ١٦\٢٩٥)

ðنېکي د ناوړو پېښو د مخنيوۍ لاملېږي او صدقه د پالونکي غوسه سړوي .( قرب الاسناد : ٣٧مخ )

ðد ښه کار پاى ته رسول تر پيلېدو يې ډېر مهم دي . (مستدرک الوسايل  ٧\٢٣٧)

خواړه

 ðپه مړښت او د جنابت په حال کې خوراک د برګي (پيس) د ناروغۍ لاملېږي .( روضة الواعظين٢\ ٣٠٨- الامالي للصدوق : ٥٤٣)

ðپه کيڼ لاس خوراک جفا ده .( الجعفريات : ١٦٢)

ðد عدسو(خوراک) مبارک او سپېڅلي خواړه دي،چې زړه نرموي، اوښکې زياتوي او خداى اويا پېغمبرانو ته مبارک کړي،چې وروستى  يې “عيسی دمريمې” زوى و .( الدعوات : ٤٨\)

ðڅوک چې خاورې وخوري او مړ شي؛نو “ځان وژنى” به وي .( الکافي ٦\٢٦٦)

ðڅوک چې “هوږه” او “پياز” وخورى؛نو زموږ جومات ته دې نه رانږدېږي .( عوالي الاللي  ١\ ١٠٣)

ðڅوک چې “انار” وخوري (؛نو) زړه يې نوراني کېږي او تر څلوېښتو ورځو پورې ترې شيطان لرې کېږي .( سايل ٢٥\١٥٣)

ðڅوک چې بې له بلنې خواړه وخوري؛نو خواړه يې په ګېډه کې د اور په لمبه اوړي او کومو خوړو ته چې بلل شوي ياست،بې له اجازې يې نورو ته مه ورکوئ .( دعائم الاسلام  ٢\١٠٨ )

 ðخواړه مو چې وخوړل؛نو خپلې ګوتې وڅټئ؛ځکه برکت پکې دى . (مستدرک الوسائل  ١٦\٢٨٦)

ðڅوک چې هره ورځ (٢١) دانې مميز وخوري؛نو بې له مرګونې ناروغۍ؛په نورو به اخته نشي. (دعائم الاسلام ٢\١٤٨)

ðڅوک چې غټه مړۍ په خوله کوي؛نو پاک خداى به يې په همدومره غټې ناروغۍ اخته کړي . د “غوا” غوښه د ناروغۍ لامل دى؛خو غوړي او شيدې يې دوا ده . (عائم الاسلام  ٢\ ١١١)

 ðڅوک چې د خوب پر مهال اوه کجورې وخوري؛ نو د کولنجو (بادو) له ناروغۍ به خوندي وي او د ګېډې چينجي يې له منځه وړي . (مستدرک الوسايل  ١٦ \٤٦١)

ðڅوک چې کومه مېوه وخوري او”بسم الله” ووايي؛نو زيان نه ور رسوي . ( مستدرک الوسايل  ١٦  \ ٤٦١)

ðڅوک چې خاوره وخوري ؛نو ملعون دى . ( بحارالانوار  ٥٧ \ ١٥٣)

ðغوښه وخورئ؛ځکه په بدن کې د غوښې د راټوکېدو لامل دى؛څوک چې څلوېښت ورځې غوښه و نه خوري؛نو بدخويه کېږي او څوک چې “وازده” يا “لم” وخوري؛نو په هومره ناروغۍ اخته کېږ ي . ( المحاسن  ٢\ ٤٦٥)

ðڅوک چې له “عدسو” (شاکلول) سره د “کدو حلوا” وخوري؛نو د خداى د يادولو پر مهال يې زړه نرمېږي او د کوراوالي قوت يې زياتېږي.  

ðڅوک چې سود وخوري ؛نو پاک خداى يې په هماغه اندازه په ګېډه کې اور ننباسي او څوک چې له دې ماله څه لاس ته راوړي؛نو خداى يې يو عمل  هم نه قبلوي او تر هغه چې ددې مال يو ذره هم ورسره وي؛ نو خداى او پرښتې پرې لعنت وايي . ( ثواب الاعمال : ٢٨٥)

ð خواړه ګډ وخورئ او مه خپرېږئ ؛ځکه په ګډ خوراک کې برکت دى . (بحار ٦٢/٢٦١ )

ð له ډېرخورۍ ډډه وکړئ .( الحياة ٤/٢٠٦)

ðچې وږى شوې (؛نو) خواړه وخوره  او لا،چې موړ شوى نه يې؛نو پرې يې ږده . ( بحار ٦٢/٢٩٠)

 

لمر

ðکومې اوبه،چې په لمر تودې شوې وي،نه پرې اودس وکړئ او نه غسل او نه يې مينځلو ته وکاروئ ؛ځکه د برګي (پيس) د ناروغۍ لاملېږي . ( الکافي ٣\١٥)

ðلمر څلور ځانګړنې لري : ( ١) رنګ اړوي ( ٢) بوى بدوي .(٣) جامې خرابوي او ( ٤) دناروغۍ لاملېږي . (وسايل ١٢\ ١١٠ )           

 

خطاطي

ðښه ليک،د روزيو له کونجيانو دى . ( بحارالانوار  ٧٣\٣١٨)

ðمشواڼۍ دې ډکه کړه،قلم کوږ نيسه،”ب” اوږده ليکه ، د سين غاښونه بېل ليکه، د ميم منځ مه ډکوه،”الله” په ښه ليک کښه او “رحمن” اوږد او “رحيم” په ظرافت وليکه او قلم دې پر کيڼ غوږ کېده، چې ورک يې نه کړې  .( منية المريد: ٣٤٩)

 

په ژوند کې بسياېنه

ðپر هغه دې خوشحالي وي،چې مسلمان وي او روزي يې هم کافي وي . ( الکافي  ٢\١٤٠)

 

خپلوان

ðکه کوم خپلوان دې اړ وي ؛نو د صدقې ورکړه بل چا ته روا نه ده . ( من لايحضره الفقيه ٤\٣٦٨)

ðپه جنت کې يو مقام دى،چې يوازې عادل واکمن،پر خپلوانو زړه سواند او زغمناک عيالوار ورته رسېداى شي . (الحضال ١\ ٩٣)

ðزړه سوى د لوراند خداى له لوري يوه څانګه ده؛نو څوک چې پر خپلوانو زړه وسوځوي؛نو خداى ورسره اړيکه ټينګوي او څوک چې يې و نه سوځوي؛خداى هم ورسره اړيکه پرېکوي . (کشف الغمه ١\ ٥٥٣)

ðله خپلوانو سره اړيکې ټينګې کړئ،که څه هم په يو ځل سلام اچولو وي .(تحف العقول : مخ ٥٧)

ð له خپلوانوسره دې “ليده کاته” کوه،که څه هم يو کال مسافرت ته اړشوې . (بحار ٧٤/١٠٣)

ð خپلوانو ته مو پام وسه،خپلوانو ته مو پام وسه . ( کنز: ٦٩١٣ ح )

ð څوک چې له خپلوانوسره اړيکې پرې کړي؛نوجنت ته نشي تلاى . (عوالى اللئالى ١/ ٢٧٠ )

 

خياطي – ګنډل

ðخياطي مؤمنې ته ښه بوختيا ده . ( الجعفريات : ٩٨مخ )

ðخياطي صالح ښځې ته ښه تفريح ده . ( وسايل الشيعه ١٧ \ ٢٣٧)

 ðخياطي د نېکانو نارينه وو کار دی .( مستدرک الوسايل ١٣\٢٢٦)

 

خيانت

ðامانت ساتنه روزي زياتوي او خيانت د بېوزلۍ لاملېږي . (الکافي  ٥\١٣٣)

ðدسيسه،چل او خيانت انسان جهنم ته راکاږي .(مستدرک الوسايل ٩\٨٠)

ðخاين او خاينې ته د شاهدۍ ورکولو اجازه نشته .(مستدرک  ٧١\٤٣٤)

ðله مسلمان سره خيانتګر له موږه نه دى .(ثواب الاعمال : ٢٨٦مخ )

ðڅلور څيزونه دي،چې که کوم کور ته لار پيدا کړي؛نو ويجاړوي يې او برکت يې له منځه وړي : ( ١) خيانت ( ٢) غلا(٣) شرابخوري .( ٤)  زنا. ( الامالي للطوسي : ٤٣٩)

ðکه څوک په کومه معامله کې له خيانته خبر وي؛نو په معامله کې د خيانتکار په څېر دى او څوک چې حق ته په رسېدو کې د مسلمان ورور مخه ونيسي؛نو روزي پرې حرامېږي؛خو هله چې توبه وباسي . (من لايحضره الفقيه ٤\١٥)

ðابوذره! څه چې په غونډه کې وينې او واورې ؛نو دا درسره امانت دى او د مسلمان ورور د راز رابرسېرول ورسره خيانت دى .( وسايل الشيعه : ١٢\ ٣٠٧)

ðپه پوهه او علم کې د يو بل “خيرغواړي” او ناصح وسئ؛ ځکه په علم کې خيانت،په مال کې تر خيانت سخت عذاب لري او د قيامت پر ورځ يې خداى په اړه تاسې پوښتي . (الامالي للطوسي : ١٢٦)

ð خپل باوري اعتمادي هېڅکله يې مه تورنوه او پر يو ځل ازمېيل شوي خاين هم هېڅکله باور مه کوه .( قرب الاسناد: ٤١مخ )

ðڅوک چې د خپل مؤمن ورور د اړتيا د لرې کولو لپاره هڅه کوى؛خو د هغه “خيرغواړى” او ناصح نه وي؛نو په حقيقت کې د خداې او د هغه له استازي سره يې خيانت کړی .( الکافي  ٢\ ٣٦٢)

ðڅوک چې د خپل ګاونډي ان يوه لوېشت ځمکه لاندې کړي؛نو پاک خداى به د ځمکې د کړۍ هومره غاړه کۍ ورپرغاړې کړي . (الامالي للصدوق : ٤٢٧)

ðکه څوک په دنيا کې کوم امانت خيانت کړي او تر مړينې وړاندې يې بېرته ورنه کړي؛نو بې له اسلامه به پر بل دين مړ شوى وي او خداى به په غوسه ورسره وويني . ( من لايحضره الفقيه ٤\ ١٥)

ðڅوک چې امانت ته سپک ګوري؛داسې چې د بېرته ورسپارلو تر وخته يې ولګوي ؛نو له موږه نه دى او همداراز څوک چې د مسلمان په مال او کورنۍ کې خيانت وکړي؛نو له موږه نه دى .( الاختصاص : ٢٤٨)

ð که چا درسره خيانت(هم) کړى وي ،ته يې ورسره مه کوه . (وسائل ١٢/ ٢٠٢)

ðڅوک چې د نورو په امانت کې خيانت کوي له ما ځينې نه دى . ( بحار ٧٥/١٧٢)

ðدا خيانت دى،چې ملګرى دې تا په هر خبره کې رښتونى وګڼې؛خو ته ورته دروغ وايې . (هماغه)

 

خير

ðڅوک چې انګېري،چې “خير و شر” بې د خداى له ارادې کېږي؛نو د پاک خداى واکمني به يې تر پوښتنې لاندې نيولې وي .(الکافي ٢\ ١٤٢)

ðد “زړه سوي” بدله تر ټولو ښو کارونو ډېر ژر رسي.(الکافي ٢\١٥٢)

ðد ښو چارو ګومارونکى؛لکه پخپله کوونکى داسې دى . (الکافي ٤\٢٧)

ðعلي!خبره يوازې په عمل ارزښت مومي او همداراز ظاهر په باطن، شتمني په بخشش،رښتيا ويل په وفا،فقه په پرهېزګارۍ،صدقه په نيت،ژوند په روغتيا او هېواد په امنيت او ښادۍ ارزښت مومي . (من لايحضره الفقيه ٤\ ٣٦٨)

ð ډېرغوره هغه دى،چې تر ټولو مخکې جومات ته ننوځي او تر ټولو وروسته راووځي .( مستدرک الوسايل٣\٣٦٢)

ð ډېر غوره هغه دى،چې خلک ترې ګټور شي او ډېر ناوړه هغه دى،چې خلک وځوروي او هغه تردې لا ډېر ناوړه دى،چې خلک يې د شر له امله احترام کوي او تر دې هغه خورا ناوړه دى،چې خپل دين د بل په دنيا وپلوري . (مستدرک الوسايل ١٢\ ٧٧)

ðبدعت ډېر ناوړه چار دى او هغه ډېر غوره چار ده،چې د خداى د رضا لپاره وشي . ( بحارالانوار  ١٠ \ ١١٠ )

ðډېره غوره چار،پرېکنده هوډ کول دى .( بحار  ٢١\٢١٠ )

ðڅوک چې (قرآن) تر نورو ډېر سم  لوستاى شي؛نو د جماعت امام دې شي او په حاضرو کې دې ډېر غوره اذان ووايي .(من لايحضره الفقيه ١\ ٢٨٥)

 

شتمني

ðد کومې شتمنۍ،چې زکات ور نه کړل شي؛نو ملعونه ده . (الکافي ٢\٢٥٨)

ðد خپلې شتمنۍ سمونه د مړانې يوه نښه ده .(من لايحضره الفقيه٣\ ١٦٦)

ðد مړي له شتمنۍ يې لومړى کفن وپېرئ بيا يې پورونه ورکړئ، ورپسې يې وصيت عملي کړئ او بياچې څه پاتې شول؛نو هغه يې ميراث شو .( تهذيب الاحکام ٦\١٨٨)

ðڅوک چې په ناحقه د مؤمن شتمني غصب او لاندې کړي او ځان ته يې ځانګړې کړي؛نو پاک خداى ترې مخ اړوي او له کړنو ان  په ښو چارو يې هم غوسه وي او په کړنليک کې يې ورته نه ليکي؛خو هله چې توبه وکاږي او غصب کړاى شوې شتمني بېرته خپل خاوند ته وسپاري . (ثواب الاعمال ٢٧٣)

ðعلي ! د مؤمنينو مشر دى او شتمني د منافقينو مشره ده . (الامالي للطوسي : ٣٥٥)

ðشتمني زما د امت فتنه ده . ( روضة الواعظين ٢\ ٤٢٩)

ðد آدم اولاد زړېږي؛خو دا خويو نه پکې ځوانېږي : ( ١) د شتمنۍ حرص (٢) او د عمر حرص .( روضة الواعظين ٢\ ٤٢٧)

ðڅوک چې ددې باک نه لري،چې خپله شتمني له کومه لاس ته راوړي ؛ نو خداى هم پروا نه لري،چې له کومه ځايه يې جهنم ته ننباسي .( عدة الداعي : ٨٢مخ )

ð شتمني د الهي تقوا د تر لاسي غوره مرستندوى ده .تحف العقول :٤٩)

ðمال او شتمني زما د امت د ازمېښت وسيله ده .(ترمذي)

ðله شتمنۍ او مقام سره مينه،د انسان دين ويجاړوي . (ترمذي– الدارمي)

ðد وسايلو ډېرښت شتمني نه ده؛بلکې اصلي شتمني د زړه غنا ده . (صحيح بخاري )

ðبې عدالته واکمن ،د شتمنۍ د حق نه ورکوونکى شتمن او کبرجن بېوزلى، لومړني دوزخ ته ننووتونکي دي . (عيون اخبارالرضا ٢\٢٨)

ðتر ځان وروسته مې امت ته د درې څيزونو په اړه وېرېږم : دا چې قرآن څنګه چې دى،بې له هغه يې تاويل کړي،عالم په “خوګانو” لټولو پسې شي او داچې مال يې ډېر شي،سرغړونه او بې پروايي وکړي او ددې کړنو چاره داده : د قرآن په اړه يې پر “محکماتو” عمل وکړئ او پر “متشابهاتو” يې ايمان راوړئ . د عالم راستنېدو ته سترګې پر لار وسئ او په خوګانو پسې يې مه ګرځئ او همداراز د شتمنۍ لپاره يې شکر وباسئ او لازم حق يې پوره کړئ . (الخصال  ١\١٦٤)

ðخداى ته غوره کړنې دادي : ( ١) هغه ايمان،چې شک پکې نه وي . (٢) ناستومان جهاد او مبارزه .( ٣) او حج،چې سوچه (د خداى لپاره) وشي او هغوى چې لومړى جنت ته ننوځي دادي :(١) شهيد( ٢) هغه مريى ، چې د خداى ښه عبادت کوي او د خپل پالندوى ناصح او خيرغواړى وي .

 

درمل

ðدرد او درمل درې څيزه دي .دردونه دا دي :”وينه”،”صفرا” او “بلغم”. حجامت د وينې درمل دى . حمام کول د صفرا او پلي تګ د بلغمو درمل دى . ( من لايحضره الفقيه  ١\ ١٢٦)

ðد دردونو علاج وکړئ؛ځکه د درد رالېږونکي درمل هم رالېږلي دي . (الدعوات : ١٨٠ مخ )

 

پوهه

ðپر هر مسلمان د علم زده کړه فرض ده او پوه شئ،چې د علم زده کوونکى د خداى تعالى ښه ايسي . ( الکافي ١\ ٣٠ )

ðڅوک چې د علم د زده کړې لپاره لار ووهي؛نو پاک خداى ورته د جنت لار هواروي او پرښتې يې تر پښو لاندې په خوشحالۍ خپل وزرونه غوړوي او څه چې په اسمان او ځمکه کې دي، ان “کب” ورته په سمندر کې بښنه غواړي او عالم پر عابد دومره غوره دى؛لکه مياشت،چې يې د “بدر” (څوارلسمې)په شپه پر ستورو لري او عالمان د پېغمبرانو وارثان دي .(الامالي للصدوق : ٦٠ مخ )

ðحواريونو حضرت عيسى ( ع) ته وويل : روح الله! له چاسره ناسته پاسته وکړو؟حضرت ورته وويل : له هغه سره،چې ليدل يې خداى دريادوي ،خبرې يې ستاسې کړه وړه زيات کړي او کړنې يې تاسې آخرت ته ورمات کړي . ( الکافي  ١\ ٣٩ )

ðدوه وږي دي،چې هېڅکله نه مړېږي 🙁 ١) د دنيا غوښتونکى ( ٢) او د علم زده کوونکى؛نو څوک چې له دنيا د حلالو هومره ګټه واخلي؛نو روغ رمټ پاتې کېږي او څوک چې بې له دې وخوري؛نو ورکېږي؛خو هله چې توبه وکاږى يا حرام ورته بېرته وګرځوي او څوک چې له عالمه،علم زده کړي او عمل پرې وکړي؛نو ژغورل کېږي او څوک چې تر لاسه کړې پوهه  د دنيا لاس ته راوړو وسيله کړي؛نو له علمه يې برخه همدا ده .

ðعلم د ايمان ښه وزير دى . زغم د علم ښه وزير دى . ملګرتوب د زغم ښه وزير دى  او صبر د ملګرتوب ښه وزير دى . ( الجعفريات : ٨٨مخ )

ðخداى ته ډېره پوهه تر ډېر عبادته غوره ده . (وسايل الشيعه٢٠\ ٣٥٧)

ðپوه په ناپوهانو کې داسې دى؛لکه په مړيو کې ژوندى . (الامالي للمفيد : ٢٨ مخ  )

ðپه مؤمن کې د غوړه مالۍ او کينې خوى يوازې د علم د زده کړې پر مهال وي .( مستدرک الوسايل ٩\ ٨١)

ðپينځه څيزونه دي،چې سپمول او ستنول يې روا نه دي : اوبه، مالګه، امنيت، اور او علم  . ( الجعفريات : ١٧٢)

ðڅوک چې د عالم کتنې او ليدو ته ورشي؛لکه چې زما ليدو ته راغلى او څوک چې له عالم سره روغبړ وکړي؛لکه چې له ماسره يې روغبړ کړى او څوک چې له عالم سره ناسته وکړي،د هغه په څېر دى،چې له ماسره يې ناسته کړې وي او څوک چې په دنيا کې زما ملګرى وي؛نو د قيامت پر ورځ به هم زما ملګرى وي او څوک چې د علم د زده کړې پر مهال مړ شي؛ نو شهيد حسابېږي .(مستدرک الوسايل ١٧ \٣٠٠ )

ðپه مينه د عالم مخ ته کتل عبادت دى . ( الجعفريات : ١٩٤)

ðد علم زده کړى نه مري؛خو داچې له خپلې هڅې برخمنېږي . (بحارالانوار  ١\ ١٧٧ )

ðپر قرآن پوهېدنه او د تاويل پېژندنه او تفسير يې غوره نعمت دى، چې خداى يې کوم بنده ته ورکوي . ( بحار ١\ ٢١٧)

ðعلم زده کړئ،که څه هم په “چين” (لرې واټن کې هم) وي . (روضة الواعظين  ١\ ١١)

ðعالم او زده کړى،په ثواب کې شريک دي،عالم دوه ثوابه او زده کړى يو ثواب وړي او بې له دې دوو کارونو،په بل کار کې خير نشته . (بحار ١\ ١٧٣)

ðعالمان دوه ډلې دي : هغه عالم،چې له خپل علمه ګټه اخلي او ژغورل کېږي او هغه عالم،چې له خپل علمه ګټه نه اخلي او ورکېږي . دوزخيان د هغه عالم له بدبويه تنګېږي،چې پر خپل علم يې عمل نه دى کړى . په دوزخيانو کې به هغه ډېر پښېمانه وي،چې يو څوک يې د خداى لوري ته رابللى وي او د هغه بلنه يې منلې وي او د خداى (د احکامو) لاروي يې کړې وي او خداى جنتي کړى هم وي ؛خو بلونکى د بې عملۍ او د ځاني غوښتنو او اوږدو هيلو له امله دوزخ ته ولاړ شي؛ځکه د ځاني غوښتنو لاروي،انسان له حقه منع کوي او اوږدې هيلې د اخرت د هېرولو لاملېږي . ( الکافي ١\ ٤٤)

ðپاک خداى له علمي مباحثه کوونکيو سره يو ساعت ناسته تر هغو زرو شپو لمونځ کولو ښه ګڼي،چې زر رکعته لمونځ پکې وکړي او همداراز تر زر غزاګانو او د ټول قرآن تر لوستو.(بحار ١\٢٠٣)

ðپه علمي مباحثو کې يو ساعت ناسته درته تر هغه يوکال عبادته غوره ده، چې د ورځې روژه يې او د شپې لمونځونه کوي او د عالم مخ ته کتل درته د زر بندګانو تر ازادولو غوره دي . ( بحار ١\٢٠٣)

ðکه مؤمن مړ شي او يوازې يو مخ (پاڼه) علمي مطلب ترې پاتې شي؛ نو په قيامت کې به دغه مخ د هغه او اور ترمنځ مانع شي او پاک خداى به د هغه د هر ټکي په مقابل کې يو ښار ورکړي،چې ددې دنيا اوه ځل هومره به وي او مؤمن،چې يو ساعت د عالم تر څنګ کېني؛نو خداى تعالى غږ کوي : داچې زما د دوست ترڅنګ کېناستې؛نو پر عزت او جلال مې قسم،چې په جنت کې به دې د هغه ملګرى کړم او ( په دې اړه) هيڅ باک نه لرم . ( الامالي للصدوق : ٣٨)

ðد خداى يو ساعت علمي مباحثه تر لسو زرو کالو عباداتو ښه ايسي او د قيامت پر ورځ دې د علم پر زده کړي خوشحالي وي .(مستدرک الوسايل ١٧ \٣٠٠ )

ðڅوک چې له خپله کوره ووځي او د علم په يو باب پسې وي؛نو پاک خداى يې،هر قدم ته د يو پېغمبر ثواب ليکي او هر ټکى،چې اوري يا ليکي،په جنت کې ورته يو ښار ورکوي . د علم زده کړى پر خداى،پرښتو او پېغمبرانو ګران وي . علم يوازې د نېکمرغو ښه ايسي؛نو د قيامت پر ورځ دې دعلم د زده کړې پر حال خوشحالي وي . پاک خداى د هغه هر قدم ته د “بدر د غزا” د شهيدانو ثواب ليکي او خداى ته ګران دى او د چاچې علم ښه ايسي؛نو جنت ورته واجبېږي او ګهيځ او ماښام د خداى په رضا کې ډوب وي او له دنيا تر هغه نه ځي،چې له “کوثر حوض” يې څښلې وي او له جنتي مېوو وخوري او په جنت کې به له حضرت خضر(ع) سره وي او دا ټولې (ځانګړنې) ددې آيت له امله دي،چې : ((خداى مؤمنانو ته غوراوى ورکوي او هغوى ته چې علم ورکړل شوى، د درجوخاوندان دي )) . ( بحارالانوار  ١\١٧٨)

ðچاچې علم زده کړ او بيا يې پرې خبرې و نه کړې،د هغه په څېر دى، چې زېرمې کوي اوڅه ترې نه بښي . (دسيوطي جامع الصغير)

ðپه کوچنيوالي کې د علم زده کړه؛لکه پر ډبره کښل دي او څوک چې په زړښت کې علم زده کوي؛لکه  پر اوبو يې،چې ليکي . ( دسيوطي جامع الصغير )

ð”زه” د علم ښار يم او “علي” يې “ور” دى ؛نو څوک چې علم غواړي؛ نو له وره دې ورننوځي .( کنز ٣٢٨٩٠ح )

ðعلم او پوهه زده کړئ،که څه هم چين ته په تګ اړ  شئ . (محجة ١/ ٢١ )

ð د علم  زده کړى ،د خداى دوست دى . ( جامع الاخبار ١١٠ / ١٩٥ )

ð له زانګو  تر قبره علم زده کړه . ( تفسيرالقمي ٢/ ٤٠١ )

ð په ناپوهانوکې د پوهې زده کړى؛لکه په مړيوکې ژوندى دى . (بحار ١/١٧٢)

ð د پوهانو د سپرلۍ وسيله يې د شهيدانو له وينې سره وسنجوله او پرې درنه شوه . ( کنز ٢ / ١٦)

ðله چاچې دې کوم ټکى زده کړ؛نو بنده يې شوې .(امالي الآلي١ /  ٢٩٢)

ð په علمي غونډوکې ګډون  عبادت دى .( العلم والحکمة : ٨٠٩ح )

ð څوک چې علم زده کړي او عمل پرې وکړي؛نوخداى به هغه څه وروښيي ،چې پرې نه پوهېږي .( کنز ١٠ / ١٣٢ )

ðڅوک چې زده کړې ته يوساعت خواري ونه زغمي؛نو تل به د ناپوهۍ په خوارۍ کې پاتې شي .( بحار ١/ ٧٧)

ðد علم زده کوونکى د خداى په فضل کې رانغښتل شوى دى .( عوالى اللآلي ١/ ٢٩٢) 

ðڅوک چې د علم په زده کړې پسې وي؛نوجنت به يې په لټه کې وي . (ميزان الحکمه : ١٣٧٨٤ح)

ðد قيامت پر  ورځ هره پوهه خپل خاوند ته وبال وي؛خو داچې عمل يې پرې کړى وي .( ميزان الحکمه: ١٤٠٢٢ح )

ðهغه پوهه،چې ونه کارول شي،د داسې خزانې په څېر ده،چې لګښت ترې ونشي. ( ميزان : ١٤٠٠٩ح )

ðلوى خداى چې عالم ته پوهه ورپېرزو کړي؛نو ژمنه يې ترې اخستې، چې نه به يې  پټوي . (پورته)

 

ښوونکى

ðپه حقيقت کې زه ښوونکى رالېږل شوى يم . ( کنز٢٨٨٧٣ح )

ð دخپلو ښوونکيو پر وړاندې عاجز او متواضع وسئ . (المعجم الاوسط  ١٦/ ٢٠٠ / ٦١٨٦ )

ð د خپل ښوونکي درناوى وکړئ . ( کنز ١٠ /٢٥٠ )

 

د عالم مړينه

ðدعالم مړينه نه جبرانېدونکى مصيبت او نه ډکېدونکې تشه ده. (منتخب ميزان :  ٤٤ ٧٧ح )

 

عالمان

ðپه ځمکه کې عالمان د اسمان د ستوريو په  څېر دي،چې [خلک ] پرې په وچو او د سمندر په تپو تيارو کې لار مومي،چې ستوري پرېووځي ؛ ډېر لارموندونکي ورک شي  . ( دامام احمد حنبل مسند)

 

ورمندون- قضاوت ( منځګړتوب)

ðدوو تنو،چې درنه منځګړتوب او قضاوت وغوښت؛نو تر هغه چې دې د دواړو خبرې نه وي اورېدلي،ترمنځ يې پرېکړه مه کوه؛ځکه که د دواړو خبرو ته غوږ ونيو؛نو حکم درته څرګندېږي . (من لايحضرالفقيه : ٣\١٣)                     

ðڅوک چې د ورځې ( ٢٥) ځل مؤمنو نارينه وو او ښځمنو ته دعا وکړي (؛نو) خداى يې زړه له کينې خالي کوي او د نېکانو په ډله کې يې ليکي،ان شاءالله. (الجعفريات : ٢٢٣مخ )

ðد هغه پر حال دې خوښي وي،چې ښه خوى ولري او خټه يې پاکه وي . دننه يې سمه او دباندې يې (هم) ښکلى وي؛تر خپل لګښت زيات (څيزونه د خداى په لار کې لګوي) له زياتو خبرو ډډه کوي او له خلکوسره په انصاف چلن کوي . ( الکافي  ٢\١٤٤)

ðد هغه پر حال دې خوښي وي،چې د قيامت پر ورځ يې تر هرې ګناه لاندې يو “استغفرالله” وي .( بحارالانوار ٥\٣٢٩)

ð په تاسې کې هوښيار غوره دي . رسول الله (ص) وپوښتل شو :دا څوک دي ؟ ورته يې وويل : د ښه خوى خاوندان،زغمناک،له مورو پلارسره نېک چلي،ګاونډيانو او پلارمړيو ته يې پام وي،خواړه ورکوي،په ډاګه سلام اچوي او د شپې،چې خلک ويده وي،لمونځ کوي ( وسايل الشيعه : ١٥\١٩١)

 

نېک

ðڅوک چې صالح دوستان او نېک اولاد ولري (؛نو) له نېکمرغيو به يې وي . ( مستدرک الوسايل ٩ \ ١٥٥)

ðڅوک چې د خپل موروپلار تر مړينې وروسته،له هغوى سره نېکي وکړي؛نو په قيامت کې به د “نېکانو مشر” وي . (پورته منبع ١٣\٤١٤)

ðله خدايه ډارن نېک،ډېرعاقل دى او بې غمه ګناهګار،ډېر ناپوه دى . ( بحارالانوار : ١\١٣١)

 

وصيت

ðڅوک چې بې وصيته ومري(؛نو بې ايمانه او) په جاهلي مرګ به مړشوى وي .( المجموع للنوي ١٥\٣٦٦)

ðمسلمان چې څه لري،حق نه لري،چې دوه شپې صبر وکړي او ويده شي او خپل وصيت ونه ليکي . ( بحراي  ٨\١٢٦)

 

اودس

ðتازه اودس کوه،چې له “پل صراطه” د ورېځې په څېر تېر شې .(بحار ٧٦/٤)

ðدرې کړنې د ګناهونو د بښنې لامل دي : ( ١) په ځيرتيا پوره اودس کول ( ٢) د جماعت لمانځه ته تلل او ( ٣) تر لمانځه وروسته،بل لمانځه ته انتظار اېستل . ( مستدرک الوسايل ١\ ٣٥٢)

ðاودس تر اوداسه د مخه ګناهونه له منځه وړي . ( فقه القرآن  ١\ ٤٢)

ðڅوک چې ښه او پوره اودس وکړي؛نو وړ دى،چې ستره الهي خوښه يې په برخه شي . ( مستدرک الوسايل  ١\ ٣٥)

ðپه قيامت کې به زما امت د نورو امتونو په منځ کې د اودس د نښو له امله سپين مخى راپاڅي . ( دعائم السلام  ١\ ١٠٠ )

ðاودس د ايمان يوه برخه او مسواک د اوداسه يوه برخه ده .( مستدرک الوسايل  ١\ ٣٦٤)

ðپاک خداى وايي :د چاچې په يوه حدث (ناپاکۍ) اودس مات شي او و يې نه کړي ؛نو له ماسره يې جفا کړې ده او تر اودس ماتي وروسته، چې چا اودس وکړ او دوه رکعته لمونځ يې و نه کړ ؛نو له ماسره به يې جفا کړې وي؛خو څوک چې تر اودس ماتي وروسته اودس او دوه رکعته لمونځ وکړي او دعا وکړي او زه يې ديني يا دنيوي دعا قبوله نه کړم ؛ نو ما به ورسره جفا کړي وي،حال داچې زه جفاکار خداى نه يم . (ارشادالقلوب  ١\ ٦٠ )

 

واکمني

ðڅوک چې درې ځانګړنې ولري، د واکمنۍ وړ دى : ( ١) داسې تقوا،چې له ګناه يې منع کړي.( ٢) داسې زغم ،چې له غوسې يې وژغوري .(٣) او د مهربان پلار په څېر له خلکو سره چلن ولري . (الکافي  ١\٤٠٧)

 

وليمه

ðوليمه په پينځو ځايو کې ده : ( ١) واده ( ٢) د اولاد زوکړه  (٣) د زوى سنتول (٤) د کور اخستل او ( ٥) له مکې د حاجي راستنېدنه .( الخصال  ١\٣١٣)

 

هجرت

ðمهاجر هغه دى،چې له ګناهونو هجرت وکړي او الهي محرمات پرېږدي . (سنن النبي)

ðڅه چې د خداى نه خوښېږي،پرېښوول يې غوره هجرت دى.  (کنز ٤٦٢٦٣ح )

 

ډالۍ

ðډالۍ ومنئ او عطر غوره ډالۍ ده،چې وړل راوړل يې اسان او بوى يې ښه دى .( تحف العقول : ٦٠مخ )

ðډالۍ ورکړئ ؛ځکه کينې پاکوي او دښمنۍ له منځه وړي . (الکافي ٥\١٤٣)

ðد ليدوکتو پر مهال لاسونه او ډالۍ ورکړئ؛ځکه لاسونه ورکول مينه زياتوي او ډالۍ کينې له منځه وړي .( مستدرک الوسايل١٣\ ٢٠٥)

ð بلنه ومنئ او د چا ډالۍ مه ورستنوئ . ( مسنداحمد١/٤٠٤)

ð يو بل ته ډالۍ ورکړئ،چې کينې له منځه وړي .( الکافي ٥‌/١٤٤)

ðغوره ورور مو هغه دى،چې عيبونه مو در ډالۍ کړي . (تنبيه الخواطر ٢/١٢٣)

 

 

ګاونډى

ðد کور د مخې،شا،ښي او کيڼ لوريو تر څلوېښتو کورونو پورې ګاونډ شمېرل کېږي .( الکافي٢\٦٦٧)

ðپوه شئ ،څوک چې ګاونډى يې له شره خوندي نه وي (؛نو) پر خداى او د قيامت پر ورځې ايمان نه لري(او بايد) ګاونډى يې،چې ترې پور غواړي، ور يې کړي،که ګاونډي ته يې څه خير (او خوښي) ورسي؛نو پرې خوشحاله شي او که کوم کړاو ورورسېد؛نو تسلي ورکړي . د کور په جوړولوکې يې ځمکه لاندې نه کړي(که په کوم کارکې ورته څه زيان و)؛ نو هغه دې نه ځوروي يا دې ترې اجازه واخلي،که مېوه يې وپېرله؛ نو ور دې يې کړي اوکه ور يې نه کړي؛نو د هغه له سترګو پټ دې يې خپل کور ته يوسي او اولاد ته يې داسې څه ور نه کړي ،چې د ده پر اولاد  غوسه شي . ( روضة الواعظين ٢\٢٨٨)

 

د شرافت لامل

ðله دينوالو سره ناسته پاسته د دنيا او اخرت د شرافت لامل دى. (الکافي١\٣٩)

 

د ورکاوي لاملونه

ðدرې څيزونه په ورکاوي کې راځي :کنجوسي ،د ځاني غوښتنو لاروي او کبرکول .( وسايل الشيعه ١\١٠٢)

ðد “لوط” قوم د لسو ځانګړنوله امله پوپناه شو،چې دا دي : ( ١) لواطت کول ( ٢) يو بل ته يې ارموني ويل (٣) کوترې الوځول (٤) ساز وسرود کول(٥) شراب څښل(٦) د ږيرو وهل(٧) د اوږدو برېتو پرېښوول (٨) شپېلي وهل (٩)چکچکې وهل(١٠) د ورېښمينو جامو اغوستل او زما امت يوه بله ډېره ناوړه ځانګړنه هم لري : ښځې به يې له ښځو خپل شهوت سړوي . ( دسيوطي جامع المغير: ٢\١٥٥)

 

 

د خداى ياد

ðپه يقين،ګهيځ او ماښام د خداى يادول،د خداى په لار کې تر تورو ماتولو غوره دي .( وسايل ٧\١٥٠ )

تبصره : امام صادق ( الکافي : ٢\٥٢٢) ددې روايت په اړه وايي :چې تر لمر ختو مخکې او تر لمر پرېوتو وروسته داسې شېبې وي،چې دعا پکې قبلېږي .

ðڅوک چې په بازار کې د خلکو د غفلت او بوختيا پر مهال خداى ياد کړي (؛نو) خداى ورته زر نېکۍ ليکي او د قيامت پر ورځ ورته داسې بښنه ورډالۍ کوي،چې د هيچ بشر په زړه کې نه تېرېږي .(عدة الداعي: ٢٥٧مخ )

ðڅوک چې خداى ډېر يادوي(؛نو د خداى (هم) خوښېږي . (بحارالانوار٦٦\٣٤٩)

ðد خداى ياد،د ايمان نښه، له دوه مخۍ پرېکون، د شيطان پر وړاندې مورچه او د اور پر وړاندې خوندېينه ده . (مستدرک الوسايل ٥\٢٨٥)

ðبې د خداى له ياده ډېرې خبرې مه کوئ؛ځکه زړه سختوي او سخت زړى له خدايه ډېر لرې وي .( مشکاة الانوار: ٥٦مخ )

ðڅوک چې (په رښتيا) د خداى ومني او احکام يې عملي کړي (؛نو) هغه به يې ياد کړى وي،که څه هم لمونځ ،روژه او د قرآن لوستل يې لږ وي او څوک چې د خداى و نه مني (او له احکامو يې سرغړونه وکړي؛نو) هغه به يې هېر کړى وي،که څه هم لمونځ،روژه او د قرآن لوستل يې ډېر وي .( معاني الاخبار: ٣٩٩مخ )

 

د مرګ ياد

ðد خوندونو ورانوونکى ډېر درياد کړئ،وپوښتل شو: دا څه دي؟ آنحضرت (ص) ورته وويل : د مرګ ياد او هغه ډېر ځيرک مؤمن دى،چې مرګ ډېر يادوي او ډېر تيارى يې ورته نيولى وي .(الجعفريات : ١٩٩مخ )

ðغوره زهد،غوره عبادت او غوره تفکر،د مرګ يادول دي؛نو څوک چې مرګ ډېر يادوي؛نو خپل قبر به د جنت په يوه باغ کې ومومي . ( جامع الاخبار : ١٦٥)

ðزړونه د اوسپنې په څېر زنګ نيسي؛خو د قرآن په لوست او د مرګ په يادونه جلا مومي . ( د نهج البلاغې شرح : ١٠ ٢٣)

ðمرګ،چې د خوندونو له منځه وړونکى دى،ډېر ياد کړئ . (محجة ٨ /٢٣٩ )

ð تر مرګ وړاندې مرګ ته چمتو وسئ . ( کنز١٥/٥٤٢)  

 

مرسته

ðڅوک چې د مؤمن مرسته وکړي (؛نو) خداى يې ( ٧٣) کړاوونه لرې کوي،چې يو يې په دنيا او نور يې د قيامت پر ورځې،چې د ستر کړاو ورځ ده او د هر چا خپل ځان ته پام وي (نه نورو ته) (لرې کوي) . ( الکافي  ٢\١٩٩ )

ðخداى پر هغه لورېږي،چې له خپل اولاد سره په ښو چارو کې لاسنيوى وکړي .( الکافي ٦\٥٠)

ðڅوک چې د خداى د رضا لپاره د مسلمان ورور د اړتيا د لرې کولو لپاره وځغلي؛لکه زر کاله چې يې د خداى داسې خدمت کړى وي،چې د سترګو د رپ هومره يې  ترې سرغړونه نه وي کړې .( کنزالفوائد١\ ٣٥١)

ðڅوک چې له کمزوري او بېوزلي سره مرسته وکړي(؛نو) خداى ورسره مرسته کوي او د قيامت پر ورځ ورته پرښتې ټاکي،چې له اورينو کندو او هيبتناکو تمځايو په تېرېدو کې ورسره داسې مرسته وکړي،چې دود او تپ يې ور ونه رسي او روغ رمټ او خوندي له “صراط” پله جنت ته تېر شي .( د الامام العسکري تفسير : ٦٣٥مخ )

ðڅوک چې له ظالم سره په ظلم کې له پوهې سره مرسته کوي؛نو په حقيقت کې له ايمانه وتلى دى .( کنزالفوائد ١\ ٣٥١)

 

پلارمړى (يتيم)

ðد يتيم پر سر لاس راکاږه او بېوزليو ته خواړه ورکړه . (احمد)

ðڅوک چې له خپلې شتمنۍ د پلارمړي لګښت پر غاړه واخلي،چې له اړتيا خلاص شي ( او مادي خپلواکۍ ته ورسي) ؛نو په يقين چې جنت پرې واجبېږي .(من لايحضره الفقيه ٤\٣٧١)

ðڅوک چې د مهربانۍ له مخې د پلامړي پر سر لاس راکاږي؛نو چې څومره وېښتان يې ترلاس لاندې ول(؛نو) په قيامت کې ورته هومره رڼاګانې ورکوي .(من لايحضرالفقيه ٤\٣٧١)

ðډېر ناوړه خواړه  د پلامړي د مال خوړل دي . ( الکافي ٨\٨١)

ðعرش د پلارمړي د ژړا پر وخت لړزېږي؛نو خداى وايي : دا څوک مې (هغه) بنده ژړوي،چې په وړوکتوب کې مې ترې موروپلار اخستي ول؟ په عزت او دبدبې مې سوګند،چاچې له ژړا چوپ کړ؛نو جنت ورته واجبوم .(ثواب الاعمال : ٢٠٠مخ )

ðهغه ډېر غوره کور دى،چې د يتيم پکې عزت کېږي . (اثنى عشريه :١٨ مخ )

ðڅوک چې په مينه د يتيم پر سر لاس راکاږي؛نوخداى به يې په قيامت کې د ټولو وېښتانو هومره رڼا ور ډالۍ کړي . (بحارالانوار٧٧/٥٨)

ðيتيم او پلار مړي ته د مهربان پلار په څېر وسه او پوه شه څرنګه يې،چې کرې،هماغسې به يې رېبې . (بحارالانوار٧٧/١٧٢)

ðزه په جنت کې له هغه سره ددې دوو ګوتو[د شهادت ګوته يې له منځنۍ ګوتې سره نزدې کړه ]په څېر يم ،چې د پلار مړي د روزنې او نفقې مسووليت پرغاړه واخلي . (سفينة  البحار٢/٧٣١)   

ðيتيم،چې وژاړي ؛نوعرش ورته لړزېږي . (سفينة البحار٢/٧٣١)

ðد پلار مړي د مال خوړل ستره ګناه ده،چې خوړونکى به يې په دوزخ کې وي . (سفينة البحار٢/٧٣١ مخ)

 

يقين

ðيقين غوره څيزدى،چې زړه ته اچول شوى دى .(بحارالانوار٦٧\١٧٣)

ðسرښندنه د انسان د يقين ښکلا ده . ( جامع الااخبار: ١٢٢مخ )

ðيقين پوره ايمان دى .( ارشاد القلوب ١\١٢٧)

ðد يقين دوه رکعته سپک لمونځ،تر يوې شپې عبادت غوره دى . (الجعفريات : ٣٥مخ )

ðد ژبې، وينا،په غړيوکړنه او د زړه يقين ته ايمان وايي . (عوالي الاللي  ١\٨٣)

ðبې يقينه عبادت ارزښت نه لري .( معدن الجواهر: ٣٩مخ )

ðيقين، غنيتوب او عبادت بوختيا ته بس دى .( الکافي ٢\ ٨٥)

ðڅوک چې د خداى تعالى پر بدلې ورکولو يقين لري؛نو ځان د نفقې ورکولو ته سخي ګرځوي او خداى وايي :څه چې لګوئ،خداى يې بدله درکوي او هغه ډېر غوره روزي ورکوونکى دى .( وسايل ٩\١٨)

ðيقين لرونکى انسان شپږ نښې لري : (١) يقين لري،چې خداى حق دى؛ نو ايمان راوړي . (٢) يقين لري،چې مړينه حق ده؛نو له هغه (چار) ډډه کوي (چې د مړينې د ډار لاملېږي . (٣) يقين لري،چې په قيامت کې راژوندي کېدل حق دي؛نو د هغه له رسوايۍ وېرېږي .(٤)يقين لري،چې جنت حق دى؛نو ورته لېوال او مينوال وي .(٥)يقين لري،چې اور حق دى؛ نو له ژغورنې يې څرګندې هڅې کوي . (٦) يقين لري،چې د قيامت د ورځې حساب حق دى(؛نو) له ځان سره (په همدې دنيا کې) محاسبه کوي .( تحف العقول : ١٨ مخ )

ðد يقين کمزوري داده،چې د خداى په خپګان خلک له ځان خوښ کړې او د خداى د ورکړې روزۍ له امله خلک وستايې او داچې خداى څه نه دي درکړي،خلک ورټې .( بحارالانوار ٧٤\١٨٧)

 

د خداى وحدانيت (توحيد)

ðتوحيد نيم دين دى او د صدقې په ورکړه روزي تر لاسه کړئ .( وسايل : ٩\٣٧١)

ðتوحيد د جنت په بيه دى .( بحارالانوار ٣\٣)

ðد توحيد،ظاهر په باطن کې او باطن يې په ظاهر کې دى . ظاهر يې توصيف او ويل کېداى شي؛خو ليدل کېږي نه او باطن يې داسې دى، چې پټ نه دى .په هرځاى کې لټول کېږي او داسې ځاى به نه وي،چې د سترګو رپ هومره ترې خالي وي،بې له محدوديته حاضر او بې له ورکېدوغايب دى .( بحارالانوار  ٤\٢٦٣)

تبصره :ددې روايت د شرح لپاره وګ :

(الف):حکيم سبزواري؛شرح الاسماالحسنى ١\١٣٣).

(ب) علامه طباطبايي ،تفسيرالميزان ٦\١٠٣)

 

يهود

ðپر يهودي او نصراني سلام واچوئ؛خو پر شرابخور نه او که پر تاسې يې سلام واچاوه؛ځواب يې مه ورکوئ . (بحارالانوار ٧٦\١٥١)

ðڅوک چې زما له اهلبيتو سره دښمني وکړي؛خداى به يې د قيامت پر ورځ د ړانده يهودي په څېر راپاڅوي .(جلال الدين سيوطي احياء الميت بفضائل اهل البيت : ١٨مخ )

 

ډوډۍ

ðخدايه ! ډوډۍ راته مبارکه کړې او زموږ او د ډوډۍ ترمنځ بېلتون مه راوله،که ډوډۍ نه واى،روژه مو نه شوه نيواى،لمونځ مو نه شو کولاى او د خداى فرض مو نه شول پوره کولاى .( الکافي ٦\٢٨٧)

ðد ډوډۍ درناوى وکړئ .( بحار ٦٢/٢٧٩ )

ðډوډۍ په چاړه نه؛بلکې په لاس پرې کوئ .( الکافي 304/6)

ðد ډوډۍ عزت کوئ . وپوښتل شو: څنګه ؟ آنحضرت (ص) ورته وويل : ډوډۍ يې،چې راوړه،بل څه ته انتظار مه باسئ او د ډوډۍ له عزت (دا هم) دى،چې له ((وبرېده)) نه شوه . (الکافي ٦\٣٠٣)

 

نبوت

ðتر ما وروسته بې له زېري ورکوونکيو کوم نبوت نشته . رسول الله ! زېري ورکوونکي څوک دي ؟ورته يې وويل : رښتيني خوبونه! (بحارالانوار  ٥٨\١٩٢)

ðخلکو! تر ما وروسته پېغمبر او زما له سنتو وروسته بل سنت نشته ؛ نو چاچې د نبوت دعوا وکړه؛نو بلنه او بدعت يې په اور کې دى؛نو و يې وژنئ او څوک چې ورپسې ولاړ شي،په اورکې به وي .(وسايل ٢٨\٣٣٧)

ðعلي! نه خوشحالېږې،چې ته زما ورور او زه ستا ورور  وسم او مقام دې راته داسې وي؛لکه د هارون (ع) چې موسى (ع) ته و؛خو په دې توپير،چې تر ما وروسته بل پېغمبر نشته.( صحيح بخاري : ٤\٢٠٨) دامام احمدحنبل مسند١\١٧٠ . صحيح مسلم : ٧\١٢٠)

 

نجوا ( پسپسکې)

ðکه درې تنه وئ؛نو نه ښايي دوه تنه يې،له درېم سره بېل پسپسکې وکړي ؛ځکه هغه خپه کوي . ( مستدک الوسايل  ٨\٣٩٩ )

ðکه دوو تنو په خپلو کې پسپسکې کولې؛نو مه ورځئ. (الجامع الصغير ١\١٢٥)

ðنه ښايي((په درېو تنو کې دې)) دوه تنه په خپلو کې پټې خبرې وکړي . ( کنز: ٢٤٨٦٠ ح )

 

نرمي

ðپه نرمۍ کې پرېماني او برکت دى او څوک چې له نرمۍ بې برخې شي (؛نو) له خيره به بې برخې شوى وي .( الکافي ٢\١١٩)

ðنرمي نيم ژوند دى .( مستطرفات السرائر: ٥٥٠ مخ )

ðنرمي ښه انګېرل دي او تاوتريخوالى شوم دى .( الکافي ٢\١١٩ )

ðکه نرمي د مخلوق په بڼه انځورېداى؛نو ډېر ښکلى مخلوق به ترې نه و. ( الکافي  ٢\١٢٠ )

ðنرمي يو څيز پسولي؛خو له څه چې لرې شي،بد رنګوي يې .( الکافي  ٢\١١٩)

ðنرمي د حکمت بنسټ دى . خدايه! څوک چې زما د امت څه چارې پر غاړه واخلي او له امت سره په نرمۍ وچلېږي؛نو ته هم ورسره په نرمۍ وچلېږه او چاچې پرې سختى کوله؛نو ته هم ورسره سختي کوه .( عوالي الاللي  ١\٣١٧)

ðکه څوک څلور ځانګړنې ولري؛خداى ورته په جنت کې کور جوړوي : (١) چې پلار مړي ته هستوګنځى ورکړي .( ٢) پر بېوزلو ولورېږي . (٣) پر موروپلار مينه وکړي (٤) تر لاس لاندې سره نرمي وکړي .(وسايل  ١٦\٣٣٧)

ðپه حقيقت کې خداى رفيق (او نرم) دى او نرمي خوښوي او نرمۍ ته داسې څه بښي،چې زور او سختۍ ته يې نه بښي . (الزهد : ٢٨ مخ )

ðعلم،ايمان،ته ښه مرستندوى دى او زغم،ايمان ته ښه مرستندوى دى او نرمي زغم ته ښه مرستندوى دى او نرمخويي چلن ته ښه مرستندويه ده. ( قرب الاسناد ٢\٣٢مخ )

 

نږدېوالى

ðابوذره! د بنده پټه سجده کول،خداى ته د نږدېوالي غوره لار ده . (الامالي للطوسي : ٥٢٩)

ðهېچاته (هم د خداى په خپګان) مه ورنږدېږئ،چې له خدايه به بېل شئ . ( الکافي ٨\٨١)

ðله هغه “بلونکي” سره مه کېنئ،چې تاسې (دغو څيزونو ته) رابولي : (١) له يقينه شک ته . ( ٢) له اخلاصه ريا ته . (٣) له تواضع نه تکبر ته . (٤) له دوستۍ او نصيحته دښمنۍ ته .( ٥) او له زهده ،دنيا غوښتنې ته؛ بلکې هغه “عالم”ته ورنږدې شئ،چې تاسې د پورته څيزونو پوټه (او عکس) ته رابولي؛يعنې : ( ١) له تکبره،تواضع ته ( ٢) له ريا اخلاص ته (٣) له شکه يقين ته (٤) له دنيا غوښتنې زهد ته (٥) او له دښمنۍ،دوستۍ او نصيحت ته . هغه (عالم) خلکو ته د وينا او وعظ صلاحيت لري،چې ددې پورته څيزونو له آفتونو په رښتيا ووېرېږي او د وينا (او وعظ) پر نيمګړتياوو برلاس وي،سم له ناسم،ناروغۍ،ځاني القاات او فتنې يې او ځاني غوښتنې وپېژني . (عدة الداعي : ٧٨مخ )

 

نصيحت او خيرغوښتنه

ðدين (ټولو ته) نصيحت او خير غواړي ده . رسول اکرم (ص) وپوښتل شو: چا ته؟ ورته يې وويل : خداى ته،استازي ته يې،ديني امامانو او مسلمانو پرګنو ته . ( الامالي للطوسي :٨٤مخ )

ðڅوک چې خپل  ځان د خپل مشر(او امام) لاروۍ او د هغه خير غوښتنې ته راهڅوي؛نو خداى به يې په رفيق اعلى (،چې د مرسلو پېغمبرانو،صديقانو او شهيدانو ځاى دى) کې له موږ سره يوځاى کړي . ( الکافي ١\٤٠٤)

ðخداى د قيامت پر ورځ له درېو ډلو عذاب لرې کوي 🙁 ١) په الهي قضا راضي ( ٢) د مسلمانانو ناصح او خيرغواړى (٣) او د نېکو چارو لارښوونکى . (مستدرک الوسايل ١٢\٤٣١)

 

نعمت

ðپر چاچې لورنې څرګندې شي؛نو”الحمدالله رب العالمين” دې ډېر ووايي . (الکافي  ٨\٩٣)

ðمؤمن ته د قبر فشار،د هغو نعمتونوکفاره ده،چې ضايع کړي يې دي . (بحارالانوار ٦٨\٥٠ )

ðپر چاچې خداى د “توحيد” لورنه لورولې وي؛نو بدله يې جنت دى . (بحارالانوار ٣\٥)

ðپر خداى  تر ايمان وروسته غوره نعمت دادى،چې خداى چاته د”کتاب الله” علم او پر تاويل يې ورته پوهه ورکړې وي .( بحارلانوار ١ \ ٢١٧)

 

 

ښېرا

ðځان د مظلوم له ښېرو وساتئ،چې له ورېځو پورته خېژي او خداى يې ويني . بيا وايي : پورته يې راوړئ،چې قبولې يې کړم او د پلار له ښېرو ډډه وکړئ،چې له تورې تېرې دي (ژر قبلېږي).(الکافي: ٢\٥٠٩)

 

کتل

ð د عالم مخ ته په مينه کتل عبادت دى .( مستدرک الوسايل : ٩ ١٥٢)

ð له عالمانو سره ناسته او علي،کعبې،قرآن او موروپلار ته کتل عبادت دي .( کشف الغمة ٢\٢٦٨)

ð علي ته کتل عبادت دى . (حاکم نيشاپوري؛مستدرک : ٣\١٤١) ( البداية و النهاية : ٧/٣٩٤)

ðعلي! په دنيا کې د مؤمن درې تفريح دي : ( ١) د دوستانو او ورونو ليده کاته ( ٢) روژه تي ته روژماتى ورکول ( ٣) او د شپې په پاى کې تهجد اوعبادت . ( مصادقة الاخوان : ٣٤)

 

لمونځ

ð داسې لمونځ کوه؛لکه چې د خپل عمر وروستى لمونځ کوې .  (وسايل  ٥\٤٦٤)

ð په قيامت کې لومړى د لمانځه پوښتنه کېږي؛نو که پوره يې ادا کړى وي (بريالى کېږي) او که نه اور ته غورځول کېږي .(عيون اخبارالرضا ٢\٣٧)

ð لمونځ ( د نورو کړنو په منځ کې) د کېږدۍ د ستنې په څېر دى،که ستنه سمه ولاړه وي؛نو تنابونه،مېخونه او پردې ګټورې وي او که ماته شي؛نو تنابونه،مېخونه او پردې ګټه نه لري .(وسايل  ٤\٣٣)

ð لمونځ د کړنو تله ده؛چاچې پوره وکړ،پوره بدله يې ورکول کېږي . (وافي  ٧\٣٠ )

ð لمونځ د دين ستن ده او ړومبى کړنه ده،چې له بني بشره ليدل کېږي؛ نو که پوره سم و؛نورې کړنې يې هم ليدل کېږي اوکه نه و؛نو نورې کړنې يې په پام کې نه نيول کېږي .( تهذيب الاحکام ٢\٢٣٧)

ð لمونځ د دين ستن ده . (المسايل الصاغانية : ١١٨ )

ð د کفر او ايمان ترمنځ يوازې د لمانځه پرېښوول دي .(ثواب الاعمال : ٣٢١)

ð بنده چې په سپکه لمونځ کوي(ښه يې نه ادا کوي او چټک يې کوي) خداى خپلو پرښتو ته وايي : زما بنده وينئ؟؛لکه چې ګومان کوي،اړتياوې يې بې له ما بل څوک پوره کوي،نه پوهېږي،چې د ټولو اړتياوو پوره کول يې زماپه واک کې دي .( الکافي ٣\٢٦٩)

ð (په جومات کې يو سړي د رسول اکرم په مخ کې په بيړه لمونځ وکړ، چې سجدې يې سمې ونه کړې،پېغمبر اکرم  وويل:) د کارغه په څېر يې (پرځمکه) ټونګې ووهلې،که په دغسې لمونځ کولو ومړ؛ نو د محمد (ص) پر دين به نه وي مړ شوى .( المحاسن  ١\٧٩)

ð لمونځ په لوى لاس مه پرېږده؛ځکه په دې کار د”اسلام ملت” ترې بېزاره وي .( الکافي ٣\٤٨٨)

ð څوک چې لمونځ په هماغه خپل وخت و نه کړي؛نو له لمانځه يو تور سيورى پورته خېژي او وايي:زه دې ضايع کړم!خداى دې داسې ضايع کړه؛لکه زه يې چې ضايع کړم .

ð بنيادم چې پينځګوني لمونځونه په خپل وخت کوي؛نو شيطان ترې ډارېږي او تښتي؛خو چې ضايع يې کړي،شيطان پرې جرائت کوي او د سترو ګناهونو کولو ته يې اړباسي. (الامالي للصدوق : ٤٨٤)

ð سبا په قيامت کې هغه ته زما شفاعت نه په برخه کېږي،چې فرض لمونځ له خپل وخته ځنډوي .(روضة الواعظين ٢\٣١٩)

 ð خداى وايي : د آدم زويه! څه ساعت د ګهيځ تر لمانځه وروسته او څه ساعت د مازيګر تر لمانځه وروسته ما ياد کړه چې څه درته مهم دي،در يې کړم .( تهذيب الاحکام : ٢\ ١٣٨)

ð پوه شئ،چې لمونځ د ځمکې پرمخ د الهي نعمت دسترخوان دى؛نو خداى يې د ورځې پينځه ځل هغوى ته غوړوي،چې د خداى رحمت غواړي . (مستدرک الوسايل : ٣\١٥)

ðد خداى د بنده او کافر ترمنځ توپير په لمونځ کولو يا نه کولو کې دى . ( سنن الکبرى ٢/٣٨٦)

ð لمونځ ،د مؤمن رڼا ده . ( کنز ٧/٢٨٨ )

ðلمونځ د هر خير کونجي ده . ( کنز ٢/٦٢)

ðبيشکه چې لمونځ،خداى ته د مؤمن د نږدېوالي لامل دى .(کنز : ١٨٩٠٧ح )

ðخداى د هغه چا لمونځ نه قبلوي،چې بدني حضور لري؛خو له زړه  نه . (بحار ٨٤/٢٤٢)

ðداسې لمونځ وکړه؛لکه چې وروستى لمونځ دې وي؛ځکه په داسې لمانځه کې خداى ته نږدېوالى وي .(بحار ٧٨/ ٢٠٠)

ðزما په امت کې نه شمېرل کېږي،چې خپل لمونځ سپک ګڼي. ( ميزان : ١٠٤٠٥ ح )

ð لمونځ  شيطان مختورى کوي . (الصلاة فى الکتاب : ٤١٥ح )

 

د شپې لمونځ

ð د مؤمن شرافت د شپې په لمانځه کې دى .(عوالي الاللي ١\ ١٣٥٢)

ð د شپې لمونځ،د قبر په تياره کې د خپل خاوند څراغ دى . (بحارالانوار  ٨٤\١٦٠ )

ð د شپې لمونځ رڼا ده؛نو پر تا د شپې لمونځ دى؛نو چاچې د شپې ډېر لمونځ کاوه،د ورځې به يې څېره ښه ښکلې وي .(مستدرک الوسايل  ٦\٣٣٧)

ð مېرمن،چې خپل مېړه د شپې لمانځه ته راپاڅوي او تر اوداسه وروسته لمونځ وکړي؛نو د داسې”مېړه او مېرمن” په ليکه کې شمېرل کېږي،چې خداى ډېر يادوي . (وسايل٧\٢٥٧)

ð څوک چې د شپې لمونځ کوي؛نو پايلې يې دا دي : ( ١) پالونکى ترې خوشحالېږي .(٢) د پرښتو ورسره مينه پيدا کېږي .(٣) د پېغمبرانو د سنتو عملي کول دي .( ٤) دپوهې رڼا يې ده. ( ٥) د ايمان اصل او بنسټ به يې غښتلى کړى وي .(٦) بدن پرې راحت مومي . ( ٧) د شيطان به بد ايسي . ( ٨) د دښمنانو پر وړاندې يې وسله ده. (٩) دعا يې قبلېږي .(١٠) کړنې يې (د خداى په درشل کې) قبلېږي . ( ١١) روزي يې برکتي کېږي . (١٢) د ملک الموت پر وړاندې د شفاعت لامل يې وي . (١٣) په قبر کې يې څراغ وي . (١٤) دا اړخونو بالښت به يې وي .( ١٥) منکر او نکير ته يې ځواب وايي .(١٦) په قبر کې تر قيامته يې ملګرى وي .(١٦) او چې قيامت راورسي؛نو د شپې لمونځ  يې : ( الف) : پرسر  سيورى او تاج وي  ( ب) د بربنډ بدن جامې وي .( ج) او رڼا يې وي،چې مخه ورته رڼا کوي (د) د هغه او اور تر منځ به پرده وي (ذ) د خداى پر وړاندې به يې د ايمان دليل وي( ذ) د نېکو کړنو د دروندوالي لامل به يې وي .(ر) له صراطه د تېرېدو اجازه ليک به يې وي .( ز) او د جنت کونجي به يې وي .(ارشاد القلوب  ١\١٩١)

 

اوبه

ð اوبه د دنيا او آخرت د څښاک آغلې (ښکلې) دي  .(طب النبي :٢٣مخ )

ð (د ورځې) په ولاړه اوبه څښه،چې روغتيا ته دې ګټورې دي. (مستدرک الوسايل ١٧\٨)

ð څوک چې د شپې په ولاړه اوبه وڅښي؛نو پر ناعلاجه ناروغۍ اخته کېږي . ( مستدرک الوسايل١٧\٩ )

ðاوبه په غړپ غړپ وڅښئ؛په يو وار اوبه څښل د ځيګر ناروغۍ رامنځ ته کوي . ( الکافي : ٦\٣٨١)

 

نهيلي

ð خداى د قيامت پر ورځ نهيلي تورمخي راپاڅوي او ورته ويل کېږي : دوى له الهي رحمته نهيلي ول . (النوادر للراوندي : ١٨ مخ )

ð په ګناه پسې د سترګو تر رپ چابکه،استغفار وکړئ او که و مو نه کړ؛ نو انفاق وکړئ او که دا مو و نه کړ؛نو خپله غوسه تېره کړئ،که دا مو ونه کړه؛نو خلکو ته څه ورکړئ او که دا مو و نه کړل؛نو له خلکو سره احسان وکړئ او که دا مو و نه کړ؛نو پر ګناه ټينګار پرېږدئ او که دا مو و نه کړ،د خداى په هيله استغفار وکړئ او هېڅکله دخداى له رحمة مه نهيلېږئ . ( مستدرک الوسايل  ١٢\١٢٤)

 

اړتيا

ð څلور څيزونه د جنت له زېرمو دي : ( ١) د اړتياپټول ( ٢) د صدقې پټول ( ٣) د ناروغۍ پټول ( ٤) د ګناه پټول . ( الامالي للمفيد:٨مخ )

ð اړتيا انسان ته د خداى امانت دى؛نو چاچې له ځان سره وساتله ؛ نو خداى ورته د لمونځ کوونکيو بدله ورکوي . ( الکافي ٢\٢٦١)

 ð څوک چې د خپل وروراړتياوې پوره کړي (؛نو) خداى يې پخپله اړتيا وې لرې کوي . ( سنن ابي داود ٢/٤٥٤)

ðخداى چې د کوم بنده خير وغواړي (؛نو) د نورو خلکو د اړتياوو لرې کولو مرجع يې ګرځوي . ( فردوس ١/٢٤٣)

 

نيت

ð بې عمله وينا،بې نيته او بې وينا عمل او (همداراز)عمل او نيت، چې له سنتو سره اړخ ونه لګوي (؛نو څه) ارزښت نه لري . ( الکافي  ١\٧٠)

ð د مؤمن نيت تر کړنې يې غوره دى او د کافر نيت تر کړنې يې بدتر دى او هر څوک د خپل نيت له مخې عمل کوي . (الکافي ٢\٨٤)

ð په حقيقت کې د کړنو ارزښت يوازې په نيتونو پورې اړه لري . (تهذيب الاحکام  ١\٨٣)

ð ابوذره! هڅه کوه،چې د هر څه لپاره نيت ولرې ان د ويدېدو او خوړو لپاره . ( وسايل  ١\٤٨)

ðکه څوک نيت وکړي،چې خپله کړې ژمنه به ترسره نه کړي (؛نو) ژمنه يې ماته کړې . ( کنز ٦/ ٢٢١)

ðد مؤمن نيت، تر  کړنو يې غوره دى . ( کافي ٢/ ٨٤ )

ðپه هر څيز کې ښه نيت لره،ان که په خوب اوخوړو کې وي . (مکارم الاخلاق : ٦٤٢)

 

چل

ðپه يقين د ژغورنې لار مو دا ده،چې له خداى سره چل مه کوئ،چې خپله به تېر وځئ؛ځکه څوک چې خداى تېر باسي؛نو همدى به وغولېږي او ايمان به يې زايل (او لرې) شي،که پوه شي؛نو ځان به يې غولولى وي.  (الامالي للصدوق : ٥٨١)

 

مېلمه

ðکوم کور ته چې مېلمه ولاړ نشي؛نو پرښتې هم نه ورننوځي . (جامع الاخبار: ١٣٦)

ðمېلمه د جنت  لار او لارښوونکى دى . (جامع الاخبار: ١٣٦)

ðڅوک چې زکات ورکړي او د مېلمه درناوى وکړي او په سختيو کې بخشش وکړي؛نو د کنجوسۍ له آفتونو به خوندي وي .(مستدرک الوسايل ٧\٣٢)

ðد مېلمه درناوى او خواړه ورکول له اخلاقي ځانګړنو دي . (الجعفريات : ١٥٤)

ðمېلمه چې د چا پر کور ننوځي،روزي يې رارسي او چې وځي؛نو د کوربه ګناهونه هم دباندې وځي ( کوربه له ګناهونوپاکېږي) (پورته :١٥٤)

ðڅوک چې کوم ښار ته ننوځي؛نو تر هغه د خپلو دينوالو مېلمه شمېرل کېږي،چې له ښاره ووځي .(علل الشرايع ٢\ ٣٨٤)

ðد مېلمستيا له احکامو دي،چې مېلمه به بې د کوربه له اجازې مستحبه روژه نه نيسي . ( الکافي ٤\١٥١)

ðمېلمستيا درې شواروزه ده او تردې ډېره په صدقه کې شمېرل کېږي، چې کوربه يې مېلمه ته ورکوي او نه ښايي مېلمه کوربه ستړى کړي،چې  پرېږدي يې يا يې وشړي . (الکافي٦\٢٨٣، جامع الاخبار: ١٣٦)

ðمېلمه د کوربه کور ته له خپلې روزۍ سره راننوځي او چې وځي؛نو د کوربنو ګناهونه له منځه ځي .( بحار ٧٥/٤٦١)

ðکوم کور ته چې مېلمه ولاړ نشي؛نو پرښتې هم نه ورننوځي .(بحار ٧٥/٤٦١)

ðمېلمه ته ځان ډېر مه کړوئ .( کنز: ٢٥٨٧٥ح )

ðڅوک چې پر خداى او د قيامت پر ورځ ايمان لري؛نو د خپل مېلمه عزت دې وکړي .( جامع الاخبار: مخ ٣٧٧ )

 

ورکاوى

ðد دې امت سمېدل (او صلاح) په زهد او يقين  کې او پوپنا کېدل  يې په کنجوسۍ او اوږدو هيلو کې وي . ( الخصال ١\ ٧٩)

ð (د زړه له کومې) خندا د پوپنا کېدو لامل دى .(مستدرک الوسايل ٨ \٤١٧)

ðپه دوو څيزونو زما د امت ښځمنې پوپنا کېږي : په سرو او نريو جامو او د امت نارينه مې د علم په پرېښوولو او مال راغونډولو ورکېږي . (ارشادالقلوب  ١\١٨٣)

ðخداى تعالى وايي : کوم بنده،چې زما ومني؛نو هغه بل چا ته نه پرېږدم او چې څوک زما ونه مني؛نو خپل ځان ته يې ورپرېږدم،چې که په کومه کنده کې تري تم شي؛نو څه پروا يې نه لرم .(من لايحضره الفقيه ٤\٤٠٣)

 

بېوسي

ðله بېوسي سره مرسته دې له غوره صدقاتو ده . ( الکافي ٥\٥٥)

ðډېره ستره بېوسي داده،چې له چا سره دې پر ملګرتوب خوښه راشي؛ نو د نوم،نسب او د اوسېدو د ځای پوښتنه ترې و نه کړې . (مسايل علي بن جعفر : ٣٣٠ مخ )

ðډېره ستره بېوسي دا ده،چې څوک دې خوړو ته راوبولي؛خو بې دليله ور نشې .(المحاسن ٢\٤١١)

ð ډېر بېوسې هغه دى،چې له دعا کولو عاجز وي او ډېر کنجوس هغه دى،چې په سلام اچولو کې کنجوسي کوي . (الامالي للمفيد : ٣١٧)

 

نوک

ðڅوک چې د جمعې پر ورځ خپل نوکان غوڅوي؛نو ګوتې يې نه خرابېږي .( الجعفريات : ٢٩ مخ )

ðد نوکانو غوڅول،انسان پر سختو ناروغيو له اخته کولو ژغوري او د روزۍ د پراخۍ لامل يې ګرځي .( الکافي ٦\٤٩٠)

ðنارينه وو!خپل نوکان پرې کړئ (او ښځمنو ته يې وويل:) خپل نوکان پرېږدئ،چې ښکلا مو ده . (دعائم الاسلام ١\١٢٤)

ðڅوک چې د جمعې پر ورځ خپل نوکان پرېکوي،پاک خداى د هغه له ګوتو دردونه وباسي او شفا ورکوي . (النوادر للراوندي : ٢٣مخ )

 

ناپوهه

ðدوه غرېبې کلمې دي،چې ويې زغمئ : د ناپوهه د حکمت خبره ومنئ او د حکيم له ناپوهه خبرې تېر شئ . ( من لايحضره الفقيه ٤\٤٠٦)

ðناپوهي ډېره سخته نيستي ده او عقل ډېره ګټوره شتمني ده . (الکافي  ١\٢٥)

ðعاقل هغه دى،چې د خداى ومني،که څه هم (ظاهراً) بدرنګه وي او ناپوهه هغه دى،چې د خداى و نه مني که څه (ظاهراً) ښکلى وي،ډېر عقلمن غوره خلک دي .( بحارالانوار ١\١٦٠)

ðعقل يوه کېزه ده،چې پر ناپوهۍ لګول کېږي .(مستدرک الوسايل  ١١\٢٠٩)

 

نفلونه

ðخداى تعالى وايي : څوک چې زما د کوم دوست سپکاوى وکړي؛نو له ماسره به يې جګړه اعلان کړې وي او بنده د فرايضو پر ادا کولو سربېره، په نفلو او مستحبي کړنو (هم) ما ته تردې رانږدېداى شي،چې ښه يې وګڼم؛نو زه يې غوږونه کېږم،چې پرې يې واوري او سترګې يې کېږم، چې پرې وګوري او ژبه يې کېږم،چې خبرې وکړي او لاسونه،چې کار پرې وکړي ،که دعا وکړي،قبلوم يې او که وغواړي،ورکوم يې .(الکافي  ٢\٣٥٢)

ðد امت کړنې مې راوړاندې شوې او و مې لېدې،چې زياترو يې نيمګړتيا درلوده؛نو هر فرض لمونځ ته مې دوه مستحبه کېښوول ،چې په کولو يې د وګړي فرض لمونځ قبول شي؛ځکه خداى حيا کوي،چې د خپل بنده له کړنې درېمه قبوله نه کړي .( وسايل  ١٠ \٤٢٦)

 

نوم

ðاولادونو ته مو غوره ډالۍ،پرې ښه نوم ايښوول دي . (النوادرللراوندي :  ٦مخ )

ðکه پر زوى مو د “محمد” نوم کېښود؛نو احترام يې وکړئ او په ناسته کې ځاى ورکړئ او بد يې مه ګڼئ . ( عيون اخبارالرضا ٢\٢٩ )

ðد کورنۍ د کوم غړي،چې د کوم پېغمبر نوم وي؛نو دا کوربه تل برکتي وي .( دعائم الاسلام ٢\١٨٨)

ðڅوک چې درې زامن لري او پر يو يې د “محمد” نوم نه وي ايښى ؛ نو له ماسره يې جفا کړې ده .( الامالي للطوسي : ٦٨٢)

 

لیک

ðښکلى ليک،د حق څرګندوالى لاپسې زياتوي . ( کنز: ٢٩٣٠٤ )

ð د نورو د ليک ځوابول،د سلام د ځوابولو په څېر لازم دي . ( کنز ١٠ /٢٤٣)

ðعلم په ليک کې را ايسارکړئ . ( ميزان الحکمه : ١٧٣٢٤ح )

ðد يوې ليکنې ارزښت په پاى کې يې نغښتى دى .( کنز ١٠/٢٤٣)

ðد ليک ځوابول،د سلام د ځوابولو په څېر واجب دي . (الجامع الصغير ٢\ ١٤)

ðڅوک چې د غازي ليک (کورته يې) ورسوي؛لکه چې مريى يې ازاد کړى او د جهاد په ثواب کې ورسره شريک دى . ( الکافي : ٥)

 

مړه خوا

ðتر وسې ( له نورو) څه مه غواړه . ( مستدرک الوسايل ٧\٢٢٤)

ðڅوک چې خلکو ته خپلې ستونزې رابرسېره کړي؛نو ځان يې رسوا کړ، غوره غنا له نورو نه غوښتل دي اودا ډېر ناوړه فقر دى،چې څوک په زوره عاجزي کوي  . (پورته)

 

وېښته

ðښکلي وېښتان  ښکلا ده .( الکافي ٢\٦١٥)

ðښکلي وېښتان الهي پوښ دى؛نو عزت يې وکړئ . (الجعفريات :١٥٦)

 

مؤمن

ðمؤمن د عطارپه څېر دى،که ورسره کېنې ګټه در رسوي اوکه پرلار هم ورسره ولاړ شې (بيا هم) ګټه دررسوي اوکه په چاروکې ورسره ګډون وکړې (؛نو هم) ګټه دررسوي . (دسيوطي جامع الصغير)

ðمؤمن د شاتو د مچۍ په څېر دى،چې يوازې پاک خوري او پاک پر ځاى پرېږدي . (دسيوطي جامع الصغير)

ðمؤمنين د اخلاص له مخې پر يو بل درجې او لوړاوى مومي . (تنبيه الخواطر ٢/١١٩)

ðهله به مؤمن يې،چې  تر پلار اولاد او نورو خلکو له ما سره ډېره مينه ولرې .( بخاري – مسلم )

ðهله به مؤمن يې،چې ځاني غوښتنې دې زما په لارښوونو پسې ولاړې شي . ( بغوى فى شرح السنة– مشکاة )

ð د ښه خوى خاوند تر ټولو بشپړ مؤمن دى .(ابوداوود- الدارمي)

ðهله به مؤمن يې،څه چې ځان ته خوښوې ،نوروته يې هم خوښ کړې . ( بخاري-مسلم )

ðمؤمن د مؤمن هېنداره ده اومؤمن د مؤمن ورور دى؛زيان ترې لرې کوي ،پاسوالي او ملاتړ يې کوي .( “ابوداود”- “ترمذي” )

ðشونې ده،چې مؤمن ډارن او بخيل شي؛خو نه دروغجنېږي.  (بيهقي)

ð مؤمن خداى ته تر مقربو پرښتو هم عزتمن دى .( کنز ١/١٦٤)

ð مؤمن ځيرک او هوښيار دى . ( ميزان : ١٤٥٠ )

ð مؤمن د مؤمن هېنداره ده .(کنز: ٦٧٣ح)

ð مؤمن هېڅکله له يوې سوړې دوه ځل نه چيچل کېږي .(صحيح البخاري ٧ / ١٠٣ )

ð مؤمن د مؤمن ورور دى او په يو حال کې هم نصيحت ترې نه سپموي . ( کنز ١ /١٤٢)

ðد مؤمن د کړنليک عنوان د علي بن ابي طالب دوستي ده . (کنز ١١/ ٦٠١)

ðمؤمنان د يو بل وروڼه دي . ( بحار ٧٧/٢٦٩)

ðمؤمن چې د مؤمن ورور په چوپړ کې وي ؛نو تردې لوړ مقام نه ترلاسه کېږي .( مستدرک ١٢/٤٢٩ )

ðمؤمن د مينې او الفت پلازمينه او مرکز دى؛نوکه څوک له نورو سره مينه او دوستي نه لري او نور يې هم ورسره نه لري؛نو په هغه کې هېڅ ډول خير نشته . ( بيهقي – احمد )

ðد مؤمن په طبيعت کې له “خيانت” او “دروغو” پرته بل هر څه ورننووتلاى شي .( احمد- بيهقي)

  ðمؤمن،مؤمن ورور ته د هيندارې په څېر دى،چې حاضر نه وي؛نو زړه يې پرې سوځي او چې حاضر وي،څه چې يې نه خوښېږي،ترې لرې کوي او په غونډه کې ځاى ورکوي . (النوادر للراوندي : ٨مخ )

ðد مؤمن له ځيرکۍ ډډه وکړئ،چې په الهي رڼا يې ګوري . (الکافي  ١\٢١٨)

ðد مؤمن ژغورنه، د ژبې په ساتنه کې يې نغښتې ده . (الکافي ٢\١١٤)

ðنشتمنو ته د شتمنۍ زياته ورکړه او له خلکو سره په انصاف چلېدل،د حقيقي مؤمن ځانګړنې دي .( الکافي ٢\١٤٧)

ðمؤمن د کجورې د ونې په څېر دى،چې پاڼې يې په اوړي او ژمي کې نه تويېږي .( الکافي ٢\٢٣٥)

ðدعا د مؤمن وسله،د دين ستن او د اسمانو او ځمکې رڼا ده . (الکافي  ٢\٤٦٨)

ðمؤمن په الهي ادب مؤدب شوى،د پراخۍ پر مهال ډېر څه لګوي او چې تنګلاسى شي؛لګښت يې لږ وي .( الکافي ٤\١٢)

ðمؤمن پر مؤمن (اوه) واجب حقوق لري 🙁 ١) په درنه سترګه وروګوري (٢) له زړه نه ورسره مينه ولري(٣) له خپلو شتمنيو يې ورکړي(٤) غيبت يې حرام بولي(٥) د ناروغۍ  پر مهال يې پوښتنې ته ورځي(٦) په جنازه کې يې برخه اخلي(٧) او تر مرګ وروسته يې يوازې په ښو يادوي .(من لايحضرالفقيه ٤\٣٩٨)

ðمؤمن ته چې (تر مړينې وروسته) لومړۍ ډالۍ ورکول کېږى،داده، چې پخپله او هغوى چې په جنازه کې يې ګډون کړى بښل کېږي .(وسايل ٣\١٤٤)

ðمؤمن هغه دى،چې نور مؤمنان په خپل ځان او شتمنۍکې د اعتماد او ډاډ وړ وبولي .( وسايل ١٢\٢٧٨)

ðمؤمن د ځمکې په څېر دى،چې خلک ترې ګټه اخلي او ازاروي يې او څوک چې د خلکو پر جفا زغم و نه کړي؛نو د خداى رضا نشي تر لاسه کولاى؛ځکه د خداى خوښي د خلکو له جفا سره اغږل شوې ده . (بحارالانوار ٦٨\٤٢٢)

ðکه له تاسې څوک ناوړه کار وويني؛نو په لاس دې يې سم کړي، که داسې نشي کړاى؛په ژبه دې يې سم کړي او که دا يې هم نشو کړاى؛نو په زړه کې دې پرې ناخوښه وي او که داسې هم نه وي؛نو ايمان يې خورا کمزورى دى .( مستدرک الوسايل ١٢\١٩٢)

ðد مؤمن له  اخلاقي ځانګړنو دي 🙁 ١) (د جماعت) په لمانځه کې حاضر وي( ٢) د زکات په ورکړه کې بيړه کوي . (٣) بېوزليو ته خواړه ورکوي . (٤) پر پلار مړي د لورنې لاس راکاږي . ( ٥) جامې يې ( زړې؛خو) پاکې وي(٦) د بدن ( په تېره بيا د عورت) په ساتلوکې ډېره ځيرنه کوي( ٧) په خبرو کې دروغ نه وايي( ٨) پر خپله ژمنه درېږي (٩) که اعتماد پرې وشي؛خيانت نه کوي(١٠) په خبرو کې رښتيا وايي ( ١١) دشپې راهبان (١٢) او د ورځې زمريان وي ( ١٣) د ورځې روژه تيان (١٤) او د شپې پر لمانځه ولاړوي ( ١٥) نه کوم ګاونډى ځوروي (١٦) او نه يې کوم ګاونډي له لارې ځورېږي (١٧) پر لار په وقار او تواضع روان وي ( ١٨) د بېوزليو لاسنيوونکي وي (په انفاق او صدقه ورسره مرسته کوي) (١٩) د مؤمنانو په جنازو کې ګډون کوي . خداى دې موږ او تاسې په پرهېز کارانو کې وشمېري . ( الکافي ٢\ ٢٣٢)

 

لورنه

ð پر نورو ولورېږئ،چې درباندې لورنه وشي؛نور وبښئ،چې وبښل شئ . (کنز ٣/١٦٤ )

ð ستا تر ګناهونو د خداى بښنه ډېره ده [؛نو] هيڅکله د خداى له رحمته مه نهيلېږه. ( کنز ٤/ ٢١٤)

ðڅوک چې پر خلکو ونه لورېږي؛نوخداى به پرې ونه لورېږي . ( عوالي الآلي ١/٣٦١٩

ðڅوک چې پر خلکو ونه لورېږي؛نو خداى به پرې هم و نه لورېږي . (بخاري– مسلم)

ðڅوک چې پر نورو ونه لورېږي؛نو خداى به پرې و نه لورېږي .( بخاري – مسلم )

ðڅوک چې پر خلکو ونه لورېږي؛نو خداى به پرې و نه لورېږي . ( مستدرک الوسايل ٩\٥٥)

ðڅوک چې پر کوچنيانو لورين نه وي او د مشرانو درناوى نه کوي او زموږ حق ونه پېژني؛نو له موږ ځنې نه دى .( الامالي للمفيد: ١٨ مخ )

مهر

ðخداى د قيامت پر ورځ هره ګناه بښي؛خو له دې درېو ګناهونو پرته ( ١) دخپلې مېرمنې د مهر نه ورکول ( ٢)  د کارګر حقوق نه ورکول (3) ازاد انسان د مريي په توګه پلورل .( الکافي ٥\٣٨٢)

 

مسئووليت

ðتاسې ټول (د تر لاس لانديو وګړيو،خپلې کورنۍ او ټولنې) پالندويان او مسؤولين ياست او په دې اړه به وپوښتل شئ . (منيةالمريد : ٣٨)

ðڅوک چې سهار راپاڅي او د مسلمانانو د چارو سمونې او د ستونزو هواري  ته يې لاسونه رابډ نه وهي؛نو مسلمان نه دى .( الکافي :١٦٣)

ðڅوک چې د چا اواز واوري،چې مسلمانانو ! (راورسئ) او ستونزه مې لرې کړئ! ؛خو دې بلنې ته يې ځواب و نه وايي (او مرسته ورسره ونه کړي؛نو) مسلمان نه دی .( الکافي ٢\ ١٦٤)

 

نشه يي توکي

ðهر نشه ييز څيز حرام دى؛نو د يو څه چې ډېر مقدار د نشه کولو لامل ګرځي ؛نو لږ يې هم حرام دى .( الکافي ٦\٤٠٨)

 

جومات

ðبلاوې،کړاوونه،آفتونه او سختۍ چې راشي؛نو جوماتوال ترې خوندي او په امان کې وي . ( الجعفريات : ٣٩)

ðاوه تنه به هغه ورځ د الهي رحمت تر سيورې لاندې وي ، چې بې له دې به هيڅ سيورى نه وي ( ١) عادل واکمن ( ٢) هغه ځوان،چې د خداى پر عبادت بوخت وي (٣) هغه چې په ښي لاس صدقه ورکړي ؛خو کيڼ يې ترې خبر نشي ( ٤) هغه چې په يوازېتوب کې خداى ياد کړي او له وېرې يې سترګې له اوښکو ډکې شي(٥) څوک چې مؤمن وګوري او ورته ووايي،چې يوازې د خداى لپاره راته ګران يې (٦) هغه چې له جوماته ووځي او نيت يې داوي،چې بيا ورته راشي(٧) او هغه چې ښکلې ښځه  يې ځان ته راوبولي؛خو دى ورته وايي،چې له ” نړى پالونکي” خدايه وېرېږم . ( الخصال ٢\٣٤٣)

ðابوذره ! په جومات کې بې له لمونځ کولو،خداى يادولو او پوهې تر لاسه کولو ناستى خوشې دى . ( مستدرک الوسايل ٣\٣٧١)

ðجوماتونه،د آخرت له بازارونو وي،پيسې يې بښنه او څيزونه يې جنت دى .( الامالي للطوسي : ١٣٩ )

ðجومات ته،چې  ننوځئ؛نو دوه رکعته لمونځ پکې وکړئ .(وسايل  ٥\٢٩٣)

ðجوماتونه مو هغسې مه ښکلي کوئ؛لکه چې يهوديانو او مسيحيانو خپلې صومعې او کليساوې ښکلې کړې دي .(مستدرک الوسايل٣\ ٣٧)

 

مسلمان

ðمسلمان هغه دى،چې نور مسلمانان يې له لاس او ژبې خوندي وي . مسلمان پر مسلمان حق لري چې 🙁 ١) د کتنې پر مهال پرې سلام واچوي (٢) د پرنجي پر مهال ورته روغتيا وغواړي(٣) په ناروغۍ کې يې پوښتنې ته ورشي(٤) بلنه يې ومني(٥) په جنازه کې يې ګډون وکړي (٦) څه چې ځان ته خوښوې،هغه ته يې هم خوښ کړي،څه چې يې بدې ايسي،هغه ته يې هم بد و ايسي(٧)چې حاضر نه وي،خير غواړى يې وي او څوک نه پرېږدي،چې غيبت يې وکړي ( ٨) پر غم يې خپه شي .( ٩) عيبونه او نيمګړې يې پټې کړي (١٠) له تېروتنو يې تېر شي (١١) تل پرې زړه سواندى وي( ١٢) د دوستۍ حقوق يې پوره کړي (١٣) پر ژمنو يې ولاړ وي ( ١٤) ډالۍ يې ومني (١٥) لورونې يې بېرته ورپوره کړي(١٦) له نېکيو يې مننه وکړي( ١٧) مرسته او لاسنيوى يې ښه وګڼي (١٨) کورنۍ يې وساتي (١٩) اړتيا يې پوره کړي (٢٠) چې بې لارې شي،سمه لار ور وښيي( ٢١) سلام يې ځواب کړي (٢٢) خبره يې بده نه ګڼي(٢٣) بخشش يې ښه وګڼي (٢٤) سوګند يې رښتيا وبولي(٢٥) له دوستانو سره يې دوست وي (٢٦) چې پر بل ظلم کوي،له ظلمه يې منع کړي او چې مظلوم شي،له بل يې د حق په اخستو کې ورسره مرسته وکړي او ځان ته يې يوازې پرېنږدي . ( الاختصاص : ٢٣٣- او کنزالفوائد  ١\٣٠٦)

 

سلامشوره

ðتر سلامشورې بل غوره ملاتړ نشته .(تحف العقول: مواعظ النبي) 

ðڅوک تر مشورې وروسته،هيڅکله نه هلاکېږي . ( اثنى عشريه: ١٦ مخ )

ðرسول اکرم ته وويل شو:”حزم  او احتياط څه ته وايي؟” و يې ويل :”د راى له خاوندانو سره سلا مشوره کول او د هغوى منل .” (سفينة البحار ١ / ٧١٨ )

ðله چاچې خپل مؤمن ورورسلامشوره وغواړي او هغه ورته ګټور نصيحت ونه کړي؛نوخداى به ترې عقل واخلي .(سفينة البحار ٢ / ٥٩٠ )

ðله داړن سره سلامشوره مه کوه،چې د وتو لار درباندې تنګوي . له بخيل سره هم سلامشوره مه کوه،چې تا له خپلې موخې پاتې کوي او له حريص سره هم مشوره مه کوه،چې هيلې درته ښکلې انځوروي. (دصدوق خصال : باب الثلاثه، ٥٣ حديث )

ðمشوره د پښېمانۍ او د نورو د پړې پر وړاندې ټينګه کلا او ډال دى . ( نثرالدر ١ /١٨٣)

ð له نورو سره مشوره ډاډمن ملاتړ دى .( بحار ٧٥/١٠٠)

ðله عقلمنو مشوره وغواړئ اوله مشورو يې سر مه غړوئ،چې  پېښيمانه به شئ .( بحار ٧٥/١٠٠)

ðله چا سره،چې په کومه مساله کې مشوره وشوه ؛نو په اړه يې امين دى او هغه ورته امانت سپارل شوې ده .(ترمذي)

ðله عقلمن زړه سواندي سره مشوره،د ودې او برکت لامل او د خداى له لوري توفيق دى؛نو پرتا ده،چې له همدغسې تن سره مشورې وکړې او له مشورې سره يې مخالفت مه کوه،چې ورک به شې . ( لمحاسن ٢\٦٠٢)

 

مصيبت ( کړاو )

ðبنده ته چې مصيبت ورسي او و وايي: ((انا لله و انا اليه راجعون))؛ خدايه ! د دې مصيبت اجر راکړه اوتردې غوره يې بدله راکړه او خداى به همداسې وکړي .( نووي ١ / ٦٩٧ )

ð د خپل ورور په مصيبت او کړاو مه خوشحالېږه (که داسې دې وکړل)؛نو شونې ده،چې خداى هغه له مصيبته وژغوري او تا پرې اخته کړي . (ترمذي)

 ð دوه ځانګړنې دي،چې که د چا په برخه شوې؛نو د دنيا او اخرت خير به يې په برخه شوى وي : د کړاو پر مهال صبر کول او چې نعمت ورورسي، شکر پرې کاږي . (مجموعه ورام ٢/ ٢٤٧)

ð که پر کړاو اخته مو وليدل؛نو په زړه کې د خداى شکر وباسئ؛خو داسې نه چې هغوى يې واوري؛ځکه چې خپه کېږي . (الکافي ٢/ ٩٨)

ðڅلور څيزونه د جنت له زېرمو دي : (١) د اړتيا پټول( ٢) د صدقې پټول ( ٣) د ناروغۍ پټول او ( ٤) د کړاوونو پټول . (الامالي للمفيد : ٨)

ðمؤمن د مصيبت پر مهال پر”ورانه” وهل،د بدلې د پوپنا کېدو لامل يې ګرځي . ( مسکن الفوائد : ٥١مخ )

ðپه زغم د غوسې د غړپ تېرول او په صبر د مصيبت د ګوټ زغمل د خداى لوري ته ښې لارې دي .( الکافي ٢\١١٠)

ðهغه به د خداى په رڼا کې وي،چې دا څلور ځانګړنې ولري : ( ١) پر (( لا (اله) – الا (الله) – محمد رسول الله)) يې ټينګې منګولې لګولې وي (٢) د مصيبت پر مهال ووايي : (( انالله وانا اليه راجعون )) (٣) نعمت چې ورورسي،ووايي: ((الحمدلله رب العلمين))(٤) او چې ګناه وکړي، ووايي : ((استغفرالله ربي واتوب اليه. ( من لايحضره الفقيه ١\١٧٥)

ðکه کوم  يو پر مصيبت اخته شوئ ؛نو زما د نشتوالى مصيبت درياد کړئ،چې له سترو مصيبتونو دى . ( وسايل ٣\٢٦٨)

ðڅوک چې له ور رسېدلي مصيبته شکايت وکړي؛نو له خپل پالونکي به يې شکايت کړى وي . ( تفسيرالقمي ١\٣٨١)

ðڅوک چې مؤمن ورور ته د وررسېدلي مصيبت تسلي ووايي؛نو خدای ورته شنې جامې وراغوندي،چې د قيامت پر ورځ به يې (چې ټول بربنډ وي) د ښکلا لامل شي . (مستدرک الوسايل  ٢\ ٣٤٩)

ðخداى تعالى وايي : کوم بنده،چې له بدني،مالي يا اولادني مصيبت سره مخ کړم او په ښکلي صبر (=جميل) يې وزغمي؛نو زه ترې حيا کوم (چې د قيامت پر ورځ) ورته تله کېږدم او يا يې کړنليک راپرانځم . (مستدرک الوسايل ٢\٣٤٩)

ð څوک چې سهار کړي؛خو له دنيا (او پېښو يې) غوسه وي،په واقع کې پر خداى غوسه شوى دى او چې له وررسېدلي کړاوه شکايت وکړي؛ نو په حقيقت کې له خدايه يې شکايت کړى دى .( تفسير القمي ١/ ٣٨١)

ðخداى چې د کوم بنده خير وغواړي؛نو په همدې دنيا کې سزا ورکوي او که (په دنيا کې) کوم بنده ته بدي وغواړي؛نو د ګناهونو له امله يې سزا نه ورکوي او په قيامت کې يې ورکړي . ( شيباني ٣\٣٤٤)

ðڅومره چې کړاو ستر وي؛نو اجر يې هم ستر وي،د خداى چې کوم بنده خوښ شي؛نو پر کړاو يې اخته کوي؛نو که پرې خوښ و،خداى ترې خوښېږي او که پرې ناخوښه و؛نو خداى ترې هم ناخوښېږي . (شيباني  ٣\٣٤٤)

ð د مؤمن نر او ښځه تل د ځان،اولاد او مال پر کړاو اخته کېږي،چې له خداى سره د کتو پر مهال يې ګناه تر غاړې نه وي . ( شيباني٣\٣٤٤)

ðمؤمن ته هر څه خير دي،که لورنه پرې وشي؛نو شکر کاږي،چې دا ورته خير دى او که څه کړاو ورورسي،صبر پرې کوي،چې دا هم ورته خير دى .  ( المعجم ١\ ١١٥)

ðڅوک چې مؤمن ورور ته د وررسېدلي کړاو تسلي ورکړي؛نو خداى ورته په قيامت کې جنتي وياړنې جامې وراغوندي .(مسکن الفواد: ١١٥مخ )

 

معاشرت

ð پوهان وپوښتئ،له حکيمانو سره ناسته پاسته وکړئ او له نشتمنو سره ملګرتوب وکړئ . ( النوادرللراوند ي: ٢٦مخ )

 

مين